यशवंतजी, ये भड़ास नहीं भद्दापन है

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स्‍वामीयोगराज शर्मा ने स्ट्रिंगरों की मनमानी का हवाला देकर चैनल वालों को सुझाव क्या दे डाला, भड़ास पर प्रतिक्रिया के नाम आर वेब युद्ध शुरू हो गया. योगराज शर्मा जी ने चाहे जिस मकसद और मंशा से वह लेख लिखा हो, लेकिन उसके बाद प्रतिक्रिया के नाम जो गन्दी गालियों का दौर एक दूसरे पर शुरू हुआ है, उसे देख पढ़ मुझे शर्म आती है. यों तो मैं भड़ास क्या, कोइ भी साइट मुश्किल से ही खोल कर देख पता हूँ. या ये कहें कि मेरी रूचि और ध्यान नहीं गया.

जब बात हमारी बाहरी दिल्ली, उत्तरी दिल्ली से संबधित स्ट्रिंगरों और योगराज शर्मा के बीच भड़ास पर वॉक युद्ध देखा तो महसूस किया कि न ही देखता तो अच्छा था. जिस भाषा को हम सुनना तक नहीं पसंद नहीं करते वह पत्रकारों के पोर्टल पर लिखी और पढ़ी जा रही है. और वह भी उस वर्ग से जो समाज में संवाद स्थापित कर समस्या और व्यवस्था को सुव्यवस्थित और शालीन बनाये रखने की सबसे बड़ी जिम्मेदारी निभाता है. क्या हम पत्रकार इस तरह आरोप-प्रत्यारोप करते हैं कि शर्म भी शर्मा जाये?

दिल्ली में स्ट्रिंगर्स कि मनमानी और चैनलों की मजबूरी शीर्षक के बाद जिस तरह से योगराज शर्मा, दलीप बुन्दवाल और कहीं-कहीं खुद मुझ पर जिस तरह से आरोप लगे मैं उस पर कमेंट्स नहीं करना चाहता. उसके बारे में चैनल में बैठे हमारे बॉस भी जानते हैं. योगराज की मंशा और चैनलों को दी गयी सलाह पर प्रतिक्रिया स्वरूप जो सामने आया, वह भी बहस को विषय हो सकता है. लेकिन जिस तरह की भाषा का प्रयोग हुआ है वह तो निहायत ही गलत था ही, उसके भी ज्‍यादा हैरत भड़ास पर उसे ज्यो का त्यों छपने पर हुआ है. यशवंतजी इस लेख के माध्यम से मैं आपका ध्यान इस ओर दिलाना चाहता हूँ कि आप यह किन लोगों की भड़ास को स्थान दे रहे है. कम से कम यह पत्रकारों की जमात तो नहीं हो सकती. यह भड़ास नहीं भद्दापन है. जिस पर जो चाहे जैसे आरोप लगा दे यह हक़ सबका है. हो सकता है उसमें कहीं न कहीं कोई न कोई सच्चाई भी हो.

आप उस विचार, लेख, भड़ास को बेशक जितना बड़ा स्पेस दें, लेकिन उसमें कम से कम गालियों का स्थान तो नहीं होना चाहिए, ऐसे तो आपका पोर्टल गालियाँ देने और सुनाने का ही मंच बन जायेगा. और वे ही उस पर पर अपना टाइम पास करते पाए जायेंगे. हो सकता है इससे आपको टीआरपी मिलने का भ्रम हो, लेकिन मैं बता दूँ कि एक ही व्यक्ति नाम और आईडी बदल बदलकर गालियाँ लिखता रहे, अपने आपको सच्चा और अच्छा सिद्ध करता रहे,  और दूसरा पक्ष भी यही करता रहे तो यह टीआरपी नहीं धोखा है. जो आप भी खा रहे हैं और आपके पोर्टल "भड़ास" पर आने वाले लोग भी. पाँच लोग पचास या पांच सौ नाम से किसी बहस पर कमेंट्स करें तो आपके पाठकों की संख्या पचास और पांच सौ नहीं हो जाएगी. शायद आपको नहीं मालूम कि तमाम बड़े चैनलों में भड़ास को बंद ही इसलिए किया गया है कि उसमें भड़ास के नाम पर भद्दी गलियां होती है. बुद्धिजीवी वर्ग जिसे पसंद नहीं करना चाहेगा. कम से कम उसे प्रकाशित करने से पहले उसे देख एडिट तो कर ही लेना चाहिए.

यशवंतजी आपने भड़ास जिस मकसद और कांसेप्ट के साथ शुरू किया उसका स्वागत हो सकता है. आपके पोर्टल पर जो चाहे जिस पर जैसे चाहे आरोप भी लगाये. आप उसे गुप्त भी रखें, इस पर भी कोई दिक्कत नहीं. मैं इस बात से भी सहमत हूँ कि हर सत्य का प्रमाण हो यह भी जरूरी  नहीं, लेकिन कम से कम कहीं किसी स्तर पर यह जबाबदेही और जिम्मेदारी भी तय तो होना ही चाहिए कि पोर्टल पर गंदे और भद्दे शब्दों का प्रयोग न हो. कम से कम किसी भी लेख, विचार कमेंट्स को पोर्टल पर प्रकाशित करने से पहले देख कर यह तो सुनिश्चित कर ही लेना चाहिए कि उसके शब्द शालीनता की सीमाएं न लांघें. हम तो यही कमाना करते हैं कि आपका पोर्टल तेज़ी के साथ ही नहीं सम्मान के साथ भी आगे बढे़. यह सुझाव है आपको अच्छा लगे तो आभार और न अच्छा लगे तो क्षमा.

लेखक राजेन्द्र स्वामी दिल्‍ली आजतक से जुड़े हुए हैं.


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Comments (8)Add Comment
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written by Dr. Maher uddin Khan, March 04, 2011
Dhadebazo.n ne yaha.n phailaya hai jal
patrkar kuch ban rahe aaj bikau mal
aaj bikau mal jaha.n chahe bulwalo
sate mai.n pat rahe aap bhi inhe.n patalo
karte phirte aaj zamane mai.n ruswai
bach sakte yadi bachna in se mere bhai
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written by Sageer-a-khaksar, February 20, 2011
Sanyamit aur maryadit shabdon mein vyakt vicharon ko yadi portal par space mile to achha rahega.
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written by Prem Arora 9012043100, February 19, 2011
सुझाव ग्रहण करने योग्य तो है ही...कुछ न कुछ तो फिल्टर होना ही चाहिए... बाकी भड़ास जब निकलती है तो गाली तो अपने आप ही जुड़ जाती है... मेरे ख्याल से जहाँ गाली का प्रयोग हो वहां पर.................... लगा देना चाहिए
मसलन उसने कहा वोह बहिन..................
उसकी माँ .........................
हाला की यह इस पारकर भी पूरा हो सकता है की
वोह बहिन तो बहुत अच्छी है
उसकी माँ उसे रोज़ अपने हाथ से खाना खिलाती है
अब जिसकी जो मर्ज़ी अपना एअर्थ निकाल लेगा
ठीक लगे तो approve
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written by kamal.kashyap, February 18, 2011
swami ji bhaut hi accha vichar hai... ek buddijiviyo ke portal par galiya honi to hamari eijeat dao par lag jayegi....yashwant ji kripya dyan de ki hamari bhadass par galat sabdo ke paryog par rok lage... ek reporter
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written by shravan shukla, February 18, 2011
ek dam sahi kah rahe hai rajendra ji... yashwant sir ji ...gaaliyo aur bhaddagi par rok lagaya jana uchit hai...
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written by jaatak, February 18, 2011
Me agree.......some level of decency should be maintained ...Yashwant babu .....please.
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written by Ravi Shankar , February 18, 2011
भडास क्या है.......
वैसे मै आपके लेख के विषय में कहना चाहूंगा, इतना क्यों बिदक रहें है महानुभाव,योगराज महराज के लेख ने ऐसा क्या कयामत कर दिया। जो पत्रकारों की जमात को ही गरियाने लगे।आप खुद ही लिख रहे कोई साईट नही देखते ज्यादा बिजी रहते है। अरे आप तो पढन पाठन से भी दूर होगे।तो किसी भी बात की रियल गुणवत्ता को कैसे समझ सकतें है। अच्छा मै ये बता दूं। मैने क्यूं लिखा,ये कमेंट साहब जब आप भडास पढते ही नही तो फिर आप ये कहने की हिमाकत कैसे कर सकते है कि ये भडास नही भददापन है। वैसे ये भी एक तरह की भडास ही है,जो आपकी आर्टिकल है।और बताउ आपको भडास क्या है। भडास जो मै लिख रहा हूं ये भी एक भडास ही है। क्यू और क्या जरूरत है इसको समझे बिना दिल की फांस निकाल मस्त हो कर अपने आगे के लक्ष्यो के लिए लगना ही भडास है।वैसे आप ने लिखा कि गालियां सुनाने का मंच बन जाएगा भडास। तो बताना चाहूंगा दूसरा कोई मंच नही होगा, जो इतना निष्पक्ष हो आपको भी गरियाने का मौका दे। क्योंकि मन में गाली रख कर कुढने के बजाए निकाल दीजिऐ।तो अच्छा है,,,,खैर टी आर पी नही होती बेब मीडिया में ये इलेक्ट्रानिक की चीज है और अखबारों में भी नही पाई जाती।वहां सेकुर्लेशन होता है।खैर आप एक बात बताऐं किन बुद्धजीवों की बात कर रहें है आप जिन्हे ये तक नही पता कि क्या दिखाना है समाज में क्या नही। माफ कीजिएगा मै आपको जानता तक भी नही ना ही योग राज को लेकिन भडास को जब से जाना है तब से पढता हूं और अच्छा लगता है,क्योंकि खरी और बेबाक बातें लिखता है।एक चेतावनी यशवंत जी ने नही लिखी मै लिख देता हूं,मीडिया हाउसेस के चापलूसों के लिए नही है ये पोर्टल कृप्या पढ कर अपना समय नष्ट ना करें ये पोर्टल केवल बु़ि़द्धजीवों व बेबाक लोगो के लिए है।
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written by मदन कुमार तिवारी , February 18, 2011
राजेन्द्र गोस्वामी जी पहले तो बुद्धिजीवी शब्द हीं गाली बन चुका है । रही भडास की बात तो एक प्रश्न का इमानदारी के साथ जवाब दिजियेगा , कभी अपने बेटे पर हाथ उठाया है ? या पत्नी को झुंझलाकर बोला है ? समझ गये न मैं क्या कहना चाहता हूं । मतलब बच्चे पर हाथ उठाने का अर्थ है , आप उसे समझाने से हार गये । आपने कभी अपने किसी बास या और कोई आदमी जिससे आपका ्किसी काम के कारण वास्ता पडा हो और वह व्यक्ति निहायत हीं घटिया किस्म का है , चाशनी वाली जुबान बोलता हो , मक्कार हंसी हो उसकी लेकिन नियत गंदी , तो वैसी स्थिति में आप भी बातचीत में कह देते होंगे साला पक्का हरामी है । भडास पर किसी की मां बहन की गाली मैने नही पढी है , हां हरामी कमिना , साला , मक्कार , चोर बेईमान घटिया जैसे शब्दों का खुब इस्तेमाल देखा है । कारण है गाली देने वाले के अंदर उस आदमी के लिये बैठी हुई भडास , गुब्बार । गोस्वामी जी लच्छेदार भाषा और उपदेश बहुत अच्छा लगता है ।यह हिंदुस्तान है , भडास निकालने की भी अगर जगह नही रहेगी तो प्रभु चावला जैसे तो बेच खायेंगे देश को । चुकी आप आजतक से जुडे हैं तो मेरी भी एक बात सुन ले आजततक पर आजकल भुत प्रेत छुडैल , प्रलय जैसे समाचार छाये रहते हैं । मेरी बेटी आजतक चैनल नही देखने देती है , कहती है यह चैनल सिर्फ़ डराता है । गोस्वामी जी आप कोई भी साईट नही देख पाते है , आपने लिखा है , जो आदमी नेट से दुर रहे और कहे की बुद्धिजीवी है , मेरे लिये तो यह आठवां आश्चर्य होगा । यो कह सकते हैं की कोई कहे की मैने तो आजतक कोई पुस्तक हीं नही पढी लेकिन ग्रेजुयेट हूं । एक बात जो सबसे खुशी की आपने लिखी है की अधिकांश चैनलो ने भडास को बंद कर दिया है ,इसका मतलब की सभी बडे चैनलों को डर लगने लगा है भडास से । जिस लेख का जिक्र किया है आपने उसपर मेरी भी एक टिपण्णी है देखकर पता चल जायेेा बडे चैनलों की औकात । वैसे विगत दस दिनों से मैं दिल्ली में था , होटल में बैठकर सिर्फ़ तथाकथित बडे चैनल हिंदी और अंग्रेजी देख रहा था । सभी चैनल बेकार लगें । आरुषी केस में तो लगा की ये सारे चैनल ठगी करते हैं जनता से चोर तो एक नंबर के हैं सभी चैनल । खैर आपसे प्रार्थना है भडास को भडास रहने दे आजततक न बनाये ।

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