नाम नई दिल्ली, उम्र अस्सी साल

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शेष नारायण सिंहआज से ठीक अस्सी साल पहले, 10 फरवरी 1931 के दिन नयी दिल्ली को औपचारिक रूप से ब्रिटिश भारत की राजधानी बनाया गया. उस वक़्त के वाइसराय लार्ड इरविन ने नयी दिल्ली शहर का विधिवत उदघाटन किया. १९११ में जार्ज पंचम के राज के दौरान दिल्ली में दरबार हुआ और तय हुआ कि राजधानी दिल्ली में बनायी जायेगी. उसी फैसले को कार्यरूप देने के लिए रायसीना की पहाड़ियों पर नए शहर को बसाने का फैसला हुआ और नयी दिल्ली एक शहर के रूप में विकसित हुआ.

इस शहर की डिजाइन में एडविन लुटियन का बहुत योगदान है. १९१२ में एडविन लुटियन की दिल्ली यात्रा के बाद शहर के निर्माण का काम शुरू हो जाना था लेकिन विश्वयुद्ध शुरू हो गया और ब्रिटेन उसमें बुरी तरह उलझ गया इसलिए नयी दिल्ली प्रोजेक्ट पर काम पहले विश्वयुद्ध के बाद शुरू हुआ. यह अजीब इत्तिफाक है कि भारत की आज़ादी की लडाई जब अपने उरूज़ पर थी तो अँगरेज़ भारत की राजधानी के लिए नया शहर बनाने में लगे हुए थे.

पहले विश्वयुद्ध के बाद ही महात्मा गाँधी ने कांग्रेस और आज़ादी की लड़ाई का नेतृत्व संभाला और उसी के साथ साथ अंग्रेजों ने राजधानी के शहर का निर्माण शुरू कर दिया. १९३१ में जब नयी दिल्ली का उदघाटन हुआ तो महात्मा गाँधी देश के सर्वोच्च नेता थे और पूरी दुनिया के राजनीतिक चिन्तक बहुत ही उत्सुकता से देख रहे थे कि अहिंसा का इस्तेमाल राजनीतिक संघर्ष के हथियार के रूप में किस तरह से किया जा रहा है. १९२० के महात्मा गाँधी के आन्दोलन की सफलता और उसे मिले हिन्दू-मुसलमानों के एकजुट समर्थन के बाद ब्रिटिश साम्राज्य के लोग घबडा गए थे. उन्होंने हिन्दू मुस्लिम एकता को तोड़ने के लिए सारे इंतज़ाम करना शुरू कर दिया था.

हिन्दू महासभा के नेता वी डी सावरकर को माफी देकर उन्हें किसी ऐसे संगठन की स्थापना का ज़िम्मा दे दिया था जो हिन्दुओं और मुसलमानों में फ़र्क़ डाल सके. उन्होंने अपना काम बखूबी निभाया और १९२४-२५ के बीच नागपुर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ नाम के दल की स्थापना करवा दी थी. इस पार्टी की विचारधारा के गाइड के रूप में उन्होंने एक नयी किताब लिखी जिसका नाम हिंदुत्व रखा गया. यह किताब इटली के दार्शनिक माज़िनी की विचारधारा पर आधारित थी. माज़िनी की न्यू इटली की धारणा पर ही बाद में हिटलर ने राजनीतिक अभियान चलाया था. १९२० के आन्दोलन के बाद कांग्रेस की राजनीति में निष्क्रिय हो चुके मुहम्मद अली जिन्ना को अंग्रेजों ने सक्रिय किया और उनसे मुसलमानों के लिए अलग देश माँगने की राजनीति पर काम करने को कहा गया.

देश का राजनीतिक माहौल इतना गर्म हो गया कि १९३१ में नयी दिल्ली के उदघाटन के बाद ही अंग्रेजों की समझ में आ गया था कि उनके चैन से बैठने के दिन लद चुके हैं. इम्पीरियल दिल्ली की स्थापना के साथ ही अंग्रेजों ने इसे आबाद करने की योजना को भी कार्य रूप देना शुरू कर दिया. नयी दिल्ली के नए बाज़ार कनाट प्लेस को आबाद करने के लिए चाँदनी चौक के व्यापारियों को तरह तरह के प्रलोभन दिए गए लेकिन कोई आने को तैयार नहीं था.

१९८० में मैंने चांदनी चौक के उन व्यापारियों से बात की थी, जो १९३० के दशक में जवान रहे होंगे. उनके बाप दादाओं को जब अंग्रेजों ने मजबूर किया तो उन लोगों ने कनाट प्लेस में जगह तो खरीद ली लेकिन कारोबार चांदनी चौक से ही करते रहे. उनका तर्क था कनाट प्लेस व्यापार के लिए सही जगह नहीं है क्योंकि गर्मियों में राजधानी शिमला शिफ्ट हो जाती है तो नयी दिल्ली में उल्लू बोलते हैं. सारे अफसर शिमला में जा कर रहते हैं. लेकिन धीरे धीरे हालात बदले और १९४७ के बाद जब आबादी का रेला दिल्ली आया तो नयी दिल्ली में आबादी आ गयी. दुकानें भी भर गयीं.

नयी दिल्ली ने हमारी आज़ादी की लड़ाई को बहुत ही करीब से देखा है. १९३१ के बाद जब भारत में महात्मा गाँधी की हर बात अंतिम सत्य मानी जाती थी, उस वक़्त नई दिल्ली में ही आज़ादी की सारी बातें होती थीं. गवर्नमेंट आफ इण्डिया एक्ट १९३५ के बाद यह तय हो गया था कि अँगरेज़ को जाना ही पड़ेगा. लेकिन वह तरह तरह के तरीकों से उसे टालने की कोशिश कर रहा था. नयी दिल्ली क महत्व इतना बढ़ गया कि बम्बई के बैरिस्टर मुहम्मद अली जिन्ना ने भी नयी दिल्ली के जनपथ पर एक मकान खरीद लिया और यहीं जम गए. उसके बाद ज़्यादातर वक़्त उन्होंने दिल्ली में ही गुज़ारा.  अंग्रेजों के मित्र थे इसलिए उन्हें एडवांस में मालूम पड़ गया था कि बंटवारा होगा और फाइनल होगा. जैसा कि हर चालाक आदमी करता है, उन्होंने अपने करीबी दोस्त, राम कृष्ण डालमिया के हाथों अपने घर का सौदा किया और नयी दिल्ली के सफ़दरजंग हवाई अड्डे से कराची के लिए उड़ गए. उन्हें मालूम था कि अब वे दुबारा दिल्ली नहीं आयेंगे.

इसी नई दिल्ली में महात्मा गाँधी ने अपनी अंतिम सांस ली. नफरत के सौदागरों की पार्टी के एक सिरफिरे ने उन्हें मार डाला. नयी दिल्ली में ही लोकतंत्र की बुनियाद रखी गयी जिसे जवाहरलाल नेहरू ने दिन रात एक करके मज़बूत बनाया. लेकिन अपनी बेटी को गद्दी देने के चक्कर में उन्होंने वंशवाद की बुनियाद रख दी. इसी दिल्ली को निशाना बनाकर पाकिस्तानी तानाशाह अयूब खां ने दोनों मुल्कों पर १९६५ की लड़ाई थोपी. भारत तो उस झटके से बच गया लेकिन पाकिस्तान आज जिस दुर्दशा से गुज़र रहा है, उसमें उस मूर्खतापूर्ण युद्ध का बहुत अधिक योगदान है. नयी दिल्ली ने संजय गाँधी का आतंक भी देखा जो उन्होंने इमरजेंसी के दौरान इस शहर पर बरपा किया था.

नयी दिल्ली में जब जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में छः लाख लोगों ने दस्तक दी तो घबड़ाकर इंदिरा गाँधी ने इमरजेंसी लगा दी. बाद में जनता पार्टी का असफल प्रयोग भी यहीं किया गया. इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद १९८४ में इसी शहर में सिखों का क़त्ले-आम हुआ और यहीं पर वह लोकशाही परवान चढी जिसके बीज जवाहरलाल नेहरू ने बोये थे. आज जब लोकतंत्र के बुनियादी मूल्यों को ख़तरा पैदा हो गया है, भ्रष्टाचार और क्रिमिनल गवर्नेंस का ज़माना है तो इसी नयी दिल्ली में तय होगा कि भारत का मुस्तकबिल क्या होगा.

लेखक शेष नारायण सिंह देश के जाने-माने पत्रकार और स्तंभकार हैं.


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Comments (10)Add Comment
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written by पंकज झा., February 12, 2011
गोरी सल्तनत के अवशेष पर किसी अवधूत की तरह खड़े हो फुफकारते शेष जी मानने वाले नहीं हैं. सवाल फ़िर वही है कि अंडमान के कमिश्नर को लिखे गए किस्सी कथित पत्र से दिल्ली के जन्मदिन का क्या ताल्लुक हो सकता है? शेष जी सही हैं या गलत, इतिहास क्या कहता है या इतिहास को क्या कहते देखना-सुनना चाहते हैं शेष जी यह भी दीगर विषय है. उनको जितना फुफकारना है फुफकारते रहे. अपन तो केवल यही निवेदन कर रहे हैं कि कुछ जानकरीप्रद और रोचक लिखते समय अपनी दुर्भावना को थोड़ा ताक पर रख दिया करें तो इसमें भला ही होगा उनका. स्वीकार्यता भी बढ़ेगी. अन्यथा जब इतने प्रोपगंडाकारों को झेल ही रहा है देश तो शेष जी भी सही...लगे रहिये हुजुर.
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written by Ish Mishra, February 12, 2011
muthi bhar kunthit vampanthi tathyon aur tarkon ke adhar par bat karte hain enlightened sanghion ki tarah hawa me laffaji nahi karte. 1907 me 1857 ki kranti par First War of Independence me hindustan ki samasik samskriti aur hindu-muslim ekjutata ki prasansa karne vala SAVARKAR jail ki yatna se tut gaya aur mafi mag kar chhutne ke bad angreji raj ka vafadar ho gaya. 1923 se 1947 tak azadi ki ladai me uski bhumika ka ek udaharan deejiye. vaise sanghion ka tark se koi matlab to hota nahi. jab azadi ki ladAI AKHIRI DAUR ME THI 1942 ME aur desh ke sare bade neta jail me the tab angrejo ka vafadar dalal angreji sena me bharti abhiyan chala raha tha. angrejon ke is dalal ke bhakt aj corporati bhopu ban kar US samrajyavad ki dalai kar rahe hain desh me firkaparasti ka jahar faila kar. sangfhion dimag ka istemal karo agar shakhaon ki murkhtapurn bauddhikon se bilkul nasht na ho gaya ho.
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written by Ish Mishra, February 12, 2011
pankaj ji, sanghion ki padhne likhne ki adat to hoti nahi. shesh narain ji ne to savarkar ko hi nudhrit kiya hai. 1907 me India's cFirst War of Independence me india ke samasik sanskriti, hindu-muslim ekjutata ki bat karne vala savarkart jail ki yatnaon se tot gaya aur angreji raj ka sahyogi ban gaya. jail se chhutne ke bad angrejon ki shah par firka parast ke jahar failane ke alava uski koi bhumika ka jikra keejiye. han vah 1942 me jab hindustani angreji raj se mukti ki ladai lad rahe the, sarew bade neta (gandhi smaet) jailon me the tab vah angreji raj ki vafadari me angreji sena me bharti abhiyan chala raha tha. ham kunthit vampanthi tathyon aur tarkon ke adhar par bat karte hain aap jaise sanghion ki tarah hawa me laffaji nahi karte. angrejon ke dalalon ke bhakt aaj corporati bhopun bane hue hain.
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written by शेष नारायण सिंह, February 12, 2011
यह लोग मानेगें नहीं.सावरकर का माफीनामा एक बार फिर पोस्ट करता हूँ. यह नैशनल आर्काइव्ज़ ,नई दिल्ली सरकारी सुरक्षा में रखा है .


he 30th March 1920.

To

The CHIEF COMMISSIONER OF ANDAMANS

In view of the recent statement of the Hon'ble Member for the Home Department to the Government of India, to the effect that "the Government was willing to consider the papers of any individual, and give them their best consideration if they were brought before them"; and that "as soon as it appeared to the Government that an individual could be released without danger to the State, the Government would extend the Royal clemency to that person," the undersigned most humbly begs that he should be given a last chance to submit his case, before it is too late. You, Sir, at any rate, would not grudge me this last favour of forwarding this petition to His Excellency the Viceroy of India, especially and if only to give me the satisfaction of being heard, whatever the Government decisions may be.

I. The Royal proclamation most magnanimously states that Royal clemency should be extended to all those who were found guilty of breaking the law "Through their eagerness for Political progress." The cases of me and my brother are pre-eminently of this type. Neither I nor any of my family members had anything to complain against the Government for any personal wrong due to us nor for any personal favour denied. I had a brilliant career open to me and nothing to gain and everything to loose individually by treading such dangerous paths. Suffice it to say, that no less a personage than one of the Hon'ble Members for the Home Department had said, in 1913, to me personally, "... ... Such education so much reading,... ... .. you could have held the highest posts under our Government." If in spite of this testimony any doubts as to my motive does lurk in any one, then to him I beg to point out, that there had been no prosecution against any member of my family till this year 1909; while almost all of my activity which constituted the basis for the case, have been in the years preceding that. The prosecution, the Judges and the Rowlatt Report have all admitted that since the year 1899 to the year 1909 had been written the life of Mazzini and other books, as well organised the various societies and even the parcel of arms had been sent before the arrest of any of my brothers or before I had any personal grievance to complain of (vide Rowlatt Report, pages 6 etc.). But does anyone else take the same view of our cases? Well, the monster petition that the Indian public had sent to His Majesty and that had been signed by no less than 5,000 signatures, had made a special mention of me in it. I had been denied a jury in the trial: now the jury of a whole nation has opined that only the eagerness for political progress had been the motive of all my actions and that led me to the regrettable breaking of the laws.

II. Nor can this second case of abetting murder throw me beyond the reach of the Royal clemency. For (a) the Proclamation does not make any distinction of the nature of the offence or of a section or of the Court of Justice, beyond the motive of the offence. It concerns entirely with the Motive and requires that it should be political and not personal. (b) Secondly, the Government too has already interpreted it in the same spirit and has released Barin and Hesu and others. These men had confessed that one of the objects of their conspiracy was "the murders of prominent Government officials" and on their own confessions, had been guilty of sending the boys to murder magistrates, etc. This magistrate had among others prosecuted Barin's brother Arabinda in the first "Bande Mataram" newspaper case. And yet Barin was not looked upon, and rightly so, as a non-political murderer. In my respect the objection is immensely weaker. For it was justly admitted by the prosecution that I was in England, had no knowledge of the particular plot or idea of murdering Mr. Jackson and had sent the parcels of arms before the arrest of my brother and so could not have the slightest personal grudge against any particular individual officer. But Hem had actually prepared the very bomb that killed the Kennedys and with a full knowledge of its destination. (Rowlatt Report, page 33). Yet Hem had not been thrown out of the scope of the clemency on that ground. If Barin and others were not separately charged for specific abetting, it was only because they had already been sentenced to capital punishment in the Conspiracy case; and I was specifically charged because I was not, and again for the international facilities to have me extradited in case France got me back. Therefore I humbly submit that the Government be pleased to extend the clemency to me as they had done it to Barin and Hem whose complicity in abetting the murders of officers, etc., was confessed and much deeper. For surely a section does not matter more than the crime it contemplates. In the case of my brother this question does not arise as his case has nothing to do with any murders, etc.

III. Thus interpreting the proclamation as the Government had already done in the cases of Barin, Hem, etc. I and my brother are fully entitled to the Royal clemency "in the fullest measure." But is it compatible with public safety? I submit it is entirely so. For (a) I most emphatically declare that we are not amongst "the microlestes of anarchism" referred to by the Home Secretary. So far from believing in the militant school of the type that I do not contribute even to the peaceful and philosophical anarchism of a Kuropatkin or a Tolstoy. And as to my revolutionary tendencies in the past:- it is not only now for the object of sharing the clemency but years before this have I informed of and written to the Government in my petitions (1918, 1914) about my firm intention to abide by the constitution and stand by it as soon as a beginning was made to frame it by Mr. Montagu. Since that the Reforms and then the Proclamation have only confirmed me in my views and recently I have publicly avowed my faith in and readiness to stand by the side of orderly and constitutional development. The danger that is threatening our country from the north at the hands of the fanatic hordes of Asia who had been the curse of India in the past when they came as foes, and who are more likely to be so in the future now that they want to come as friends, makes me convinced that every intelligent lover of India would heartily and loyally co-operate with the British people in the interests of India herself. That is why I offered myself as a volunteer in 1914 to Government when the war broke out and a German-Turko-Afghan invasion of India became imminent. Whether you believe it or not, I am sincere in expressing my earnest intention of treading the constitutional path and trying my humble best to render the hands of the British dominion a bond of love and respect and of mutual help. Such an Empire as is foreshadowed in the Proclamation, wins my hearty adherence. For verily I hate no race or creed or people simply because they are not Indians!

(b) But if the Government wants a further security from me then I and my brother are perfectly willing to give a pledge of not participating in politics for a definite and reasonable period that the Government would indicate. For even without such a pledge my failing health and the sweet blessings of home that have been denied to me by myself make me so desirous of leading a quiet and retired life for years to come that nothing would induce me to dabble in active politics now.

(c) This or any pledge, e.g., of remaining in a particular province or reporting our movements to the police for a definite period after our release - any such reasonable conditions meant genuinely to ensure the safety of the State would be gladly accepted by me and my brother. Ultimately, I submit, that the overwhelming majority of the very people who constitute the State which is to be kept safe from us have from Mr. Surendranath, the venerable and veteran moderate leader, to the man in the street, the press and the platform, the Hindus and the Muhammadans - from the Punjab to Madras - been clearly persistently asking for our immediate and complete release, declaring it was compatible with their safety. Nay more, declaring it was a factor in removing the very `sense of bitterness' which the Proclamation aims to allay.

IV. Therefore the very object of the Proclamation would not be fulfilled and the sense of bitterness removed, I warn the public mind, until we two and those who yet remain have been made to share the magnanimous clemency.

V. Moreover, all the objects of a sentence have been satisfied in our case. For (a) we have put in 10 to 11 years in jail, while Mr. Sanyal, who too was a lifer, was released in 4 years and the riot case lifers within a year; (b) we have done hard work, mills, oil mills and everything else that was given to us in India and here; (c) our prison behaviour is in no way more objectionable than of those already released; they had, even in Port Blair, been suspected of a serious plot and locked up in jail again. We two, on the contrary, have to this day been under extra rigorous discipline and restrain and yet during the last six years or so there is not a single case even on ordinary disciplinary grounds against us.

VI. In the end, I beg to express my gratefulness for the release of hundreds of political prisoners including those who have been released from the Andamans, and for thus partially granting my petitions of 1914 and 1918. It is not therefore too much to hope that His Excellency would release the remaining prisoners too, as they are placed on the same footing, including me and my brother. Especially so as the political situation in Maharastra has singularly been free from any outrageous disturbances for so many years in the past. Here, however, I beg to submit that our release should not be made conditional on the behaviour of those released or of anybody else; for it would be preposterous to deny us the clemency and punish us for the fault of someone else.

VII. On all these grounds, I believe that the Government, hearing my readiness to enter into any sensible pledge and the fact that the Reforms, present and promised, joined to common danger from the north of Turko-Afghan fanatics have made me a sincere advocate of loyal co-operation in the interests of both our nations, would release me and win my personal gratitude. The brilliant prospects of my early life all but too soon blighted, have constituted so painful a source of regret to me that a release would be a new birth and would touch my heart, sensitive and submissive, to kindness so deeply as to render me personally attached and politically useful in future. For often magnanimity wins even where might fails.

Hoping that the Chief Commissioner, remembering the personal regard I ever had shown to him throughout his term and how often I had to face keen disappointment throughout that time, will not grudge me this last favour of allowing this most harmless vent to my despair and will be pleased to forward this petition - may I hope with his own recommendations? - to His Excellency the Viceroy of India.

I beg to remain,

SIR,

Your most obedient servant,

(Sd.) V.D. Savarkar,
Convict no. 32778.
© National Archives of India
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written by शेष नारायण सिंह, February 12, 2011
मैं एक बार फिर सावरकर का माफीनामा पोस्ट करने वाला हूँ. पहले भी कर चुका हूँ लेकिन यह संघी भाई भूलते बहुत हैं
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written by पंकज झा., February 12, 2011
आ. शेष जी. अव्वल तो यह कि सावरकर या हिंदुत्व आपकी तारीफ़ का न मुहताज है न आपकी दुर्भावना से उसे कोई नुकसान पहुचने वाला. आप अपने कष्ट को ही दूर करने की जुगत में लगे रहे यही बेहतर है. ढेर सारे ऐतिहासिक उद्धरणों को देकर आप खुद को विद्वान भले साबित कर लें लेकिन विवेकानंद से लेकर सावरकर और आज के भी राष्ट्रवादी चिंतकों के पाँव की धुल भी नहीं साबित हो सकते आप. जहां तक द्वि-राष्ट्रवाद के सिद्धांत का सवाल है तो उसका बीजारोपण तो कांग्रेस ने अपने 1916 के अधिवेशन में ही धर्म के आधार पर 'सेपरेट इलेक्टोरल' का प्रस्ताव पारित कर ही कर दिया था. और अंततः नेहरु की पद लिप्सा ने उस सुद्धांत का विष-वृक्ष 1947 में तैयार किया. लेकिन सवाल यहाँ कही से इन सब मुद्दों का था ही नहीं. कभी 'जौक' ने जिन दिल्ली की गलियों को छोड़ कर जाने से इनकार किया था, वहाँ के गलियों-चौबारों का रोचक विवरण करने का अवसर आपने अपनी 'कुंठा' के कारण खो दिया. बस अपना निवेदन महज़ इतना था. दिल्ली का बखान किये जाने के मामले में आपसे लाख गुना बेहतर खुशवंत सिंह जी का वह 'हिजड़ा' साबित हुआ जिसके माध्यम से लाख अश्लीलताओं के बावजूद खुशवंत जी ने एक रोचक आख्यान गढ़ने में सफलता प्राप्त की थी. खैर.
अगर हर विषय को आप केवल हिंदुत्व विरोध और राजनीति से जोड़कर देखने को विवश हैं तो मुझे यह कहने की इजाज़त दीजिए कि आपके इस प्रलाप से आपकी पार्टी का कुछ भी भला नहीं होने वाला. यह शहर सदा आपको 'दिलदारो दिल्ली दूर अस्त' कहकर चिढाता ही रहेगा और आपके दुर्भावना का शिकार राजनीतिक दल पूरी मजबूती से यहाँ राष्ट्रवाद का पताका फहराता नज़र आएगा. आज भी लोकसभा में सबसे बड़े और एकमात्र प्रासंगिक विपक्ष की भूमिका में राष्ट्रवाद आपके कलेजे पर मूंग दल रहा है. और सहानुभूति आपसे इसलिए है कि निकट भविष्य में भी आपके कलेजे को कोई ठंढक् पहुचने के आसार नज़र नहीं आ रहे हैं...शुक्रिया.
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written by शेष नारायण सिंह, February 11, 2011
झा जी ,
आपका लोगों का वैचारिक कष्ट मेरी समझ में आता है. लेकिन जब भी नयी दिल्ली का ज़िक्र होगा तो गाँधी की अगुवाई में लड़ी गयी आज़ादी की लड़ाई का ज़िक्र ज़रूर होगा. उनकी जघन्य हत्या का ज़िक्र भी होगा जिसे आपके कुछ साथी गाँधीवध कहते हैं . गाँधी जी की लड़ाई को कमज़ोर करने की जिन्ना और सावरकर की कोशिश का ज़िक्र ज़रूर होगा. १९४२ के आन्दोलन का ज़िक्र ज़रूर होगा जिसमें पूरा देश गांधी के साथ था. उस दौर में देश का मामूली से मामूली राजनीतिक कार्यकर्ता जेल में था जबकि आपके नेता लोग मौज कर रहे थे. जहां आर एस एस की तारीफ़ करने का मौक़ा मिलता है ,मैं कभी चूकता नहीं . मसलन मैं यह कई बार लिख चुका हूँ कि जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में जो लड़ाई इंदिरा गाँधी के खिलाफ इस देश की जनता ने लड़ी थी उसके सारे लाजिस्टिक्स का इंतज़ाम ,बंगाल के अलावा उत्तर भारत के अन्य राज्यों में आर एस एस ने ही किया था .आप लोगों को शायद मालूम नहीं होगा कि दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ के इमरजेंसी के अध्यक्ष के रूप में अरुण जेटली ने उसमें बहुत बड़ी भूमिका निभाई थी . वे एक बहादुर इंसान हैं और मैं अरुण जेटली का प्रशंसक हूँ. सुषमा स्वराज ने इमरजेंसी में बडौदा डाईनामाईट केस में वकील बनकर जनता की पक्षधरता दिखाई थी उसका मैं प्रशंसक हूँ . जो भी अच्छा काम हुआ है उसकी तारीफ की जानी चाहिए लेकिन अगर आप लोग चाहते हैं कि सावरकर की तारीफ़ की जाय तो मुश्किल होगा क्योंकि उन्होंने अंग्रेजों से माफी मांगकर देश के आन्दोलन को कमज़ोर करने की कोशिश की . अंग्रेजों की साज़िश का हिस्सा बने .महात्मा गाँधी की हत्या में अभियुक्त रहे ,तो उनकी तारीफ़ करना मेरे लिए असंभव होगा . हाँ १९१० के पहले और १९१८ के बाद के सावरकर में ज़मीन आसमान का अंतर है कि क्योंकि उनके माफीनामे में ही लिखा है वे माफी मिलने के बाद ब्रिटिश साम्राज्य के लिए काम करेगें . तो उन्होंने किया और मैंने इस लेख में उसी का ज़िक्र किया है . शायद आपको नहीं मालूम कि उन्होंने अंग्रेजों के द्विराष्ट्र सिद्धांत का भी प्रतिपादन किया था. १९३६ में अहमदाबाद में हिन्दू महासभा के अपने अध्यक्षीय भाषण में उन्होंने साफ़ साफ़ दो राष्ट्र की बात की थी . और लगभग उसी वक़्त जिन्ना ने लखनऊ में अपनी पार्टी के सम्मलेन में द्विराष्ट्र सिद्धांत की वकालत की थी. दोनों ही नेताओं के भाषण में एक ही बात कही गई थी , एक ने उर्दू में कहा और दूसरे ने हिन्दी में . ऐसा इसलिए हुआ कि दोनों को अंग्रेज़ी का मूल भाषण उस वक़्त के गृह विभाग से मिला था और दोनों ही अंग्रेजों के हुक्म के गुलाम थे. अब अगर आप चाहें कि मैं जिन्ना या सावरकर की तारीफ़ करू तो बहुत मुश्किल होगी
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written by पंकज झा., February 10, 2011
शेष जी दुराग्रही लेखकों की ज़मात में अकेले हैं ऐसा तो नहीं कहा जा सकता लेकिन हां उन मुट्ठी भर कुंठित वामपंथियों में से एक ज़रूर हैं जिन्हें हिंदुत्व के नाम से चिढ है. शीर्षक देख कर लगा कि कुछ अच्छा पढ़ने को मिल जाएगा दिल्ली के बारे में लेकिन अफ़सोस यहाँ भी इनका विषवमन जारी ही रहा. बिना किसी सन्दर्भ के भी अपने ही पुरोखों को चार गाली देने से यहाँ भी बाज़ नहीं आये.ऐसा लगता है कि कल को अगर क़ुतुब मीनार भी टेढा हो जाय तो इन्हें ये भी हिन्दुत्ववादी षड्यंत्र ही नज़र आएगा. एक अच्छे हो सकने वाले आलेख की ऐसी-तैसी कर दी लेखक ने.हालांकि इसके अलावा लेख के काफी सन्दर्भ पठनीय हैं.
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written by madan kumar tiwary, February 10, 2011
आपकी दिल्ली शायद शुरु से हीं धोखेबाज और मक्कार लोगों की जगह रही । आज भी दिल्ली में मक्कार ज्यादा हैं , वह तो भला हो बिहार -यूपी के लडको का जो कुछ इमानदारी जिंदा है। वरना यह पुरी तरह द्लालों की हो चुकी है ।
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written by anil bharadwaj, February 09, 2011
thanks

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