कबीलाई तंबुओं का उखड़ना तय

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गिरीशजी: अरब दुनिया में बहती लोकतांत्रिक हवा : ''शायद यह कबीलाई तौर-तरीकों का असर हो कि गद्दाफी लीबिया के आलीशान महलनुमा आवासों के अलावा टेंट-तंबुओं में भी रहते हैं. इन तंबू-कनातों के अनेक बाहरी घेरों में सतर्क महिला कमांडो होती हैं. 2009 में रोम के पास लाकिला में हुए जी-8, जी-5 शिखर सम्मेलन में पर्यवेक्षक के रूप में आए गद्दाफी अन्य सभी राष्‍ट्राध्यक्षों की तरह भव्य होटलों में नहीं रूके, वो अलग खुले मैदान में लगे तंबुओं में ठहरे थे.''

''तब इस खबर से न केवल सभी चौंके थे, बल्कि यह इटली समेत दुनिया भर के अखबारों की सुर्खी भी बनी थी. तभी पहली बार गद्दाफी राष्‍ट्रपति बराक ओबामा से भी मिले थे, लेकिन अब अरब जगत में बह रही तेज हवा से न केवल उनके, बल्कि बहुतों के पारंपरिक तंबू कनात उखड़ रहे हैं, तो दूसरी ओर नए बेहतर आशियानों के सजने के पक्के आसार हैं...''

1789 की फ्रांसीसी क्रांति और उसके बाद प्रतिक्रांति के दौर में नेपोलियन बोनापार्ट जब 1804 में सम्राट बना तो पोप बग्घी पर सवार होकर रोम से पेरिस पहुंचा. उसकी इच्छा थी कि वो अपने हाथों से नेपोलियन को ताज पहनाए. भव्य समारोह में पोप ताज लेकर नेपोलियन की ओर आगे बढ़ा, लेकिन वैसा नहीं हो सका जैसा कि पोप ने सोचा था. नेपोलियन ने पोप को धक्का देते हुए ताज उसके हाथ से ले लिया और खुद अपने हाथों से उसे पहन लिया. दिलचस्प है कि नेपोलियन ने इस कृत्य को कुछ इस अंदाज में न्यायोचित ठहराया : 'मैंने फ्रांस का ताज जमीन पर पड़ा हुआ पाया और उसे तलवार की मदद से उठाकर धारण कर लिया.' नेपोलियन जिसे 'लिटिल कारपोरल' भी कहते हैं, उसके व्यक्तित्व में अनेक आकर्षण और अच्छाइयों के बावजूद एक मदांध तानाशाह की झलक साफ थी. ऐसा ही मदांध तानाशाह लीबिया का कर्नल मोअम्मर गद्दाफी भी है. उसके उद्गार भी ऐसे ही हैं : 'मैंने क्रांति के बाद ताकत से ये सब हासिल किया है और मुझे सिर्फ ताकत से ही हटाया जा सकता है... लीबिया का निर्माण मैंने अपने हाथों से किया है और मैं इसे बर्बाद भी कर सकता हूं.'  गद्दाफी भी हर तानाशाह की तरह खुद को अपने देश का पर्याय समझता है और 'ग्रीन बुक' में उसका कहना है कि वैसे तो मैं 'वास्तविक लोकतंत्र' में यकीन करता हूं, लेकिन सच यही है कि 'जिसके पास ताकत होती है वही शासन करता है.' तो ये हैं तानाशाह गद्दाफी के कथन, जो किसी भी तरह से दूसरे सर्वसत्तावादियों से अलग नहीं हैं. और ऐसों का हश्र क्या होता है, इससे हम सभी वाकिफ हैं.
आशंका जताई जा रही है कि मिस्र और ट्यूनीशिया से अलग लीबिया में यदि गद्दाफी हटते हैं तो वहां कबीलाई संघर्ष शुरू हो सकता है, क्योंकि लीबिया में अनेक प्रभावशाली कबीले हैं. अल कायदा या दूसरे आतंकी इस्लामी संगठन इसका फायदा उठा सकते हैं और स्थितियां अफगानिस्तान या सोमालिया जैसी हो सकती है.

लेकिन इन आशंकाओं के उलट स्वस्थ और सकारात्मक संकेत भी मौजूद हैं और ये संकेत सारे उत्तर अफ्रीकी और अरब राष्‍ट्रों पर कमोबेश लागू होते हैं. अब यह मान्यता खत्म हो रही है कि मुस्लिम राष्‍ट्रों में लोकतंत्र नहीं आ सकता. या फिर कि इन देशों में धर्मनिरपेक्ष तानाशाही और मजहबी कठमुल्लेपन के बीच ही चुनाव हो सकता है, यानी कि तीसरा कोई और रास्ता नहीं है. लेकिन अब इन सबसे अलग ये अरब देश एक नई राह पर चलते प्रतीत हो रहे हैं. कुछ-कुछ उसी तर्ज पर, जैसा लातिनी अमेरिका में पिछले एक दशक से भी अधिक समय तक चले राजनीतिक प्रयोगों और सामाजिक प्रगतिशील आंदोलनों में देखने को मिला था. अर्जेंटीना से वेनेजुएला और ब्राजील से बोलीविया तक चली नई जागृत लहर ने अवाम को आगोश में ले लिया था. उसमें और आज के अरब जगत के आंदोलन में गजब का साम्य भी दिख रहा है - तब भी लंबे समय तक चले व्यापक विद्रोह का कोई केंद्रीय नेतृत्व नहीं था और आज भी कोई केंद्रीय नेतृत्व नहीं है. आज कोई स्थापित नेता या पारंपरिक संदर्भों में कोई विपक्षी नेता जनांदोलनों का नेतृत्व नहीं कर रहा है. मिस्र में वेल घोनिम और अल बारादेई उभरे जरूर, पर नेतृत्व उनके हाथ नहीं रहा. मुस्लिम ब्रदरहुड की आशंका भी अर्थहीन ही रही. आशय यह है कि ट्यूनीशिया, मिस्र, लीबिया, यमन, जार्डन, बहरीन जैसे सभी देशों में जनता स्थानीय स्तर पर स्वायत्त रूप से नई लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए तैयार हो रही है. जाहिर है उसकी यानी कि जरूरत के हिसाब से उसका लोकतंत्र होगा.

कार्टून

लंदन, रोम के युवाओं की तरह अरब देशों का युवा भी नई सोच से लैस है. वो बेरोजगारी, गरीबी से निजात चाहता है तो तानाशाही-सर्वसत्तावादी सरकारों का भी अंत चाहता है. वो आजाद स्वायत्त व्यवस्था चाहता है और चाहता है कि शासन योग्य, बुद्धिमानों के हाथों में रहे. नए उभरते मध्य वर्ग और खासकर युवाओं की अगुवाई में चल रहे इस आंदोलन का माध्यम बना ट्विटर और फेसबुक. रोजगार, बेहतरी और विकास की आकांक्षा ने इन्हें एकजुट किया है. ये तबका अनुभवों से जानता है कि बेन अली, मुबारक या गद्दाफी का जाना पहला कदम है, कोई मंजिल नहीं. मजे की बात है कि पारंपरिक विपक्ष इनके आंदोलन में भाग तो ले रहा है, पर उसे निर्देशित नहीं कर पा रहा. इसीलिए मिस्र और ट्यूनीशिया में राष्टन्पतियों के भागने के बाद भी जनांदोलन रुके नहीं हैं. जनता संवैधानिक सुधार, आजादी, विकास के लिए सड़क पर है. मिस्र में मुबारक द्वारा नियुक्त प्रधानमंत्री ने भी इस्तीफा दे दिया है. लीबिया में संघर्ष जारी है. जनता लीबिया की उस व्यवस्था को पूरी तरह नकार चुकी है, जिसमें विदेशी भाषाओं को पढ़ने पर रोक थी. विदेशियों से राजनीति पर बात करने पर तीन साल की कैद का प्रावधान था. टोब्रुक में लोगों के एकत्र होने की जगह सिर्फ एक सिनेमाघर था, लेकिन उसे भी बंद करा दिया गया. लोग वहां बिना मनोरंजन और बिना खेल के मैदान के रहते थे. शहर में शाम से ही अंधेरा पसर जाता था. ऐसे में इलेक्‍ट्रानिक मीडिया -  अलजजीरा और इंटरनेट का असर बढ़ा, इस पर सरकारी नियंत्रण नहीं था. लेकिन जब जनांदोलन भड़के तो गद्दाफी ने इंटरनेट भी बंद करा दिया, पर तब तक 'तानाशाह' ने देर कर दी थी.

लेकिन अरब देशों में इस भारी उथल-पुथल के बीच खबर ये भी है कि अमेरिका वहां गणतंत्रों की तुलना में राजशाहियों को बनाए रखने के लिए प्रयासरत है. बेन अली, मुबारक जैसे राष्‍ट्रापति जा चुके हैं और यमन के सालेह का नंबर है. लेकिन सऊदी अरब, बहरीन, कुवैत, कतर, संयुक्त अरब अमीरात, जार्डन इत्यादि में राजशाहियों को बचाने के प्रयास में वहां सुधार के कामों पर जोर है. चूंकि गणतांत्रिक व्यवस्थाओं में भ्रष्ट आचरण और चुनावी धांधली के जरिए राष्‍ट्रपतियों ने दशकों से खुद को कुर्सी पर बनाए रखा है, इसलिए उनके प्रति जनता की नाराजगी भी ज्यादा है, जबकि राजशाहियों से जनता की वैसी उम्मीद इसलिए नहीं है, क्योंकि वे खुद के लोकतांत्रिक होने का दावा भी नहीं करतीं. इससे अब नई लहर में 'संवैधानिक राजतंत्र' की दिशा मजबूत हुई है. वैसे गद्दाफी जैसे शासक भी हैं, जो न तो राष्‍ट्रपति हैं और न ही राजा, जिनकी कहानी थोड़ी अलग है. कुल मिलाकर देखें तो गणतंत्रों की तुलना में राजतंत्रों को मिले बेहतर जनसमर्थन का कारण संयुक्त अरब अमीरात, कतर और कुवैत जैसे देशों की सरकारों का रुख भी रहा है. उदाहरण के लिए संयुक्त अरब अमीरात में शादी होने पर सरकार सारा खर्च वहन करती है और नए घर खरीदने में भी मदद करती है. आशय यह है कि ये सरकारें राजशाही होने के बाद भी गणतांत्रिक सरकारों की तुलना में थोडी कल्याणकारी हैं, इसीलिए वहां जनता की नाराजगी भी थोड़ी कम है. पर नई 'लहर' का असर वहां भी है.

पर इन बानगियों के बाद भी आजाद खयालों वाली बदलाव की चाहत अरब दुनिया में जिस नई व्यवस्था की बात कर रही है - वो निश्चित रूप से पारंपरिक लोकतंत्र की अवधारणा से अलग हटकर है. वो सिर्फ चुनावी आवरण और भ्रष्ट व्यवस्था का लोकतंत्र नहीं है, वो जरूरत के हिसाब से अपनी जम्हूरियत की इबारत खुद लिखने को आतुर है. साफ लगता है कि वे लातिनी अमेरिका में पिछले दशक के सिएटल से ब्यूनस आयर्स और जेनोआ से बोलीविया तक चले जन अभियान के राजनीतिक-सामाजिक अभियानों को नए रूप में अरब दुनिया में कार्यान्वित होते देखना चाहते हैं.

लेखक गिरीश मिश्र वरिष्ठ पत्रकार हैं. इन दिनों वे लोकमत समाचार, नागपुर के संपादक हैं. उनका ये लिखा आज लोकमत में प्रकाशित हो चुका है, वहीं से साभार लेकर इसे यहां प्रकाशित किया गया है. गिरीश से संपर्क This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it के जरिए किया जा सकता है.


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Comments (2)Add Comment
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written by तमाशबीन , March 08, 2011
मदन कुमार तिवारी की बात में दम है। हम खामाखां मध्यपूर्व में हो रहे विप्लव को लोकतांत्रिक बयार मान बैठे हैं। smilies/grin.gif वैसे ये सच है कि ऐसा मानने वाले ''लाल''बुझक्कड़ ज़्यादा है।
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written by मदन कुमार तिवारी , March 06, 2011
शुरुआती दौर में मेरी भी सोच वही थी , जो आपकी है, लेकिन एक के बाद एक वैसे मुल्क जहां तानाशाह तो थे , पर लश्कर , तालिबान , फ़तेह जैसा आतंकवादी संगठन नही राज कर रहा था , सता का परिवर्तन न तो संयोग हो सकता है और न हीं , फ़ेसबुक या अन्य सोशल नेटवर्किंग साईट की देन । कहीं न कहीं कुछ है , जिसका आभास तो हो रहा है पर वह दिख नही रहा । यह कुछ कुछ हमारे देश में प्रतिबंधित संगठनो के छदम नाम से सतह पर कार्यरत संगठनो की तरह है । लगता है , आतंकवादी संगठन चोला बदलकर इस तरह के आंदोलनो को पर्दे के पिछे से संचालित कर रहे हैं, अगर ऐसा है, जिसकी संभावना ज्यादा है , तो निश्चित रुप से पुरे विश्व के लिये यह खतरे का संकेत है ।

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