बाहर से लड़ाई लड़ें बिहार के ईमानदार पत्रकार

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संजयजीमेल पर चैट के दौरान पटना के एक विद्यार्थी अभिषेक आनंद से कहा - बिहार के मीडिया के बारे में बतायें। अभिषेक का जवाब था- क्या बताऊँ..पेपर पढ़ना छोड़ दिया कुछ दिनों से ऑनलाइन अखबार पढता हूँ, नीतीश जी भगवान हो गए हैं.. हर सुबह बड़ी बड़ी तस्वीरों से दर्शन होता हैं... और अंदर कहीं भी किसी भी पेज पर अगर कहूं कि सरकार के खिलाफ कोई आलोचना नहीं होती, तो आश्चर्य नहीं... लालू कहां गए पता नहीं। कोई नया विपक्ष कब आएगा पता नहीं, बिना विपक्ष के लोकतंत्र कि कल्पना आप कीजिये... मीडिया और सत्ता, खास कर बिहार में खेल जारी हैं... ऐसा बाहर के लोग ही नहीं, कई बिहारी भी ऐसा ही मानते हैं।

इधर फेसबुकर पर पत्रकार साथी पुष्कर ने अपने वॉल पर लिखा : - बिहार में सबकुछ ठीक नहीं है। बिहार की पत्रकारिता को नया रोग लग गया है। खबरें सिरे से गायब हो रही हैं। कुछ खबरों को लेकर एकदम खामोशी। पिछले कुछ समय की खबरों पर नजर डालिए, कई ऐसे उदहारण मिल जायेंगे। ऐसा तो लालू राज में भी नहीं हुआ था। लालू के दवाब के बावजूद बिहार की पत्रकारिता को जंग नहीं लगा था। माना नीतीश राज में बिहार में बहुत सुधार हुए हैं लेकिन खबरों का यूँ लापता हो जाना।

इसके साथ ही दिल्ली के एक पत्रकार मित्र रितेश जी बेतियां गये। फोन पर बात हुई। नी‍तीश राज में बिहार कैसा लग रहा है। उन्होंने जो कुछ बताया दिल पसीज उठा। उन्होंने बताया कि उन्हें पिता जी से जुड़ी कुछ प्रशासनिक कार्य के लिए तहसील के चक्कर लगाये पड़े तो उन्हें अहसास हुआ कि बिहार की प्रशासनिक व्यवस्था पर अफसरशाही और टालमटोल कितना हावी है। रितेश जी ने बताया कि वे अपने कार्य के सिलसिलम में उपमुख्‍मंत्री सुशील कुमार मोदी से भी मिले, लेकिन काम नहीं बना। रिश्वत के बिना कोई काम नहीं हो सकता है। उन्होंने बताया कि दिल्ली या दूसरे प्रांतों में बैठ कर जो हम बिहार की हकीकत जान रहे हैं, दरअसल वह हकीकत नहीं है। हकीकत देखना है तो बिहार आकर देख लें। इन सबके अलावा पिछले दिनों अन्य ऐसी कई खबरे आईं, जिससे यह साबित हुआ कि सुशासन बाबू के राज में मीडिया पत्रकारिता नहीं कर रही है, बल्कि चारे के लिए मेमने की तरह मिमिया रही है।

किसी जमाने में बिहार में खाटी पत्रकारिता का दौर रहा। मीडिया ने कई मामलों उजागर किये। पत्रकार की रिपोर्ट पर मुख्यमंत्री की कुर्सी तक भी गई। पर आज पूरा का पूरा माहौल बदला हुआ है। जैसे लालू-राबड़ी राज में बिहार की हकीकत निकल कर राष्‍ट्रीय समाचार पत्रों तक पहुंचती थी, कई मायनों में वैसे हालात आज भी है, लेकिन अब खबरे नहीं आती हैं। लालू यादव मीडियाकर्मियों से दुर्व्‍यवहार जरूर करते थे। लेकिन मीडिया की आवाज को नीतीश की शासन की तरह नहीं दबाया गया।

लोकतंत्र में जब मजबूत विपक्ष न हो तो यह भूमिका स्वत: मीडिया की बन जाती है। लेकिन खबरें कह रही है कि कमजोर विपक्ष के साथ ही बिहार की मीडिया भी पूरी तरह से कमजोर हो चली है। यदि ऐसा नहीं होता तो 10 फरवरी को पत्रकार/संपादकों के खिलाफ नागरिक सड़कों पर नहीं उतरते। आश्चर्य की बात है कि नागरिकों के इस जनआंदोलनों की खबर को बिहार की मीडिया में स्थान नहीं मिला। हिंदू ने इस आंदोलन एक फोटो प्रकाशित किया। फोटो बिहार की मीडिया की सारी हकीकत बताती है।

बिहार के पत्रकार मित्र कहते हैं कि कुछ खिलाफ प्रकाशित करने पर धमकी मिलती है। समाचार पत्र का विज्ञापन बंद हो जाता है। मुख्यमंत्री संपादक को हटवा देते हैं। विज्ञापन के दम पर नीतीश सरकार ने मीडिया को पूरी तरह से अपने गिरफ्त में ले लिया है। मीडिया प्रबंधक का लक्ष्य पूरा हो रहा है, तो फिर भला उनकी नौकरी करने वाले पत्रकार क्या करें। पत्रकार मित्रों की मजबूरी समझ में आती है। लेकिन चुपचाप चैन से बैठना समस्या का समाधान नहीं। बिहार के पत्रकार बिहार की मीडिया में सरकार की खिलाफत नहीं कर सकते है, तो कम से कम राज्य के पेशे के प्रति ईमानदार पत्रकार बाहर की मीडिया के लिए स्वतंत्र लेखन करें। भले ही बिहार की मीडिया नीतीश का नियंत्रण है। इसका मतलब यह नहीं कि देश की मीडिया भी नीतीश के पक्ष में कुछ नहीं बोले, लिखे। बाहर से लड़ाई भी धीरे-धीरे रंग जरूर लाएगी।

लेखक संजय स्वदेश बिहार के गोपालगंज के मूल निवासी हैं तथा दिल्ली, नागपुर में पत्रकारिता के बाद इन दिनों दैनिक नवज्योति के कोटा संस्करण से जुड़े हैं. इनका मनना है कि पत्रकारिता के लिए चाहे माहौल कैसा भी हो, आज भी मिशन की पत्रकारिता संभव है. देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं व पोर्टलों में स्वतंत्र लेखन के साथ जन सरोकारों से भी जुड़े हैं. इनसे संपर्क This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it के जरिए किया जा सकता है.


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Comments (5)Add Comment
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written by subhash chandra, February 23, 2011
संजय जी..लेख अच्छा है...इसके लिए बधाई...
लेकिन बिहार के बहार भी देखे .... क्या कोई संपादक अब पत्रकार को रखना चाहता है... सबको पत्रकार के चोले में ऐसा आदमी चाहिए जो उसके लिए उल्टा सीधा काम करता रहे...समपादक तो मानिये ब्रांड मेनेजर हो गए हैं... जो सदा मालिक का पिऐ लगते हैं....हा...एकाध लोग हैं जो उम्मीद की किरण जगा रहे हैं....सरकार यों ही नहीं चलती और कई घराने यूँ ही बिहार जाने की नहीं सोच रहे....... समझा कीजये...
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written by ravi, February 23, 2011
tiwary jee kitna bhi gala phad ke kahe but unki bato par vishwas karna kathin hai.
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written by satish sukma, February 23, 2011
aap ne jo likha hai main es se ekdam sahmat hu aaj ke yug me patrkaro par se janta ka vishwas uth gaya hai . add se press ka mangement pura ho raha hai . nokri karne wale patrkar kya kar sakta hai? satish chandak press repoter naiduniya
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written by dr. devesh singh, February 23, 2011
एक ही लेख तीन पोर्टल पर क्या वेवकूफी है.......................,भाई विश्वास नही था,कि एक जगह छप जाएगा।लेख अधूरा सा लग रहा है मित्र?
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written by मदन कुमार तिवारी , February 23, 2011
्मैं जब बोलता था तो इसी भडास पर गालियां देते थें पाठक । आज सब मेरी हीं बात बोल रहे हैं । नीतीश एक तानाशाह हैं। नीतीश भ्रष्ट अधिकारियों को संरक्षंण देते हैं । पटना का कमिश्नर के पी रमैया बहुत बडा भ्रष्ट है नीतीश क्या सभी को यह पता है । लेकिन वह नीतीश का चहेता है । बिहार के पत्रकार पे रोल पर काम कर रहे हैं । दैनिक जागरण , हिंदुस्तान , आज जैसों ने तो जनता की आवाज हीं खत्म कर दी है । नीतीश की जीत भी ईवीएम में छेडछाड का ्नतिजा है । केन्द्र की सरकार को भी पता है । ईवीएम पर शोध करने वाले मिशीगन विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर को हवाई अड्डा से हीं दिल्ली में वापस लौटा दिया गया । अभी आगे -आगे देखिये क्या होता है । बिहार हीं नहीं हिंदुस्तaान के सभी बडे और बिकाउ टाईप के पत्रकार पे रोल पर काम कर रहे aं ।

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