अजमेर में पत्रकारों का जमीनी घोटाला

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राजेंद्र हाड़ा मार्च-अप्रैल 2002 में अजमेर में एक खेल शुरू हुआ। जमीनों का खेल। इसके मुख्य किरदार थे पत्रकार! नौ साल होने जा रहे हैं खेल आज भी जारी है। मुख्य किरदार आज भी पत्रकार ही हैं। ईमानदारी, सच्चाई, निष्पक्षता की मिसाल बने अजमेर के इन पत्रकारों में से कुछ तो पांच-पांच भूखंडों के स्वामी हो चुके हैं। अगर जांच हो जाए तो अपना दावा है कि मुंबई का आदर्श सोसायटी घोटाला भी पीछे रह जाए। भूखंड पाने के लिए ‘पत्रकार’ शब्द की परिभाषाएं तक बदल दी गईं।

श्रम कानून के तहत नौकरी करने वाले का आय प्रमाण पत्र उसका मालिक या नियोक्ता ही दे सकता है परंतु अजमेर में पत्रकारों के क्लब और संगठनों ने आय प्रमाणित कर दी। ऐसी एक नहीं कई खामियां इस घोटाले में है। सरकारी कर्मचारी हो या सरकार से रिटायर्ड चूंकि पत्रकारों की मेहरबानियां थी इसलिए उन्हें भी भूखंड दे दिए गए। बेचारे पत्रकार के पास अपना एक अदद आशियाना तो होना ही चाहिए। इस मकसद से शुरू की गई इस योजना का हश्र यह हुआ कि इन बेचारों में से कुछ ने तो जमीन के भाव बढ़ते ही भूखंड बेच डाले तो कुछ ने मकान बनाकर किराए पर उठा दिए।

अशोक गहलोत सरकार ने अजमेर नगर सुधार न्यास को फरवरी-मार्च 2002 में अजमेर के पत्रकारों के लिए एक आवासीय योजना बनाने के आदेश दिए। न्यास ने एक महंगी और पॉश कॉलोनी में योजना बना दी। सरकार का मकसद था पत्रकारों, साहित्यकारों और अखबारों से जुडे़ अन्य लोगों को सस्ती दर पर जमीन दिलाना। महंगी जमीन और कौड़ियों के दाम देखते ही पत्रकारों का भू-माफिया दल सक्रिय हो गया। यहां आपको बता दें कि अजमेर में विधिक पत्रकारिता के लिए हर अखबार ने वकीलों को रखा हुआ है और वे नाम के ही विधिक या पार्ट टाइम पत्रकार हैं, उनसे पूर्णकालिक की तरह काम लिया जाता है।

इसी तरह कई सरकारी कर्मचारी भी हैं, जो पत्रकार के रूप में काम कर रहे हैं। इनमें से ज्यादातर वे हैं जो नौकरी लगने या वकालत शुरू करने से पहले पत्रकार थे, परंतु अखबारों की कम तनख्वाह और अपने पास एक अतिरिक्त योग्यता होने के कारण उन्होंने दूसरे व्यवसाय को अपना लिया, परंतु अपनी लेखन लत या पत्रकारीय शौक के चलते उन्होंने फिर से पार्ट टाइम रूप में पत्रकारिता को अपना लिया। अपन भी उनमें से एक हैं। जो करीब दस साल पत्रकारिता करने के बाद वकालत से जुड़ गए और बाद में वकालत और पत्रकारिता साथ-साथ करते रहे। चस्का ऐसा कि पार्ट टाइम कहे जाने, वाजिब दाम नहीं मिलने के बावजूद बाकायदा डेस्क या संस्करण प्रभारी का काम करते थे और पूरी ईमानदारी से करते थे। तो पार्ट टाइमर की इस जमात ने भी भूखंड के लिए आवेदन कर दिया और सीधा, सच्चा हलफनामा भी दिया कि हमारी आय का एक मात्र जरिया पत्रकारिता नहीं है।

जिस समय आवेदन लिए जा रहे थे तभी लग गया कि खेल कुछ और ही होने जा रहा है। अपने चहेतों के नाम के बंदरबांट शुरू हो गई। पत्रकार थे उनके खिलाफ कौन माई का लाल आवाज उठा सकता था। उनकी मेहरबानी से न्यास की कुर्सी संभालने वाले राजनेता हों या सरकारी अफसर सब खामोश। जैसा वे कहते अपने दस्तखत कर देते। वकील थे इसलिए मालूम था कि मामला बढ़ा तो यह कहकर शिकायत दाखिल दफतर कर दी जाएगी कि आपने आवेदन ही नहीं किया है इसलिए आप को बोलने का कोई हक नहीं है। सूचना का अधिकार कानून उस समय आया नहीं था। अपन ने पहले तो दस हजार रूपए के साथ आवेदन कर दिया कि जाने कैसे-कैसों को आप पत्रकार मान रहे हैं, यहां तो सचमुच में पत्रकारिता करते हैं, लिहाजा पार्ट टाइम पत्रकारों को भी भूखंड का हकदार माना जाए। इसके साथ ही अजमेर के संभागीय आयुक्त के यहां इस बंदरबांट की शिकायत दर्ज करवा दी। श्री मुकेश शर्मा बडे़ भले अफसर थे। हाथोंहाथ अजमेर के सिटी मजिस्‍ट्रेट को जांच सौंप दी।

जांच हुई, अपने बयान हुए। उन्होंने कई खामियां मानीं। जांच रिपोर्ट हमें नहीं मिल पाई परंतु पत्रकारों की गालियों के साथ जो कुछ सुनने में आता उससे पता लगता रहता कि जांच में क्या कुछ हुआ। बाद में पता लगा कोई ना कोई गली निकाल ली गई है। बीच-बीच में बंदरबांट का खेल चलता रहा। पिछले दिनों फिर कुछ बंदरबांट हुई। लगा अब हद हो रही है। सुप्रीम कोर्ट तक जमीन घोटाले को लेकर इतना गंभीर है और उसकी खबरें छापने वाले इन बेशर्म पत्रकार बंधुओं की आंखों में पानी तक नहीं है। लिहाजा अपन ने फिर कमर कस ली है। मालूम है इसकी खबर अजमेर तो क्या राजस्थान के किसी अखबार और न्यूज चैनल में नहीं आने वाली है। भड़ास नहीं होता तो शायद अपन भी यह हिम्मत नहीं कर पाते। खबर के तथ्य संकलित कर तो लें परंतु जब कहीं सामने ही ना आ पाए तो फायदा क्या ? लिहाजा अब अपन ने नगर सुधार न्यास में सूचना की एक लंबी-चौड़ी अर्जी लगाकर इस कांड के बारे में सारी जानकारी मांग ली है, साथ ही एक अर्जी संभागीय आयुक्त के यहां भी दी है कि जरा हमें भी तो पता लगे कि हमारी जांच का हुआ क्या था? मामला लंबा चलने वाला है। यह तो प्रस्तावना है। फिलहाल अर्जी दायर की है जिसके तथ्य इस तरह से हैं।

राजेंद्र हाड़ा करीब दो दशक तक पत्रकारिता करने के बाद अब पूर्णकालिक वकील के रूप में अजमेर में कार्यरत हैं. 1980 में बीए अध्ययन के दौरान ही पत्रकारिता से जुड़े. दैनिक लोकमत, दैनिक नवज्योति, दैनिक भास्कर आदि अखबारों में विभिन्न पदों पर कार्य किया. साप्ताहिक हिंदुस्तान, आकाशवाणी, जनसत्ता, नवभारत टाइम्स, राष्ट्रदूत आदि में भी रचनाएं, खबरें, लेख प्रकाशित-प्रसारित. 1986 से वकालत भी शुरू कर दी और 2008 तक वकालत - प़त्रकारिता दोनों काम करते रहे. अब सिर्फ वकालत और यदा-कदा लेखन. पिछले सोलह साल से एलएलबी और पत्रकारिता के विद्यार्थियों को पढ़ा भी रहे हैं.


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Comments (3)Add Comment
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written by GAGAN KHAN MEHAR, March 04, 2011
IS PURE PRAKARAN KI NISAPAKSHA JANCH JARURI HAI .IS MUDDE KO UTHANE JE LIYE HADA JI THANKS .
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written by rajesh choudhary, February 12, 2011
Ajmer ke in patrakaro ko ashok gehlot ke hato patte baante gaye. cycle par chalne wale patrakar aaj carorpati ha. sarkari jamin ki aisi bandar baant kahi nahi dekhane ko milegi. iskki jaanch hona jaruri ha. hada ji bapu ne hi aisi himmat ki thi. dekh liya unko kaise club se hata diya. kyo in gundo ki jamat se panga le rahe ho. prashashan aur pulice tak ki inse phati padi ha.. cm me himmat ha to inpar jaanch bitha kar dekhe kahi unko hi pad nahi chhodana pad jaye. thanks hada ji. lage raho. rajesh
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written by अमित बैजनाथ गर्ग. , February 11, 2011
अगर ये मामला सही है तो फिर राजस्थान के बड़े कहलाने वाले अखबार और न्यूज़ चैनल क्या कर रहे हैं. केवल दुनिया को ही नैतिकता और शुचिता का पाठ पढ़ा रहें हैं या खुद भी कभी कुछ करेंगे. किसी ने सही कहा है हमाम में सभी नंगे हैं, नंगा नंगे को क्या कहेगा?

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