मिस्र से उठी जम्हूरी हवा!

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गिरीश मिश्र : उम्मीद-आशंकाओं के बीच : ट्यूनीशिया से शुरू हुई जनविद्रोह की धमक ने मिस्र को पूरी तरह से अपने आगोश में ले लिया है. मिस्र में जिस तरह से राजधानी काहिरा, सुएज, अलेक्जेंडिन्या समेत अनेक शहरों में लाखों लोग सड़कों पर रैली की शक्ल में उतरे और राष्‍ट्रपति हुस्नी मुबारक के तीन दशक के शासन के खात्मे की मांग की, उसने दुनिया भर में अनेक सर्वसत्तावादी तानाशाही तंत्रों को भयभीत कर दिया है.

खबर है कि जार्डन के राजा अब्दुल्लाह ने भी अपने प्रधानमंत्री रिफाई को हटा दिया है. उनकी जगह पूर्व जनरल और सैन्य सलाहकार मारुफाल बखीत को नया प्रधानमंत्री बनाया है और शासन में अनेक सुधारों की बात कही है. फलस्तीन में भी नए चुनाव कराने की बात शासन स्तर पर उठ रही है. वहां पांच साल पहले चुनाव हुए थे. सीरिया में भी फेसबुक और ट्विटर पर राष्‍ट्रपति असद की मुखालफत शुरू हो गई है और राजधानी दमिश्क में विरोध मार्च की चर्चा सुर्खियों में है. ट्यूनीशिया के राष्‍ट्रपति के सऊदी अरब भागने के बाद से ही पड़ोसी राष्‍ट्र अल्जीरिया, यमन में भी गरीबी, तानाशाही, भ्रष्टाचार, कुव्यवस्था के विरोध के साथ ही लोकतांत्रिक आजादी की मांग जोर पकड़ रही है. लेबनान और अन्य देश भी इस जम्हूरी हवा के असर से अछूते नहीं हैं. लेकिन ये तो रही पड़ोसी देशों की बात, दिलचस्प तो ये है कि चीन, रूस और ईरान जैसे तानाशाही तंत्र भी अब सकते में हैं. चीन में वेब पर नियंत्रण और बढ़ा दिया गया है. ईरान में 2009 में राष्‍ट्रपति अहमदीनेजाद के फिर राष्‍ट्रपति बनने पर हुए जन विरोध को फिर से हवा मिल गई है. आगामी 12 फरवरी को वहां भी छात्रों की रैली का आयोजन है. इसी तरह रूसी राष्‍ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन को हटाए जाने की आवाज रूस में भी उठनी शुरू हो गई है.

फिलहाल दुनिया मिस्र के घटनाक्रम को खासे कौतुहल के साथ देख रही है. लाखों की तादाद में जनता सेना के टैंकों के साथ सड़कों पर है. सेना ने गोली चलाने से इनकार कर दिया है. लेकिन स्थिति पर उसकी निगाह है. खबर है कि मुबारक-समर्थक और विरोधियों में बुधवार को संघर्ष हुआ है. कुछ दिनों पूर्व तक जनता पर गोली और आंसू गैस का प्रयोग कर रही पुलिस फिलहाल सड़क पर नहीं है. शायद वो जेल तोड़ कर भागे अपराधियों और लूटपाट की बढ़ती घटनाओं के बीच अपनी अपरिहायर्ता साबित करने की कोशिश में है. सारी व्यवस्था ठप है. बैंक, स्कूल, कालेज, दफ्तर सभी कुछ. जनता अब 82 वर्षीय मुबारक के सत्ता से हटने से कम पर वापस घर लौटने को तैयार नहीं है और मुबारक हैं कि वो आगामी सितंबर तक अपना कार्यकाल पूरा करना चाहते हैं. उन्होंने सारा दोष गृह मंत्री पर डालते हुए उसे पद से हटा दिया है और खुफिया प्रमुख उमर सुलेमान को उपराष्‍ट्रपति नियुक्त कर विपक्ष से बात कर संवैधानिक सुधारों की बाबत कदम उठाने को अधिकृत किया है, लेकिन जनता अब कुछ भी सुनने को तैयार हो, ऐसा नहीं लगता. कुल मिलाकर स्थिति यही है कि मुबारक अपने बेटे जमाल को अपना उत्तराधिकारी घोषित करना चाहते हैं, विपक्ष को अभी भी काबू में रखना चाहते हैं, फेसबुक, ट्विटर को नियंत्रित करके विरोध को दबाना चाहते हैं तो दूसरी ओर भरसक लोकतांत्रिक होते हुए भी दिखना चाहते हैं. मुबारक के इस द्वंद्व के बीच जनता ने उन्हें सत्ता से हटने के लिए अगले शुक्रवार तक का समय दिया है.

उधर, अमेरिका और इस्राइल इस सारे घटनाक्रम से सबसे ज्यादा परेशान हैं. उनकी नींद उड़ी हुई है. उनकी परेशानी का कारण यह है कि अब तक पश्चिमी नेताओं और अरब जगत के नेताओं के बीच के गठबंधन के केंद्रीय स्तंभ हुस्नी मुबारक ही रहे हैं. मुबारक के बिना यह गठबंधन कायम नहीं रह पाएगा. मुबारक ही एकमात्र प्रमुख अरब नेता हैं, जिन पर इस्राइल का पूरा भरोसा रहा है. मुबारक के बिना मध्यपूर्व शांति वार्ता भी खतरे में पड़ जाएगी. 1928 में बने मुस्लिम ब्रदरहुड पर लगाम लगाने का काम भी मुबारक ने किया था. खबरों में ब्रदरहुड के रिश्ते अतिवादी संगठनों हिज्बुल्ला और हमास से भी उजागर हुए थे. जाहिर है ऐसे में अनवर सादात के बाद पिछले तीन वर्षों से पूरे मध्यपूर्व में पश्चिम के खासमखास मुबारक के हटने को पश्चिमी खेमा कैसे स्वीकार कर ले, इस्राइली प्रधानमंत्री नेतन्‍याहू ने भी अपनी आशंका जताते हुए कहा है, 'हमें डर है कि मिस्र की बागडोर किसी इस्लामी गुट के हाथ में न चली जाए. ईरान और कई अन्य जगहों पर ऐसा हो चुका है..'

इस डर का कारण यह भी है कि मिस्र में सत्तारूढ नेशनल डेमोक्रेटिक पार्टी (एनडीपी) के बाद एकमात्र प्रमुख संगठन मुस्लिम ब्रदरहुड ही है. वैसे तो यह संगठन प्रतिबंधित है लेकिन यह जनता के बीच अनेक कल्याणकारी कार्यक्रम चलाता रहा है, इसलिए इसका असर भी है. वैसे अभी जनता के स्तर पर जो विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं, उनमें मुस्लिम ब्रदरहुड की प्रमुखता हो, ऐसा नहीं है, लेकिन पश्चिम और इस्राइल का डर यही है कि ब्रदरहुड किसी भी चुनाव में बेहतर प्रदर्शन कर सकते हैं. खासकर मौजूदा अव्यवस्था के बाद ये इसलिए संभव है क्योंकि सांगठनिक स्तर पर वे बेहतर हैं. कहने को ब्रदरहुड जिहादियों से अलग हैं, लेकिन अनेक देशों में ये उग्रवादी संगठनों से भी संबद्ध हैं. चूंकि ये पश्चिमी नीतियों के भी कटु आलोचक हैं और पिछले चुनावों में निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में इनके सांसदों की संख्या भी मिस्र में प्रभावी रूप से बढ़ चुकी है इसलिए भी इन्हें लेकर संशय है.

बहरहाल मिस्र में जनविद्रोह की मौजूदा स्थिति में अमेरिका ने शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक बदलाव की बात कही है और भारत ने भी जनांदोलन के प्रति सतर्क सकारात्मक टिप्पणी की है. इसी तरह दुनिया भर की निगाहें लगी हुई हैं, लेकिन निर्णायक रुख तो वहां जनता के साथ सेना को व्यक्त करना है. तो क्या सेना ट्यूनीशिया की तर्ज पर राष्‍ट्रपति को पद से हटने को कहेगी या फिर 1989 के चीन के थ्‍यान आनमन चौक पर टैंकों के दमन की पुनरावृत्ति काहिरा के तहरीर चौक पर भी होगी? फिलहाल संकेत तो यही है कि अमेरिका जिस तरह से बदलावकारी प्रवृत्तियों का समर्थन कर रहा है और मंगलवार को राष्‍ट्रपति बराक ओबामा ने मुबारक से फोन पर आधे घंटे बात की है - वो 'नए' का ही संकेत देता है. संभवतः इस संकेत को सेना ने पहले ही समझते हुए जनता पर गोली चलाने से इनकार भी कर दिया था. इसके अलावा, एक बड़ा पक्ष ये भी है कि मिस्री सेना को हर साल अमेरिका से लगभग डेढ़ बिलियन डालर की जो मदद मिलती है, उसे सेना खोना नहीं चाहती है. लेकिन इन सबके बीच विचित्र द्वंद्व यह भी है कि जन आकांक्षा मुबारक विरोध के साथ ही उन्हें सत्ता में बनाए रखने वाले अमेरिका के खिलाफ भी है.

अमेरिका की परेशानी भी यही है कि एक ओर वह लोकतांत्रिक जन आकांक्षा की अभिव्यक्ति का समर्थन कर रहा है, दूसरी ओर उसे लोकतांत्रिक चुनाव में मुस्लिम ब्रदरहुड और जिहादियों की सफलता का डर सता रहा है. ले-देकर संयुक्त विपक्ष द्वारा संभावित प्रत्याशी मोहम्मद मुस्तफा अल बारादेई पर नजर टिकती है - लेकिन बारादेई एक स्वतंत्र, उदारवादी, आधुनिक शख्सियत हैं. वो अमेरिका के चहेते भी नहीं हैं. आखिर बारादेई ने ही इराक में अमेरिकी हमले का विरोध किया था और उन्होंने अंतर्राष्‍ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी के प्रमुख के रूप में ईरान के परमाणु ठिकानों के खिलाफ कार्रवाई पर भी अमेरिकी मत का समर्थन नहीं किया था - ऐसे में अमेरिका उन पर कितना भरोसा करेगा ये तो वक्त ही बताएगा. लेकिन इन संशयों-दुविधाओं के बीच अमेरिका की मजबूरी यही है कि फिलहाल बारादेई ही सर्वाधिक उपयुक्त व्यक्ति हैं. जिनकी छवि न केवल मिस्री जनता के बीच सम्मानित है, बल्कि संयुक्त विपक्ष के बीच वही सबसे उपयुक्त और समझदार व्यक्ति माने जाते हैं. पिछले महीनों में मुस्लिम ब्रदरहुड समेत विपक्षी संगठनों की संयुक्त बैठक में उन्हें विपक्ष का प्रतिनिधि भी चुना गया है. उसके बाद से अरब लीग और अमेरिकी प्रतिनिधियों ने भी उनसे मुलाकात  की है. बहरहाल, इन स्थितियों के बीच बहस की दो धाराएं प्रमुखता से सामने आ रही हैं. पहली आशावादी धारा है कि मिस्र में स्वतंत्र चुनाव हों, जो कि दशकों से नहीं हुए हैं, तो युवा आकांक्षा पर आधारित लोकतंत्र को मजबूती मिलेगी. दूसरी यह कि यदि मौजूदा हालात में हिंसा-अराजकता बढ़ी तो उसका फायदा वे जिहादी गुट उठा लेंगे, जिन्हें हुस्नी मुबारक ने लंबे समय से कठोर नियंत्रण में रखा है.

लेखक गिरीश मिश्र वरिष्ठ पत्रकार हैं. इन दिनों वे लोकमत समाचार, नागपुर के संपादक हैं. उनका ये लिखा आज लोकमत में प्रकाशित हो चुका है, वहीं से साभार लेकर इसे यहां प्रकाशित किया गया है. गिरीश से संपर्क This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it के जरिए किया जा सकता है.


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