एक पत्रकार की वैचारिक छटपटाहट

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महाराष्ट्र के रत्नागिरी में मेरी मुलाकात पत्रकार शिरिष दामले से हुई। शिरिष भी उन पत्रकारों में से एक हैं, जो आजकल एक अखबार में काम तो करते हैं, लेकिन उन्हें पता है कि वे जो काम कर रहे हैं, वह नौकरी से अधिक कुछ भी नहीं है। उन्होंने बातचीत में जो भी कहा वह अकेला उनका नहीं आज खुद को पत्रकार कहने वाले बहुत से लोगों का दर्द है। इसमे भाषा-जाति और क्षेत्र का भी भेद नहीं है। हर तरफ कमोवेश एक सी स्थिति है। इसलिए अब इस बात को स्वीकार करने में किसी को आपत्ति नहीं रही है कि पत्रकारिता मिशन नहीं बल्कि धंधा है।

अब यह बात पत्रकारिता की पढ़ाई करने आए छात्रों के ही गांठ बांध दी जाती है, समाज को बदलने का सपना लेकर इस क्षेत्र में आए हो तो कुछ और कर लो। पत्रकारिता के माध्यम से अब यह संभव नहीं है। वैसे शिरिष दामले का नाम यहां लेने के पीछे मुख्य वजह पत्रकारिता की निन्दा करना नहीं है। उस उम्मीद पर बात करना है, जिसकी राह दामले साहब ने दिखलाई। वे कहते हैं, 'हम कुछ साथी पत्रकार जो अलग-अलग अखबारों में काम करते हैं, सोच रहे हैं एक साप्ताहिक अखबार अपनी आमदनी को जोड़कर निकालें। जिसमें वे सारी खबरें हों, जिसे हमारा अखबार अपनी-अपनी मजबूरी में छाप नहीं पाता।' दामले साहब इस तरह की कोशिश में जुट गए हैं।

वैसे यह काम अकेले दामले साहब ही क्यों करें? इस बात को तो अभियान की तरह जिले-जिले में फैलाया जाना चाहिए। यदि एक जिले के दस पत्रकार भी महीने दो-दो हजार रुपए जोड़ लें तो एक साप्ताहिक अखबार मजे से निकाल सकते हैं। बिना विज्ञापनों पर निर्भर हुए। वैसे इस तरह का नेक काम करने के लिए कुछ लोग आगे जब आएंगे तो निश्चित तौर उनके अपने समाज से उन्हें मददगार भी मिलेंगे। कमाल की बात यह है कि यह अखबार वे सभी पत्रकार अपने-अपने अखबार में काम करते हुए निकाल सकते हैं। या इस तरह का प्रयास वे अपने प्रयत्नों से या किसी को प्रेरित करके शुरू करवा सकते हैं और इस तरह के प्रयास को वे अपना नैतिक और आर्थिक सहयोग तो दे ही सकते हैं।

आज छपने के अभाव में खत्म हो रही खबरों को जरुरत है, एक ईमानदार अखबार की। यदि एक पत्रकार की जानकारी में कोई खबर, पाठकों के बीच जाने से महरुम रह जाए तो यह पत्रकार की अपने पेशे के साथ बेईमानी ही कही जाएगी। इसलिए अब यही समय है, हम आगे बढ़े और व्यवस्था में रहते हुए उसमें सुधार के लिए प्रयास करें। दामले साहब की पीड़ा तो निश्चित तौर पर बहुत लोगों के दिल का दर्द है लेकिन उन्होंने जो कदम उठाने का निर्णय लिया है, वह भी वे सारे लोग अपनाने के लिए आगे बढ़े तो निश्चित तौर पर हमारी पत्रकारिता संवर सकती है। भूत-प्रेत, अपराध, सेक्स, सनसनी से बाहर निकल सकती है। जिन उम्मीदों पर बड़े अखबार खरे नहीं उतर रहे, उसे छोटे छोटे अखबार मिलकर बिल्कुल पूरा कर सकते हैं।

लेखक आशीष कुमार अंशु इंडिया फाउंडेशन फॉर रूरल डेवलपमेंट स्‍टडीज से जुड़े हुए हैं.


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Comments (1)Add Comment
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written by मदन कुमार तिवारी, February 13, 2011
वाह क्या मेरे मन की बात कही है । आज इसी की जरुरत है ।

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