मीडिया के विरुद्ध जुगाली बंद करें नेता-मंत्री

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आए दिन महाराष्ट्र के नेतागण मीडिया पर अपनी भड़ास निकालते नजर आ रहे हैं. पहले अजित पवार ने मीडिया की डंडे से खबर लेने की कोशिश की, उसके बाद केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री विलासराव भी पत्रकारों पर बरस पड़े. रह रहकर इससे पहले भी कई कांग्रेसी नेता पत्रकारों और मीडियावालों पर अपनी खुन्नस निकालते देखे जा रहे हैं. इन नेताओं की इस उलटवासियों से यह लगने लगा है कि वे अब सच्चाई नहीं जानना चाहते और इसके लिए अपना चेहरा साफ करने की बजाए आईना ही तोड़ने पर आमादा हो गए हैं.

वैसे नेता और मीडिया की दोस्ती अब एक अनजानी बात नहीं रही. लेकिन जब मतलब हो तो मीडिया अच्छा है लेकिन मतलब निकल गया तो मीडिया को नसीहत देना शुरू कर देते हैं. तब कोई डंडा से खबर लेता है तो कोई शराबी कह कर पत्रकारों को नीचा दिखाने का प्रयास करता है. फिलहाल सबसे ज्यादा दर्द विलासरावजी को है. मीडिया से उन्हें शिकायत है कि वे टेबल पर बैठकर मनगढ़ंत चर्चाएं कर मंत्रियों को बदनाम करते हैं और विकास के काम में रोड़े अटकाते हैं. वैसे विलासराव व मीडिया में हमेशा ही मधुर संबंध रहे हैं. जब वे शरद पवार के दांव में फंसकर चुनाव हार गए थे और कांग्रेस से बाहर चले गए थे. तब मीडिया की यारी उन्हें रास आई थी. आज भी कई पत्रकार उनके गुडबॉक्स में हैं. अगर उन्हें देखकर उन्होंने मीडिया को शराबी कहा है तो यह उनकी संगति पर निर्भर करता है और ऐसे पत्रकारों को पूरी मीडिया मान लेना विलासराव जी की भूल है.

विलासराव पुराने मंजे हुए कांग्रेसी नेता है. लातूर से मुंबई होते हुए दिल्ली तक पहुंचे हैं. उनकी दिल्ली तक की यात्रा भले ही उनके कार्यों का बड़ा मूल्यांकन हो लेकिन उनके अच्छे कार्यों को हाइकमान व जनता तक पहुंचाने का काम मीडिया ने ही किया. अब यह मीडिया उन्हें अखरने लगा है तो वे कम से कम उलट पुलटे काम करना छोड़ दें. राज्य सरकार के टकसाल से अदालत का दंड भरवाने की क्या जरुरत थी. क्या राज्य टकसाल का पैसा मंत्रियों की गलतियों का खामियाजा भुगतने के लिए है या जनकल्याण के लिए? अगर यह बातें आपके ध्यान में लाई जा रही हैं तो इसमें गलत क्या है? आप जब गलती कर रहे थे तब इन बातों पर गौर क्यों नहीं किया. एक सामान्य व्‍यक्ति भी सरकारी पैसों के दुरुपयोग को समझता है. इसमें अदालत ने दखल दिया है. अदालत ने जब खुलेआम इस बात को अयोग्य करार दिया तो इसमें मीडिया की क्या गलती है?

विलासरावजी, आपके ईदगिर्द घूमनेवाले मीडिया के लोग ही सिर्फ मीडिया नहीं हैं. जो आपकी शराब पी ले वह मीडिया नहीं है, मीडिया क्या है. इसे आपसे बेहतर कोई नहीं समझ सकता. इसलिए मीडिया पर अपनी राय जाहिर करने से पहले भारतीय पत्रकारिता के इतिहास पर नजर दौड़ाइए. शायद आपका भी एक अखबार है जिसे आपका परिवार संचालित करता हैं. अगर मीडिया ऐसा होता तो आप इसे क्यों पोसते, आपकी सरकार के भ्रष्टाचार, निक्कमापन और लाचारी से जनता क्षुब्ध हो चुकी है. कमरतोड़ महंगाई और उस पर से नेताओं का देश के पैसों की लूट अब सामने आने लगी है. आपकी ग्राम विकास योजना पर नजर रखिए, जहां दलाल 70 फीसदी पैसा हजम कर रहे हैं. ग्राम विकास के नाम पर दो लाख करोड़ ख़र्च हो गए हैं, लेकिन देश की ग्रामीण व्यवस्था की हालत क्या है यह मीडिया उजागर करे यह जरुरी नहीं है.

नरेगा के नाम पर जो भ्रष्टाचार चल रहा है वह तो अतुलनीय हो गया है. उस पर से राष्ट्रकुल खेल घोटाला, टूजी स्पेक्ट्रम घोटाला सहित पूर्वोत्तर राज्यों में 70000 करोड़ का घोटाला यह सिद्ध करता है कि मीडिया की नजर बचाकर देश की संपत्ति को हड़पने की सुनियोजित साजिश इस देश में चल रही है. राजनीति अब सेवा का माध्यम नहीं बल्कि देश को लूटने का औजार बन गया है. ऐसे में मीडिया का दायित्व बन जाता है कि वह तथ्यों को नागरिकों के समक्ष लाए और ये तथ्य जब नेताओं और मंत्रियों की करतूतों को आईना दिखाते हैं तो भड़ास मीडिया पर निकलना कितना उचित है? यह विलासराव जी खुद समझ सकते हैं. पर ऐसे नेताओं को सावधान हो जाना चाहिए कि जो नेता मीडिया पर अंकुश और प्रताड़ना करने की बात करते हैं, उनका राजनीतिक भविष्य खतरे में पड़ जाता है. इसका एक बेहतरीन उदाहरण बसपा सुप्रीमों कांशीराम रहे है. इसलिए नेता या मंत्री जो भी हैं अपने दायरे में रहें. उचित निर्णय लें. नागरिकों को न्याय दिलाएं, बेवजह मीडिया के खिलाफ जुगाली करना बंद करें.

लेखक अश्विनी कुमार मिश्रा मुंबई से प्रकाशित सांध्‍य दैनिक निर्भय पाक्षिक के संपादक हैं.


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