'ऐसी क्‍या मजबूरी है कि आईसीसी के सामने भीगी बिल्‍ली बन जाता है मीडिया'

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आदरणीय सर, मैं एक कैमरामैन हूं. मैंने वर्ल्‍ड कप के दौरान मीडिया की जो लाचारी देखी, ऐसी लाचारी कभी नहीं देखी थी. आईसीसी की मनमानी कुछ इस कदर दिखाई दी कि उसके सामने मीडिया बेबस और लाचार दिखा. पहले से आईसीसी ने मैच के दरमियान कैमरामैन को स्‍टेडियम में आने पर रोक लगा दी, कोई कुछ नहीं बोला.

स्‍टेडियम में मैच के दौरान पुलिस से लेकर चपरासी तक मीडिया पर हावी होता दिखा. और हद तो उस समय हो गई, जब चार मार्च को अहमदाबाद में हुए मैच के पहले दिन में होने वाली पीसी थी. इस पीसी में ऑडियो आउट के लिए रखा मशीन काम नहीं कर रहा था. चैनल के पत्रकार खिलाड़ी के पास अपने-अपने माइक रखने गए, तब आईसीसी के अधिकारी ने सभी माइक पर से आईडी हटाकर ही माइक रखने को बोला. और सभी रिपोर्टरों ने अपने हाथों से अपनी कंपनी का आईडी माइक पर से हटाया, तब मुझे बहुत अपमानजक लगा. मैं समझता हूं कि सभी चैनल वालों को इसमें अपमान लगना चाहिए.

इतना ही नहीं, इसके बाद तो उस समय हद ही हो गई जब चार मार्च यानी कि मैच वाले दिन स्‍टेडियम के मेन गेट के बाहर उन लोगों ने कड़ी धूप में एक सफेद कपड़ा डालकर एक बोर्ड मार दिया, 'वनली फार कैमरामैन' फिर भी सब भीगी बिल्‍ली बने रहे, एक भी शब्‍द बोले बिना रिपोर्टर स्‍टेडियम में चले गए. वैसे रिपोर्टर बेचारे भी क्‍या करते, उनकी भी मजबूरी है यार. मुझे लगा कि मेरी एक जिम्‍मेदारी बनती है कि मैं ये बात आपके माध्‍यम से मीडिया के सामने रखूं और पूछूं कि ऐसी क्‍या मजबूरी है कि ऐसे शेर बनने वाला मीडिया आईसीसी के सामने भीगी बिल्‍ली बन जाता है.

एक कैमरा जर्नलिस्‍ट द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.


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Comments (5)Add Comment
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written by vinod desai, March 10, 2011
kya kare sabko apni job bachani he .....
muze lagta he ki sabko dar he k icc k samne aavaj uthane se job ja sakti he ....
par kisine to himmat ki k ye bat bhadas ke madyam se sabko batai....

lekin dekhate aage kya hota he ....
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written by amresh, March 06, 2011
jab media he bik chuke hai to baki ki asha karna muskil hai. top to bottomsmilies/grin.gifsmilies/grin.gif
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written by राजीव शर्मा, March 06, 2011
कमाल है,, इतनी चुप्पी...
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written by bipin Mori, March 05, 2011
muje lagta he kisi NEWS valo ne vo story naki ki hoge
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written by amit singh, March 05, 2011
इसका जबाब बडे़ -बडे़ संपादको के पास जरूर है....जरा वे भी आईसीसी का बहिष्कार करके दिखा दें। एक महीना अगर आईसीसी वालो को टीवी पर ना लाने का कसम ले लें तो शायद प्रेस का वजूद इनको पता चल जाये और इस अपमान का बदला मिल जायेगा..मगर इन मठाधीशों के पास खबर ही नहीं होती..जिसको ये चलावाएं.. अगर है भी तो खबर से संबंधित लोगो का प्रोफाइल पूछते है... आज रिपोर्टरों के साथ है कल इन संपादको के साथ होगा...तब जाकर संपादकों से संबंधित और मीडिया से संबंधित संगठनों के कान में आवाज जायेगी।

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