बापू की कलम को प्रणाम!

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fगरीशजी: पुण्यतिथि पर विशेष : आज महात्मा गांधी की पुण्यतिथि है. बापू को श्रद्धांजलि के साथ पिछले दिनों वर्धा के महात्मा गांधी अंतर्राष्‍ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय में हुए सेमिनार की याद आ रही है, जिसमें पत्रकारिता के संदर्भ में गांधी की बात उठी थी. मेरी मान्यता है कि गांधी दुनिया के महानतम पत्रकारों में से एक थे. जननेता, राजनीतिज्ञ, समाजसुधारक और संत या महात्मा बनने या इनकी जनता के बीच स्वीकार्यता की प्रक्रिया तो जीवन के बाद के चरणों की है. जीवन की शुरुआत तो वकालत के साथ पत्रकारिता की ही रही.

दक्षिण अफ्रीका में 1890 के दशक में वह ’टाइम्स ऑफ नटाल' समेत कई अखबारों में संपादक के नाम पत्र लिख रहे थे और फिर 1903 में उन्होंने इंडियन ओपीनियन का प्रकाशन शुरू किया. वो लगभग पचास वर्षों तक साफगोई, स्पष्टता और ईमानदारी के साथ पत्रकारिता से संबद्ध रहे. इनमें चालीस साल तो सीधे तौर पर वे लगभग आधे दर्जन अखबारों के संपादन में सक्रियता से जुड़े रहे. माना जाता है कि उन्होंने अपने जीवन में एक करोड़ से ज्यादा शब्द लिखे. यानी पांच सौ शब्द पत्रकारिता के सक्रिय जीवन में रोज. गांधी ने लिखा है- ’मैंने पत्रकारिता से जहां गांधीजीआत्मनियंत्रण सीखा वहीं समाज को गहराई से जानने-समझने का मौका भी मिला. बिना पत्रकारिता के किसी जनांदोलन को चलाना मुश्किल काम है और मेरे लिए भी बिना पत्रकारिता के सत्याग्रह के संदेश को लोगों तक पहुंचाना कठिन होता...'

लेकिन गांधी के दौर की पत्रकारिता क्या आज संभव है? क्या यह संभव है कि गांधी की तरह बिना विज्ञापन प्रकाशित किए किसी अखबार को चलाया जा सकता है? क्या गांधी की तरह मिशनरी के रूप में पत्रकारिता से जुड़ा जा सकता है, कोई अखबार उस तरह से भी निकल सकता है जैसा कि गांधी ने निकाला और उसे इंडियन ओपीनियन, नवजीवन, यंग इंडिया या हरिजन की तरह लंबे समय तक चलाया जा सकता है? स्पष्ट है कि इसका जवाब सामान्‍तय: नकारात्मक ही है. लेकिन इन प्रश्नों को गहराई से समझने की आवश्यकता है. दरअसल, गांधी की पत्रकारिता, जनता से गहरे जुड़ाव और फिर महात्मा बनने की श्रृंखला के मूल में थी- उनकी ईमानदारी, साफगोई और निर्भीकता. मेरा स्पष्ट मानना है कि पत्रकारिता ने गांधी को गांधी बनाया.

कम लोग जानते हैं कि जब 1922 में चौरीचौरा कांड हुआ, जिसमें 21 पुलिस कर्मियों को आंदोलनकारी जनता ने जिंदा जला दिया था, तो गांधी ने खिलाफत आंदोलन वापस ले लिया था. उन्होंने कहा था कि सत्याग्रह में हिंसा के लिए कोई जगह नहीं है. लेकिन तभी गांधी ने यंग इंडिया में तीखा लेख भी लिखा- ’सत्ता की लाल शराब के नशे में मदांध होकर गरीब लोगों की दुर्दशा पर कोई सरकार लंबे समय तक नहीं चल सकती. यह दुनिया का नियम है. अब तो लड़ाई छिड़ चुकी है और ब्रिटेन के लोगों को समझना चाहिए कि यह लक्ष्य हासिल होने तक चलेगी.'

गांधी के इस लेख के साथ ही पूर्व में लिखे दो आलेखों के आधार पर ब्रिटिश सरकार ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया और 1922 में ही उन पर राजद्रोह का मुकदमा चलाया. गांधी ने भरी अदालत में जजों की जूरी (पैनल) के सामने कहा ’चौरीचौरा में हुए नरसंहार की जिम्मेदारी मैं लेता हूं क्योंकि इस आंदोलन की अगुवाई मैं कर रहा था. मेरी इस अदालत से प्रार्थना है कि इसके लिए, जो भी सख्त से सख्त सजा का प्रावधान हो, वो मुझे दी जाए...' गांधी के इस बयान पर अदालत अवाक थी. लेकिन जूरी ने सर्वसम्मत फैसला सुनाया- ’कानूनी प्रावधानों के तहत हम आपको छह साल कड़ी कैद की सजा सुनाते हैं. लेकिन हम ब्रिटिश क्राउन से अपील करते हैं कि आपकी सजा माफ कर दी जाए और यदि यह सजा माफ कर दी जाती है तो सबसे ज्यादा खुशी इस अदालत को ही होगी.

यहां गौर करने की बात यह भी है कि उसी अदालत ने गांधी को लेकर यह टिप्पणी भी की कि ’आपके जैसा कैदी न तो इस कोर्ट में पहले कभी आया है और न ही भविष्य में कभी आएगा.' तो ये थी गांधी की ताकत. लेकिन जेल में तबीयत बिगड़ने पर स्वास्थ्य कारणों से उन्हें 1924 में रिहा कर दिया गया. यहां गहराई से विश्लेषित करें तो कोर्ट में गांधी का बयान और फिर कोर्ट की टिप्पणी विश्व इतिहास में खुद में ईमानदारी का ऐसा नायाब उदाहरण है, जिसका कोई सानी नहीं है और कम लोग महसूस करते हैं कि इसके मूल में सच्चाई पर आधारित उनकी पत्रकारीय दृष्टि ही थी.

गौर करने की बात ये भी है कि गांधी हमेशा ही विपरीत ध्रुवों के बीच संतुलन पर भी जोर देते थे. संभवतः इसी को वो आत्मनियंत्रण भी कहते थे. तभी तो चौरीचौरा कांड के बाद यंग इंडिया में तीखा लेख लिखते हैं, जिसे लेकर राजद्रोह का मुकदमा तक चलता है तो साथ ही ईमानदारी से खुद को ही सजा के लिए पेश भी करते हैं. यह अद्भुत संतुलन गांधी के जीवन के सभी पक्षों में दिखता भी है- चाहे वाम- दक्षिण पक्ष हो, धर्म-राजनीति हो, निजी जीवन हो या सार्वजनिक जीवन, व्य्वसाय हो या नैतिकता या फिर विज्ञान हो या मानवीयता. इसे इस तरह भी समझा जा सकता है कि एक ओर गांधी खुद भारत में 1922 में ही ब्रिटिश सरकार के खात्मे की बात करते हैं तो दूसरी ओर 1915 में दक्षिण अफ्रीका में अपने दूसरे बेटे मणिलाल को एक पत्र लिखते हैं. यह पत्र ऐतिहासिक इस मामले में है कि- ’एक पत्रकार पिता ने पत्रकार बेटे' को यह पत्र लिखा था. तब गांधी दक्षिण अफ्रीका से भारत आ गए थे और वहां फोनिक्स में मणिलाल गांधी ’इंडियन ओपीनियन' देख रहे थे. पिता ने लिखा था- ’इंडियन ओपीनियन में सच लिखो, लेकिन विनम्रता कभी मत छोड़ो. भाषा में उदारता होनी चाहिए और यदि गलती हो जाए तो उसे स्वीकार करो.' तो ये है वो अद्भुत साफगोई, जो विनम्र, उदार, सहज है तो साथ ही उसमें प्रतिबद्धता के प्रति गजब की अपूर्व जिद भी है.

भारत में बीसवीं सदी के सत्तर-अस्सी के दशक में ’खोजी पत्रकारिता' का दौर आया था, लगा था कि पत्रकारिता क्रांतिकारी दौर में प्रवेश कर रही है. तब अनेक घोटालों और दबी-छुपी चीजों का पर्दाफाश हुआ था. लेकिन महसूस करने की बात ये है कि गांधी भारत के ही नहीं दुनिया के चंद पहले खोजी पत्रकारों में शुमार हैं. उन्होंने ही दक्षिण अफ्रीका से लौटने पर बिहार के चंपारण की यात्रा की और वहां ब्रिटिश सरकार के संरक्षण में निलहों के जबरदस्त अत्याचार और किसानों के शोषण के खिलाफ आवाज उठाते हुए उसकी मुकम्मल रिपोर्ट तैयार कर अखबारों में प्रकाशित की. यहां गांधी पत्रकार के साथ ही जननायक और एक्टिविस्ट के रूप में भी सामने आते हैं. और, यही चंपारण भारत के सत्याग्रह की पहली प्रयोगभूमि और आधारभूमि भी बनती है.

गांधी पत्रकारिता के जरिए जीवन के सभी पक्षों को प्रभावित करते हैं - राजनीति के साथ ही समाज सुधार और बेहतर जीवन के सभी पक्षों से वो अखबार को जोड़ते हैं, लेकिन आलोचना से भी पीछे नहीं हटते. तभी तो 1946 में दिल्ली में सांप्रदायिक तनावों और अफवाहों के बीच वो अखबारों की तीखी आलोचना भी करते हैं. अप्रैल 1946 में एक प्रार्थनासभा में वो कहते हैं - पत्रकार चलती-फिरती बीमारी की तरह हो गए हैं. वे खबरों को बढ़ा-चढ़ाकर भड़काऊ बनाकर छाप रहे हैं. यह गलत है. उन्हें मालूम होना चाहिए कि लोग अखबारों में छपी बातों को ईश्वरीय वाक्य मानते हैं. दुख की बात है कि अखबार अपना दायित्व नहीं निभा रहे. और, इसी क्रम में उन्होंने मजाक में यहां तक कहा था कि ’यदि वायसराय की जगह मैं एक दिन के लिए डिक्टेटर बन जाऊं तो मैं हरिजन अखबार को छोड़ कर सभी अखबारों को बंद कर दूं.' ध्यान से देखें तो हरिजन को छोड़ने की बात उन्होंने इसलिए की थी क्योंकि वो सियासत से ज्यादा सामाजिक सुधारों के सवालों से संबद्ध था, और सियासत की खबरों से जुडे़ अनेक अखबार सांप्रदायिक तनावों के समाचारों से भरे थे.

तो ये थी गांधी की पत्रकारीय दृष्टि जो ईमानदारी से पूरी जीवन यात्रा में उनके साथ रही. खुद गांधी ने हमेशा इसकी ताकत को स्वीकार किया. आज देश, समाज, दुनिया सभी कुछ बदल चुकी है. लेकिन आज के बदले सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक माहौल में भी जो चीज नहीं बदली है, वो है कलम का धर्म और उसका नैतिक धरातल. समाज में मूल्यों के स्तर पर लाख गिरावट के बाद भी ईमानदार पहल की दरकार गांधी के समय भी थी, गांधी के पहले भी थी और आज भी है. ईमानदारी-साफगोई-नैतिक पहल का समाज ने हमेशा ही स्वागत किया है. आज बापू की पुण्यतिथि पर भी हमें ऐसी हर पहल के अभिवादन का संकल्प लेना चाहिए- जो चाहे कितनी भी छोटी क्यों न हो, लेकिन ईमानदार हो और उसके केंद्र में समाज का अंतिम व्यक्ति यानी आम आदमी हो. और अंत में, बापू की उस ईमानदार कलम को प्रणाम.

लेखक गिरीश मिश्र वरिष्ठ पत्रकार हैं. इन दिनों वे लोकमत समाचार, नागपुर के संपादक हैं. उनका ये लिखा आज लोकमत में प्रकाशित हो चुका है, वहीं से साभार लेकर इसे यहां प्रकाशित किया गया है. गिरीश से संपर्क This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it के जरिए किया जा सकता है.


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