खुद बीमारी से जूझ रहा है उत्‍तराखंड का स्‍वास्‍थ्‍य महकमा

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: सभी अस्‍पतालों में डाक्‍टरों का अभाव : लगभग साठ प्रतिशत पद खाली :  उत्‍तराखण्ड राज्य बने दस बरस हो गये हैं। लंबी लड़ाई और बडी़ शहादतों के बाद यह राज्य बना था। विकास और बेहतरी की ढेर सारी उम्मीदों के साथ। बेहतरी की उम्मीद भरे स्लोगनो, नारो और लंबे जन आन्दोलनों की कोख से जन्मा उत्‍तराखण्ड राज्य दस साल बाद भी लुभावने नारों और स्लोगनो के बूते ही चल रहा है।

भारत की संसद ने एक बार इस राज्य का नाम बदल कर उत्तरांचल से उत्‍तराखण्ड जरूर किया। लेकिन यहॉ पक्ष और प्रतिपक्ष की सभी सियासी पार्टियों और उनके नेतागण पिछले दस सालों में इसे औद्योगिक प्रदेश, उर्जा प्रदेश, पर्यटन प्रदेश, हर्बल प्रदेश, आयुष प्रदेश, शिक्षा का हब, स्वस्थ्य एवं खुशहाल प्रदेश आदि अनेक नामों से नवाज चुके है। जबकि जमीनी हकीकत यह है कि कई क्षेत्रों में उत्‍तराखण्ड आज भी वहीं खड़ा है, उत्‍तर प्रदेश में रहते जहॉ था। कई मायनों में उस जमाने से भी पीछे। प्रदेश की स्वास्थ्य सेवाएं इसका जिन्दा सबूत है। पूरी दुनियां-जहान को प्राकृतिक संजीवनी जडी़-बूटियों के जरिये स्वस्थ्य तथा निरोग्य बनाने का दावा करने वाले उत्‍तराखण्ड की स्वास्थ्य सेवाओं का हाल उत्‍तर प्रदेश के जमाने से भी बदतर हो गया है। प्रदेश की स्वास्थ्य सेवाएं तात्कालिक सेवाओं के बूते चल रही है।

सूचना का अधिकार अधिनियम के सहारे प्रदेश की स्वास्थ्य सेवाओं की सेहत की पड़ताल करने की कोशिश की गयी। करीब साल भर की लंबी जद्दोजहद के बाद सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत प्रदेश के स्वास्थ्य मकहमे से मिली जानकारियॉ बेहद चौंकाने वाली है। इन सूचनाओं ने उत्‍तराखण्ड की स्वास्थ्य सेवाओं की जमीनी हकीकत को बेपर्दा कर दिया है। साथ में स्वस्थ्य प्रदेश की दावों की पोल भी खोल दी है। स्वास्थ्य मकहमे से हासिल जानकारियों पर अगर यकीन करें तो उत्‍तराखण्ड की बुनियादी स्वास्थ्य सेवाएं आज के मुकाबले उत्‍तर प्रदेश में रहते कहीं बेहतर थी।

आज उत्‍तराखण्ड डॉक्टर और खास तौर पर विशेषज्ञ डॉक्टरों की जबरदस्त कमी से जूझ रहा है। हालांकि उत्‍तर प्रदेश का हिस्सा रहते हुए भी डॉक्टरों की तैनातगी के मामले में उत्‍तराखण्ड की स्थिति बेहतर नहीं थी। राज्य बनने के बाद स्थिति सुधरने के बजाय और बदतर हो गयी है। राज्य निर्माण के दौरान यानी वर्ष 2000 में उत्‍तराखण्ड में विभिन्न ग्रेड के डॉक्टरों के करीब सत्रह सौ पद स्वीकृत थे। इनमें करीब पचास फीसदी डॉक्टर तैनात थे। राज्य बनने के बाद अब राज्य में विभिन्न ग्रेड के डॉक्टरों के पद करीब तेईस सौ के आस-पास हो गये हैं। इसके सापेक्ष मौजूदा वक्त में यहॉ महज करीब इकतालीस फीसदी डॉक्टर तैनात हैं। जबकि डॉक्टरों के उनसठ प्रतिशत पद खाली है। राज्य में मरीजों का ईलाज करने वाले विशेषज्ञ डॉक्टर भले ही नहीं हो। स्वास्थ्य महकमें में अफसरों के पदों में जबरदस्त ईजाफा अवश्य हुआ है। राज्य बनते वक्त यहॉ एक महानिदेशक, दो निदेशक और नौ अपर निदेशक थे। अब एक महानिदेशक, छह निदेशक, पैंतीस अपर निदेशक और एक सौ सत्तावन संयुक्त निदेशक हो गये हैं।

राज्य के दूरदराज के ग्रामीण इलाकों में चिकित्सा और स्वास्थ्य सेवाओं की सबसे ज्यादा दरकार है। क्योंकि इन क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की कोई वैकल्पिक व्यवस्था मौजूद नहीं है। इसलिए स्वास्थ्य सेवाओं का सारा दारोमदार सरकारी अस्पतालों पर ही टिका है। अफसोस पहाड़ी इलाकों में ही डॉक्टरों की सबसे ज्यादा कमी है। पहाडी़ क्षेत्र की स्वास्थ्य सुविधाओं का अंदाजा डॉक्टरों की तैनातगी के इन आकड़ों से सहज ही लगाया जा सकता है। उदाहरण के तौर पर बागेश्वर जिले में डॉक्टरों के 76 पद स्वीकृत है। इनमें से 55 खाली है। उत्‍तरकाशी जिले में 88 में से 66 पद खाली हैं। पिथौरागढ़ जिले में 117 में से 89 पद रिक्त हैं। टिहरी गढ़वाल जिले में डॉक्टरों के 194 पद मंजूर है। इनमें से 146 पद खाली है। चमोली जिले में 133 में से 74 पद खाली है। रूद्रप्रयाग में 76 में से 49 पद खाली है। नैनीताल जिले में डॉक्टरों के 171 पद मंजूर है। इनमें से 122 पद खाली है। पौड़ी जिले में 193 में से 139 पद खाली है। अल्मोडा़ जिले में 235 में से 155 पद खाली है। जबकि चंपावत जिले में डॉक्टरों के 60 पद स्वीकृत है। इनमें से 40 पद खाली है। उद्यमसिंहनगर जिले में डॉक्टरों के 147 पद स्वीकृत है। इनमें से 60 पद खाली है। देहरादून जिले में 154 में से 72 पद खाली है। यही स्थिति हरिद्वार जिले की भी है।

डॉक्टरों की तैनातगी के मामले में पहाड़ के जिला और दूसरे बड़े अस्पतालों की हालत भी बेहतर नहीं है। जिला पुरूष चिकित्सालय, पौडी़ में डाक्टरों के 20 पर स्वीकृत है। जिनमें से दर्जन भर पद रिक्त है। जिला चिकित्सालय रूद्रपुर में 32 में से 12 पद खाली है। जिला चिकित्सालय पिथौरागढ़ में 26 पद मंजूर है। जिनमें से 14 पर रिक्त है। जिला चिकित्सालय गोपेश्वर में स्वीकृत 33 पदों में से 16 पद खाली है। जिला चिकित्सालय हरिद्वार में 39 डॉक्टर होने चाहिए थे, लेकिन है सिर्फ 23 डॉक्टर। बाकी 16 पद खाली है। संयुक्त चिकित्सालय, कोटद्वार में 22 डॉक्टरों के पद मंजूर है, लेकिन यहॉ 14 डॉक्टर तैनात है। 8 पद खाली है। प्रसिद्ध टीबी अस्पताल, भवाली में 8 डॉक्टर होने चाहिए थे लेकिन यहॉ सिर्फ एक अदद डॉक्टर तैनात है। डॉक्टरों के 7 पद खाली हैं। बेस अस्पताल, अल्मोडा़ में 25 में से डाक्टरों के 10 पद खाली है। बीरचन्द्र सिंह गढ़वाली, आयुर्विज्ञान एंव शोध संस्थान, श्रीनगर में डॉक्टरों के 28 पद स्वीकृत है। लेकिन यहॉ तैनात है सिर्फ 11 डॉक्टर। बाकी 17 डॉक्टरों के पद खाली है। जिला चिकित्सालय नई टिहरी में डॉक्टरों के स्वीकृत 18 पदों में से 7 पद खाली है। दून चिकित्सालय, देहरादून में डॉक्टरों के स्वीकृत 52 पदों में से 17 पद खाली हैं। जिला महिला चिकित्सालय पौड़ी में डॉक्टरों के 9 पद स्वीकृत है। तैनात हैं सिर्फ 2 डॉक्टर। बाकी 7 पद खाली है। पहाडी़ इलाकों में विशेषज्ञ चिकित्सकों की भारी कमी है। पैरामेडिकल स्टाफ की स्थिति भी कमोवेश ऐसी ही है। राज्य में पैरामैडिकल स्टाफ के कुल 3,845 पद स्वीकृत पदों में से करीब पच्चीस फीसदी यानी 904 पद रिक्त है।

राज्य बनने के इन दस सालों में स्वास्थ्य सेवाओं के आधारभूत ढॉचे में भी बडा़ बदलाव नहीं आया है। राज्य बनते समय सन् 2000 में यहॉ 33 बडे़ अस्पताल, 23 सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र, 63 प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र, 172 अतिरिक्त प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र, ग्रामीण क्षेत्रो में 322 राजकीय एलोपैथिक चिकित्सालय और 37 ग्रामीण महिला चिकित्सालय थे। दस सालों के बाद आज राज्य में 37 बडे़ चिकित्सालय है। सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र बढ़कर 55 हो गये हैं। प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र घटकर 42 रह गये हैं। अतिरिक्त प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों की संख्या 208 हो गयी है। जबकि ग्रामीण महिला चिकित्सालयों की संख्या घटकर 23 रह गयी है। ग्रामीण क्षेत्रों के एलोपैथिक चिकित्सालयों की संख्या उतनी ही है।

उत्‍तराखण्ड के सरकारी अस्पतालों में मरीजों के स्वास्थ्य परीक्षण के लिए भले ही डॉक्टर नहीं हों, लेकिन इन दस सालों में दवाओं का बजट करीब तीन सौ गुना जरूर बढ़ गया है।  प्रदेश की स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर सरकारी दावें जो भी हो, पर जमीनी हकीकत यह है कि पहाड़ के दूरस्थ ग्रामीण क्षेत्र आज भी चिकित्सा और स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं। पहाड़ी क्षेत्रों की लचर स्वास्थ्य सेवाओं का सबसे ज्यादा खामियाजा ग्रामीण इलाकों के बच्चों, महिलाओं और बुजर्गों को उठाना पड़ रहा है। डॉक्टरों के अभाव में उत्‍तराखण्ड के ज्यादातर बडे़ सरकारी अस्पताल महज रेफरल अस्पताल बनकर रह गये हैं। ईलाज के लिए सरकारी अस्पतालों में आने वाले ज्यादातर रोगियों को बाहर के अस्पतालों को रेफर कर दिया जा रहा है। नतीजन प्राईवेट अस्पताल और नर्सिंग होम जमकर चॉदी काट रहे हैं। निजी अस्पतालों और नर्सिंग होमों में दिन-प्रतिदिन बढ़ती लाचार रोगियों की भीड़ सरकारी दॉवों की हकीकत बयॉ कर रही है। अफसोस की बात यह है कि स्वास्थ्य सेवाओं समेत राज्य के विकास से जुडे़ दूसरे बुनियादी मुद्दे किसी भी सियासी पार्टी के एजेन्ड़े में शामिल नहीं है। प्रदेश की मौजूदा भाजपा सरकार और सत्ता की भावी दावेदार कांग्रेस ने अलग राज्य निर्माण के बुनियादी सवालों को हाशिए में धकेल दिया है। इन दिनों प्रदेश में भाजपा सरकार की विकास उर्फ समीक्षा यात्रा और इसके जबाब में कांग्रेस की सत्याग्रह उर्फ विरोध यात्राओं की जुगलबंदी चल रही है। दोनों पार्टियों की इस सियासी कसरत में पहाड़ के विकास से जुडे़ असल मुद्दे सिरे से गायब हैं।

उत्‍तराखण्ड के चुनिन्दा जिलों एवं बड़े चिकित्सालय में विशेषज्ञ चिकित्सक/ एमबीबीएस/दंत चिकित्सक/महिला एवं पुरूष चिकित्सक सहित सभी संवर्ग के चिकित्सकों के स्वीकृत/कार्यरत/रिक्त पदों का तुलनात्मक विवरण- वर्ष 2000 एवं वर्ष 2010.

रिकार्डरिकार्ड

लेखक प्रयाग पाण्‍डेय उत्‍तराखंड के वरिष्‍ठ पत्रकार तथा एक्टिविस्‍ट हैं.


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