''किसी ने कह दिया, लिखने वाले ने लिख दिया और वही छप भी गया''

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: भड़ास में छपे दो भड़ास पर मेरी भड़ास : दिल्ली में स्ट्रिंगरों की मनमानी और चैनलों की मजबूरी परस्पर विरोधी बातें हैं : भड़ास पर प्रकाशित एक लेख का ‘संपादन’ तो मैंने कर दिया। एक और कॉपी का संपादन ठीक से नहीं हुआ है। मेरी राय में यह खबर तो लगाने लायक ही नहीं थी इसलिए मैंने इसकी खामियां साफ-साफ बताते हुए ये कमेंट लिखा है पर एक अन्य खबर, खोजी पत्रकारिता के अभाव में घटी मीडिया की विश्वसनीयता – का संपादन नहीं हुआ है।

विनोद मेहता को पायनीयर का संपादक लिखा गया है और यह भी कि हुड्डा के मुताबिक प्रजातन्त्र के चार स्तंभ- विधानपालिका, कार्यकारिणी, न्यायपालिका और प्रेस हैं। होना चाहिए था - प्रजातंत्र के तीन स्तंभ होते हैं – कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका। मीडिया को चौथा स्तंभ माना जाता है। अब किसी ने कह दिया, लिखने वाले ने लिख दिया और वही छप भी गया है। इसी तरह, विचार गोष्ठी में जाने माने पत्रकार विनोद मेहता, गोबिंद ठुकराल, बीके चम के साथ बलवंत तक्षक - जरा अनुचित है।

दिल्ली में स्ट्रिंगरों की मनमानी और चैनलों की मजबूरी शीर्षक से एक खबर पढ़ने को मिली। इसकी शुरुआत इस प्रकार होती है, “ज्यादातर चैनलों में स्टाफ रिपोर्टरों के पास ज्यादा खबरें निकालने के लिए दिल्ली में संपर्कों की कमी है। लिहाजा आज ज्यादातर चैनल दिल्ली की खबरों के लिए स्ट्रिंगर्स पर ही ज्यादा निर्भर हो गए हैं। चाहे वो स्टार न्यूज हो, आजतक, आईबीएन, सहारा समय या फिर जी नेटवर्क हो। दिल्ली में अगर सही स्ट्रिंगर्स की संख्या की बात करें तो आंकड़ा दर्जन भर आ कर ही अटक जाता है।“ स्टाफ रिपोर्टर स्ट्रिंगर पर ही निर्भर हैं फिर भी दिल्ली जैसे शहर में दर्जन भर स्ट्रिंगर ही हैं – परस्पर विरोधी बातें हैं। इसके आगे लेखक ने लिखा है, “फिर शुरू हो जाता है मजबूरी का खेल...  एक स्ट्रिंगर दो से तीन चैनलों के लिए काम करता है। एसाइन्मेंट डेस्क की भी मजबूरी है कि उसे दूसरे चैनलों पर चलने वाली खबरों को ही अपने स्ट्रिंगर से मंगवाना पड़ता है। और कोई चारा नहीं है .. ।“ क्यों नहीं है। स्ट्रिंगर कैसे चैनल वालों को मजबूर कर देंगे जिन स्ट्रिंगरों की बात हो रही है वो क्या मां के पेट से ही सोर्स लेकर पैदा हुए हैं जो दिल्ली के बाहर से आया, कोई नया रिपोर्टर वैसा सोर्स नहीं बना सकता है?

समझ में नहीं आ रहा है कि योगराज शर्मा कहना क्या चाह रहे हैं। करोड़ों का चैनल चलाने वाले 70 हजार रुपए महीने (यह आंकड़ा योगराज जी का है, मुझे तो यकीन नहीं है कि चैनल वाले स्ट्रिंगर को इतने पैसे देंगे, स्टाफर नहीं रखेंगे, उनकी मनमानी सहेंगे और योगराज जी को अपने लिए आंसू बहाने का मौका देंगे) का बिल लेने वाले स्ट्रिंगर के आगे मजबूर हो जाएंगे। मजबूरी (अगर है तो) स्ट्रिंगरों के कारण नहीं है, पैसे न होने या खर्च करने की इच्छा या माद्दा न होने के कारण होगी।

आगे उन्होंने लिखा है कि ज्यादातर चैनल के दफ्तर नोएडा में हैं इसलिए दक्षिण और पूर्वी दिल्ली करीब है। पर सच यह है कि ज्यादातर चैनल के दफ्तर नोएडा में हैं क्योंकि वहां सस्ती जमीन मिली है और सब एक जगह हैं तो उसका फायदा भी उठाते हैं। वह हम पर, आप पर, दर्शकों पर या स्ट्रिंगरों पर कोई अहसान नहीं कर रहे हैं। अपने स्वार्थ से हैं। और अगर एनडीटीवी अकेले ग्रेटर कैलाश में तथा टोटल टीवी कनॉट प्लेस में है (सुना है वो भी नोएडा जा रहा है) तो उसका नफा-नुकसान उसे ही होगा, इसमें भी उसका स्वार्थ या मजबूरी होगी। योगराज शर्मा के हम जैसे पाठक इस तथ्य का क्या करें? वैसे भी यह कोई ब्रेकिंग न्यूज तो है नहीं। दक्षिण और पूर्वी दिल्ली करीब है इसलिए रिपोर्टरों की पहुंच आसान होगी ही। इसमें भी नया क्या है? जहां रिपोर्टर की पहुंच आसान नहीं होती है और प्रतिनिधि रखना आवश्यक समझा जाता है वहीं स्ट्रिंगर रखा जाता है। इसमें स्ट्रिंगरों का क्या दोष है?

स्ट्रिंगरों ने गुटबाजी कर ली है, से क्या तात्पर्य है? पत्रकारिता में रिपोर्टिंग, फोटोग्राफी ऐसे ही की जाती है। एक को सूचना मिलती है वह अपने साथियों को बताता है। एक मौके पर पहुंचता है वह दो-चार ऐंगल से फोटो लेता है और साथियों को देता है। वीडियो कैमरा इतना सस्ता नहीं हुआ है कि एक ही व्यक्ति दो चार रख ले और अगर कोई चार कैमरे लेकर मौके पर पहुंच जाता है और समय पर न पहुंच पाने वालों को दे देता है तथा खबरों का धंधा करने वालों से औने-पौने दाम मांगता है तो क्या गलत और गुनाह करता है? अगर चैनल वाले अपने स्टाफर रखेंगे और मोटी तनख्वाह भी देंगे तो इसे रोका नहीं जा सकेगा और मेरे ख्याल में चैनल को शूट से मतलब होना चाहिए इससे नहीं कि कैमरा-मैन या रिपोर्टर समय से मौके पर पहुंचा था या नहीं। रिपोर्टर भी यही करते हैं। कोई रिपोर्ट मौके पर न पहुंच पाए तो साथियों से ही तो पूछेगा या फिर एजेंसी की कॉपी से मदद लेगा। इसमें बुराई क्या है?

आपका यह सुझाव कि, “चैनलों को बाहरी, पश्चिमी और उत्तरी दिल्ली के बीच अपने ब्यूरो ओफिस बनाने चाहिए। वहां हर वक्त दो स्टाफ रिपोर्टर, एक ओबी वैन खड़ी कर दें तो खबरें और बेहतर और स्पेशल भी हाथ आ सकेंगी। खर्च भी कुछ खास नहीं होगा।“ सुनने में तो अच्छा लग रहा है पर आप क्या समझ रहे हैं कि सभी चैनल चलाने वाले मूर्ख हैं और इसीलिए ऐसा नहीं कर रहे हैं। ऑफिस बना लें, ओबी वैन खड़ी कर दें – ऐसे लिख दिया जैसे चैनल वाले भी किसी कागज पर लिख देंगे तो हो जाएगा। खबर-खबर होती है और सही होगी तो सभी चैनलों पर एक ही होगी, अखबारों में भी वही छपेगी। यह एक नाम से छपे या चार – इससे पाठक या दर्शक को क्या फर्क पड़ता है। और यह घोटाला कैसे है। असाइनमेंट डेस्क पर दिल्ली के लोग नहीं बैठाए गए या बिहार-यूपी के ऐसे लोग बैठा दिए गए हैं जो दिल्ली का भूगोल या इसके इलाकों का नाम नहीं जानते हैं तो यह चैनल की मजबूरी है या बैठाने वाले की या उस लाला की जो गांठ से पैसे निकालना ही नहीं चाहता है? असाइनमेंट डेस्क वालों के लिए स्ट्रिंगर पर निर्भर होना मजबूरी है तो स्ट्रिंगर की वजह से नहीं – लाला की वजह से या लाला के चम्मच संपादक की वजह से जिसने स्टाफ रिपोर्टर नहीं रखा है या रखना चाहता है।

आपने लिखा है, “कई चैनलों में उनके स्टाफ रिपोर्टर की तनख्वाह तो 25 हजार है, लेकिन इलाके के स्टिंगर का मासिक बिल 70 हजार तक पहुंच जाता है। एक दो चैनलों ने तो इस खर्च में कटौती करने के लिए अपने स्ट्रिंगर को रिटेनर बना दिया है। महीने में 20 हजार देकर उसी का कैमरा, उसी की गाड़ी, उसी का कैमरामैन सब जिम्मेदारियां उसी पर सौंप दी है। इस राशि में वो क्या खर्च करेगा, क्या बचा कर घर चलाएगा, इसका अंदाजा भी चैनलों को है। लेकिन करें तो क्या?” अव्वल को स्ट्रिंगर और रीटेनर में ज्यादा फर्क नहीं है फिर भी अगर कोई 70 हजार छोड़कर 20 हजार रुपए में मान जा रहा है तो उससे आपको सहानुभूति क्यों है। जिसे 50 हजार रुपए (वो भी हर महीने) का मतलब नहीं समझ में आता हो उसके लिए हम आप आंसू बहाकर क्या करेंगे। और यह भी क्या चैनल वालों की मजबूरी में हो रहा है? आपने बात शुरू की चैनल की मजबूरी से आ गए स्ट्रिंगर की मजबूरी पर!

अंतिम पैरे में आपने काम की और गंभीर बात कही है लेकिन है वह भी हवा में ही। कोई ठोस उदाहरण नहीं। सब कुछ स्ट्रिंगरों के चाहने से हो जाता है तो चैनल में बैठे लोग किस बात की तनख्वाह पाते हैं? और इन्हें देखने वाला कोई नहीं है क्या? आपने लिखा है, “बाहरी, उत्तरी और पश्चिमी दिल्ली में स्ट्रिंगर्स के गुटों के हावी होने का नुकसान स्थानीय अधिकारियों व नेताओं को भी भुगतना पड़ता है। जिसके पीछे एक स्ट्रिंगर पड़ गया, उसे सब मिलकर बर्बाद करने तक में कसर नहीं छोड़ते। जिस खबर को उठाना हो या जिस खबर में उनका हित सध रहा हो, उसे सभी एक साथ उठा देते हैं। एक चैनल पर खबर चली नहीं कि दूसरे चैनल को उस खबर को चलाना मजबूरी हो जाता है। (चाहे वह गलत, अपुष्ट या ब्लैकमेलिंग वाली हो?) चैनलों के इनपुट हेड, आउटपुट हेड या मॉनिटरिंग डिपार्टमेंट क्या इन मुद्दों को बैठकों में उठाते नहीं होंगे। ये संभव नहीं। लेकिन हल निकालने की चिंता किसी को नहीं।“ अगर आपकी बात मान भी लें कि हल निकालने की चिन्ता किसी को नहीं है तो क्या जिन नेताओं और अफसरों को ये बर्बाद करते हैं वे इस लायक भी नहीं बचते कि आपसे, चैनल से या भड़ास4मीडिया से शिकायत कर सकते।

यह सब आपने तब लिखा है जब एक बड़े खबरिया चैनल ने अपने एक अच्छे और तेज-तर्रार रिपोर्टर से इस्तीफा देने के लिए कहा है क्योंकि उसके पास एक राजनेता के खिलाफ पक्की खबर थी (जो अभी चली नहीं है और राजनेता अभी बर्बाद भी नहीं हुए हैं)। स्ट्रिंगरों को गरियाना आसान है पर यह नोट कर लीजिए कि किसी भी चैनल या अखबार की जान होते हैं वे फिर भी व्यवस्था ऐसी है कि सबसे ज्यादा शोषित और पीड़ित वही हैं। जब स्टाफ रिपोर्टर को नौकरी से निकालने में समय नहीं लगता तो स्ट्रिंगरों को यह बताने की भी जरूरत नहीं समझी जाती है कि वे खबरें न भेजें। उनकी खबरों का उपयोग बंद कर दिया जाता है या फिर दूसरे की खबरों का उपयोग शुरू कर दिया जाता है। यह सब मैं इसलिए नहीं लिख रहा हूं कि स्ट्रिंगर के रूप में मैं भी कभी शोषण का शिकार हुआ हूं। इसके उलट वर्षों तक स्ट्रिंगरों की खबरें देखी हैं और उनके संपर्क में रहा हूं। इस आधार पर कह सकता हूं कि यह एक कमजोर स्ट्रिंगर की बगैर संपादित की हुई कॉपी है, जो छपने योग्य नहीं है।

संजय लेखक संजय कुमार सिंह लंबे समय तक जनसत्ता, दिल्ली से जुड़े रहे. बाद में उन्होंने नौकरी छोड़कर अपना खुद का काम शुरू किया. अनुवाद के काम को संगठित तौर पर शुरू किया. ब्लागिंग में सक्रिय रहे. सामयिक मुद्दों पर लिखते-पढ़ते रहते हैं.


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