संयोग-वियोग में लिपटे एक प्रेमी के नोट्स

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चंडीदत्‍तप्यार ना प्यास है, ना पानी। ना फानी है, ना रूहानी। मिठास है, तो कड़वाहट भी। बेचैनी है तो राहत भी। पहला प्यार अक्सर भोला होता है। भले ही उम्र पंद्रह की हो या फिर पचपन की। कैसे-कैसे अहसास भी तो होते हैं पहले प्यार में। एक प्रेमी के नोट्स पढिए, इस वैधानिक चेतावनी के साथ-इनसे इश्क का इम्तिहान हल नहीं होगा, क्योंकि हर बार नए सवाल पैदा होते हैं-

संयोग के दिन

तुमसे मिलने के बाद पहला जाड़ा : सुबह के चार बजे हैं। बाहर तेज हवा चल रही है, फिर भी खिड़कियों पर टंगे परदे हिल नहीं रहे। थमे हैं। सन्नाटा अक्सर रह-रहकर शोर के आगोश में गुम हो जाता है। तेज हवा का शोर। दरवाजा खटखटाए बिना ठंड कमरे में घुस आई है पर मैं तो गर्म हूं... एक शोर मुझमें भी है। सीना धक-धक के साथ गूंजता है पर रजाई पुरानी पड़ जाने के बाद भी सर्दी नहीं लग रही। कल शाम तुम्हारी हथेलियों में जकड़ा मेरा दाहिना हाथ अब तक तप रहा है, जैसे!

लाल रंग का वो छोटा-सा छाता : सुबह से बारिश हो रही है। मैं भीग रहा हूं एक बस स्टैंड की ओट में खड़े होकर। कपड़े सब सूखे हैं पर अंदर कहीं कुछ बहुत गीला हो चुका है। यकायक घड़ी देखता हूं- तीन बज चुके हैं। तुम जाने वाली होगी। मैं भागता हूं। फिसलता हूं। कीचड़ में गिर गया हूं मैं और अब मिट्टी से लबालब। हाथों से अपना चेहरा पोंछने की नाकामयाब कोशिश करता हूं। मिट्टी महक रही है, तुम्हारे बालों में लगे चमेली के तेल सी। मेरा दौड़ना जारी है और घड़ी की सुइयों का भी। सवा तीन बज चुके हैं। तुम्हारी बस रेंगने लगी है। खिड़की से झांकतीं तुम्हारी लालची आंखें। तुम हाथ बढ़ाती हो और थमा देती हो-एक छोटी-सी लाल रंग की छतरी!

नहीं आता था पतझड़ : पेड़ को छोड़ रिस रहा है एक-एक पत्ता-पत्ता। दरख्त ठूंठ बन चुके हैं, लेकिन मैं यकायक लहलहा उठा हूं। घर के सामने एक पीपल का पेड़ है। वो मुझे बुलाता है, उसे मैं छूता हूं और लगता है-तुम्हारी खुरदरी एडियों से एक लता फूटी है और मेरे इर्द-गिर्द लिपट गई है। तुम हंसती हो-बस, तुम यूं ही जड़ बने रहना।

लो मिल लो, ये हैं श्रीमान वसंत : छोटा-सा स्टूल है और बेशुमार चिट्ठियां हैं। शायद पांच-सात साल पुरानी। बार-बार पढ़ रहा हूं। एक-एक चिट्ठी लगता है, तुमने ही लिखी है। रात नागफनी का गमला खिड़की के बगल रखा है, उसमें खिल गई है गुलाब की कली।

जाती हुई रात, आ रहे सूरज के घोड़े : गर्मी आ गई है पर दिन भर ही रहती है। रातें उमस भरी ठंडी हैं। भोर के पांच बजे हैं और मैं तुम्हारे घर के पास लगे लैंपपोस्ट के नीचे मौजूद हूं। ना सूरज उगा है, ना चांद ढल सका है। लैंपपोस्ट का बल्ब भी टिमटिमा रहा है। आसमान पर जाती हुई रात की लाल-लाल डोरों वाली आंखें हैं और धीरे-धीरे सुनाई देने लगी है सूर्य के घोड़ों के चलने की आवाजें। अलसाई आंखों के इशारे से जैसे घर का दरवाजा हटाती हो तुम... कुछ झुंझलाई हुई सी।

वियोग की रातें

जाने के बाद का जाड़ा : दोपहर आने को है। सुबह कई महीनों से नहीं देखी। हाथों से सिगरेट के कई बरबाद टोटों की महक आ रही है। नुक्कड़ पर अलाव जल रहा है। सोचता हूं- हाथ सेंक लूं। तुम पूछोगी कि फिर से सिगरेट पी, तो बहाना बनाऊंगा- नहीं, अलाव पर हाथ रखे थे। ... पर तुम तो हो नहीं। यकायक, थरथराने लगा हूं। नसें ज्यूं जम रही हैं। खड़े-खड़े गल जाता हूं।

पिघलती हुई रूह : यह वही शहर है, जहां हम मिले। टिन की छत पर बहुत बड़ी-बड़ी बूंदें गिर रही हैं। बाहर आ जाता हूं, भीगने का मन है। तुम नहीं, तो गम नहीं, अकेले ही भीग लूंगा...पर कर नहीं पाता। बूंदें ज्यादा बड़ी हैं। सिर पर टप-टप गिर रही हैं। कानों में हवा भर रही है। सांस फूल जाती है और मैं भीगा हुआ लबालब घर के अंदर हूं...इस दफा कपड़े भीगे हैं पर मन भभक रहा है, धुआं बहुत ज्यादा नहीं हो गया क्या...और ताजा हवा बिल्कुल नहीं।

पतझड़ और वसंत की दोस्ती : वसंत बहुत दिन से नहीं आया। दगाबाज है। किसकी तरह पता नहीं। शायद हम दोनों जैसा ही साबित हुआ। उसने पतझड़ से दोस्ती कर ली है। तुमने मचलती हुई उंगलियों से धनिया के बीज रोपे थे और नींबू का पौधा लगाया था। खट्टा-खट्टा कितना अच्छा लगता था हम दोनों को। ब्रेड पकौड़े अब भी बनते हैं बुतरू की दुकान पर, लेकिन तुम्हें पता है- हमारे घर के पिछवाड़े की धनिया और नीबू, दोनों सूख चुके हैं।

जल जाऊंगा, थोड़ा-सा पानी है क्या : उमस बहुत है। सांस लेनी भारी लग रही है। लगता है- कोयले की भट्टी से निकली राख सीने में अटक गई है। कोला में बर्फ डालकर शराबी होने की नाकामयाब कोशिश कर रहा हूं...बेकार है, बेअसर है। गोलगप्पे भी ताजा नहीं कर पा रहे, पुदीना भी नहीं। तुम आओगी क्या... होठों के एकदम करीब, बस अपनी सांसों से मेरी आंखों में फूंक मार देने के लिए देखो, नाराज ना होना। किचन में फुल क्रीम दूध का पूरा पैकेट पड़ा है और तुम्हारी पसंदीदा लिपटन की चाय भी। हा हा हा। खैर, ना हो तो एक ग्लास पानी ही दे दो। जल रहा हूं।

लेखक चण्डीदत्त शुक्ल स्वाभिमान टाइम्स हिंदी दैनिक में वरिष्‍ठ समाचार संपादक के पद पर कार्यरत हैं.


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Comments (8)Add Comment
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written by Awanindra Tripthi, February 17, 2011
namshkaar sir...aapko dekhe arsa beet gaya...bahut chota tha jb aap ropar me amar ujala me kaaryarat the...mere pita shri satyendra pati tripathi usi samaye se aapki taareef or aapke bhavishya ki mangalkaamna krte the...aaj hosh sambhaal ne ke baad pehli baar aapko padhne ka mauka mila.vakai me aapki ye rachna mukt kanth prashansha yogya h or aap bhi....ropar aaj bhi aapko yaad krta h or mai bhi....
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written by sarla , February 14, 2011
bahut sundar... m lovin it... maine isko padha nahi dekha, poori picture meri aankhon mein chal rahi thi.. really nice... bhaavo ko routine zindagi se kya joda hai...
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written by awesh, February 14, 2011
@राजीव ,अभिषेक श्रवण ",नाचे न आवे अगन्वे टेढ़" , तुम लोग अपने गिरेबान में झांककर देखो ,चंडीदत्त क्या है उन्हें पढने वाले जानते हैं ,|उनके बारे में तुम लोगों के किसी प्रमाणपत्र की जरुरत नहीं है ,हाँ तुम लोग जो कर रहे हो उसे हम अपने यहाँ लंठई कहते हैं
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written by चण्डीदत्त शुक्ल, February 14, 2011
@ प्रिय अभिषेक जी--शुक्रिया इस बात का कि आपने इतने ध्यान से यह लेख पढ़ा। यदि श्री रजनीश शुक्ल, रतलाम ने यही लेख लिखा है, तो यह दुनिया का आठवां आश्चर्य है। साम्यता हो भी सकती है कहीं, क्योंकि प्रेम की धार और धारा एक-सी होती है...लेकिन यकीन करोगे--मैंने वह लेख नहीं पढ़ा। अगर आपके पास है, तो एक बार ज़रूर दिखाइएगा। अन्यथा, एक नम्र निवेदन है...झूठा इल्जाम ना लगाया करो यार। छुद्रता सी झलकती है।
@ अंबुज जी : शुक्रिया, रुचि लेकर पढ़ने के लिए। यह बात सही है कि आलोचक जब जन्म ले लें, तो आपका कद बढ़ने लगता है।
@ श्रवण जी : आपका आभार।
@ राजीव जी : कम जानकार लोगों के प्रति आपकी सहानुभूति का मैं भी कायल हूं। वैसे, मैं इतना जानकार भी नहीं कि लोगों को **** बना सकूं।

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एक बार पुनः आप सबका आभार। वैसे, यह रचना पूरी तरह मौलिक है, क्योंकि प्रेम मूल संरचना में ही अपने अहसासों को लेकर आता है, किसी चोरी को लेकर नहीं।

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written by rajeev singh, February 13, 2011
ye sala bahut badaa natwarlaal hai, badi badi baatein karke kam jaankaar logon ko chutiya banana iska shagal hai...khair yahan bhi iski pol khul gayi...ha ha ha...
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written by shravan shukla, February 13, 2011
ka baat bol rahe hai abhishek ji..kya aapke paas wo cutting maujood hai? agar to kripya use yaha attached karke laga deejiye.... warna kisi par iljaam na lagaye..
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written by ambuj, February 13, 2011
बहुत खूब बड़े भाई ...कलम तोड़ दी ........आपकी लेखनी की धार ऐसे ही कमाल करती रहे .................मेरी शुभकामनाये है आपको ......रही बात माथुर जी के कमेन्ट की ..तो इस पर मै तो यही कहूँगा की अगर लोग आपकी आलोचना करना शुरू कर दे तो ये मान लेना चाहिए की आप तरक्की कर रहे है ...इसलिए ऐसी बातों पर ध्यान दिए बिना लगे रहिये
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written by अभिषेक माथुर, February 13, 2011
बेहद ही गलत बात... समाचार सम्पादक के रूप में कार्यरत होने के बाद भी रचना की चोरी। आज से कोई १४-१५ वर्ष पहले नईदुनिया जब केवल इन्दौर से ही प्रकाशित होता था उसके बुधवार के विविधा स्तम्भ में प्रकाशित हो चुकी है यह पूरी की पूरी रचना। नईदुनिया इन्दौर के बुधवार, दिनांक ११ मई १९९४ के अंक में पृष्ठ क्रमांक सात पर विविधा स्तम्भ में रजनीश शुक्ल, रतलाम के नाम से प्रकाशित है। इस तरह से चोरी करके अपने नाम से फिर से प्रकाशित करना शर्म की बात है।

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