एक दिनी दिल्ली यात्रा से उपजे सवाल का जवाब मैं तलाश नहीं पा रहा : हरिवंश

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हरिवंश: हमें अर्जुन, भीम, गांडिव- गदा भी नहीं चाहिए, बल्कि अपढ़ कामराज जैसा रहनुमा चाहिए : कई महीनों बाद दिल्ली जाना हुआ. नहीं जानता, दिल्ली हमसे दूर हो गयी है या हम दिल्ली से दूर. इस यात्रा का मकसद था. आइसी सेंटर फॉर गवर्नेस द्वारा आयोजित, करप्शन फ्री गवर्नेस (भ्रष्टाचार मुक्त शासन) पर बोलना.  इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में. प्रभात कुमार जी (पूर्व राज्यपाल, पूर्व कैबिनेट सचिव) और  अनेक मशहूर लोग इस संस्था से जुड़े हैं.

इस तरह दिल्ली और देश- दुनिया में अपने काम- ज्ञान के कारण पहचान रखनेवाले अनेक विशिष्ट लोगों के बीच बोलना एवं उनसे मिलना, अनुभवों से भरा रहा.  पर दिल्ली की फिजा में एक गंध है. बेचैनी है. शीर्ष संस्थाओं के कमजोर, लाचार और असहाय होने का बोध एवं एहसास. अनेक गंभीर आरोपों से घिरे यूपीए के प्रधानमंत्री की प्रेस कांफ्रेंस की चर्चा, टीवी चैनलों के संपादकों के साथ बातचीत में अपनी लाचारी और असहाय होने का एहसास कराना. भारत के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस केजी बालाकृष्णन की संपत्ति की जांच पर उच्चतम न्यायालय की तीन सदस्यीय बेंच का निर्देश. 2010 में भारत सरकार के गृह मंत्रालय को उनके एवं उनके परिवार की संपत्ति की जांच का एक शिकायती पत्र मिला था.

याद रखिए भारत के कुछ पूर्व मुख्य न्यायाधीशों की भूमिका को लेकर भी एक पीआइएल दायर हुआ है. इन्हीं दिनों ए राजा के साथ-साथ देश के उद्योग जगत के महारथियों से भी सीबीआइ पूछताछ कर रही है. करुणानिधि के परिवार के द्वारा संचालित कलाइनार टीवी चैनल पर भी सीबीआइ ने छापे डाले हैं. इस चैनल के मालिक करुणानिधि और उनका परिवार है. आशंका है कि 2जी घोटाले के पैसे इस चैनल में पहुंचे हैं. उधर बीजेपी ने सोनिया गांधी एवं उनके परिवार पर विदेश में खाता होने का आरोप लगाया. फिर लालकृष्ण आडवाणी ने इसके लिए क्षमा मांगी. इधर, सीबीआइ ने बाबरी ध्वंस प्रकरण में आडवाणी और ठाकरे को पुन: अभियुक्त बनाने के लिए उच्चतम न्यायालय में मामला दायर किया.

इसके पहले इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने बाबरी विध्वंस मामले में षडयंत्र के आरोपों से आडवाणी और ठाकरे को बरी कर दिया था. ओड़िशा के मलकानगिरि के कलक्टर आर विनिल कृष्णा और इंजीनियर पवित्र माझी को नक्सलियों द्वारा बंधक बनाये जाने के मामले से सरकार एवं दिल्ली स्तब्ध दिखते हैं. किसी को सूझ नहीं रहा कि क्या रास्ता हो? लगता है देश की चुनौतियों के आगे दिल्ली लाचार है. कोई नेता या स्टेट्समैन नहीं दिख रहा, जो इस मझधार में देश को एक नयी रोशनी की झलक दे सके. अच्छे लोगों का एक समूह मानता है कि प्रधानमंत्री निजी तौर पर पाक साफ हैं, पर वो यह भी कहता है कि वह अब तक की भ्रष्टतम सरकार की सदारत कर रहे हैं. नहीं पता, तथ्य क्या है. पर देश की चुनौतियों को देख कर लगता है, नेतृत्व की दरिद्रता है.

18 फरवरी को ही दिल्ली में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार शिवशंकर मेनन ने चिंता व्यक्त की कि पाक में परमाणु हथियार भारत के लिए चिंता का विषय है. पिछले दिनों यह खबर आयी थी कि भारत के खिलाफ पाक ने 90 जगहों पर आणविक हथियार (मिसाइल) तैनात कर रखे हैं. शिवशंकर मेनन के अनुसार पाक- अफगानिस्तान में बढ़ रहा उग्रवाद और आतंकवाद गंभीर चिंता का विषय है. उधर, चीन की बढ़ती ताकत, भविष्य के युद्ध की तैयारी की खबरें अलग हैं. पर इन सबसे बेपरवाह भारत, बाहरी चुनौतियों से घिरा, अंदर के भ्रष्टाचारों के विस्फोट, राजनीतिक दिशाहीनता और अनिर्णय से ऐसे हालात में पहुंच गया है, जहां उसे एक प्रभावी, गतिशील और निर्णायक राजनीति की प्रतीक्षा है.

यह स्थिति देख कर बहुत पहले दिनकर की लिखी कविता का आशय याद आता है. उस कविता में उन्होंने ईश्वर या नियति से आग्रह किया था कि युधिष्ठिर को यहां न रोको, उन्हें स्वर्ग जाने दो, पर हमें गांडिव - गदा और अर्जुन- भीम जैसा वीर लौटा दो. ऐसा सुना है, चीन से पराजय की पृष्ठभूमि में दिनकर की यह पीड़ा प्रस्फ़ुटित हुई थी. आज की दिल्ली, देख कर लगता है कि हमें अर्जुन, भीम या गांडीव- गदा के रूप में प्रभावी राजनीतिज्ञ और स्टेट्समैन चाहिए. जो निर्णायक हों, जिनकी बातों से राजसत्ता का प्रताप पुन: लौटे. यह लाचारी, असहाय बोध, शीर्ष पर चौतरफा भ्रष्टाचार और चरित्र का संकट दिखायी न दे.

जब से देश में संपदा बढ़ी है, खासतौर से 1991 के उदारीकरण के बाद आर्थिक विकास दर में जो प्रगति हुई है, उससे लोभ-लालच और भोग का एक नया संसार सामने है. जहां किसी के पास धैर्य नहीं. समय नहीं. बस भूख है. पढ़े-लिखे लोगों की संख्या बहुत बढ़ चुकी है. राजनीति में एक से एक विद्वान (प्रबंधन विशेषज्ञ या विदेशों से पढ़े-लिखे लोग) मौजूद हैं. पर राजनीति उतनी ही सड़ चुकी है. दरुगध देती. क्या इसका निष्कर्ष यह है कि पढ़े-लिखे लोग, पहले से अधिक धन-संपदा से संपन्न लोग ही इस बीमारी की जड़ में हैं?दिल्ली से लौटते हुए लक्ष्मीचंद जैन (एलसी जैन के नाम से मशहूर) की पुस्तक सिविल डिसओबेडियंस (टू फ्रीडम स्ट्रगल्स) ली. जैन साहब गांधीवादी थे.

जयप्रकाश नारायण के अभिन्न सहयोगी. वे योजना आयोग के सदस्य भी थे. पुराने पवित्र गांधीवादी नेताओं की धवल परंपरा की एक कड़ी. कुछ ही दिन पूर्व उनका निधन हुआ. उनसे मिलना हुआ था. कुछेक बार प्रभात खबर के काम को देख कर, उन्होंने अपने स्तंभ में इसका उल्लेख भी किया था. कुछेक जाने-माने मित्रों के माध्यम से उनसे मिलना हुआ था. बहुत नजदीकी का संबंध नहीं रहा. पर उनके जीवन एवं काम ने उनके प्रति मन में आदर और श्रद्धा का भाव पैदा किया. उनकी पुस्तक में कई महत्वपूर्ण चीजें हैं. एक सूचना, जिसे पढ़ कर आघात पहुंचा. पंडित नेहरू चीन के युद्ध के बाद अस्वस्थ हो गये थे. तब भारत सरकार की महत्वपूर्ण फाइलें इंदिराजी के माध्यम से उन तक पहुंचने लगीं. जैनजी कहते हैं, हमें कभी पता नहीं चलेगा कि ऐसा आदेश खुद नेहरू ने दिया था या नहीं, पर अगर ऐसा था, तो यह उस पवित्र नियम का उल्लंघन था कि बिना शपथ लिये कोई कैसे भारत सरकार की गोपनीय फाइलें देख सकता है? उल्लेखनीय है कि इंदिराजी किसी सरकारी पद पर नहीं थीं. पर नेहरू की मौत के बाद सत्ता के महलों में कैसे षडयंत्र रचे गये? यह जान कर सत्ता की भूख का एहसास होता है. कामराज के नेतृत्व में एसके पाटील, एस निजलिंगप्पा, अतुल्य घोष, नीलम संजीव रेड्डी ने तुरंत पहल की कि प्रधानमंत्री की गद्दी को तत्काल भरा जाये.

इस समूह ने लाल बहादुर शास्त्री को प्रधानमंत्री के लिए चुना. इंदिराजी ने शास्त्रीजी के चयन को रोकने की हरसंभव कोशिश की. तब कांग्रेस के एक महासचिव थे, श्रीनिवास मलय्या. वह एलसी जैन के राजनीतिक अभिभावक भी थे. 1952 से 1965 (मरने तक) के बीच लोकसभा के सदस्य रहे. कमला देवी चट्टोपाध्याय ने एलसी जैन की मुलाकात मलय्या से करायी थी. मलय्या और शास्त्रीजी तब कांग्रेस के सचिव थे. कामराज कांग्रेस के अध्यक्ष थे. मलय्या ने जैनजी को तब बताया कि इंदिराजी ने शास्त्रीजी के चयन की आहट पाकर तुरंत कामराज को पत्र भेजा. कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक होनेवाली थी. इंदिराजी ने पत्र में लिखा,  यह सही नहीं होगा कि नेहरू का उत्तराधिकारी चुना जाये, क्योंकि अभी देश शोक मना रहा है.

13 दिनों का राजकीय शोक था. पत्र पाते ही कामराज भांप गये कि कुछ गड़बड़ है. कामराज को सूचना मिल गयी कि इंदिराजी के दो खास लोग वीके कृष्णा मेनन और केडी मालवीय ने यह पत्र तैयार किया है. ये दोनों पंडित नेहरू के खास लोग थे. इनके  न रहने पर अपनी प्रतिबद्धता इंदिराजी के साथ जोड़ ली थी. इंदिराजी का यह पत्र लेकर जो व्यक्ति कामराज के ऑफिस गया, उसने कहा कि इस पत्र की प्राप्ति पर दस्तखत कामराज ही करेंगे. कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक चल रही थी. पत्र मिलते ही कामराज ने बैठक स्थगित कर दी.

कामराज ने मलय्या से तमिल में बातचीत की और कहा कि वे तीन मूर्ति हाउस जा रहे हैं. ऊपरी मंजिल पर शोक में लोग बैठे थे. कामराज भी वहां जाकर बैठे. इंदिराजी का पत्र उनके पॉकेट में था. सबके साथ वह कुछ देर बैठे. फिर निकलने लगे. वह दो-तीन सीढ़ी उतरे होंगे कि इंदिराजी लगभग दौड़ती हुई उनके पास आयीं. उन्होंने पूछा, आपको मेरा पत्र मिला है? उन्होंने अपना पॉकेट दिखाया. कहा कि हां मिला है. इस पॉकेट में है. वह रुके नहीं. सीढ़ियों से उतरते रहे. तब इंदिराजी ने उन्हें ठहरने को कहा और पूछा, अब आप क्या करने जा रहे हैं?

कामराज का जवाब विलक्षण है. यह जवाब दिखाता है कि गांधी युग में कैसे मिट्टी से निकले लोग इतने बड़े स्टेट्समैन और दूरदृष्टिवाले हुए. कामराज जी रुके. इंदिराजी की ओर मुड़े और कहा कि वह आपके पिता थे, इसलिए आपके दुख का एहसास है. पर हम सब आज अनाथ हैं, क्योंकि वह हमारे भी पिता थे. हम आपकी भावना और दुख की घड़ी में साथ हैं. पर एक पार्टी के रूप में हमारा दायित्व है कि पंडितजी के उत्तराधिकारी का तत्काल बगैर विवाद के चयन हो, अन्यथा पूरे देश-विदेश में एक संशय और गलत संदेश जायेगा कि भारत में हो क्या रहा है?  हम इसकी इजाजत नहीं दे सकते. हम यह नहीं होने दे सकते हैं. इसलिए हमलोग अपने निर्णय पर आगे बढ़ रहे हैं.यह जवाब सुन कर इंदिराजी स्तब्ध और जड़ बन गयीं.

कामराज चुपचाप उतर कर कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में सीधे गये. कुछेक मिनट बाद बैठक खत्म हुई और कांग्रेस कार्यसमिति के लोगों ने बाहर आकर इस चयन की सूचना दी. जब शास्त्रीजी के नाम की घोषणा हुई, तो कामराज ने शास्त्रीजी को बुलाया और कहा कि  मेरा सिर्फ एक सुझाव है. अपने मंत्रिमंडल में इंदिराजी को रखें. शास्त्रीजी ने तत्काल इस पर अपनी सहमति दिखायी. उन्होंने तुरंत इंदिराजी को फोन किया. पर इंदिराजी ने मंत्री बनने से इनकार कर दिया.

इस बीच नियमत: तीन मूर्ति निवास खाली करने की चर्चा शुरू हुई. क्योंकि वह प्रधानमंत्री का आवास था. शास्त्रीजी ने मना किया कि वह कहीं और रहेंगे. बाद में इंदिराजी ने इंगलैंड जाकर अपने बच्चों के साथ रहने की इच्छा दिखायी. पर पता चला कि बिना किसी सरकारी पद के भारतीय दूतावास उनकी यात्रा या दूसरे खर्च का वहन नहीं कर पायेगा. इंदिराजी ने अपने विश्वस्त उमाशंकर दीक्षित को मलय्या के पास भेजा. मलय्या ने कामराज से इंदिराजी की मुसीबतों का उल्लेख किया. कामराज ने शास्त्रीजी से अनुरोध किया. फिर शास्त्रीजी मंत्री बनाने पर राजी हो गये.

पर पता चला कि मंत्रिमंडल में इंदिराजी से वरिष्ठ तीन लोग हैं. वरिष्ठता में उनका नाम चौथे स्थान पर है. इंदिराजी वरिष्ठता की सूची में चौथे स्थान पर रहने को तैयार नहीं थीं. उमाशंकर दीक्षित फिर मलय्या के घर आये. उनसे इंदिराजी की बात बतायी. मलय्या ने कहा कि इंदिराजी गलती कर रही हैं. नंबर चार पर होना भाग्यशाली है. शास्त्रीजी भी चौथे नंबर पर थे और वे प्रधानमंत्री बन गये. उमाशंकर दीक्षित ने यह संदेश इंदिराजी को दिया और वह तुरंत मंत्रिमंडल में शामिल होने को सहमत हो गयीं.

आगे भी जो कुछ हुआ, उससे कामराज की महानता, जीवटता और स्टेट्समैन की अद्भुत छवि उभरती है.एक वर्ष में शास्त्रीजी नहीं रहे. पुन: पुराना गुट हरकत में आया. मोरारजी देसाई और इंदिराजी के बीच चयन होना था. यह भी चर्चा थी कि कामराज खुद प्रधानमंत्री बनना चाहेंगे. कामराज के नेतृत्व में सिंडिकेट के नेताओं ने महसूस किया कि प्रधानमंत्री वो बने, जिसकी अखिल भारतीय पहचान हो और पूरे देश के लिए स्वीकार्य हो. कामराज और उनके साथियों ने इंदिरा गांधी को नये प्रधानमंत्री के रूप में चुना.

इंदिराजी ने अपने मंत्रियों की सूची बनायी और राष्ट्रपति भवन जाने से पहले कामराज के यहां पहुंचीं. उन्होंने कामराज को एक मुड़ा हुआ कागज दिया. वह कागज खोलें, इसके पहले इंदिराजी ने कहा कि यह मंत्रियों की सूची है. पर इसमें कोई फ़ेरबदल नहीं होगा. कामराज ने बिना पढ़े रख लिया. कामराज ने पूछा, चाय पीयेंगी? इंदिराजी ने कहा, हां. चाय पिलाने के बाद वह पेपर जस का तस इंदिराजी को वापस कर दिया. इंदिराजी ने पूछा, अरे आप इसे पढ़ नहीं रहे हैं. जिस कामराज ने इंदिराजी को प्रधानमंत्री के रूप में चुना, उसी इंदिराजी को उनका जवाब था, पढ़ना जरूरी नहीं. आपने इसे अत्यंत सावधानी से तैयार किया है और जब कोई परिवर्तन इसमें नहीं होना है, तो फिर इसे वापस ही कर देना चाहिए.

दो बार, दो प्रधानमंत्री को चुननेवाले व्यक्ति थे कामराज. विकट परिस्थितियों में एक स्टेट्समैन की तरह उनके निर्णय अदभुत थे. शास्त्रीजी के चयन के वक्त इंदिराजी का पत्र और उनको तीन मूर्ति भवन में खड़ा-खड़ा वह ऐतिहासिक जवाब. फिर से इंदिराजी को प्रधानमंत्री बनाने के बाद, इंदिराजी द्वारा राष्ट्रपति भवन जाने से पहले कामराज को संभावित मंत्रियों की सूची दिखाना और परिवर्तन न कहने की बात करना और फिर कामराज का शालीन पर साफ जवाब, सामयिक इतिहास के अविस्मरणीय प्रसंग हैं.

आधिकारिक तौर पर प्रधानमंत्री का पद दो बार पास आने और उसे दूसरों को सौंप देने का काम कामराज ने किया. वह कामराज थे, कौन?ठेठ बिहारी लफ्ज में कहें, तो वह जाति से नाडार थे. दलित. केरल में दलितों से ऊपर की मान्यता. बिहार में जैसे ताड़ी का धंधा करनेवाले होते हैं, उसी कौम से. वह 1903 में जन्मे. परिवार में मामूली काम- धाम था. पिता नारियल का धंधा करते थे. वह जब छह वर्ष के थे, पिता चल बसे. मां ने गहने बेच कर पढ़ाये.

1914 में कामराज ने पढ़ाई छोड़ कर, परिवार पालने-पोसने का काम किया. वह एक दुकान में लग गये. पर राजनीति में रुचि थी. वह धरना-प्रदर्शन में शामिल होने लगे. जाने-माने वक्ता एवं प्रखर सांसद एसएस सत्यमूर्ति उनके राजनीतिक गुरु थे. उन्होंने कामराज में अद्भुत सांगठनिक क्षमता, अथक कार्यकर्ता, अत्यंत सक्षम इंसान की झलक देखी. जब कामराज तमिलनाडु के मुख्यमंत्री बने, तो सबसे पहले सत्यमूर्ति के घर गये और उनकी विधवा से आशीर्वाद लिया.

तमिलनाडु के गांवों में शिक्षा के जनक वही माने जाते हैं. मुख्यमंत्री के रूप में मिड डे मील योजना के वही जनक थे. सी राजगोपालाचारी को हरा कर वे मुख्यमंत्री बने. अंगरेजों के जमाने में वहां शिक्षा सात प्रतिशत थी. कामराज के काल में 37 प्रतिशत तक पहुंच गयी. राजाजी के काल में 12 हजार स्कूल थे. कामराज के समय में 27 हजार स्कूल हुए. स्कूलों में पढ़ाई के दिन बढ़ाये गये, ताकि शिक्षा की गुणवत्ता बेहतर हो. अनावश्यक छुट्टियों में कटौती की गयी. पाठ्यक्रम बदले गये, ताकि छात्रों के संपूर्ण व्यक्तित्व में वृद्धि हो सके.

कामराज के प्रयास से आइआइटी मद्रास की स्थापना 1959 में हुई. उनके कार्यकाल में कोई गांव बिना प्राइमरी स्कूल के नहीं रहा. हर पंचायत में हाई स्कूल खुला. अशिक्षा खत्म करने के लिए उन्होंने कक्षा 11 तक मुफ्त अनिवार्य पाठ्यक्रम शुरू किया. खेती पर भी उनकी निगाह रही. पांच बड़े नहरों का निर्माण कराया. 150 लाख एकड़ खेतों में सिंचाई होने लगी. उन्हीं के कार्यकाल में भेल (त्रिची में) की स्थापना हुई. नेवेली लिग्नाइट कॉरपोरेशन शुरू हुआ.

मनाली रिफाइनरी लिमिटेड की स्थापना हुई. बिजली के लिए कई योजनाएं शुरू हुई. वह अपने साथी मंत्रियों को कहते थे - सीधे समस्या से जूङों, उनसे भागें नहीं. उसका हल निकालें, चाहे समस्याएं कितनी भी छोटी हों. अगर काम करेंगे, तो जनता में संतोष रहेगा कि हमारे मंत्री परिश्रम कर रहे हैं.एक अर्थ में कामराज अपढ़ थे. समाज के सबसे कमजोर तबके से आते थे. वह पैदा भी अत्यंत गरीब परिवार में हुए. वह न तो अभिजात्य वर्ग से थे. न गौर वर्ण के थे. न रूप-रंग आकर्षक था. पर, 1964 और 1966 में दो-दो बार प्रधानमंत्री के चयन में जिस विलक्षण बुद्घि, धैर्य, संयम और श्रेष्ठ आचरण का कामराज ने परिचय दिया, वह बेमिसाल है. विकास के मोरचे पर भी उनके विजन और सपनों का पर्याय ढूंढ़ना मुश्किल है.

राजनीति में ईमानदारी, सादगी व शुचिता के तो वे खुद पर्याय बने. वह मुख्यमंत्री थे, तब का प्रसंग. यह घटना इंदिरा गांधी के प्रेस सलाहकार रहे व भारत के महान पत्रकार में से एक एचवाइ शारदा प्रसाद के छोटे भाई और नवनीत के विलक्षण संपादक रह चुके नारायण दत्तजी ने मुझे हाल की बेंगलुरु यात्रा में सुनायी. कामराज मुख्यमंत्री बने, तब उनकी मां जीवित थीं. उनका मां से बहुत ज्यादा लगाव था. असमय पिता की मौत के बाद मां ने गहने और बचा-खुचा धन बेच कर घर चलाया था. कामराज हर माह अपने गांव जाते थे. निजी वाहन से. रात में उसी घर में ठहरते थे. माह भर के खाने-पीने की चीजें और दूसरे सामान की बंदोबस्त करते थे. उनके एक मित्र ने उनसे पूछा, आप अपनी मां को अपने साथ क्यों नहीं रखते? क्यों अकेले रह रहे हैं?

कामराज का जवाब सुन कर मैं अवाक रह गया. मूल्य और निष्ठा (वैल्यूज एंड ऐथक्स) में कितनी ऊंचाई थी, उस अपढ़ इंसान में. कामराज ने कहा, आप जानते नहीं, मेरी मां पढ़ी-लिखी नहीं है. कोई रिश्तेदार या परिचित आकर उन्हें कुछ कहेगा, वह मुख्यमंत्री आवास में रहेंगी, तो उनसे किसी को कोई आग्रह या आदेश करायेगा, इससे सत्ता की पवित्रता भंग होगी. कल दिल्ली से लौटते हुए यह प्रसंग स्मरण आया, तो लगा, अपढ़ कामराज तो महान थे.

आज केंद्रीय सरकार में अनेक हार्वर्ड और दुनिया के विख्यात विश्वविद्यालयों से पढ़े लोग बड़े पदों पर हैं. पर कामराज के पासंग में भी नहीं हैं. विकास की क्या समझ थी, कामराज में. मेरे मित्र डॉ शैवाल गुप्ता ने एक प्रसंग सुनाया. कामराज मुख्यमंत्री बने. वह नाडार जाति के थे. अत्यंत पिछड़े व गरीब समूह से. नाडार लोग कामराज से मिले, तब तमिलनाडु में ब्राह्मण अत्यंत पढ़े-लिखे व आगे थे. कामराज ने उन्हें सलाह दी - पढ़ो, शिक्षित हो, पर किसी जाति विशेष से शिक्षा में मुकाबला कर उसे पछाड़ने की स्पर्धात्मक मानस छोड़ दो. उद्यमी बनो. उसके बाद कामराज ने एक जापानी कंसलटेंसी कंपनी बुलायी. शिवकाशी में बारिश कम होती थी. वह रेन शैडो का इलाका था. नमी कम थी. उस समूह ने पूरा अध्ययन कर तीन सुझाव दिये और कहा कि तीन चीजें यहां पर संभव हैं - 1. प्रिंटिंग (छपाई काम), 2. पटाखे का उद्योग और 3. दियासलाई उद्योग. यह सब आज से 50-60 पहले एक अपढ़ व्यक्ति के विजन से हुआ. इस जापानी कंसलटेंसी के सुझाव पर अमल हुआ. आज शिवकाशी, ऐशिया के बेस्ट प्रिटिंग सेंटर, पटाखे और माचिस उद्योग के रूप में स्थापित हो गया है. यहां के उद्यमी भी नाडार जाति के हैं. कामगार भी.

सरकार  ने शिवकाशी को इंडस्ट्रियल स्टेट बना दिया. बिजली दी, जमीन दी, सड़क बनवाया और राज्य का भरपूर संरक्षण दिया. इंस्पेक्टर राज के कुप्रभाव को बंद किया. कल-कारखानों में अफसरों के तंग करने की प्रवृत्ति या लालफीताशाही पर रोक लगायी. इस तरह शिवकाशी दुनिया में विख्यात हुआ. आज उसी नाडार कौम के शिव नाडार एचसीएल टेक्नोलॉजी जैसी कंप्यूटर कंपनी के चेयरमैन और चीफ स्ट्रैटजी ऑफिसर हैं. लगभग 35 वर्षो पहले वह और उनके पांच साथियों ने डीसीएम कॉरपोरेट जगत की सुरक्षित नौकरी छोड़ कर माइक्रोप्रोसेसर का काम शुरू किया, तब भारत में कुल 250 कंप्यूटर्स थे. आज उनकी निजी संपत्ति 15 हजार करोड़ आंकी जाती है. वह समाज को मदद पहुंचाने व शिक्षण संस्थानों के खोलने वगैरह में अगले पांच वर्षों में 4000 करोड़ खर्च करेंगे. उनके नाम से एक विश्वविद्यालय बन रहा है. एक कला संग्रहालय उनकी पत्नी के नाम से बन रहा है. शुरू से अब तक लगभग 5000 छात्रों के बीच 36 करोड़ के स्कॉलरशिप बांट चुके हैं. उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर के पास 20 एकड़ में उन्होंने विद्या ज्ञान स्कूल शुरू किया. कक्षा छह से 12 तक के लिए. एक लाख से कम आयवाले परिवार के बच्चों के चयन की व्यवस्था की गयी है. अंतत: यहां पांच हजार बच्चे पढ़ेंगे. इसके लिए संसाधन नाडार फाउंडेशन से मिलेंगे. यह समाज में उद्यमी पैदा करने का परिणाम है.

आज आंध्र प्रदेश में कम्मा और रेड्डी समूहों को देखें. खेतिहर समुदाय, फिर तंबाकू उत्पाद से जुड़े, फिर फिल्म उद्योग से, चिट फ़ंड उद्योग में गये, मीडिया में उतरे. अब नॉलेज इंडस्ट्री से भी जुड़ गये हैं. अब वहां से पूरी दुनिया में अपनी छाप छोड़ रहे हैं. दिल्ली और हैदराबाद में सुंदर और नये हवाई अड्डे बनानेवाले लोग या समूह कौन हैं? जेएमआर कंपनी आंध्रप्रदेश से जुड़ी हुई है. पीडब्ल्यूडी में एक एक्जिक्यूटिव इंजीनियर रहे व्यक्ति के उद्यमिता का परिणाम है. आंध्र बैंक ने इस तेलुगु पूंजी व ऐसे कॉरपोरेट समूहों को प्रश्रय देकर आगे बढ़ाया है.पर याद करें, कामराज को शिवकाशी का प्रयोग? क्या अदभुत दृष्टि थी. 60 वर्षो पहले. आचरण की गरिमा क्या थी? जिस सत्यमूर्ति ने उन्हें राजनीति में उतारा, वह आजीवन उनके णी रहे. वह अंधभक्त कांग्रेसी व नेहरू के अनुयायी रहे. पर फर्ज व भूमिका की बात उठी, तो उस अपढ़ कामराज ने तुरंत प्रधानमंत्री का गद्दी भर कर दुनिया को संदेश दिया कि भारत में लोकतंत्र जड़ें जमा चुका है. पश्चिम मानता था कि नेहरू के न रहने पर भारत बिखरेगा, लेकिन कामराज ने तत्काल शास्त्रीजी को उस पद पर बैठा कर भारत के लोकतंत्र को एक नयी ऊंचाई दी.

इंदिराजी के दरबारियों ने और इंदिराजी ने, शास्त्रीजी को प्रधानमंत्री बनाने के रास्ते में जो अवरोध उत्पन्न किये, उनको जिस तरीके से कामराज ने हैंडल किया, वह इतिहास का एक प्रेरक अध्याय है. इंदिराजी की चिट्टी मिलते ही कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक स्थगित कर उनके घर गये, जो जवाब गरिमा के साथ इंदिराजी को दिया, उससे भारतीय राजनीति में नया अध्याय लिखा गया. गरिमा का, स्टेट्समैनशिप का, दूरदृष्टि का. पर उसी इंदिरा गांधी को जरूरत पड़ी, तो दुबारा कामराज ने प्रधानमंत्री बनवाया. बिना किसी कटुता के. वही इंदिरा गांधी ने जब अपने मंत्रिमंडल के सदस्यों की सूची उन्हें दी, इस आग्रह के साथ कि इसमें अब फ़ेरबदल संभव नहीं, तो बिना देखे कामराज ने जिस श्रेष्ठ आचरण और मर्यादा के साथ पत्र लौटाया, उत्तर दिया, वह सिर्फ उनके व्यक्तित्व या उनके कद के बारे में नहीं, बल्कि उनके माध्यम से भारतीय राजनीति की ऊंचाई का अध्याय है.

आज उसी देश में ऑक्सफोर्ड, कैंब्रिज, हार्वर्ड, स्टैनफोर्ड से पढ़े-लिखे सांसद हैं, प्रधानमंत्री हैं. मंत्री हैं. इनमें से कोई कामराज जैसे गरीब परिवार से नहीं आता. न फ़ूहड़ खद्दर पहनता है. न उनके जैसा अपढ़ है, फिर भी देश में चरित्र का यह संकट? स्टेट्समैनशिप का यह अभाव? 60 वर्षो में मुल्क आगे गया है या पीछे? पढ़े-लिखे लोगों ने देश को आगे बढ़ाया है, या पीछे धकेला है? एक दिन की दिल्ली यात्रा खत्म कर रांची लौटा, तब से यही सवाल मन में है. इसका उत्तर ढूंढ़ सकने की क्षमता नहीं है. पर, दिनकर की वर्षों पहले पढ़ी कविता की पंक्तियां याद आ रही हैं - युद्धिष्ठिर नहीं चाहिए, हमें अर्जुन, भीम चाहिए. मेरी कामना है ईश्वर से, प्रकृति से या संसार में कोई मनुष्येत्तर शक्ति है, तो उससे कि हमें अर्जुन, भीम, गांडिव- गदा भी नहीं चाहिए, बल्कि अपढ़ कामराज जैसा रहनुमा चाहिए, जो अपने आचरण, चरित्र, दृष्टि से नयी ऊंचाई, गरिमा व भव्यता दे सके.

लेखक हरिवंश बिहार-झारखंड के प्रमुख हिंदी अखबार प्रभात खबर के प्रधान संपादक हैं. उनका यह लिखा प्रभात खबर में प्रकाशित हो चुका है और वहीं से साभार लेकर यहां प्रकाशित किया गया है.


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