महिलाओं को गैर बराबरी से नहीं मिल पाई मुक्ति

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सुमनजी: महिला दिवस (8 मार्च) पर विशेष : महिलाओं की स्थिति का अन्दाजा उन्हें पैदा होने से पहले भ्रूण में मार देने, महिला आरक्षण विधेयक के पास होने में बाधाओं, महिलाओं के खिलाफ बढ़ते उत्पीड़न और शोषण की घटनाओं से आसानी से लगाया जा सकता है। महिला सशक्तीकरण के दावों में कितनी सत्यता है, इसे भी इससे परखा जा सकता है। धन और धरती में असमानता तथा भेदभाव न सिर्फ भारत जैसे देशों में वरन दुनिया के विभिन्न देशों में विभिन्न रूपों में देखे जा सकते हैं।

प्रश्न यह है कि महिलाओं के प्रति समाज का नजरिया क्या हो? पारम्परिक रूप से जो नजरिया चला आ रहा है, उससे क्या हम सन्तुष्ट हैं? आखिर इसकी बुनियाद कहां है? महिलाएं अब ऐसे क्षेत्रों में भी पहुंच गयी हैं और वहां अपने को स्थापित करने का काम किया है जो अभी तक पुरुषों के कार्य के लिए ही जाने-पहचाने जाते थे। खेत-खलिहान में काम करने से लेकर विमान की परिचारिका और संचालन ही नहीं सेना में भी उनका आगमन हुआ है। इसी के साथ उनकी चुनौतियां भी बढ़ी हैं। एक चुनौती तो उन क्षेत्रों की है जिन्हें उन्होंने अपनाया है, वहीं दूसरी चुनौती का सामना उन्हे घर-परिवार और समाज से करना पड़ रहा है।

हरियाणा की एक लड़की जो एवरेस्ट की चोटियां चढ़ने में कामयाब हो जाती है, भारत तिब्बत सीमा बल में प्रवेश करती है तो उसके मां-बाप का सहयोग नहीं मिल पाता है। भाइयों को कान्वेण्ट में पढ़ाया जाता है और लड़की को पहाड़ में गांवों में छोड़ दिया जाता है। यह दृष्टिकोण उस पुरानी सोच से कहीं भी अलग नहीं दिखती जब लड़कियों को बासी भात भी नहीं मिल पाता था। यह बासी भात भी लड़के के लिए ही रखा जाता था। लड़कियों के ठुनकने पर कहा जाता था ‘का ये अगले हर मा चलिहैं।’ यह तो महज उदाहरण है। अपने अन्तर में झांक कर देखें कि क्या आज भी हम बेटों की भांति महत्व दे पाते हैं अपनी बेटियों को। खान-पान, पहनने-ओढ़ने से लेकर शिक्षा नौकरी और उत्तराधिकार में क्या हमारी सोच में समानता दिखती है?

खेतों-खलिहानों से होते हुए शिक्षा, चिकित्सा, विज्ञान- तकनीक, उद्योग-धन्धें राजनीति, सेना, सभी क्षेत्रों में महिलाओं ने देश, समाज और काल की चुनौतियों को लांघते हुए अपनी दुनिया बनायी है। दुनिया का कोई भी ऐसा क्षेत्र नहीं है जहां महिलाओं ने सफलता के मानदण्डों को स्थापित करते हुए यह साबित न किया हो कि हम किसी से कम नहीं हैं। फिर वे कौन से कारण हैं कि उन्हें बौद्धिक, सामाजिक और शारीरिक रूप से कमतर मान लिया जाता है। सेना में महिलाओं के प्रवेश पर लम्बी बहसें जारी हैं, मोर्चे पर तैनात सेना के जवानों, सैन्य अधिकारियों तथा समाज के लोगों के तंग नजरिये का शिकार उन्हें होना पड़ रहा है। सेना के एक अधिकारी का यह कहना कि महिलाओं के लिए एअरफोर्स, थलसेना और नौसेना की अपेक्षा कहीं अधिक कारगर है क्योंकि हम जब महिलाओं को मोर्चे पर तैनात करते हैं तो बहुत से ऐसे आपातकालीन अवसर आते हैं जब हम उन्हें नैसर्गिक सुविधाएं देने मे असमर्थ होते हैं। सेना के एक विंग से जुड़ी महिला को कोर्ट में अपने कपडे़ उतार देने पड़ते हों तो उत्पीड़न की उस दशा को सोचा जा सकता है। उत्पीड़न सिर्फ शरीर तक सीमित नहीं होता है। मानसिक उत्पीड़न कहीं ज्यादा तकलीफदेह होता है।

एक ओर महिलाएं सफलता के कदम चूम रही हैं वहीं दूसरी ओर उनकी दुश्वारियां भी कम नहीं हुयी हैं क्योंकि उन्हें उनकी योग्यता, क्षमता के बजाय एक महिला होने के नजरिये से ही आंका जाता है। धर्म के लबादे में लिपटी महिला की मानसिक गुलामी और रूढ़िगत परम्पराओं के बीच वह फंस सी गयी है। महिला की इसी स्थिति का लाभ बाजार ने तेजी से उठाया है। बाजार में महिला को एक उत्पाद बनाकर खड़ा कर दिया है और उसके सामने चकाचौंध की एक दुनिया है, जो उसे मुक्ति के बजाय एक ऐसी अन्धेरी कोठरी में ले जा रही है जहां से उसका निकलना मुश्किल होगा। महिलाओं के प्रति दृष्टिकोण में सबसे बड़ा बाधक तत्व उसकी प्राकृतिक विशेषता है। इसके प्रति पहले से चली आ रही धारणाएं और धार्मिक लबादे तथा कर्मकाण्ड हैं, जिसे उतार कर फेंक पाने में महिलाएं अभी तक पूरी तौर पर सक्षम नहीं हो पायी हैं। वे उसमें ही मुक्ति का मार्ग तलाश करने लगती हैं। वे कभी परम्पराओं के नाम पर, कभी संस्कारों के नाम पर और कभी गुड गर्ल सिण्ड्रोम के तहत उसे अपनाती हैं। बाजार ऐसी स्थितियों के दोहन के लिए नये-नये तरीके ईजाद करता रहता है। बाजार रोज ऐसे उपायों की खोज में रहता है जो हमारी जेब से पैसा निकाल सके और इस पैसे को निकालने में हमारे विचार भी बाधक होते हैं तो वह विचारविहीन ऐसी संस्कृति को पालने-पोसने में यकीन करता है, जिससे वह अपना लक्ष्य साधने में सफल हो सके। हम महिलाओं को इससे भी सावधान होना है कि कोई हमें अस्त्र के रूप में इस्तेमाल न कर सके।

देश में प्रतिभाताई पाटिल के राष्ट्रपति बनने के बाद वैसी ही बहसें आरम्भ हो गयीं जैसी की प्रधानमंत्री पद पर महिला के आसीन होने के बाद शुरू हुयी थीं, क्योंकि हम क्या करेंगे उन लोगों को जो यह मानते हैं कि जिन देशों में शासक और सत्ता संचालन में महिलाएं हो जाती हैं, वह देश बरबाद हो जाता है। उन्हें इस बात की बेहद तकलीफ थी कि हिन्दुस्तान, पाकिस्तान, बंग्लादेश तथा श्रीलंका में महिलाओं ने शासन सत्ता सम्भाली। पाकिस्तान में बेनजीर के प्रधानमंत्री बनने के समय भी यही सवाल ऐसे ही लोगों द्वारा उठाया गया था। ये वही लोग हैं जो दुनिया को आगे के बजाय पीछे घसीटने में लगे हैं। उन्हें भय लगता है कि कहीं जागीर पर चली आ रही बपौती उनकी छिन न जाये।

73वें 74 वें संविधान संशोधन के बाद पंचायतों में एक तिहाई महिलाओं को आरक्षण दिये जाने के बाद के हालात भी कुछ यही स्थिति बयान करते हैं। इन्हीं परिस्थितियों ने पहले से चले आ रहे बाबू की बीबी बबुआइन, अफसर की बीबी अफसराइन, डाक्टर की बीबी डाक्टराइन और मास्टर की बीबी मास्टराइन के बाद प्रधानपति, प्रमुख पति जैसा शब्द ईजाद किया है और वे बडे़ ही गर्व के साथ अपने को इससे जोड़ते हुए सारे कार्य निष्पादित कर रहे हैं, मानो यह उनके लिए शर्मिन्दा होने का विषय नहीं होता है। पूरे परिवार की नाक घर की महिलाओं के जिम्मे ही टिकी रहती है। इज्जत के कारण होने वाली हत्याएं इसकी गवाह हैं। महिलाओं के लिए काम और नौकरी का आंकलन प्रायः उनकी अस्मिता, स्वाभिमान के बजाय उनके आर्थिक कमजोर पहलू को ही समझा जाता है।

खेत-खलिहान में काम करने वाली महिला के घर में पति की कमाई बढ़ते ही उसे घर के अन्दर पहुंचा दिया जाता है जहां उसकी स्थिति आश्रिता की ही हो जाती है। घर और घर में आने वाली कमाई में उसका कोई अधिकार न होना उसे दोयम दर्जे में तब्दील करने में सहायक की भूमिका निभाता है, क्योंकि हम आज भी लड़कियों की परवरिश उसे विवाह हेतु योग्य बनाने में लड़के की मांग के अनुरूप तैयार करने में करते हैं, जबकि लड़के को नौकरी, धन्धे या परिवार और वंश चलाने के उद्देश्य से तैयार करते हैं। इसमें अब बदलाव हो रहा है। यह बदलाव ही वह कारण भी है कि वे रूढ़िवादी शक्तियां इसे स्वीकार नहीं कर पा रही हैं और शोषण, उत्पीड़न के माध्यम से उस पर काबू करने का प्रयास कर रही हैं। आज भी छेड़छाड़ की जानकारी होते ही लड़कियों को घरों के अन्दर धकेल दिया जाता है, जबकि इसमें उनका कोई दोष नहीं होता। कुछ लोग यह तर्क देते घूमते मिल जायेंगे कि क्या करें लड़कियां ही ऐसे कपडे़ पहनती हैं जो स्वयं घटनाओं को दावत देते हैं, लेकिन क्या वे इस बात का जवाब दे सकेंगे कि जब छह माह की बच्ची को भी दुराचार का शिकार बनाया जाता है तो इसके पीछे भी उनका परिधान है? पिछले दिनों  जितनी भी घटनाएं घटी हैं क्या उनमें उन लड़कियों के वस्त्र जिम्मेदार थे? यह तो वही स्थिति होती है जिसमें कुछ लोग यह तर्क देते हैं कि औरतों को अपना पूरा शरीर ढंक कर रखना चाहिए जिससे मर्दों के मन न मचलें। यदि यही सही है तो क्या यही स्थिति मर्दों के बारे में नहीं होनी चाहिए।

जागरूकता और आर्थिक स्वावलम्बन महिलाओं के आगे बढ़ने की कुंजी है लेकिन इसी के साथ निर्णायक पदों पर उनकी पहुंच भी आवश्यक है। जो समाज शिक्षा और राजनीतिक निर्णायकों की स्थिति में नहीं पहुंच पाया वह आज भी पिछड़ा है। इसलिए महिलाओं को अपनी दोहरी जिम्मेदारी ही सही, समाज के विभिन्न क्षेत्रों मे अवश्य जाना चाहिए नहीं तो वे न सिर्फ अपनी पीढ़ी के साथ बल्कि आने वाली पीढ़ी के साथ भी न्याय नहीं कर पायेंगी। हम महसूस करते हैं कि समाज के दूसरे हिस्से जिसे हम पुरुषवादी मानसिकता कहते हैं, जो रूढ़ियों की जकड़न से ऊपर नहीं उठ पा रहा है, उसकी मानसिकता में भी बदलाव हो। समाज का दूसरा हिस्सा जब तक नहीं बदलेगा हम एक भेदभाव रहित समाज को बना पाने में सक्षम नहीं हो सकेंगे।

लेखिका सुमन गुप्‍ता पिछले दो दशक से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं तथा जनमोर्चा से जुड़ी हुई हैं.


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