मिस्र के 'महाकुंभ' की धमक!

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गिरीशजीमिस्र में तहरीर चौक पर जनता का सैलाब बदस्तूर जारी है. पिछले दिनों हिंसा के बाद भी उत्साही हुजूम शांतिपूर्ण है. मिस्र के इतिहास में इस अपूर्व जम्हूरी मेले में लोग सपरिवार शरीक हैं. मांएं गोद में बच्चों को लेकर मौजूद हैं, सिर्फ इस आस में कि कम से कम उनके लाल को आज से ’बेहतर कल' मिले, वो नहीं जिसे वे दशकों से भुगत रही हैं. फिल्मी सितारों, थिएटर कर्मियों, डॉक्टरों-इंजीनियरों, शिक्षकों समेत शहरी मध्यवर्ग की अगुवाई में युवा, बुजुर्ग, आम मेहनतकश सभी शरीक हैं - बदलाव की चाहत वाले इस महाकुंभ में.

ठेले वाले वहीं सामान बेच रहे हैं तो लोग नई सुबह की आशा में नाच-गा भी रहे हैं. इस रैली में जनशक्ति के प्रतीक महात्मा गांधी को भी याद किया जा रहा है. लेकिन इन सबको धता बताते हुए राष्‍ट्रपति हुस्नी मुबारक ने अमेरिकी टीवी एबीसी न्यूज को दिए साक्षात्कार में अपनी मंशा जता दी है- ''मैं राष्‍ट्रपति पद से भले ही उकता गया हूं, लेकिन इसे छोड़ने का सवाल ही नहीं. मेरे पद से हटने पर मिस्र में अराजकता फैल जाएगी और मुस्लिम ब्रदरहुड इसका फायदा उठाकर सत्ता पर काबिज हो जाएगा.'' उधर, ह्यूमन राइट्स वाच और एमनेस्टी इंटरनेशनल के प्रतिनिधियों समेत 18 विदेशी पत्रकारों को सेना ने मुबारक समर्थकों से छुड़ाया है, लेकिन मीडियाकर्मियों पर हमले की तीखी निंदा संयुक्त राष्‍ट्र महासचिव बान की मून समेत ब्रिटेन, फ्रांस, इटली, जर्मनी, स्पेन - सभी ने की है. इस पर मिस्री प्रधानमंत्री अहमद शफीक ने माफी मांगी है तो राष्‍ट्रपति मुबारक ने आगे बढ़कर खुद ही सफाई दे डाली है कि 'इसमें उनका हाथ नहीं है.' दूसरी ओर जमीनी हकीकत ये है कि सड़कों पर सेना ने टैंकों के साथ जगह-जगह नाकेबंदी भले कर रखी हो, लेकिन उसने जनता पर गोली चलाने से इनकार कर दिया है. वैसे भी मिस्र में हर किसी की सैन्य प्रशिक्षण व्यवस्था से जनता-सेना का रिश्ता बेहतर है, बजाय पुलिस के.

इन सबके बीच अमेरिकी राष्‍ट्रपति बराक ओबामा ने हवा के रुख को भांपते हुए जनता जनार्दन के सुर में सुर मिलाया है - ''अब बदलाव को रोका नहीं जा सकता. अब इसकी शुरुआत फौरन शांतिपूर्ण और व्यवस्थित तरीके से होनी चाहिए.'' तो ये है वो परिदृश्य - जिस पर सारी दुनिया की निगाह टिकी हुई है और जिसका संदेश पड़ोसी अल्जीरिया, यमन, जार्डन, सीरिया, लेबनान समेत सभी अरब देशों के आगे भी जाने वाला है. पूरा समां लोकतांत्रिक समुद्र मंथन जैसा ही है. लेकिन इस मंथन के बाद क्या अमृत की हकदार जनता को वाकई अमृत मिल भी पाएगा या फिर से प्राकृतिक न्याय को प्रतिबद्ध किसी विष्णु को चक्र चलाना पडे़गा? मौजूदा हालात में ये तो तय है कि देर-सबेर मुबारक को जाना ही होगा, क्योंकि जनता अब पीछे लौटने को तैयार नहीं, अब हर तानाशाह की तरह मुबारक का यह अंतिम दांव भी नहीं चलने वाला कि 'मेरे बाद मिस्र का क्या होगा!', संभव है कि वे तुरंत चले जाएं और उनके बाद अगले चुनाव तक हाल में खुफिया तंत्र के प्रमुख से उपराष्‍ट्रपति बने उमर सुलेमान सत्ता संभालें, क्योंकि इस समय सत्तातंत्र में वही सबसे ताकतवर हैं या फिर प्रधानमंत्री अहमद शफीक. वैसे सुलेमान अमेरिका के ज्यादा चहेते रहे हैं और अमेरिका में 9/11 के आतंकी हमले के बाद अरब जगत में अल कायदा की गतिविधियों को नियंत्रित करने में मिस्र के खुफिया प्रमुख के रूप में सबसे खास स्तंभ रहे हैं. इस समय भी विपक्ष से वार्ता और प्रस्तावित संवैधानिक सुधारों की जिम्मेदारी उनके ही हाथों में है. सुलेमान ही जनता को आश्वस्त कर रहे हैं कि अगले चुनाव में हुस्नी मुबारक या फिर उनका बेटा चुनाव नहीं लड़ेंगे.

तो क्या मान लिया जाए कि 1952 में मिस्र में राजतंत्र के खिलाफ कर्नल गामेल अब्दुल नासिर ने जो सैन्य विद्रोह कराया था और नासिर के बाद अनवर सादात और हुस्नी मुबारक भी जिस तरह सेना से ही राष्‍ट्रपति बने, उसी 'राज्यतंत्र'  की परंपरा कथित लोकतंत्र के नाम पर आगे भी चलती रहेगी? और पूरे घटनाक्रम को ’खतरे और अवसर' के रूप में चतुराई से देख रहे सुलेमान सफल हो जाएंगे? या फिर किसी अंतरिम व्यवस्था के बाद स्वतंत्र चुनाव ही नई व्यवस्था की इबारत लिखने के लिए निर्णायक होंगे? फिलहाल बिखरे लोकतांत्रिक उदारवादी विपक्ष की ओर से अल बारादेई का नाम भी प्रस्तावित है, जो बेहतर संकेत है. लेकिन बारादेई के सामने भी चुनौतियां और खतरे कई हैं. पहला तो यही कि वो अमेरिकी खेमे के पसंदीदा हों, ऐसा नहीं है. उन्होंने अंतर्राष्‍ट्रीय परमाणु ऊर्जा आयोग का अध्यक्ष रहते हुए इराक पर हमले का ही विरोध नहीं किया था, बल्कि ईरानी परमाणु ठिकानों के विवाद में भी ईरान पर किसी कार्रवाई को समर्थन देने से इनकार कर दिया था. दूसरा यह कि वो मिस्र में पैदा हुए, पले-बढे़, लेकिन उनका ज्यादा समय विदेश में गुजरा है. बारादेई की स्वतंत्र शख्सियत का पढे़-लिखे तबके में असर जरूर है, लेकिन मिस्री आम जनता में पैठ नहीं है. तीसरा यह कि बारादेई किसी भी स्वतंत्र चुनाव में क्या मुस्लिम ब्रदरहुड का सामना कर पाएंगे? मुस्लिम ब्रदरहुड वैसे तो मिस्र में प्रतिबंधित है, लेकिन जनता के बीच उदार-कल्याणकारी कायरों के लिए जाना जाता है. इसी के बल पर उसने पिछले चुनावों में एक बार निर्दलीय के रूप में संसद में अपने 80 उम्मीदवारों को जिताने में सफलता भी हासिल की थी. तो क्या किसी संगठित लोकतांत्रिक विपक्ष के अभाव में ईरान की पुनरावृत्ति मिस्र में भी होगी? आखिर लोग ईरान के शाह के जाने के बाद अयातुल्ला खुमैनी के आने को भूले तो नहीं हैं और न ही वे ईरान की 2009 की उस कथित लोकतांत्रिक क्रांति को भूल पाए हैं, जो खुद अपने अंतर्विरोधों से ग्रस्त थी. तभी तो वहां उच्च तबके का लोकतांत्रिक-उदार खेमा पश्चिम की तरह का लोकतंत्र चाहता था, लेकिन जनाधार न होने से वो निर्णायक न हो सका.

दिलचस्प यह है कि ईरान जैसी स्थिति कमोबेश मिस्र में भी है. उदारवादी शहरी मध्यवर्ग तो चाहता है पश्चिम जैसा लोकतंत्र, लेकिन गांवों के किसान और अशिक्षित आम लोग अपनी व्यवस्था, अपना राज चाहते हैं. दोनों में साम्य इस बिंदु पर जरूर है कि वे दशकों से जारी ’राजतंत्र' से मुक्ति चाहते हैं. ऐसे में मुस्लिम ब्रदरहुड की अगुवाई में इस्लामी तंत्र आगे आ सकता है. वैसे अभी पश्चिमी लोकतंत्र समर्थकों की तुलना में ब्रदरहुड बहुत कमजोर है, लेकिन इसमें भी अतिशयोक्ति नहीं है कि उसमें मिस्री जनता के बीच जनाधार बढ़ाने की क्षमता पश्चिम समर्थक लोकतांत्रिकों और अल बारादेई से कहीं ज्यादा है. इन हालातों में यदि मिस्र में इस्लाम के नाम पर उग्रवाद आया तो अमेरिका, इजराइल के साथ ही ईरान को भी नागवार गुजरेगा. ईरान का दर्द यह होगा कि इस समय वो दुनिया में इस्लामी केंद्र के रूप में है. ईरान कभी नहीं चाहेगा कि उसका कोई प्रतिद्वंद्वी पैदा हो और कोई नया इस्लामी केंद्र बने, हां वो सहायक जरूर चाहेगा. लेकिन मिस्र के इस्लामी केंद्र बनने से सबसे ज्यादा खतरा अमेरिका और इजराइल को होगा. दरअसल, मिस्र अरब विश्व का केंद्र है. 1948 में इजराइल के निर्माण के बाद से ही उसके साथ 1948, 67 और 73 में युद्ध हो चुका है. तब अरब गठबंधन में सीरिया, जार्डन, लेबनान के साथ मजबूत अगुवा मिस्र ही था और 1973 तक मिस्र की रक्षा नीति, विदेश नीति पर नासिर का असर था, जो शीतयुद्ध के दौर में सोवियत समर्थक थे. इसे अनवर सादात ने बदला और फिर सत्तर के दशक के अंतिम वर्षों से मिस्र सोवियत गठबंधन से हटकर अमेरिका के साथ हो गया. इससे अमेरिका को बड़ा फायदा तेल की राजनीति को लेकर तो हुआ ही, साथ ही अरब देशों में असर बढ़ाने में भी मदद मिली. इसके अलावा इस सदी की शुरुआत में 9/11 के आतंकी हमले के बाद मिस्र ने अल कायदा को नियंत्रित करने में भी मदद की. अब यदि नए हालात में किसी कट्टरपंथ में मिस्र की नीति बदलती है तो अमेरिकी नीति भी बदलेगी ही.

इसी तरह इजराइल का मसला है. अरबों के साथ इजराइल के 1973 तक हुए तीनों युद्धों में इजराइल की सुरक्षा ही उसका प्रमुख मुद्दा था. तब उसके अस्तित्व पर खतरा मुख्यतः मिस्र से ही था. फिर सत्तर के दशक में मेनहिम बेगिन-अनवर सादात की कैंप डेविड संधि से यह खतरा इजराइल से टला. वैसे आज भी उसे ईरान से खतरा है, लेकिन वो दूर की बात है. गौर करें तो इसके बाद 1982 और 2006 के लेबनान में इजराइल के युद्ध हुए, लेकिन तब मुद्दा इजराइली सुरक्षा का नहीं, इजराइली हितों का था. यानी मिस्र से संधि के बाद इजराइल सुरक्षा को लेकर निश्चिंत हो गया. अब यदि इस्लामी कट्टरपंथ मिस्र में आया तो इजराइल को अपनी सुरक्षा को लेकर फिर से सैन्य ताकत को बढ़ाना होगा. और फिर अनवर सादात के समय हुई संधि का इजराइली दक्षिणपंथियों ने विरोध किया था. अब फिर से वहां भी कट्टरपंथ को बढावा मिलेगा.

दिलचस्प यह भी है कि भले ही नासिर के बाद सादात के समय से अब तक मिस्र अमेरिका के नजदीक रहा है, लेकिन संकेत यही हैं कि आने वाले वक्त में अमेरिका की परेशानी बढ़ने वाली है. इस मंदी के दौर में मिस्र के हालात से जहां तेल के भाव बदलेंगे, वहीं यूरो और डॉलर के संदर्भ में भी परेशानी होने वाली है. खुद अमेरिकी नीतियां भी उसके लिए गहरी फांस हैं. इराक में अमेरिकी विजय के साथ ही कुवैत और सऊदी अरब में पश्चिमी लोकतंत्र को लाने की बात प्रमुखता से उठी थी, लेकिन उसे खुद उन देशों के सत्ताधीशों ने खारिज कर दिया, इराक और अफगानिस्तान की स्थिति भी किसी से छिपी नहीं है. तो अमेरिका एक ओर तो उदार लोकतंत्र, मानवाधिकार और संवैधानिक व्यवस्था की बात करता है और दूसरी ओर ज्यादातर अरब देशों में ’राजतंत्रीय' तानाशाही को अपने हित में बनाए रखना चाहता है. यह द्वंद्व हमें ज्यादातर अरब मुल्कों में दिख रहा है. दिलचस्प है कि ट्यूनीशिया, मिस्र, अल्जीरिया, यमन, जार्डन की ये हवा अब ’संक्रामक' हो चुकी है. इसका असर उत्तर अफ्रीकी, अरब और पश्चिम एशियाई मुल्कों में तो होगा ही, चीन, रूस और दूसरे महाद्वीपों के देशों में भी हो तो आश्चर्य नहीं. अमेरिका को अब अरब देशों के प्रति पुरानी नीति बदलनी ही होगी. नए उभरते मध्यवर्ग की अगुवाई में किसी भी अवाम की आवाज को अब दबाया तो नहीं जा सकता है.

वैसे मिस्र में यदि चुनाव में उदारवादी पश्चिमी लोकतंत्र समर्थक यानी अल बारादेई टाइप के लोग चुनाव जीतते हैं या फिर पूर्व दशकों की तरह सेना के ही हाथ में सत्ता रह जाती है तो मिस्र जम्हूरी जरूर होगा, लेकिन कोई बड़ा बदलाव फिलहाल अरब जगत में नहीं होगा. पर यह लंबे समय तक चल पाएगा, ऐसा नहीं लगता. कारण यह है कि जनता में मुबारक जैसों को समर्थन के चलते अमेरिका के प्रति भी भारी नाराजगी है, इसलिए नीतियों को लेकर फर्क आना स्वाभाविक है. 1789 की फ्रांसीसी क्रांति भी मध्यवर्गीय क्रांति थी, मिस्र की तरह वहां भी जेलें टूटी थीं और जनता सड़कों पर थी, लेकिन प्रतिक्रांति के दौर में वहां रोब्सपियर और नेपोलियन बोनापार्ट जैसे तानाशाह भी उसी में से निकले. आज ईरान की क्रांति का हश्र भी हमारे सामने है. ऐसे में अरब जगत के बारे में कुछ स्पष्ट कहना तो मुश्किल है, लेकिन जहां तक मिस्र की बात है तो कहा जा सकता है कि मिस्र ऐसा देश है जिसकी आंतरिक नीति अपने देश के नागरिकों से ज्यादा दूसरों को प्रभावित करती है. नासिर के पहले मिस्र दूसरा था. नासिर के समय सोवियत समर्थक, नासिर के बाद सादात और फिर मुबारक के समय भी पश्चिम समर्थक, जो वह अब तक है. मजे की बात है कि इन्हीं संदर्भों में दुनिया की नजर भी मिस्र के प्रति बदलती रही है. अब देखना है कि आगे मिस्र किस राह चलता है - किसी सार्थक बदलाव के साथ या फिर उसी पारंपरिक राह पर, लेकिन जो भी होगा, खास ही होगा.

लेखक गिरीश मिश्र वरिष्ठ पत्रकार हैं. इन दिनों वे लोकमत समाचार, नागपुर के संपादक हैं. उनका ये लिखा आज लोकमत में प्रकाशित हो चुका है, वहीं से साभार लेकर इसे यहां प्रकाशित किया गया है. गिरीश से संपर्क This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it के जरिए किया जा सकता है.


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