ये 'तूफान' थमने वाला नहीं

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गिरीश जी''ट्यूनीशिया, फिर मिस्र. अब कौन? अनेक सर्वसत्तावादी सरकारें भयभीत हैं. फिलहाल मिस्र की घटनाओं पर फलस्तीन, जार्डन, तुर्की, यमन, बहरीन, अल्जीरिया, लेबनान, सीरिया और ईरान के लोगों ने गले मिलकर, जबर्दस्त आतिशबाजी करके और गाडियों के हॉर्न बजाकर खुशी का इजहार किया है. लेकिन सऊदी अरब, लीबिया, कुवैत, ओमान, अल्जीरिया और बहरीन जैसे अनेक देशों की सरकारें सकते में हैं. उधर, तुर्की सरकार ने जहां खुशी व्यक्त की है, वहीं ट्यूनीशिया की सरकार ने चुप्पी ओढ़ रखी है, जबकि जनता उल्लसित है...''

राष्‍ट्रपति हुस्नी मुबारक जब शुक्रवार को परिवार समेत लाल सागर के किनारे स्थित शर्म अल शेख के लिए रवाना हुए तो मिस्र ही नहीं, सारी दुनिया के लोकतंत्र समर्थकों में खुशी की लहर दौड गई. संयुक्त राष्‍ट्र, यूरोपीय संघ, अमेरिका, भारत समेत अनेक देशों ने आगे की जनतांत्रिक प्रक्रिया को लेकर उम्मीद जताई. लेकिन स्विट्जरलैंड ने तुरंत मुबारक के बैंक खातों पर रोक लगाने की घोषणा की. अब मुबारक आगे कहां जाते हैं, स्पष्ट नहीं है. यहां याद रखने की बात यह है कि जब पिछली 14 जनवरी को ट्यूनीशिया की राजधानी से जनविद्रोह के बाद राष्‍ट्रपति जिने अल अबिदीन बेन अली अपने परिजनों के साथ भागे थे तो उनका विमान भूमध्यसागर के ऊपर देर तक चक्कर काटता रहा, क्योंकि उनके लंबे समय तक संरक्षक रहे फ्रांस ने उन्हें शरण देने से इनकार कर दिया था. फ्रांस इस तरह मुंह मोड़ लेगा, वो भी ऐसे मौके पर, बेन अली ने ये कभी नहीं सोचा था. फिर वो क्या करते? उन्होंने तुरंत सऊदी अरब से विनती की कि 'शरण दो'. तब सऊदी अरब ने इस बिन बुलाए मेहमान को जेद्दा में उतरने की अनुमति दी. कोई ताज्जुब नहीं कि बाकी चीजों में बेन अली से समानता रखने वाले हुस्नी मुबारक के साथ इस मामले में भी ऐसा ही कुछ हो. यह तो रहा मुबारक का काहिरा छोडकर भागना. अब कृपया निम्न घटनाओं पर गौर करें -

- खबर है कि मिस्र में जनता की जीत और राष्‍ट्रपति हुस्नी मुबारक के राजधानी से जाने के बाद इराक की राजधानी बगदाद में भ्रष्टाचार और भारी अव्यवस्था को लेकर हजारों लोगों ने प्रदर्शन किया है.

- ट्यूनीशिया, मिस्र के जनविद्रोह से उत्साहित होकर शुक्रवार को ही दक्षिणी यमन के हजारों लोगों ने सड़कों पर उतरकर उत्तरी यमन से अलग होने की मांग की. पिछले दो सप्ताहों से पूरे यमन में भी सरकार विरोधी प्रदर्शन हो रहे हैं.

- ईरान में विपक्षी नेता मीर हुसैन मुसावी ने पहले ही मिस्र, ट्यूनीशिया में जनक्रांति के समर्थन में आगामी 14 फरवरी को रैली की घोषणा की थी. अब इसी मांग का समर्थन करने वाले विपक्षी नेता महदी करूबी को घर में नजरबंद कर दिया गया है.

- चीन सरकार पहले से ही इन जनप्रदर्शनों से भयभीत है. चीन में फेसबुक, ट्विटर पर प्रतिबंध के साथ ही मिस्र और ट्यूनीशिया की किसी भी खबर के प्रसारण पर रोक लगा दी गई है. चीन को डर है कि जनता के बीच इन सरकार विरोधी प्रदर्शनों का गलत असर पडे़गा.

- मिस्र और ट्यूनीशिया की तरह अल्जीरिया में भी आर्थिक और राजनीतिक स्थितियों के विरोध में चार लोगों ने खुद को आग लगाकर खुदकुशी कर ली है. इससे लोगों में आक्रोश बढ़ा है.

- लीबिया के तानाशाह शासक मोहम्मद कद्दाफी भी आतंकित हैं. कद्दाफी ने पहले भी ट्यूनीशिया से बेन अली के भागने पर जनता की आलोचना की थी और ट्यूनीशियाई जनता से कहा था कि बेन अली से अच्छा शासक ट्यूनीशिया को नहीं मिल सकता.

- इन घटनाओं से परेशानहाल अरब लीग के नेताओं ने शर्म अल शेख में पिछले दिनों बैठक करके बेरोजगारी दूर करने, शासन व्यवस्था में सुधार करने और सुरक्षा तंत्र को जनता के हित में ढील देने की बात भी कही है. इनमें सीरिया के राष्‍ट्रपति बशीर अल असद के साथ ही कुवैत, जार्डन, सऊदी अरब, अल्जीरिया समेत अनेक देशों के शासक शामिल हैं.

- मिस्र में मुबारक विरोधी क्रांति का प्रतीक बना 30 साल का युवक वेल घोनिम. घोनिम ने शासन विरोधी ऑनलाइन अभियान चलाया. वह काहिरा में गूगल इंक में कार्यरत है. उसे मुबारक समर्थक पुलिस ने 12 दिनों तक गिरफ्तारी में रखकर प्रताडि़त किया. लेकिन जन दबाव में रिहाई के बाद घोनिम आज बदलावकारी 'युवा शक्ति' का प्रतीक बन गया है तो मुबारक 'ध्वस्त होते क्रूर निर्मम शासन' के प्रतीक हैं.

- अरब-अफ्रीकी देशों में नई जनचेतना के प्रतीक के तौर पर सोशल नेटवर्किंग साइट्स को महत्वपूर्ण माना जा रहा है. जहां बिना किसी जननेता के नए उभरते मध्यवर्ग और खासकर युवाओं की अगुवाई में ये जनक्रांतियां काफी हद तक अहिंसक रूप में सफल हो पाईं, जबकि इन क्षेत्रों में ऐसे अहिंसक जनप्रदर्शनों का कोई इतिहास भी नहीं रहा है.

दरअसल, ट्यूनीशिया के बाद मिस्र में भ्रष्टाचार, तानाशाही, सत्ता के आतंक, भारी बेरोजगारी, परिवारवाद के खिलाफ उस जनता की जीत हुई है, जिसने इसके पहले कभी इस तरह सड़कों पर उतरकर आंदोलन नहीं किया था. अनेक मामलों में ये जनांदोलन अपूर्व रहे हैं. काहिरा, अलेक्जेंडिन्या, स्वेज समेत मिस्र के अनेक शहरों में लाखों लोग शांतिपूर्ण तरीके से आततायी सरकार को उखाड़ फेंकने में सफल रहे. अब मिस्र की सैन्य परिषद ने कमान संभाल ली है - जो आने वाले समय में परिवर्तन की वाहक बनेगी. कहने वाले इसे आधी जनता की और आधी सेना की जीत बता रहे हैं, लेकिन 30 साल से चल रहे पश्चिम के दुलारे आततायी को कुर्सी छोड़नी पड़ी है, ये बड़ी बात है. दरअसल, मिस्र की सेना का चरित्र इस मायने में अलग रहा है कि वो हमेशा सत्ता शिखर के साथ हो, ऐसा नहीं है. जब 1952 में कर्नल नासिर ने राजतंत्र को खत्म किया था तो सेना का उच्च तबका सत्ता शिखर के साथ था, लेकिन नासिर ने सेना के आम जवानों के साथ जनता की आवाज का साथ दिया. फिर 1981 में उस घटना का समर्थन तो नहीं किया जा सकता, लेकिन सच यही है कि राष्‍ट्रपति अनवर सादात की इजराइल के साथ शांति संधि को लेकर अरब जगत की विरोधी भावना के चलते सेना की परेड के दौरान ही जवानों ने गोली मारकर हत्या कर दी. और, अब फिर मिस्र के 18 दिनों से जारी जनप्रदर्शन पर सेना ने गोली चलाने से इनकार कर दिया. अनेक जगहों पर तो सैनिक प्रदर्शनकारियों के साथ नाचते-गाते नजर आए.

गौर करें ये सिर्फ मिस्र में ही नहीं हुआ है. ट्यूनीशिया में भी हुआ. वहां भी जनाक्रोश बढ़ने पर सेनापति रशीद अम्मार ने गोली चलवाने से मना कर दिया. वहां से भी राष्‍ट्रपति जिने अल अबिदीन बेन अली को सपरिवार अपने मालमत्ते के साथ भागना पडा. ट्यूनीशिया से शुरू हुई अरब जगत की इस बगावत को 'रजनीगंधा क्रांति' कहा जा रहा है. मजे की बात है कि रजनीगंधा की इस मादक सुगंध ने पूरे अरब जगत और अफ्रीका को सम्मोहित कर दिया है. पूर्व सोवियत संघ की तर्ज पर ट्यूनीशिया में भी बेन अली ने लगातार लगभग आधे दर्जन चुनावों में 99 फीसदी वोटों से जीत हासिल की. दिलचस्प है कि 2009 के चुनाव में जब उन्हें 88 प्रतिशत वोट मिले तो उन्हें बड़ा धक्का लगा. दरअसल, ये सभी चुनाव खुद में धांधली की अपूर्व मिसाल थे. लेकिन ट्यूनीशिया से शुरू हुई आग अब मिस्र से होते हुए अल्जीरिया, सीरिया, जार्डन, मोरक्को, सूडान, मौरिटानिया, लीबिया, सऊदी अरब, इराक, ईरान, लेबनान, यमन, ओमान समेत अनेक देशों में पहुंच रही है.

दरअसल, इन क्षेत्रों में चाहे राजनीतिक व्यवस्था कहने को पश्चिम समर्थक उदारवादी-धर्मनिरपेक्ष हो या मजहबी या फिर सामंती-राजतंत्रीय, उन सभी का चरित्र क्रूर तानाशाही का ही रहा है. जनता के शोषण के साथ ही बढ़ती बेरोजगारी, मानवाधिकारों पर रोक और अभिव्यक्ति की आजादी का न होना भी आग में घी डालने का काम करता रहा है. भ्रष्टाचार और तानाशाही की सभी सीमाओं को लांघते इन शासकों की बानगी देखने के लिए तो यही प्रर्याप्‍त है कि हुस्नी मुबारक के दशकों के शासन में लगातार इमरजेंसी रही. पुलिस किसी को भी बिना बताए गिरफ्तार कर सकती थी और जब कुर्सी छोड़ भागने की नौबत आई तो एक आकलन में उनके पास 70 अरब डालर की संपत्ति का होना बताया गया. 1789 की फ्रांसीसी क्रांति के समय के क्रूर शासक लुई सोलहवें की पत्नी मेरी एंटोनियो की तरह इनकी बीवियों ने भी जनआक्रोश को बढ़ाने का ही काम किया. खयाली दुनिया में रहने वाली मेरी तो कहती थी कि 'जनता को रोटी खाने को नहीं है तो वह केक खाए', और बेन अली की पत्नी लैला टनबेल्सी ने तो खुद अपने और पति के खानदान के नाम पर देश की आधी संपत्ति को ही हड़प लिया था. ये तथ्य विकिलीक्स ने उजागर किए हैं. इसीलिए आम जनता ने कभी लुई और एंटोनियो को सरेआम चौराहे पर गिलोटीन के हवाले कर दिया था, तो भगोडे़ बेन अली और टनबेल्सी के परिजनों की बची-खुची संपत्तियों को ही फूंक डाला.

बहरहाल, तेल और खनिजों को आमदनी के कवच की तरह प्रयोग करने वाले ये अरब और अफ्रीकी तानाशाह यदि ये मानकर चलते हैं कि वे खुद तो अथाह संपत्ति का दोहन करते रहें और परेशानहाल जनता को जूठन फेंकते रहें तो अब इंटरनेट के इस युग में यह संभव नहीं है. नया उभरता मध्यवर्ग और अधिकारों के प्रति सजग युवा अब वैश्विक गांव के रूप में तब्दील होती दुनिया में चुप रहने वाला नहीं है. यही वजह है कि ट्यूनीशिया में सब्जी बेचते पढे़-लिखे बेरोजगार नौजवान की पुलिस पिटाई और फिर अपमान से क्षुब्ध हो उसके द्वारा आत्महत्या बारूद में चिंगारी बन जाती है, जिसमें 23 साल से एकछत्र राज चला रहे तानाशाह को भागना पड़ता है, तो मिस्र और अल्जीरिया भी अपने बेरोजगार युवाओं की खुदकुशी पर आग बबूला हो उठते हैं. बहरहाल, वजह कोई भी हो, पूरे क्षेत्र में सत्तातंत्र की भ्रष्ट लूट के खिलाफ जनता उठ खड़ी हुई है. दर्जनों देश इससे प्रभावित हैं. वहां इनके रूप क्या होंगे ये तो वक्त ही बताएगा, लेकिन सुधार के लिए जनआकांक्षा के अनुरूप सत्ता की पहल तुरंत अपेक्षित है. फिलहाल, मौजूदा हालातों पर फलस्तीनी दैनिक 'अल कुद्स अल अरबी' में छपी संपादक अब्दुल बारी अटवान की यह टिप्पणी मौजू है : 'अरब देशों में धैर्य बहुत है. यह ऊंट के धैर्य की तरह है. जिस तरह नाराज ऊंट जुल्म करने वाले को नहीं छोड़ता, उसी तरह अरब जगत अब अपने बंधनों को तोड़ डालने पर आमादा है...'

लेखक गिरीश मिश्र वरिष्ठ पत्रकार हैं. इन दिनों वे लोकमत समाचार, नागपुर के संपादक हैं. उनका ये लिखा आज लोकमत में प्रकाशित हो चुका है, वहीं से साभार लेकर इसे यहां प्रकाशित किया गया है. गिरीश से संपर्क This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it के जरिए किया जा सकता है.


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