संपादक, मालिक और पत्रकारों के नाम एक खुला पत्र

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: एक दूसरे को गालियां देने की बजाय बदलाव का माहौल तैयार करें : प्रिय यशंवतजी भड़ास जिस प्रकार से पत्रकारिता जगत की आवाज बनकर उभरा है। उसके लिए आपको बधाई। आपके द्वारा स्थापित इस अनूठे पोर्टल पर सभी को अपनी पीड़ा, भड़ास निकालने का मौका मिल रहा है। हालांकि पूंजी के दौर में पत्रकारिता का मिशन दम तोड़ चुका है। पत्रकारों के लिए वेतन की मांग हो या सिफारिश सभी पर घमासान जारी है। समाचार पत्रों के मालिक खलनायक बने हुए हैं। चंद समाचार पत्र समूह मुनाफे की फसल काट रहे हैं लेकिन गाली सभी को मिल रही है।

मैं एक दैनिक समाचार पत्र का मालिक, सम्पादक खुद हूं। इसलिए भड़ास के माध्यम से कुछ विचार व्यक्त कर रहा हूं। यदि आप लोग इससे सहमत हों तो इन विचारों को अपनाकर इसके लिए ऐसा माहौल तैयार करें कि बदलाव आये अन्यथा हम यूंही एक दूसरे को हरामखोर कहकर गालियां देने के सिवा कुछ नहीं कर पायेंगे। अपने स्तर से मैं इस बारे में प्रयास शुरू कर चुका हूं। विभागीय नीतियों में परिवर्तन न आने तक मैंने गलत नीतियों के प्रति विज्ञापन सम्बंधी मान्यता हेतु आवेदन न लेने का भी संकल्प लिया है। चूंकि यशवंतजी आप वरिष्ठ पत्रकार रह चुके हैं तथा भड़ास के माध्यम से एक पूंजीविहीन लघु समाचार पत्र ही चला रहे हैं। ऐसे में आप भी इस मुहिम को सार्थक बनाने में इस लेख को छापने के अतिरिक्त सार्थक भूमिका निभायेंगे। ऐसी अपेक्षा मैं आपसे करता हूं। आप भले ही इस लेख को छापे या न छापे लेकिन मेरा आपसे अनुरोध है कि एक ऐसा माहौल तैयार करें। जिसमें पत्रकारों की अस्मिता एवं समाचार उद्योग के अस्तित्व की रक्षा हो सके। भड़ास के सम्पादक, सभी पाठकों, देश भर के सभी पत्रकार संठगनों एवं इंडियन न्यूज पेपर सोसायटी के नाम खुला पत्र-

प्रिय भाईयों अखबार में पत्रकार के रूप में काम करना या उसे मालिक के रूप में चलाना दोनों ही बेहद कष्टदायक कार्य हैं। कम वेतन एवं सुख सुविधाएं पत्रकारों एवं उनके परिवार को जीवन पर्यन्त दुख देते हैं तो कागजी मुनाफा अखबार मालिकों के सिर के बालों की रोज बलि लेता रहता है। फर्जी कागजों की प्रतिपूर्ति कर फर्जी मुनाफे की बैंलसशीट पर अपने परिवार को सुनहरे कल के सपने दिखाने वाले मालिक भी हर पल यही कोशिश करता हैं कि कैसे उसे बेगार करने वाला पत्रकार उपलब्ध हो। यह स्थिति हमारी अपनी बुनी हुई है। इंडियन न्यूज पेपर सोसायटी द्वारा हाल ही में सरकार द्वारा गठित वेतन बोर्ड की सिफारिशों का विरोध एवं उसको लेकर की जा रही पत्रकारों की चिंता के बीच कोई भी स्थिति का सही आंकलन करने को तैयार नहीं है। नामचीन मीडिया समूहों में कार्य करने एवं उपेक्षित होने वाले पत्रकारों द्वारा चार पन्ने का जो तमगा लघु अखबार के मालिकों को दिया जाता है, उसके जिम्मेदार भी स्थिति का सही आंकलन न करने वाला पत्रकार जगत ही है।

आखिर क्या कारण है कि समाचार पत्र उद्योग के आर्थिक स्रोत्र को लेकर कभी कोई चिंता व्यक्त नहीं करता। कभी कोई नहीं कहता कि कौन सा समाचार पत्र समूह एवं न्यूज चैनल किस आर्थिक आधार पर खड़ा है। लघु अखबारों का रोना रोने वाले पत्रकार संगठन एवं न्यूज पेपरों के मालिकों ने कभी भी यह क्यों नहीं सोचा कि उनके संस्थान किस तरह कागजी मुनाफे की जगह असल का फायदा कमायें। समस्या की सारी जड़ भी इसी में छिपी है। जब अखबार जमीनी स्तर पर मजबूत नहीं होगा तो वह सपने में भी कैसे सोच सकता है कि वह सरकारी नियम कायदों के अनुसार किसी को पगार देने की हिम्मत कर सकता है। चूंकि मैं भी अक्टूबर 2007 से एक दैनिक अखबार का मालिक हूं, इसलिए मैं इस उद्योग के नफे नुकसान को भली भांति समझता हूं। हालांकि इस धंधे को फायदे का सौदा बनाने की हिम्मत मैं कभी नहीं जुटा पाया। मैं एक श्रमजीवी पत्रकार हूं। इसलिए अपने अखबार की रिर्पोटिंग से लेकर पेज डिजाइनिंग तक का कार्य मैं खुद करता हूं। इसलिए मुझे कभी किसी को पगार देकर काम कराने की जरूरत नहीं पड़ी। और हां यदि मुझे किसी की जरूरत पड़ती तो शायद मुझे अखबार का प्रकाशन बंद करना पड़ता। यह स्थिति हम जैसे चार पन्ने वाले अखबार के मालिकों की होती है।

यह तो बात रही पत्रकारिता के निचले पायदान की। जहां से चलकर या तो लोग बड़े बैनरों की नौकरी में जाते हैं या वहां से धकियाए जाने के बाद यहां आते हैं। अब मैं आता हूं मीडिया के उस वर्ग पर, जिसका कब्जा न सिर्फ पत्रकार संगठनों पर है बल्कि मुनाफे की मशीन के रूप में जिनका बाजार एवं सरकार पर कब्जा है। हिन्दुस्तान, राजस्थान पत्रिका, अमर उजाला, जागरण, डीएलए, टाइम्स ग्रुप, जनसत्ता ये ऐसे नाम हैं जिनकी गिनती शुरू होने के साथ ही खत्म हो जाती है। पत्रकारिता जगत में भी दो ही तरह के पत्रकार हैं। एक हम जैसे लघु पत्रकारिता से जुड़े पत्रकार रूपी मालिक और दूसरे ग्रुप के अखबार में काम करने वाले पत्रकार। ग्रुप में काम करने वाले पत्रकारों का एक छोटा समूह जरूर अच्छी सैलरी पर काम करता है, जबकि एक बड़ा समूह अपने क्षेत्र से अपनी पगार निकालने के लिए खुल्ले सांड सा छोड़ दिया जाता है। अच्छे पैकेज वाले एक छोटे से समूह के लिए पगार का हर समय रोना रहता है। इनके लिए ही सरकार बेतन बोर्ड का गठन करती है। हालांकि प्रबंधन द्वारा पगार अलग रजिस्टर से दी जाती है एवं साइन अलग रजिस्टर पर कराये जाते हैं।

आजादी की जंग में अखबारों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। इस बात को आजाद भारत की सरकार ने महसूस किया। छोटे अखबारों से लेकर बड़े समूहों के उत्थान में सरकार ने अपनी नीतियों को लचीला किया। हालांकि 2000 से 2011 के बीच सरकारी नीतियां टाइट हुई हैं। जिसके चलते छोटे अखबार तो लगभग बंदी की कगार पर पहुंच चुके हैं। चूंकि नियमों को बनाने एवं लागू करने वाली सरकार को पत्रकारिता जगत से पूरा सपोर्ट मिला। इसलिए ऐसी नीतियां बनायी गयीं कि अखबारों या मीडिया समूहों को आसानी से कुचला जा सके। इसका असर भी हुआ है। राज्य सूचना विभाग से लेकर डीएवीपी तक नैतिकता की दुहाई देकर भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने का दावा करने वाले मालिक-सम्पादकों को चायपानी से लेकर बड़ी सौगात के जरिये मान्यता लेते देखा जा सकता है। कभी कोई पत्रकार संगठन एवं न्यूज पेपर मालिकों के संगठन इस बात पर सवाल नहीं उठाते कि ऐसे नियम बनाये ही क्यों गये हैं, जिससे अखबारों या मीडिया समूहों को लाभदायक उद्योग में तब्दील किया जा सके। अखबारों के लिए सरकारी तंत्र द्वारा सबसे बड़ा इन्द्रजाल प्रसार का फैलाया गया है। मैं चुनौती के साथ कहता हूं कि जो डीएवीपी एवं राज्यों के सूचना विभाग 2000 प्रतियां न्यूनतम को विज्ञापन मान्यता का आधार बनाते हैं, शायद ही इनके पैनल पर लघु अखबारों में कोई भी ऐसा हो जो एक हजार की संख्या को पार करता हो। बिक्री की तो बात करना ही बेमानी है। यह एक कटु सत्य है कि रंगीन अखबारों के मायाजाल में लघु अखबार न के बराबर बिकता है।

जानते सब हैं लेकिन सभी चुप हैं। कोई यह नहीं कहता कि देश में कितने अखबार फायदे में चल रहे हैं। बस सीए की फर्जी रिपोर्ट पर किसी का बीस, किसी का पच्चीस तो किसी का पचास हजार का प्रसार मान लिया जाता है। इस आधार पर रेट तय होता है। हम जैसे चार पन्नों के अखबार वाले दो चार पर्चे छापकर सरकार से लाखों डकार जाते हैं। हालांकि इस रकम का कभी पचास तो सत्तर फीसदी पैसा सरकारी बाबुओं की जेब में भी जाता है। लिहाजा चार पन्नों के अखबार का धंधा सरकार के विज्ञापन देखने वाले महकमे के जिम्मेदार बाबुओं एवं रिश्तेदारों के बैंक एकाउन्टों को फुल करने के काम भी आता है। हां यदि कोई श्रमजीवी पत्रकार अखबार चला ले तो उसे इतने चक्कर कटाये जाते हैं कि वह चक्करघिन्नी बन जाता है। प्रेस मान्यता का तो हाल ही बुरा है। सरकार की मर्जी जिसे चाहे पत्रकार माने, जिसे चाहे न माने, लेकिन पत्रकारिता जगत में कभी हलचल नहीं होती। यहां हम लघु अखबार वाले ही हावी रहते हैं।

हमें मान्यता पूजा पाठ के साथ सरकारी मशीनरी को चढ़ावा चढ़ाकर मिल जाती है, लेकिन बड़े बैनरों में काम करने वाली पत्रकारों की फौज अपने संस्थान में कभी इसके लिए जुबान भी नहीं खोल पाते। और हां हम तो इस मामले में इतने ताकतवर हैं कि प्रेस वाले से लेकर खोमचे वाले तक को मान्यता प्राप्त पत्रकार बना जाते हैं। विज्ञापन मान्यता के साथ यह एक ऐसा मुद्दा है जिस पर समय रहते समवेत प्रयास किये जाने की जरूरत है। भले ही इसके लिए पत्रकारों के पंजीकरण को अनिवार्य कर क्षेत्र में उनके कार्य को अनुभव के रूप में काउंट करते हुए 3 से 5 वर्ष की समयावधि निर्धारित हो लेकिन मान्यता सभी को मिलनी चाहिए। इस क्षेत्र में कार्य करने के लिए शैक्षिक योग्यता का निर्धारण हो। टाइटल से लेकर सम्पादक तक के लिए अनुभव एवं शैक्षिक योग्यता को अनिवार्य किया जाये। इससे किसी को गुरेज नहीं हो सकता।

इसी तरह या तो विज्ञापनों का खेल बंदकर समाचार उद्योग को अपने पैरों पर खुद खड़ा होने के लिए छोड़ दिया जाना चाहिए अथवा समाचार पत्र के प्रकाशन के साथ ही उसे सरकारी एवं गैर-सरकारी विज्ञापनों के प्रकाशन हेतु योग्य घोषित किया जाना चाहिए। इसके साथ ही प्रसार का खेल भी बंद करके लघु, मध्यम एवं बड़े समाचार पत्र के लिए अलग अलग नीतियां बनायी जायें। यदि इन मुद्दों पर समाचार समूहों के मालिक एवं पत्रकार एक होकर आवाज उठाते हैं तो न तो पत्रकार मालिक को गरियेगा, न ही मालिक पत्रकार एवं अन्य स्टाफ की सेलरी की कटौती की जुगत लगायेगा। तो आइये इस मुहिम को अपनाकर आप अपने स्तर से आन्दोलन में अपनी भूमिका का निर्वाहन करें।

लेखक मोहित कुमार शर्मा मुरादाबाद से प्रकाशित दैनिक न्‍यूज ऑफ जेनरेशन एक्‍स के संपादक/मालिक हैं. इनसे संपर्क This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it के जरिए किया जा सकता है.


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