ईश्वर न करें आपको कैंसर हो

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आलोकजी: हो गया तो बिक जाएंगे, लुट जाएंगे : कैंसर का नाम सबको स्तब्ध और अवाक कर देने के लिए काफी है। आज भी आम तौर पर इसे सजा-ए-मौत का ऐलान ही माना जाता है और जो लोग बच जाते हैं वे शायद पूर्वजन्म के पुण्यों के और अपनी प्रबल इच्छा शक्ति के बल पर बचते हैं। लेकिन भारत में कैंसर की कहानी सिर्फ इतनी नहीं है। सिगरेट और तंबाकू के लगातार प्रसार और विस्तार से कैंसर बढ़ता जा रहा है और आबादी के बड़े हिस्से को आतंकित कर रहा है।

फिर भी बहुत सारे कैंसर ऐसे हैं जो तंबाकू खाने वालों को ही नहीं होते। ब्लड कैंसर, स्तन कैंसर, आंतों का कैंसर, बोन मरो कैंसर, लिवर कैंसर अचानक कहीं से आकर गिरफ्त में ले लेते हैं और आज तक किसी भी पैथी में यह पक्का पता नहीं चला कि कैंसर की वास्तविक वजह क्या है?

लेकिन इस मेडिकल ज्ञान के बाद जरा दुनिया को देखें तो दृश्य बहुत आघात पहुंचाने वाला है। कैंसर दुनिया का सबसे महंगा रोग है। इसकी आम दवा तीस से चालीस हजार से कम की नहीं आती और उससे ज्यादा खर्चा अस्पताल का होता है। अभी कहानी शुरू हुई है। कैंसर की एक दवा हैं सेटयूक्सीमेब। देखने में बड़ा निरापद सा इंजेक्शन हैं लेकिन दाम सुनते ही होश उड़ जाते हैं। ढाई लाख रुपए का एक इंजेक्शन हैं। दिल्ली में जो सज्जन इसकी एजेंसी के मालिक हैं, वे हर मेडिकल स्टोर और अस्पताल में इस इंजेक्शन की खरीद पर नजर रखते हैं और सीधे मरीज के परिवार को फोन कर के पच्चीस से पचास हजार रुपए तक का डिस्काउंट अगले इंजेक्शन पर देने की मेहरबानी का वादा करते हैं। यह इंजेक्शन लेने के पहले ग्राफील इंजेक्शन लेना पड़ता हैं, जो एक इंजेक्शन दस हजार रुपए का होता है और एक साथ तीन इंजेक्शन लेने होते हैं। लोग अपने घर, मकान, खेती और जो भी संपत्ति हैं बेच दें, जहां से मिले वहां से उधार ले लें फिर भी इस इलाज का खर्चा निकलने वाला नहीं है। इन महंगे इंजेक्शन और कीमोथेरेपी की दवाई बनाने वाली दिल्ली में कुल 11 रजिस्टर्ड कंपनियां हैं। उन्हें भी पता हैं कि भारत में आम बीमार की औकात कितनी होती है। इसलिए कीमोकार्ब नाम का एक रसायन लगभग 24 ब्रांड नामों से और 24 अलग अलग दामों पर बिकता है।

वैसे महंगी दवाईयों की बात करें तो आपके खून में लाल रक्त कणों के नष्ट हो जाने, जो आपकी मृत्यु का कारण भी बन सकते हैं, को ठीक करने के लिए सोलाइरिस नाम की दवा हैं जिसका एक साल का खर्चा 409500 डॉलर प्रति वर्ष है। भारत में कितनों की हिम्मत हैं कि इस दवाई को खा कर अपनी जान बचा पाए। कंपनी वाले कहते हैं कि पंद्रह साल में अस्सी करोड़ डॉलर तो उन्होंने दवाई विकसित करने में खर्च कर दिए हैं। वे कह रहे हैं तो मानना पड़ेगा। यह आंकड़ा फोर्ब्स मैग्जीन का है जहां बताया गया है कि शरीर के रासायनिक परिवर्तनों को नियंत्रित करने वाली शाइर फॉर्मास्यूटिकल्स की दवा एलप्रेज का एक साल का खर्चा तीन लाख पिचहत्तर हजार डॉलर है। इसके भी एजेंट दिल्ली में हैं।

हर महंगी दवाई में डॉक्टर अगर चाहे तो कंपनी से रिश्ता निभा कर उसे एक चौथाई या उससे भी कम दाम पर दिलवा सकता है। भारत में जो मेडिकल माफिया चल रहा है उसके आतंकवाद का एक नमूना यह है कि एक ही दवाई एक ही अस्पताल में दो मरीजों को लगाई गई। पहले को यह दवा चालीस हजार रुपए की पड़ी और दूसरे को 18 हजार रुपए की। थोड़ा शोध करने पर पता लगता है कि इस दवा का लागत मूल्य मात्र 1600 रुपए है। लोगों के जीवन को बेच कर इतना मुनाफा यह माफिया कहां ले जाएगा और क्या उनके शिकारों की बददुआएं उन्हें चैन से जीने देगी? 

हाल में एक महत्वपूर्ण काम यह हुआ है कि इंडियन मेडिकल एसोसिएशन और भारत सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय ने डॉक्टरों की एक आचार संहिता तैयार की है। इस आचार संहिता पर सीने में दिल रखने वाले डॉक्टरों ने भी कई विमर्श आयोजित कर के इस आचार संहिता के पालन का फैसला किया है, जिसमें दवा कंपनियों से डॉक्टरों को उपहार या किसी भी किस्म का लाभ नहीं लेने की कसम खाई जानी है। वैसे भी डॉक्टरों की जो शपथ होती है, उसमें उनकी जिम्मेदारी प्राथमिक और अंतिम रूप से मरीज के प्रति होती है और कायदे से उन्हें इस बात से कोई मतलब नहीं होना चाहिए कि कौन सी कंपनी किस दाम पर क्या बेच रही है। उन्हें तो विशेषज्ञ के तौर पर जो सर्वोत्तम और सबको सुलभ दवा समझ में आती हो वह लिखना चाहिए। लेकिन ऐसा होता नहीं है। वैसे तो सभी बीमारियों के और खास तौर पर कैंसर के डॉक्टर अक्सर विदेशों में नजर आते हैं, जहां बहाना सेमिनार वगैरह का होता है और असली खेल मौज मस्ती का होता है। यही डॉक्टर एक शहर से दूसरे शहर जाते हैं तो यात्रा निजी हो या व्यवसाय वाली, हवाई जहाज के टिकट से ले कर लोकल टैक्सी और होटल तक का भुगतान करने की कंपनियों में प्रतियोगिता शुरू हो जाती है। निर्दोष और मासूम लोगों की जिंदगी से खेलने का टिकट मरीज को बड़ा महंगा पड़ता है।

पता नहीं क्यों, भारत के दवा और रसायन मंत्रालय ने इन कंपनियों पर बंधन और अंकुश लगाने के कोई प्रामाणिक उपाय नहीं किए? संविधान में सबके लिए स्वास्थ्य की व्यवस्था हैं। सरकार या सरकारें जितना कर सकती हैं उतना करती हैं। केंद्रीय स्वास्थ्य योजना का सालाना बजट अरबों रुपए का है। लेकिन यह योजना और कर्मचारी बीमा योजना जैसी योजनाएं सिर्फ सरकारी कर्मचारियों के लिए उपलब्ध हैं यानी जिनको सौभाग्य से रोजगार मिल गया वे इन योजनाओं का लाभ उठा सकते हैं। वरना आम आदमी के लिए जीवन उतना ही महंगा है जितना बिटियां की शादी करना या खेत या मकान खरीदना।

पता नहीं क्यों इस मेडिकल माफिया के आतंकवाद पर कोई हमलावर कार्रवाई नहीं की गई। कीमोथैरेपी में एक्लारबिसिन, काइलैक्स, साइफ्रावाइव, एटोपोसाइड उन दवाईयों में से हैं जो आप दुकान के आधार पर और सौदा करने की शक्ति की दम पर दस हजार से ले कर पचास हजार तक में खरीद सकते हैं। और फिर कीमोथैरेपी कोई अंतिम इलाज नहीं हैं। कीमो के रसायनों वाली जेफ्टिब गोली आपको रोज एक खानी पड़ेगी और एक महीने के पैकेट पर दाम दस हजार रुपए लिखा है। लेकिन ज्यादा चिंतित होने की जरूरत नहीं हैं। अगर मेडिकल माफिया के किसी आतंकवादी से आपका परिचय हैं तो यह दवा ढाई से तीन हजार रुपए में मिल जाएगी। जाहिर है कि घाटा उठा कर कोई कुछ नहीं बेच रहा होता हैं। आप खुद अंदाजा लगा लीजिए कि दवा का असली और मूल दाम क्या होगा? इन अपराधियों को फांसी पर लटकाने का पता नहीं कोई प्रावधान किसी भी सरकार ने नहीं किया जबकि सभी सरकारें अपने आपको मानवीय कहती हैं।

यह पापी खेल सिर्फ एलोपैथी में चल रहा हो ऐसा नहीं है। भारत सरकार में आयुष नाम का एक विभाग हैं, जो समानांतर यानी आयुर्वेदिक दवाओं के विकास को प्रोत्साहन देने के लिए है। ज्यादातर खर्चा आयुष के टेलीविजन और अखबारों में प्रचार पर और ज्ञात-अज्ञात वैद्य हकीमों को नीम के पत्ते से लेकर मूली और गाजर के आयुर्वेदिक गुणों पर शोध करने में चला जाता है। आयुर्वेद की सदियों पुरानी परंपरा के लिए आयुष के पास कोई जगह नहीं है। असाध्य बीमारियों का इलाज करने का दावा होम्योपैथी और आयुर्वेद दोनों करते हैं, मगर कुल मिला कर बात इतनी सी हैं कि एलोपैथी का असर सबसे पहले होता है और वैसे भी अपने देश में अंग्रेजी बोलने वाले डॉक्टरों पर ज्यादा भरोसा किया जाता है।

ये वे डॉक्टर हैं जिनके पास कंपनियों के एजेंट दिन भर बैठे रहते हैं और उनका दुस्साहस यहां तक है कि अस्पताल के रजिस्टर की जांच कर के पुष्टि करते हैं कि किस डॉक्टर ने किस कंपनी की दवा लिखी। उसी के आधार पर डॉक्टर पर आर्थिक और दूसरे उपकार करने का फैसला होता है। अब डॉक्टर भी चेते हैं और हम लोग सिर्फ प्रार्थना कर सकते हैं कि उनकी चेतना प्रामाणिक होगी। लेकिन एक तरफ तीन खरब डॉलर का अनियंत्रित बाजार हैं जहां जिंदगी अलग अलग दामों पर नीलाम की जाती है और दूसरी तरफ कई डॉक्टरों का यह दावा है कि जब आप वकीलों और चार्टर्ड अकाउंटेंटों की फीस पर अंकुश नहीं लगा सकते तो उनकी कमाई पर अंकुश क्यों लगाया जाए?

एक बहुत बड़ा विषाक्त चक्र है। इसमें रेनबैक्सी, डॉबर, एग्जिम फार्मा, मेडीपाम्स, मेट्रिक्स फर्मिका, साइजिनस स्पेशलेटिज, अनमोल हेल्थ केयर, ऑल्टो केयर, यूनीलैब, पारस लेबोरेट्रीज, सॉलीटियर, एमिल फार्मा, जैनोन और यूनीलैब जैसे नाम हैं, जिनमें से ज्यादातर आपको भले पता न हो मगर डॉक्टरों और आपकी जिंदगी के दलालों को यह नाम अच्छी तरह याद है। ज्यादातर एक जैसी दवाई बनाते हैं और अलग-अलग नामों से अलग-अलग दामों पर बेचते हैं। अस्पताल पांच सितारा हो रहे हैं, मेडिक्लेम और मेडिकल इंश्योरेंस की दूसरी कंपनियां सिर्फ लोगों को डरा कर धंधा कर रही हैं। भारत जैसे गरीब देश में जहां दो वक्त का खाना भी सौभाग्य माना जाता हैं, वहां खास तौर पर दवाओं के नाम पर ऐसे पाप चल रहे हों तो अपने देश के लिए दुआ करने के अलावा और कोई रास्ता नहीं बच जाता। भारत में मेडिकल आतंकवाद कितना फल-फूल रहा है इसका एक सबूत चंडीगढ़ में पीजीआई के सामने तीन सौ साठ वर्ग फीट की दवा की वह दुकान है, जिसका किराया 44 लाख रुपए प्रति माह है। कमाई आप खुद सोच लीजिए।

लेखक आलोक तोमर देश के जाने-माने पत्रकार हैं. कैंसर की बीमारी और उसके इलाज के दौरान उनके जो व्‍यक्तिगत अनुभव रहे हैं, उसको उन्‍होंने नवभारत टाइम्‍स में लोगों से बांटा है. यह लेख वहीं से साभार लेकर प्रकाशित किया जा रहा है.


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written by Sunil Amar journalist 09235728753, February 06, 2011
स्तब्ध कर देने वाली जानकारियां हैं आलोक जी और दुःख यह जानकर हुआ कि आप को भी ये परेशानी है! बीमारियाँ किसी को भी हो सकती हैं लेकिन इलाज का दुःख गरीबों को ही उठाना पड़ता है.इतनी असमानता और उस पर इतना अत्याचार देख-सुनकर मेरा यह विश्वास और दृढ़ हो जाता है कि ईश्वर नाम कि किसी सत्ता का कोई अस्तित्व नही है.कोई भी रचयिता अपनी कृतियों कि इतनी दुर्दशा कैसे देख सकता है ?
आप शीघ्र स्वास्थ्य लाभ करें ऐसी कामना है. और हम किसी भी तरह मदद के काम आ सकें
तो बताइयेगा.

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written by santosh jain.raipur, February 06, 2011
Alokji ,kis kis ko dekhiye kis kis ko roeyain .yaha 36garh me bhi piparment aour chaklet bechanewale dawai bech rahe hai,health deptt ghatiya microscop -expiery date ki dawaiya kharid raha hai -kayee health director ya to bimar hai ya farar hai. bus maze mey hai to minister aour secretary
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written by Sunil Amar journalist 09235728753, February 06, 2011
स्तब्ध कर देने वाली जानकारियां हैं आलोक जी और दुःख यह जानकर हुआ कि आप को भी ये परेशानी है! बीमारियाँ किसी को भी हो सकती हैं लेकिन इलाज का दुःख गरीबों को ही उठाना पड़ता है.इतनी असमानता और उस पर इतना अत्याचार देख-सुनकर मेरा यह विश्वास और दृढ़ हो जाता है कि ईश्वर नाम कि किसी सत्ता का कोई अस्तित्व नही है.कोई भी रचयिता अपनी कृतियों कि इतनी दुर्दशा कैसे देख सकता है ?
आप शीघ्र स्वास्थ्य लाभ करें ऐसी कामना है. और हम किसी भी तरह मदद के काम आ सकें
तो बताइयेगा.

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written by madan kumar tiwary, February 06, 2011
देश क कानून बहुत कमजोर है , या कमजोर रखा गया है । सरकार की संस्थायें हैं , जिवन रक्षक दवाओं की किमत पर नियंत्रण के लिये , लेकिन शायद हीं कभी कोई कारवाई उसके स्तर पर हुई हो । वैसे जो मंहगी दवायें हैं , उन्हें आप सीधे विदेश की कंपनियों को लिखकर मंगा सकते हैं । लेकिन हर आदमी के वश की यह बात नही है । जरुरत है सरकार का ध्यान इस ओर खिचने की । हम सब मिलकर यह प्रयास कर सकते हैं ।
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written by mohammad zakir hussain, February 06, 2011
alok ji,
ramvilas paswan jaise dhakad minister bhi dawaon ke daam kam nahi karwa paye, aaise mein badi na-ummidi nazar aati hai. main khud pichle ek mahine se in dawa atankiyon ke shikanje mein hoon. father ko lakwe ki shikayat par bhilai shahar ke chandulal aspatal lekar gaya. waha 12 din mein har roz aspatal ke neuro physisian ne 2 se 3 hazar ki dawayein likhi. ICU mein mariz ko rakhne ki wajah se hamein majboori mein yeh dawayein kharidni padi. lekin tamam ilajon ke bawjood bill badta hi gaya aur mariz ki taklif pahle se zyada ho gayee. had to tab ho gayee jab maine apne father ko wahan ke ICU se dusre asptal shift karana chaha to chandulal aspatal walon ne un mahangi dawaon ke naam likh kar dene se inkar kar diya. bahut pressure ke baad unhone naam likha. ab kuch parichit doctoron ko maine wahan ke paper dikhaye to maalum hua ki jin dawaon ke naam likh kar dene mein bhilai ke chandulal aspatal wale aana-kaani kar rahe they, un dawaon se dimag mein clauting badne ki gunjayeesh zyada rahti hai. aur mere father ke case mein yehi hua.
ab aaise dawa mafiyao aur doctoron ke liye mere dil se sirf bad-dua hi niklegi.
kashh.. ham safed libaas wale in atankiyon par kaabo kar paate.

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