मुख्यमंत्री मायावती के झूठ को उनकी सीबीसीआईडी ने पकड़ा!

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नूतन ठाकुर: बबलू और आब्दी की गिरफ्तारी के पीछे का सच : वैसे तो जिंदगी में कोई बात शायद बेमतलब नहीं होती पर उत्तर प्रदेश में तो निश्चित तौर पर हर बात के पीछे कोई ना कोई कारण जरूर होता है. और अक्सर जो दिखता है, सच वैसा नहीं होता. अब जीतेन्द्र सिंह बबलू और इन्तेज़ार आब्दी की गिरफ्तारी का मामला ही ले लीजिए.

बबलू बीकापुर से माननीय विधायक हैं, बहुजन समाज पार्टी से. इन्तेज़ार आब्दी गन्ना संस्थान के अध्यक्ष हैं, राज्य मंत्री का दर्ज़ा हासिल किये हुए. कल ये दोनों माननीय अचानक अरेस्ट हो गए. और इन्हें अरेस्ट किया उत्तर प्रदेश की सीबी-सीआईडी विभाग ने. अब मजेदार बात यह है कि इन्हें जिस आरोप या अपराध में पकड़ा गया है वह घटना घटी थी आज से करीब दो साल पहले. उस समय उत्तर प्रदेश कांग्रेस की अध्यक्ष रीता बहुगुणा जोशी ने कथित तौर पर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती के लिए कुछ ऐसे शब्दों का प्रयोग कर दिया था जो आम तौर पर अच्छे नहीं कहे जायेंगे. शायद बबलू साहब और आब्दी साहब को ये शब्द इतने नागवार गुज़रे कि संभवतः इन्होंने इसके बदले रीता बहुगुणा जोशी को सबक सिखाने की ठान ली.

इसके कुछ ही दिनों के अंदर रीता जोशी का लखनऊ स्थित मकान अचानक रात में अग्नि के हवाले हो गया. इस तरह माल एवेन्यू जैसे महत्वपूर्ण स्थान पर, प्रदेश की मुख्यमंत्री के आवास से मात्र चंद कदमों पर स्थित एक भारी-भरकम और सुरक्षित से मकान में कुछ गुंडों और आपराधिक तत्वों ने जबरिया घुस कर आग लगा दी. मकान ऐसी जगह पर था कि हर आदमी यह कह सकता था कि यह काम बिना प्रशासन की मिली-भगत से नहीं हो सकता.

चंद कदमों पर मुख्यमंत्री का भारी सुरक्षा घेरे वाला आवास, चारों ओर वीआईपी किस्म के लोग, शहर में बीचों-बीच वह आवास, और फिर भी कुछ गुंडों ने उसमे घुस कर मकान को जला दिया! बहुत शोर मचा, बहुत हंगामा हुआ. उस पर भी तुर्रा यह कि जिस समय यह कुकर्म हो रहा था लगभग उसी समय कुछ इलेक्ट्रोनिक मीडिया के लोग भी पहुँच गए और आग लगाने वाले कुछ महानुभावों की तस्वीर भी उतार ली. उनमे से एक तो जीतेन्द्र सिंह बबलू से मिलती-जुलती तस्वीर थी और दूसरे एक स्थानीय बसपा नेता इन्तेज़ार आब्दी की थी. इसके साथ कुछ पुलिसवालों की भी तस्वीरें आई थीं, जिनमे एक इन्स्पेक्टर हजरतगंज, एक सीओ, एक एसपी सिटी और एक आईजी स्तर के अधिकारी की भी तस्वीरें आने की चर्चा हुई. इन खुलासों के बाद बहुत शोर-गुल हुआ, बहुत छीछालेदर हुई, बहुत भर्त्सना हुई.

पर माननीय मुख्यमंत्री जी को इस सारे प्रकरण से जैसे कोई खास वास्ता ही नहीं हो. उन्होंने घटना घटने के लगभग तुरंत बाद ही यह कह दिया कि इस मामले से बसपा के किसी भी नेता का कोई लेना-देना नहीं है. अब जब मुख्यमंत्री ने स्वयं ही यह कह दिया तो फिर किसी के कुछ और कहने का मतलब भी नहीं रह गया और ना ही किसी की कोई हिम्मत हुई होगी. उस पर तुर्रा यह कि इस मामले में पुलिस ने ताबड़तोड़ कुछ लोगों को मुलजिम के रूप में पहचान भी लिया, उनकी गिरफ्तारी भी हो गयी और इस तरह मामले का पटाक्षेप ही माना जाने लगा. पर कुछ तो इलेक्ट्रोनिक मीडिया के दिखाए गए फोटो के आधार पर, कुछ स्थानीय लोगों के भारी विरोध पर और कुछ राजनैतिक सरगर्मियों के कारण, ये बेचारे निरीह लोग इस मामले में कोर्ट के स्तर पर बख्श दिए गए. जान बची लाखों पाए, और ये गरीब लोग ऐसे गायब हुए कि गधे के सिर से सींघ.

पर चूँकि घर रीता बहुगुणा का जला था इसीलिए वे ही इससे असल रूप में आहत हुई थीं. उन्होंने इस मामले को छोड़ा नहीं और इसमें पुलिस, प्रशासन से ले कर कोर्ट-कचहरी तक का दरवाज़ा लगातार खटखटाती रहीं. मुश्किल तो बहुत आई पर धीरे-धीरे उनके रास्ते खुलते गए. पहले मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के स्तर पर इस मामले में जीतेन्द्र सिंघ बबलू और इन्तेज़ार आब्दी के खिलाफ नामजद मुक़दमा दर्ज करने के आदेश हुए. फिर इसकी विवेचना सीबी-सीआईडी को गयी. सीआईडी मामले को लिए काफी लंबे समय तक सोयी रही पर इसी बीच रीता जोशी ने हाई कोर्ट में भी रिट याचिका दायर कर दी थी जिसमे इस मामले की विवेचना सीबीआई से कराने की मांग की थी.

अब इस मामले में हाई कोर्ट की सुनवाई अपने अंतिम स्टेज में आ गयी दिखती है और अभी तक जो भी बात सामने आई है, उससे यही दिखता है कि उत्तर प्रदेश सरकार को यह महसूस हुआ हो कि संभव है मामला हाई कोर्ट के आदेश पर सीबीआई के सुपुर्द ना कर दिया जाए. चूँकि रीता बहुगुणा जोशी इस मामले में प्रदेश के चोटी के कई लोगों को शुरू से ही आरोपित करती रही हैं, इसीलिए एक बहुत बड़ा तबका यही मान रहा है कि यह बबलू और आब्दी के खिलाफ जो भी कार्यवाही हुई है, वह मूल रूप से इस पूरे मामले में हाई कोर्ट में सरकार की नाक बचाने और मामले को सीबीआई को भेजे जाने से बचाने के लिये की गयी है.

यदि ऐसा नहीं होता तो फिर यह कैसे संभव था कि जिस मामले में घटना के दो दिन के अंदर ही प्रदेश की मुख्यमंत्री स्वयं किसी बसपा नेता की सहभागिता को अस्वीकृत कर दें, कोई और निरपराध लोग पकड़ लिए जाएँ, ये दोनों आरोपित सरेआम घूम रहे हों और आब्दी को इस घटना के बाद राज्य मंत्री का दर्ज़ा दे दिया जाए (जिसे रीता जोशी और तमाम नेता इस घटना के इनाम के रूप में बताएं), उसी मामले में ये दोनों लोग उसी सीआईडी को अचानक हाई कोर्ट में सुनवाई होने के कुछ दिनों पहले ही अचानक मिल जाएँ और सारी कार्यवाहियां आनन-फानन में हो जाए.

सत्ता की ताकत का खेल खेलना सबों को अच्छा लगता है पर हममे से हर आदमी को यह याद भी रखना चाहिए कि यह सत्ता नाम की चीज़ बहुत फरेबी किस्म की है और यदि आज उसका बेजा  इस्तेमाल क़ानून को धता बताते हुए एक पक्ष करेगा तो कल यही काम दूसरा भी करता नज़र आएगा. इन हालातों से बचने का एक ही उपाय है कि आज जब मेरी सत्ता हो तो मैं यह समझूं और याद करूँ कि यह सत्ता मुझे नेक काम करने और क़ानून का पालन कराने के लिए दी गयी है, खुलेआम क़ानून का गला घोंट कर स्वयं की ताकत पर इतराने के लिए नहीं.

डॉ नूतन ठाकुर

संपादक

पीपल’स फोरम, लखनऊ


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