पीएम की पीसी : गूंगा, लाचार और बेचारा मनमोहन!

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Alok Tomarप्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने छह महीने में अपनी दूसरी प्रेस कांफ्रेंस काफी डरते डरते शुरू की और कहा कि सरकार से गलतियां होती हैं मगर लोकतंत्र में मीडिया को अच्छे पक्ष भी देखने चाहिए। महंगाई और मुद्रास्फीति जैसे विषयों पर बोलने के बाद सबसे पहला सवाल ए राजा और टू जी स्पेक्ट्रम का था और मनमोहन सिंह ने पहली बार मंजूर किया कि ए राजा ने उनसे कहा कुछ और किया कुछ और।

मनमोहन सिंह ने साफ साफ शब्दों में कहा कि एक साझा सरकार में करुणानिधि की सलाह मानना उनकी मजबूरी थी और वहां से राजा और दयानिधि मारन के नाम आए थे। प्रधानमंत्री के पास इसका कोई जवाब नहीं था कि उन्होंने राजा को ही क्यों चुना? जब बार बार पूछा गया तो मनमोहन सिंह ने सिर्फ इतना कहा कि कुछ फैसले मेरे विवेक पर भी छोड़ दिए जाने चाहिए।  प्रधानमंत्री ने साफ साफ कहा कि ए राजा के बारे में उन्हें शिकायतें मिल रही थी और इसीलिए मैंने उन्हें एक पत्र भी लिखा था जिसमें कहा गया था कि संचार मंत्री को हर हाल में नियम और कानून का पालन करना चाहिए और स्पेक्ट्रम आवंटन को ले कर जो शिकायतें आ रही हैं और कंपनियों के लोग मुझे मिल रहे हैं उन्हें देखते हुए आपको सावधान रहना होगा।

मनमोहन सिंह के अनुसार राजा का जवाब यही था कि उन्होंने अब तक पारदर्शिता से काम लिया हैं और आगे भी लेते रहेंगे। उन्होंने तो राजा की तारीफ करते हुए कहा कि जिस दिन मैंने राजा को पत्र लिखा उसी दिन उनका जवाब आ गया। पत्र में राजा ने कहा था कि नीलामी करना उचित नहीं होगा क्योंकि इससे नई और छोटी कंपनियां घाटे में रहेंगी। इसलिए राजा ने कहा कि वे थ्री जी में नीलामी कर लेंगे लेकिन फिलहाल पहले आओ, पहले पाओ, के आधार पर लाइसेंस देंगे। मुझे भी यही ठीक लगा।

ये बोलते ही मनमोहन सिंह की समझ में आ गया था कि वे बहुत बड़ी चूक कर बैठे हैं। उन्होंने फौरन कहा कि इसके बाद लाइसेंस कैसे दिए गए, उन्हें कैसे बेचा गया, क्या शर्तें रखी गई और किससे क्या लेन देन हुआ इसके बारे में न मैंने किसी से पूछा और न किसी ने मुझे बताया। यह वही लाइन हैं जो सर्वोच्च न्यायालय में मनमोहन सिंह के बचाव में सरकार के वकीलों ने बोली थी और झाड़ खाई थी।

मगर अब तो मनमोहन सिंह ने खुद ही सबके सामने साबित कर दिया है कि उनकी सरकार में क्या होता रहता हैं इससे उनका कोई खास मतलब नहीं है। बस सरकार चलते रहना चाहिए। राजा का उन्होंने खूब बचाव किया और जब इस बचाव से पत्रकार बेचैन होने लगे तो मनमोहन सिंह ने कहा कि जिसने भी गड़बड़ी की हैं उसे बख्शा नहीं जाएगा।  दरअसल प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह इस मुद्दे को सीमित रखना चाहते थे इसलिए भाषण की शुरुआत ही मनमोहन सिंह ने इसरो से ले कर आदर्श घोटाले तक का वर्णन कर दिया था और यह कहा था कि गलती करने वाले किसी भी व्यक्ति को चाहे वह कितना भी बड़ा क्यों न हो, बख्शा नहीं जाएगा।

मनमोहन सिंह चाहे जो चाहते रहे हों और आंतरिक सुरक्षा से ले कर विदेशी संपर्कों का चाहे जितना वर्णन उन्होंने किया हो लेकिन पूरी बातचीत टू जी घोटाले और राजा के आस पास सीमित रही। मनमोहन सिंह को मानना पड़ा कि करुणानिधि के दबाव में उन्होने राजा को संचार मंत्री बनाया था और शिकायतें राजा के खिलाफ उस समय भी थी। नीरा राडिया के बारे में मनमोहन सिंह ऐसे चौकें जैसे कोई मंगल ग्रह का नाम सुन लिया हो। संसद शुरू होने के पहले और प्रतिपक्ष के घपलों के आरोपों से घिरे मनमोहन सिंह पर दया ज्यादा आई और यह भी समझ में आ गया कि अपनी सरकार के सारे फैसले वे खुद नहीं करते। उन्होंने जानबूझ कर अपना शुरुआती भाषण छोटा रखा था मगर उस दार्शनिक भाषण को सुनने के लिए कोई राजी नहीं था। मनमोहन सिंह ने जेपीसी के सवाल पर कहा कि वे किसी कमेटी के सामने पेश होने से नहीं डरते और उन्हें जो मालूम हैं और जो पूरा सच हैं वह सामने लाने में उन्हें कोई संकोच नहीं हैं।

प्रधानमंत्री ने कहा-

1. मीडिया ने घोटालों का पर्दाफाश किया है। देश के मार्गदर्शन में मीडिया का अहम रोल रहा है।

2. भ्रष्टाचारियों के खिलाफ कड़े कदम उठाए जाएंगे। भ्रष्टाचार मुद्दे को लेकर जाने-अनजाने देश की छवि खराब हुई है। लेकिन भारत को घोटालों का देश कहना गलत है।

3. आतंकवाद और सांप्रदायिकता ताकतों से निपटने के लिए हम पूरी तरह से तैयार है। आंतरिक सुरक्षा देश के लिए बड़ा खतरा है, उल्फा से बातचीत में शांति की उम्मीद जगी है।

4. जम्मू कश्मीर में हालात पहले से बेहतर हैं। सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्यों ने घाटी का दौरा किया है।

5. इस वक्त महंगाई एक बड़ी समस्या है। इससे निपटने के लिए हमारे पास पर्याप्त साधन नहीं है। मार्च तक महंगाई 7 फीसदी से नीचे आएगी।

6. संसद सत्र की कामयाबी की उम्मीद की जानी चाहिए। सरकार गंभीरता से काम कर रही है।

7. 2 नवंबर 2007 को ए राजा को चिट्टी लिखकर टेलीकॉम आवंटन में पारदर्शिता की बात कही थी, राजा ने पारदर्शिता का भरोसा दिलाया था।

दरअसल पिछले कुछ दिनों से प्रधानमंत्री चौतरफा मुश्किलों से घिरे हैं। अपनी पहली पारी में परमाणु डील कराके और विश्वास मत जीतकर वाहवाही लूटने वाले मनमोहन सिंह, यूपीए की दूसरी पारी में बैकफुट पर हैं। आदर्श घोटाले से लेकर कॉमनवेल्थ घोटाले तक, और 2जी स्पेक्ट्रम से लेकर हालिया एस बैंड विवाद तक मनमोहन सिंह की मुश्किलें लगातार बढ़ी हैं। जेपीसी जांच को लेकर संसद का शीतकालीन सत्र भी स्वाहा हो गया। ऐसे में प्रधानमंत्री नहीं चाहते हैं कि बजट सत्र में भी ये टकराव जारी रहे। यही वजह है कि उन्होंने बुधवार को न्यूज चौनलों के संपादकों से मुखातिब होने का फैसला किया। मनमोहन सिंह को बार-बार अब तक का सबसे कमजोर प्रधानमंत्री बताने वाली बीजेपी चाहती है कि तमाम मुश्किल सवाल पूछे जाएं। और प्रधानमंत्री देश को साफ जवाब दें। सूत्रों के मुताबिक सोमवार को कांग्रेस की कोर ग्रुप की बैठक में इस मामले पर माथापच्ची  की गई थी। सोनिया गांधी समेत वरिष्ठ कांग्रेसियों को लगा कि 21 फरवरी को बजट सत्र शुरू होने से पहले ये कदम कारगार साबित हो सकता है।

लेखक आलोक तोमर जाने-माने पत्रकार और विश्लेषक हैं. उनका यह लिखा समाचार एजेंसी डेटलाइन इंडिया से साभार लेकर यहां प्रकाशित किया गया है.


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