आजकल लोग मुझे याद नहीं करते हैं

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अभिषेक प्रसादथोड़ी देर पहले ही किसी से फ़ोन पर मैंने कहा था कि... दिल किसी जंगल की तरह होता है और दिमाग खूबसूरत बगीचे की तरह... जंगल में पेड़-पौधे खुद जन्मते हैं, बढ़ते हैं... उन्हें कोई लगाता नहीं है, पानी नहीं देता, खाद नहीं देता... जंगल में जीव-जंतु-जानवर भी स्वच्छंद अपने हिसाब से रहते हैं, बढ़ते हैं... पर बगीचे को कोई अपने हिसाब से सोच-समझ कर, काट-छांट कर बनाता है... मेरा जंगल भी वैसा ही है...

आज कल इस जंगल में कोई पौधा नहीं उग रहा... कई दिनों से मैंने महसूस किया है कि लोग अब मुझसे दूर होते जा रहे हैं... ब्लॉग पर, ऑरकुट-फेसबुक में, मोबाइल पर या मेल पर आज कल लोग मुझे याद नहीं करते... इधर समय अभाव के कारण इन्टरनेट की दुनिया को ज्यादा समय भी नहीं दिया मैंने... हाँ कुछ समय चुरा कर एक-आध ब्लॉग पोस्ट जरूर किये थे... पर या तो किसी पोस्ट पर कोई कमेन्ट आया ही नहीं और आया भी तो एक-आध... मुझे लगा कि लोगों के पास शायद समय नहीं या फिर ब्लॉग की दुनिया से उनका मोहभंग हो गया है... पर पिछले तीन दिनों से जब मैं दोबारा इन्टरनेट पर सक्रिय हूँ तो मैंने देखा कि न ही लोगों का मोहभंग हुआ है और न ही समय की कमी है...

कई नए चेहरे ब्लॉग की दुनिया में दस्तक दे चुके हैं... कई पुराने चेहरे और पहचान बना चुके हैं... फिर क्या कारण है कि लोगों ने मुझसे दूरी बना ली है... पर बात सीधी-सी है... इस दुनिया में कुछ भी पाने के लिए उसके बदले में कुछ न कुछ देना पड़ता है... ब्लॉग पर कमेन्ट पाने हैं तो कमेन्ट देना पड़ता है... इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप क्या लिख रहे हैं, कैसा लिख रहे हैं... जितना कमेन्ट आप करते हैं उतना ही कमेन्ट आपको मिलते हैं... मेल पाने हैं तो मेल करना पड़ता है... किसी से बात करनी है तो आपको फ़ोन करना पड़ेगा... लोगों को इस बात से कोई मतलब नहीं कि आप किस मजबूरी की वजह से दूर हैं... आप थोड़ा सा ध्यान अपना हटाते नहीं है कि लोग आपको अपनी दुनिया से निकाल फेंकते हैं... ये बात मैं भी समझ चुका हूँ...

कई दिनों से कोई नयी कविता भी नहीं लिखी है... बताया न आज कल मेरे जंगल में कोई पौधा नहीं उग रहा और मैं बगीचे के फूलों से गुलदस्ता बनाना नहीं चाहता... यूँ ही बैठे बैठे अपनी पुरानी डायरी देख रहा था... इक कविता नजर आई तो सोचा आज उसी को आप लोगों के साथ बाँट लूँ... समय मिले और अच्छा लगे तो कुछ मार्ग-दर्शन कीजियेगा....

काश मैं तेरे कमरे का इक आइना होता
तुम रोज सुबह उठकर
सामने मेरे आया करती
अपनी उलझी लटों को फिर
सामने ही मेरे सुलझाया करती
सिलवट पड़ चुके कपड़ों को
अपने हाथों से सीधा करने की कोशिश करती
जाते-जाते फिर मुझमें अपना अक्स देखती
हलके से मुस्कुराती और खुद की नजरों से
खुद को ही बचाती
तुम सामने मेरे बैठ कर घंटों खुद को निहारा करती
अपनी खूबसूरती पर कुछ इठलाती
कुछ शरमाती फिर धीरे से मुस्कुराती
जब भी तुम उदास होती
मेरे ही सामने बैठ तुम चुपचाप अपने आंसू बहाया करती
फिर जब नजरें उठाकर देखती
साथ मैं भी तुम्हारे रोता होता
तुम झट से अपनी आंसुओं को पोंछ
फिर धीरे से मुस्कुराती
जब भी तुम यादों में घिरी होती
तुम सामने मेरे ही खड़ी होती
मुझे देख-देख कर तुम अपनी यादों पर
खूब खिलखिलाकर हंसती
और कभी कभी धीरे-से शरमा कर मुस्कुरा देती
रात सोने-से पहले तुम फिर
सामने मेरे खड़ी होती
थोड़ी देर खुद को मुझमें निहारा करती
फिर धीरे-से मुस्कुरा कर
अपने बिस्तर पर लेट शायद मुझे ही याद करती
काश मैं तेरे कमरे का इक आइना होता
हर पल मुझमें तेरा ही अक्स होता
सदा मैं तुझे ही निहारा करता
काश मैं तेरे कमरे का एक आइना होता....

फिलहाल इतना ही

आपका

अभिषेक प्रसाद

ABHISHEK PRASAD

http://ab8oct.blogspot.com

संपर्क : This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it Mob: +919654484003


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Comments (8)Add Comment
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written by govind goyal, February 21, 2011
no comment.
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written by vandana sharma, February 21, 2011
Striking metaphors, similies and words
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written by vandana sharma, February 21, 2011
The best views I have ever read on Bhadas. 3 Cheers for Abhishek ji. Keep on writing. Ur writing is like fresh air. Kudos.
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written by vartika , February 20, 2011
Dil ek jangal ...Dimag ek bageeecha ...,upmaayen bhut anoothi or Arthpoorn hain !
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written by Manoj, February 20, 2011
Abhishek Babu, Yaar achha likhte ho !
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written by डा.अजीत तोमर, February 20, 2011
अभिषेक जी,

ब्लागजगत की औपचारिक और आभासी दूनिया के बारें मे एकदम सही लिखा है आपने...सबसे बडी बात कमेंट पाने के लिए आपको दूनिया भर के ब्लाग पर चक्कर लगाने पडते है....बकवास पोस्ट मे गम्भीर दर्शन निकाल कर कमेंट्स करने पडते है। मै भी इसका भुक्तभोगी हूँ नियमति रुप से दो ब्लाग लिखता हूँ लेकिन कमेंट्स के मामले मे एकदम निर्धन हूँ
। स्वांत सुखाय के भाव से लिखते रहिए।

आपकी कविता दमदार है...बधाई

डा.अजीत
www.shesh-fir.blogspot.com
www.meajeet.blogspot.com
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written by Abhishek, February 20, 2011
Thanks Yashwant Bhayi...
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written by sunil jha , February 20, 2011
sir aapne achha likha ,,lekin soch aapki kahi na kahi khud tak simit hai ,thoda apne aayine se nikal kar samajik banye ,,

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