ये है पेड न्‍यूज से आगे की शक्‍ल

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: कांग्रेस की रीजनल चैनलों से बड़ी डील : नीतीश स्‍टाइल में मीडिया मैनेजमेंट करने की तैयारी : 10, जनपथ उलझन में है। सत्ता का गुरूर टूटा है। जिस दलदल में कांग्रेस-नीत सरकार फंसी है उससे उबरने के रास्ते सीमित हैं। बिहार चुनाव के नतीजों ने कांग्रेस की उम्मीदों पर पानी फेर दिया। जिन मुद्दों के सहारे वो चुनाव में उतरी, वो बैतरणी पार करने में नाकाफी साबित हुई। इस बीच घोटालों की बौछार ने उसे बेदम करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। मजबूर कांग्रेस ने अब छवि सुधारने की कोशिशें तेज कर दी है।

ये मुहिम दो स्तरों पर है और इसे हिंदी पट्टी के सभी राज्यों में आजमाया जा रहा है...पहला संगठनात्मक स्तर पर और दूसरा नीतीश शैली की मीडिया मैनेजमेंट के जरिये। संगठन को कहा गया है कि वो केंद्र सरकार के उद्देश्यों और घोटालों पर पार्टी की राय को लोगों के बीच स्पष्टता से उजागर करे। कांग्रेस का थिंक-टैंक छवि निर्माण को बेहद अहम मान रहा है। यही कारण है कि मीडिया के वशीकरण के नीतीश के फार्मूले को तवज्जो दिया जा रहा है।

पार्टी को अहसास है कि छवि बनाने में नीतीश ने मीडिया का किस खूबी से इस्तेमाल किया। हालत ये है कि बिहारीपन के प्रकटीकरण में जुटी मीडिया के सारे प्रयास अपने आप नीतीश की आभा से तारतम्य स्थापित करते नजर आ रहे। यहाँ तक कि किसी बिहारी की व्यक्तिगत उपलब्धि के किस्से मीडिया में इस तरह परोसे जा रहे हैं मानो ये सब नीतीश के कारण ही हासिल हुआ हो।

ज्यादा पीछे जाने की जरूरत कहाँ... यही कोई एक-डेढ़ साल पहले नीतीश ने पत्रकारों से बिहार की छवि निखारने की गुजारिश की थी। पत्रकार गदगद हुए। नीतीश सरकार के "पीआर" के रोल में अपने को फिट करने में इन्हें कोई झिझक नहीं हुई। पत्रकारों का इस तरह निहाल होना समाज के लिए बड़ी खबर थी। ये सदमा देने जैसी थी।

राम विलास पासवान जैसों का मानना है कि नीतीश की "लार्जर देन लाइफ इमेज" बुलबुला है जो कि फूटेगा। कांग्रेस को लगता है कि ऐसा होने में समय भी लगता है और ये अक्सर "रिजनल क्षत्रपों'' पर असर डालता है। कांग्रेस की छवि का बुलबुला भी फूट सकता है। इस पर कांग्रेसी रणनीतिकार सचेत हैं और मान कर चल रहे हैं कि इसको बर्दाश्त करने के लिए उसके पास विशाल संगठन है। वैसे भी कांग्रेसी कवायद अगले लोकसभा चुनाव के मद्देनजर है जिसकी ट्रेलर यूपी चुनाव में दिखेगी । पार्टी समझती है की राहुल की ताजपोशी के लिए हिन्दी पट्टी में स्वीकार्यता जरूरी है। यही कारण है कि सकारात्मक छवि निर्माण पर भरोसा जताया गया है।

जानकारी के मुताबिक़ हिन्दी पट्टी के स्थापित रीजनल न्यूज चैनलों से "डील" की गई है। ये चैनल मनरेगा, प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना, इंदिरा आवास, इंदिरा गांधी वृद्धावस्था पेंशन जैसी योजनाओं पर स्टोरी बनाएँगे और न्यूज स्लॉट में दिखायेंगे। ये विशेष ख़बरें सकारात्मक होंगी। इनका टोन सफलता की कहानी जैसा होगा। ये दिखाया जाएगा कि वंचितों के जीवन में इन योजनाओं के कारण कैसे खुशहाली आई है।

जोर इस बात पर है कि इन योजनाओं के तहत जो भी निर्माण कार्य हुए हैं या हो रहे हैं, उसके अच्छे हिस्से को दिखाया जाए। जहाँ काम बंद है वहां स्थानीय मुखिया की मदद से कैमरे के सामने काम होता दिखाया जा रहा है। मजदूरों को ये बताना होता है कि कैसे उनकी किस्मत बदली है। इन मैनेज्ड स्टोरीज के लिए रिसर्च टीम है। रिसर्च टीम के प्रमुखों को कान्ट्रैक्ट पर लाया गया है, जो संभवतः केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय से टिप्स पाते हैं।

खबर के मुताबिक रीजनल न्यूज चैनल के सबसे बड़े खिलाड़ी को बिहार सहित सात राज्यों का जिम्मा मिला है। इसके एवज में चैनल को 60 करोड़ रुपये मिलेंगे। एक अन्य स्थापित हिन्दी चैनल को छह राज्यों की जिम्मेवारी सौंपी गई है। इस चैनल के साथ 40 से 50 करोड़ के लेन-देन की बात है। इसके अलावा एक भोजपुरी चैनल को दो राज्यों में काम सौंपा गया है। उसे 20 से 30 करोड़ के बीच मिलेगा। स्टोरी के स्तर पर खासा ध्यान रखा जा रहा है, जिस कारण इन चैनलों की प्रोग्रामिंग टीम के सदस्य शूट पर निकल रहे हैं।

जी हाँ! ये पेड न्यूज से आगे की शक्ल है, जो अखबारों के साथ चैनलों में भी झाँक रहा है। यहाँ राजनीतिक चेहरों के आख्यान की जगह आम आदमी की खुशहाली का विमर्श है। इसमें स्वार्थ और छल का सामाजीकरण किया जाता है। ये मानवीय दिखता है लिहाजा "डिसेपटिव" है। आपको अभास हो गया होगा कि चैनलों के खांटी स्वभाव को बदलने के किसिम-किसिम के दखल कितने रंग लाने लगे हैं। याद करिए अर्जुन सिंह के मुख्यमंत्रित्व काल को। इस दौरान सरकार को सुकून देने की जिस पत्रकारिता के बीज बोये गए अब उसका प्रचंड विस्तार सामने है। मध्य भारत में इस विकृति को "विकास की पत्रकारिता" कही गई। पत्रकार जमात के चतुर खिलाड़ी खूब फले-फूले। पंजाब को भी याद करना चाहिए जहां पत्रकारिता की कब्र खोदने के लिए नए-नए प्रयोग हुए।

हिन्दी पट्टी के अन्य राज्यों की वनिस्पत बिहार में "चेस्ट'' पत्रकारिता होती रही। लेकिन यहाँ पत्रकारिता का मौजूदा कोलाहल अशांत करने वाला है। बिहार की स्थापना के सौ साल होने वाले हैं। इसके लिए जश्न का माहौल बनाया जा रहा है। तैयारी के मिजाज को देखते हुए कहा जा सकता है कि सरकारी और गैर-सरकारी आयोजनों की श्रृंखला सामने आते जाएँगे और बिहारी अस्मिता का "ओवरटोन" मजबूत उपस्थिति दर्ज करता जाएगा। मीडिया में भी इसको लेकर उन्मादी सक्रियता है। लेकिन आशंका है कि मीडिया के इस उत्साह का यश भी नीतीश उठा ले जायेंगे। ये आशंका इसलिए भी है कि बिहारी मीडिया का बड़ा हिस्सा नीतीश में चाणक्य और चन्द्रगुप्त के समवेत स्वरूप दिखाने का आदी हो चला है। जबकि इस पेशे में बेढब बन चुके समझदार लोग टुकुर-टुकुर ताकने को बाध्य हैं।

इस दारुन परिदृश्य के निहितार्थ हैं। पत्रकारिता "हर क्षण के इतिहास का गवाह" नहीं रहा... अब वो इसका साझीदार है। समाज और घटना के बीच "इंटरफेस" की बजाय पत्रकार अब कारक हैं। अब आप कुत्ते को नहीं काटेंगे तो भी न्यूज बनेंगे। पानी में रहकर नहीं भींगने की कला दम तोड़ रही है। पत्रकार अब पानी में भींग भी रहे हैं और नंगे भी हो रहे हैं। वे इतने से संतुष्ट नहीं कि पत्रकारिता उन्हें "रिफ्लेक्टिव पावर" देती है। चांदनी जैसी आभा। अब वो सूरज की तरह ना सही, उल्का पिंड की रोशनी के लिए ठुनक रहा है।

नतीजा सामने है। कई पत्रकार खूब पैसे पा रहे हैं। वे "ब्रांड" भी बन रहे हैं। इन्हें देख बांकी के पत्रकार आपाधापी में हैं। सफल होने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार। ये बात उन्हें नहीं सालती कि वे खुद न्यूज बन रहे हैं। कांग्रेस को पत्रकारीय कौशल के इस अवतार पर खूब भरोसा है। उसे पता है कि दिल्ली के नामचीन पत्रकारों ने एक दिन में ही मंदी को कैसे छू-मंतर कर दिया था। याद है ना पिछली दिवाली। भूल गए हो तो दिवाली के अगले दिन के अखबार फिर से पलट लें। दिल्ली के इन पत्रकारों की माया देखिये पिछले लोकसभा चुनाव से लेकर झारखण्ड चुनाव तक मंदी, महंगाई, काला-धन कभी मुद्दा नहीं बन सके। तब दिल्ली की सत्ता खूब खिलखिलाई थी। झारखण्ड चुनाव के पांच-दस दिनों बाद ही महंगाई सुर्खियाँ बनने लगी। अब बारी है रिजनल मीडिया के भरपूर दोहन की।

कई लोग मानने लगे हैं कि चौथा खम्भा जैसा कुछ नहीं होता। कहीं ये आर्तनाद तो नहीं? मानो कोई बूढ़ा व्यक्ति बीच सड़क पर चीख-चीख कर कह रहा हो कि उसका बाप मर गया। आस-पास जमा अपेक्षाकृत जवान लोग फूसफुसा रहे हों कि ये तो खुद बूढा हैं, फिर किस बाप के लिए विलाप कर रहा है, इनके बीच से बेपरवाह लाल-बत्ती मचलती हुई गुजर रही होगी। कल को कोई पत्रकार ये पूछे कि पत्रकारिता क्या है तो हे लोकतंत्र के "लोक" आपको हैरानी नहीं होनी चाहिए?

लेखक संजय मिश्र पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.


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Comments (5)Add Comment
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written by girish kesharwani , February 28, 2011
संजय जी का लेख वाकई में काबिले तारीफ है, हमारे देश के नेता बेईमान तो हैं साथ ही राष्ट्रद्रोही भी हैं, ये हराम के जने जिनका कोई इमान-धरम नहीं है अब जो सच्चाई के साथ देश की अस्सी फीसदी गरीब जनता की हक़ की लड़ाई में साथ देने वाले मिडिया को भी मैनेज करने की तैय्यारी में लग गए हैं, और वो ये काम बड़े ही आसानी से कर सकते हैं क्योंकि मीडिया में भी जयचंदों की कमी नहीं है, जिस दिन ऐसा हो गया तो देश की जनता भी मिस्र और लीबिया के रस्ते चलने को बाध्य होगा तब न तो कोई राजनैतिक दल बचेगा और न ही मीडिया |
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written by akhilesh akhil, February 28, 2011
sanjay bhai nai jankari di aapne. nitish ji jis tarah se media ko mahnage kar rakhe hai usi tarah congress bhi kuchh karne ja rahi hai. halaki is khel me media ko labh hoga lekin patakarita ka nash bh. waise patrakarita to ab hoti nahi hai lekin jo bhi thoda bachaa thaa ab barbaad hoga. darasal rajniti jis pesha par haavi ho jaati hai wah pesh akhatm ho jati hai. yehi haal media ka hona hai. yeh to paid news ka baap hai.
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written by narender, February 27, 2011
सत्य वचन है गुरूदेव। सारे फीलगुड करके नोटो की चाशनी में नहाने की प्रक्रिया में है। खुद को पत्रकार कहने वाले रीजनल चैनल्स के जांबाज सिपाही अब देहातियों से रिहर्सल करवा रहे कि कहो- पहले खेत में लोटा लेकर जाते थे, लेकिन जब से पंजे की सरकार बनी है, बस मौज में है। सरकार ने घर में ही शौच करने के दरवाजे खोल दिये है अब किसी भी वक्त करते है औऱ मन भर के- जय हो सरदार जी की।
केन्द्र सरकार प्रदेश सरकार का मुगालता बढ़ाती जा रही है और परदे के पीछे मिशन-2012 की बड़ी तैयारियां जन्म ले चुकी है। मायाजी चौपर में घूम-घूमकर खुश हो रही है। एक खबर देखी थी दो दिन पहले, उप्र में कांग्रेस ने गुप्त सर्वे कराया है जिसमें कांग्रेस सबसे नीचे है औऱ माया सबसे ऊपर है। मालूम होता है इस खबर से मायावती बहुत खुश है। अब वह अपने मातहतों को कैमरे के सामने आंखे नही दिखाती, अरे..तरे करके नही बोलती..आप बोलती है। कांग्रेस मायाकाल के अवसान की तैयारी कर रही है और इस चुनाव में मीडिया उसकी हमसफर है।
कैसे ...जानने के लिए हिंदी, अग्रेजी और भोजपुरी चैनलों के ब्रेक में आने वाले सरकारी विज्ञापन देखिये।
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written by mohd jabevd, February 27, 2011
aishe hota hai media ka istemal, asli chehra aaya samne,
loktantra ka chautha stambha............ pahla bhi nahin.
hud tak girne ki parakastha hai.
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written by vikas sharma, February 27, 2011
kya kahe, meri dharna ko vishash hone laga hai ki partakarita aur patrakaron ki kharidi -bikri sirf chattisgarh me nahi ye to desh bhar ki tasir hai, jis bebaki se sanjay ji ne mudde ki gambhirta ko rekhantik kiya hai mujhe lagta hai aab isse aage samadhan par charcha ko shuru karne ki jarurat hai. bahut badhi sanjay ji patrakar wahi jo apne se shuru karte hue samaj ki kuritiyon par nispaksh tippni kare. aage bhi sangharsh jari rakhe aapki soch se bahut se log ittefak rakhte hain. badlao bhi aayega vishwash banaye rakhe.

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