कहानी एक तानाशाह, एक लोकतांत्रिक की

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गिरीश मिश्रलीबिया के तानाशाह कर्नल गद्दाफी और विकीलीक्स के जूलियन असांज चर्चा में हैं. ये अलग बात है कि विपरीत वजहों से. एक खुद का ताज बचाने में इतना नीचे गिर गया है कि न तो हवा का रुख पहचान पा रहा है और न ही दीवार पर लिखी अपने ही पतन की इबारत. हालत ये है कि वो अपनी ही अवाम का भाड़े के सैनिकों से कत्लेआम करा रहा है. तो दूसरा सारी दुनिया में जम्हूरियत का परचम फहराने को आतुर है, लेकिन उसे अमेरिकी अगुवाई में पश्चिमी लोकतांत्रिक खेमे की शातिराना नाराजगी झेलनी पड़ रही है.

दुनिया भर के अखबारों और खबरिया चैनलों में दो नाम इस समय सुर्खियों में हैं. पहला है लीबिया का सर्वेसर्वा तानाशाह कर्नल मोअम्मर गद्दाफी और दूसरा विकीलीक्स का संस्थापक जूलियन असांज. दोनों पर ही मुसीबत आई हुई है और दोनों ही अमेरिका की आंख की किरकिरी हैं, लेकिन विपरीत कारणों से. एक ऐसा महत्वाकांक्षी - बर्बर शासक है, जो खुद को अरब नेताओं का नेता, मुस्लिमों का इमाम और राजाओं का राजा कहता रहा है या फिर चापलूसों से कहलवाता रहा है, पर अब उसकी गद्दी हिल रही है. जिसने सदियों के लीबिया/त्रिपोली के इतिहास में 42 वर्ष के सबसे लंबे काल तक एकछत्र राज किया है, जिसके लिए किसी विरोधी की हत्या किसी चींटी मसलने से ज्यादा कभी नहीं रही और जो यही काम आज भी अपनी ही लोकतंत्र समर्थक आम अवाम के साथ गोली-टैंकों और हवाई बमबारी के जरिए कर रहा है.

तो दूसरा यानी कि 39 वर्षीय असांज खुद को लोकतंत्र समर्थक कहता है और जिसके समर्थन में सारी दुनिया में मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का हुजूम है. अमेरिका के गुप्त दस्तावेजों के खुलासे से जिसने विश्व में तहलका ही नहीं मचाया, बल्कि लोगों को बताया है कि खुद को सभ्य-शिष्ट कहने का दंभ भरने वाले अमेरिका का असली चेहरा कितना कुरूप है. और, ये जो अरब देशों में लोकतंत्र की आंधी चल रही है, उस आग को भड़काने में भी असांज के विकीलीक्स का हाथ रहा है, जब उसने ट्यूनीशिया में दशकों से एकछत्र राज कर रहे बेन अली और उसकी बेगम सहित पूरे परिवार की अय्याश जिंदगी का खुलासा करते हुए वे दस्तावेज जारी किए जो कि ट्यूनीशिया की जनक्रांति में मददगार हुए और जिसके चलते भी बेनअली के खिलाफ माहौल बना और उन्हें भागना पड़ा. लेकिन चर्चा पहले लीबिया के गद्दाफी की.

ध्यान देने की बात ये है कि पड़ोसी होने के बावजूद लीबिया न तो मिस्र है न ही ट्यूनीशिया और न ही सऊदी अरब, यमन या अल्जीरिया. इसी तरह गद्दाफी भी न तो बेन अली हैं और न ही हुस्नी मुबारक. दरअसल, लीबिया अनेक कबीलों में बंटा देश है जिसकी आबादी सिर्फ साठ लाख है, जिसमें से लगभग 20 लाख लोग बेरोजगार हैं. यहां सेना की संख्या सिर्फ 40 हजार है लेकिन ये सैनिक मिस्र और ट्यूनीशिया की तरह उस रूप में निर्णायक नहीं हैं कि वे विद्रोही जनता से शासक के खिलाफ मिल जाएं और फिर आदेश के बावजूद उनके द्वारा गोली चलाने से इनकार करने पर शासक को ही देश छोड़ कर भागना पड़े. लीबिया में सेना के समानांतर रिवोल्यूशनरी समितियां हैं, जो गद्दाफी की वफादार हैं. विदेशों से लाए गए भाड़े के प्रशिक्षित सैनिकों के पास आधुनिक हथियार भी हैं, भले ही सेना के पास न हों. इन अर्धसैनिक बलों को ‘पीपुल्स आर्मी’ कहते हैं. इनकी मदद को तगड़ा खुफिया तंत्र है - कुछ  कुछ दशकों पहले के पूर्वी जर्मनी और रोमानिया की याद दिलाता हुआ. भाड़े के सैनिकों में पड़ोस के चाड, सूडान, मॉरिटानिया, गिनी और निजेर के लोग शामिल हैं. गद्दाफी ने यह पूरा तंत्र सिर्फ अपने प्रति निष्ठा को लेकर खड़ा किया है. और यही वो तबका है, जो लीबिया की सड़कों पर वहां के अवाम का खून बहा रहा है.

अनेक मानवाधिकार संगठनों ने लीबिया में दो हजार से ज्यादा लोगों के मारे जाने की आशंका जताई है. अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा ने ब्रिटेन, फ्रांस, इटली के शासकों को फोन करके वैकल्पिक कार्रवाई पर विचार की बात कही है. स्विट्जरलैंड ने गद्दाफी की अरबों डालर की बैंकों में जमा संपत्ति को फ्रीज करने की घोषणा की है, क्योंकि उसके अनुसार ये जनता की संपत्ति है. लीबिया में नरसंहार अंतर्राष्ट्रीय कानूनों, मान्यताओं और नैतिक मानदंडों के खिलाफ है - इस आधार पर उसके खिलाफ कार्रवाई की मांग उठ रही है. खुद गद्दाफी के चचेरे भाई अहमद गद्दाफ उसका साथ छोड़ कर काहिरा चले गए हैं. उसके दो मंत्रियों ने साथ छोड़ दिया है, मंत्री मुस्तफा जलील ने तो यहां तक कहा है कि 1988 में लॉकरबी विमान धमाका कराने के आदेश गद्दाफी ने ही दिए थे, जिसके प्रमाण मौजूद हैं. सेना ने भी अनेक जगह विद्रोही जनता से हाथ मिला लिया है. फिर भी लीबिया में संघर्ष जारी है.

यहां गौर करने की बात यह है कि जहां लोकतांत्रिक लहर के बाद सऊदी अरब के शासक ने जनता की वेतन बढ़ोत्तरी, बेरोजगारी और आवास भत्तों के मदों में 37 अरब डालर की योजनाओं की घोषणा की है. बहरीन, यमन, मोरक्को और अल्जीरिया जैसे देशों में भी ऐसी ही घोषणाएं हो रही हैं, फिर लीबिया में ऐसा क्यों नहीं? दरअसल, गद्दाफी लीबिया के कबीलों को एक दूसरे के खिलाफ खड़ा करके उन्हें अब तक अपने हित में लड़ाते रहे हैं, उन्हें भरोसा है कि आगे भी वो इसमें सफल हो जाएंगे. यहां आशंका ये है कि कहीं लीबिया में सूड़ान और इथोपिया जैसे कबीलाई संघर्ष न शुरू हो जाएं.

वैसे, 68 वर्षीय तानाशाह गद्दाफी के जीवन की महत्वाकांक्षा भी उन्हें किसी भी तरह से गद्दी न छोड़ने को बाध्य कर रही है. दुनिया के अनेक देशों में उनकी आतंकवादी हरकतों के लिए भले ही थू-थू हो, लेकिन इटली के ‘बदनाम’ प्रधानमंत्री बर्लुस्कोनी उनके मित्र हैं और इटली के बैंकों में उनकी साठ अरब डालर की संपत्ति जमा है. 1969 में जब गद्दाफी ने राजशाही का खात्मा करके कमान संभाली, तब वो महज 27 साल के थे. तब क्रांतिकारी चेग्वेरा के लीबियाई संस्करण के रूप में उनकी छवि उभरी - यानी सफारी सूट और काले चश्मे में पश्चिमी साम्राज्यवाद का विरोधी ही नहीं, मिस्र के गामेल अब्दुल नासिर का प्रशंसक और वैचारिक जमीन पर इस्राइल विरोधी, अरब समाजवाद और अरब राष्ट्रवाद का अनन्य समर्थक.

लेकिन वक्त के साथ जहां गद्दाफी का लीबिया साम्राज्यवाद विरोधी गढ़ बन कर अंतर्राष्ट्रीय आतंकवादी गतिविधियों में शरीक हुआ, वहीं कल्याणकारी राज्य, लोकतंत्र और इस्लामी नैतिकता पर आधारित इस्लामी समाजवाद का सिद्धांत एकतंत्री निजाम में परिणित हो गया. दुनिया को दिखाने के लिए माओत्से तुंग की लिटिल रेड बुक की तर्ज पर ‘ग्रीन बुक’ भी तीन खंडों में लिखी गई, लेकिन क्रांतिकारी समितियों के जरिए विरोधियों के खून से लीबिया लाल होती रही, तो लीबिया से बाहर भी आतंक से दुनिया दहलती रही. गद्दाफी ने 1972 में जर्मनी के ओलंपिक में हमला करवाया, 1984 में लंदन में ब्रिटिश पुलिस अफसर फ्लेचर की हत्या करवाई, 1986 में बर्लिन में बमबारी करवाई,  एक विमान का अपहरण करवाया तो 1988 में कनाडा से उड़े विमान को विस्फोट से गिरवा दिया जिसमें 270 लोग मारे गए. गद्दाफी ने पाकिस्तान के जुल्फिकार अली भुट्टो के साथ मिलकर इस्लामी बम बनाने की भी कोशिश की. इस तरह तेल के पैसे से उसने आतंक की आग भड़काने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी. उधर, नाराज अमेरिका ने लीबिया पर बमबारी की और संयुक्त राष्ट्र ने उस पर प्रतिबंध भी लगाए. पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रेगन ने इसीलिए गद्दाफी को ‘मध्य-पूर्व का पागल कुत्ता तक कहा, तो गद्दाफी भी संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद को ‘आतंक परिषद’ कहते रहे.

वैसे हमेशा अपनी जिद पर अड़े रहने और विदेशी महिला अंगरक्षकों से घिरे रहने वाले गद्दाफी को उनके सनकीपन के लिए भी ज्यादा जाना जाता है. वो दुनिया के पहले ऐसे राष्ट्राध्यक्ष हैं, जो राष्ट्रपति या राष्ट्राध्यक्ष कहलाना पसंद नहीं करते. 1970 में उन्होंने जरूर प्रधानमंत्री बनना चाहा लेकिन फिर 1972 में प्रधानमंत्री पद छोड़ दिया. फिर उन्हें कैप्टन से कर्नल कहलाना भा गया और 40 साल से कर्नल ही बने हुए हैं. सनकपन का ये उदाहरण भी दिलचस्प है कि किसी देश की कमान संभाल रहा वो अकेला बिगड़ैल शख्स है, जो खुलेआम कहता है कि ‘सोमालिया के समुद्री लुटेरे कुछ भी गलत नहीं कर रहे. वो तो आत्मरक्षा में पश्चिम के लालची देशों को सिर्फ जवाब भर दे रहे हैं.’ कोई गद्दाफी को बताए कि इसका शिकार सिर्फ पश्चिम नहीं, सारी दुनिया हो रही है. और जवाब देने का ये कौन-सा तरीका है? लेकिन समझा जा सकता है गद्दाफी जैसे तानाशाहों को जब अपनी ही अवाम की चिंता नहीं है तो फिर व्यापक मानवता के बारे में वो क्या सोचेंगे?

अमेरिका प्रत्यर्पण की आशंका है असांज को

विकीलीक्स के संस्थापक जूलियन असांज ने आशंका जताई है कि यदि उसे ब्रिटेन से स्वीडन प्रत्यर्पित किया गया, तो उसे स्वीडन से अमेरिका भेज दिया जाएगा. वहां उसे ग्वांतानामो बे की बदनाम जेल में बंद कर दिया जाएगा या फिर जान से मार दिया जाएगा. असांज ने लंदन के संडे टाइम्स में ये भी खुलासा किया है कि उसे चल रहे मुकदमे के लिए पैसों की काफी जरूरत है इसलिए वो ‘आत्मकथा’ भी लिख रहा है. विकीलीक्स और खुद को बनाए रखने के लिए उसे यह किताब लिखनी पड़ रही है, जिसमें जनता और उनकी सरकार के नए रिश्तों को लेकर वैश्विक संघर्ष की बात होगी. नई पीढ़ी को जोड़ने वाली यह किताब आगामी अप्रैल में आएगी. असांज ने स्वीडन में खुद पर लगे आरोपों को ‘अविश्वसनीय झूठ’ कहा है और स्वीडन को ‘नारीवादी आंदोलन का सऊदी अरबिया’. असांज का मानना है कि उसका काम अफ्रीकी-अमेरिकी अश्वेतों को नागरिक अधिकार दिलाने के लिए संघर्ष करने वाले मार्टिन लूथर किंग जूनियर के काम जैसा है या फिर 1960 के दशक में वियतनाम युद्ध के खिलाफ जनता के प्रदर्शन जैसा. बहरहाल, असांज के समर्थकों और मीडिया का एक बड़ा तबका ये सच ही मानता है कि तीन महीने से ब्रिटिश कोर्ट में चल रहा  मुकदमा और अब स्वीडन प्रत्यर्पण की बात सिर्फ असांज के अभियान को रोकने के लिए ही है. सरकार और कारपोरेट की गुप्त बातों के खुलासे से सारी पोल-पट्टी खुलने का डर जो है. लेकिन दुनिया भर में असांज को मिल रहे भारी जनसमर्थन के संकेत को सरकारें अनदेखा - अनसुना करने की मूर्खता करेंगी, ऐसा लगता तो नहीं.

लेखक गिरीश मिश्र लोकमत समाचार के संपादक हैं.


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