तब बाघ की खाल ओढ़े गदहे कतई बर्दाश्‍त नहीं होंगे

E-mail Print PDF

पदमपतिजी: अचम्‍भा-करिश्‍मा रोज-रोज नहीं होता : बचपन के कुछ दिन मैंने कोलकाता में गुजारे थे. खेलों के प्रति इस दीवाने महानगर का ही शायद यह असर रहा होगा कि मेरा रुझान खेलों में बढ़ा और कालांतर में यह रोजी-रोटी का जरिया भी बना. आम कलकतिया खेल प्रेमी की तरह मैं भी मोहन बागान - ईस्ट बंगाल की फुटबाल भिडंत देखने कूदता-फांदता जाया करता था और तब जो भी टीम हारती थी, वो एक ही गाना गाती थी, 'हमारे ग्यारह खिलाड़ी उनके 14 खिलाडियों के खिलाफ खेल रहे थे. मानो रेफरी और दोनों लाइन्स मैन विजेता टीम के अतिरिक्त खिलाड़ी हों.

क्रिकेट में भी इन दिनों कुछ ऐसा ही नज़ारा देखने को मिल रहा है. दोनों मैदानी अम्पायर और बाहर बैठी दो तीसरी आँखें ऐसे ही कानूनी दांव-पेच में फंस रही हैं. कम से कम भारत-इंग्लैण्ड मैच के बाद आम दर्शकों को तो ऐसा ही लगा. यह दुखद है. सरल अज्ञानता यदि हानिकारक हो तो उसे हानिकारक मानना ही बेहतर होगा और अम्पायरों का उद्देश्य क्रिकेट को स्वाभाविक खेल के रूप में स्थापित करना है न कि उसे कानूनी चीर-फाड़ केंद्र बनाना है. सरल शब्दों में कहें तो अगर आपने तय किया कि तकनीक के बल पर अम्पायर के फैसले को चुनौती देनी है तो फिर मशीन या तकनीक पर ही भरोसा कीजिये, तीसरी आँख की भूमिका बस लाल और हरी लाइट जलाने भर की ही होनी चाहिए, न कि अपनी टांग अड़ाने की. ठीक है कि एकदम सटीक फैसले करने वाली तकनीक हाट स्पाट का प्रयोग नाकआउट दौर से शुरू होना है और अभी फैसले हाक आई कर रही है. अगर हाक आई बता रही है कि गेंद स्टंप में जा रही है तो बल्लेबाज को आउट देने में कोई हिचक नहीं होनी चाहिए. ये ढाई मीटर से ज्यादा की दूरी क्या बला है.

कैसे तय होगा कि गेंद ज्यादा दूरी होने से स्टंप छोड़ देती जबकि हाक आई साफ़-साफ़ दिखाती है कि गेंद स्टंप छोड़ रही थी या स्टंप के ऊपर से निकल रही थी. जो सचिन 99 के स्कोर पर दुनिया के सर्वश्रेष्ठ अम्पायर टफेल द्वारा गलत आउट दिए गए हों, उनका या कप्तान धोनी का यूडीआरएस का विरोध यूँ ही नहीं है. तकनीक सटीक हो और उसमें तकनीक के साथ तीसरी आँख यानी अम्पायर का किसी भी तरह का दखल नहीं होना चाहिए. निर्णय निष्पक्ष ही नहीं, सही होने चाहिए. मगर क्या कीजियेगा, इस विश्व कप में क्रिकेट छोड़ कर और सब हो रहा है. सट्टेबाज क्रिकेट को मदारी का खेल बनाने में जुटे हैं. हर कदम पर जुए का दाँव लगाने की गुंजाइश बनाई जा रही है. कितनी अजीब बात है कि यह चर्चा शुरू हो चुकी है कि जब आयरलैंड ने इंगलैंड को हरा दिया है तो भारत भी खतरे में है. पर कोई यह चर्चा नहीं करता कि दक्षिण अफ्रीका खतरे में है. क्योंकि भारत को खतरे में डाल कर इस काल्पनिक घटना से सट्टे की दुकानदारी ज्यादा मजबूत होगी.

खैर, क्रिकेट को अगर क्रिकेट माना जाय तो जो टीम इस विश्व कप को जीतने की प्रबलतम दावेदार के रूप में उतरी हो, वो नौसिखियों से भी हार सकती है, इस तरह की बात करने वाले यह भूल जाते हैं कि अचम्भे और करिश्मे रोज नहीं होते. आयरलैंड ने इंग्लैण्ड को पटखनी दी तो इसमें केविन ओ ब्रायन के शतक से ज्यादा अहम राष्ट्रवादी मुक्ति आन्दोलन की भूमिका रही होगी, अर्जेंटीना- ब्राजील, और भारत-पाक जूनून जैसी बात रही होगी. वो जुनून कम से कम इस मुकाबले में तो नहीं दिखने जा रहा है. सच तो यह है कि भारत के साथ आयरिश टीम फिक्सिंग बिना नहीं जीत सकती, इस तथ्य को बच्चा-बच्चा जानता है. और अगर मान लीजिये कि भारत तब भी हारता है तो उसे राष्ट्रीय दंड मिलना चाहिए. क्योंकि बाघ की खाल ओढ़े गदहे कतई बर्दाश्त नहीं होंगे.

बैंगलुरू में रविवार को होने जा रहे मैच में जहाँ तक भारतीय एकादश का प्रश्न है तो उसमे एक बदलाव होना चाहिए और चावला के स्थान पर फिट नेहरा को मौका मिलेगा. यदि बल्लेबाजों की अभी तक चेरी बनी हुई पिच की बात की जाय तो लगता है कि इस बार इसमें गेंदबाजों के लिए भी करने को कुछ होगा.

लेखक पदमपति शर्मा जाने-माने हिंदी खेल पत्रकार हैं. बनारसी ठाठ के धनी पदमजी जहां भी रहे, अपनी तबीयत से रहे, जो भी किया डंके की चोट पर किया. हिंदी खेल पत्रकारिता की दशा-दिशा बदलने वाले पदम ने दर्जनों खेल पत्रकारों को ट्रेंड कर पत्रकारिता में बड़े जगहों पर पहुंचाया. साठ साल की उम्र में भी पदमजी इन दिनों दिल्ली मे दनदना रहे हैं. वेब जर्नलिज्म से लेकर इलेक्ट्रानिक, प्रिंट, रेडियो सभी मीडिया माध्यमों में सक्रिय हैं. वे अपनी आवाज, विजन, लेखन, विश्लेषण से तेज-तर्रार युवा पत्रकारों को पछाड़े हुए हैं.


AddThis
Comments (0)Add Comment

Write comment

busy