बड़ी मनहूस रात है

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बड़ी मनहूस रात है. आज दारू नहीं पी. कोई उन्माद-उम्मीद नहीं बची. आलोक भइया का चेहरा घूम रहा है आंखों के आगे. खुद को कमजोर महसूस कर रहा हूं. हम फक्कड़ों के अघोषित संरक्षक थे. अब कौन देगा साहस और जुनून को जीने की जिद. अपने गांव में घर के छत पर अकेला लेटा मैं चंद्रमा के इर्द-गिर्द सितारों में आलोक सर को तलाश रहा हूं. लग रहा है आज चंद्रमा नहीं, आलोक जी उग आए हैं. धरती से आसमान तक की यात्रा खत्म कर हम लोगों को मंद-मंद मुस्कराते दिखा रहे हों.... कि...

देख बेटा, सब डरते हैं इससे पर ये सफर भी कितना आसान है. अब डेटलाइन इंडिया और भड़ास की दुकान यहीं पर सजाई जाएगी, फिर यमराज और विलासी-बेखबर देवताओं की खबर ली जाएगी, तू भी आ जा. मजा आएगा, हम मिल बैठेंगे कई यार....

पनीली हो चुकी आंखों से मैं सोच रहा हूं आलोक जी के बारे में. दिल्ली में न होने की मजबूरी पे खुद को कोस रहा हूं. उन्हें कैंसर नहीं हुआ था. वे दरअसल एक नई लड़ाई लड़ कर हम सबको दिखा रहे थे कि इन बलाओं-विपदाओं की ऐसी की तैसी, कोई क्यों इनके हो जाने से परेशान रहता है, रोता रहता है, ये तो छुई-मुई हैं, देखो, मुझे सब है फिर भी मैं मस्त हूं और अपना काम कर रहा हूं. और, यह सब करते कहते आलोक भइया निकल गए एक और चुनौती से दो-चार होने, देह त्यागने के प्रयोग को करने और फिर उसके बाद वाली दुनिया-जीवन को जीने-जानने.

पर इस देहधारी दुनिया में तो आलोक भइया अब न मिलेंगे, कष्ट इस बात का है. सुप्रिया भाभी के साथ वो न दिखेंगे और न बतियाते नजर आएंगे. बिटिया उन्हें प्यार से हाथ हिलाकर हेलो-हॉय न कर पाएगी. हम लोगों को डांट-फटकार, प्यार-पुचकार और जिद्दी धुन न सुनाई देगी. क्या कहूं, क्या लिखूं. लिखते उनके बारे में हैं जिन्हें कम जान पाए, कम मिल पाए. जो सांसों और रगों में समाया-सा हो, उसके बारे में कैसे बयान किया जा सकता है.

वो कोई मनुष्य नहीं थे. वो आलोक थे, साधक थे, कठोर साधक. जो ठान लेते, वो कर देते. वो दिखा देते, वो सुना देते, वो लिख देते, वो बयान कर देते. वो महसूस करते थे समष्टि का दर्द, वो जान लेते थे अनकहे राज. वो बता देते थे दुनिया की कांप्लेक्स सुर लय ताल को, हर किसी को, बेहद सरल शब्दों में सा रे गा मा पा की तरह. वो आग थे, जिसमें हर दुष्ट को झुलसा-जला देने का माद्दा था. वो प्रेमी थे, हर वंचित, उपेक्षित, अभागे, किनारे किए गयों, हाशिये वालों, टेढ़े-मेढ़ों को अपनाने वाले.

एक मित्र का अभी एसएमएस आया है- ''ये होली जीवन में से एक ऐसा रंग ले उड़ी है जिसकी भरपाई मुश्किल है, हर आने वाली होली के दिन इस रंग से भारतीय पत्रकारिता महरूम रहेगी.'' एक वरिष्ठ संपादक का एसएमएस आया- ''दिन-रात की इस मनहूसियत से दो-चार हूं. आज सुबह से कुछ भी नहीं किया. अभी थोड़ी देर पहले मुंह-हाथ धोया हूं. बहुत याद आ रही है आलोक की.'' एक वरिष्ठ पत्रकार का संदेश आया- ''आज मैंने दो प्रिय खो दिए, आलोक और मेरी बड़ी दीदी का बेटा, रोड एक्सीडेंट में. ये मनहूस होली.'' लखनऊ से एक संपादक का संदेश मिला- ''आलोक कभी मरते नहीं, वो तो आलोक है और रहेगा.'' एक बिना सेव किए अनाम नंबर से एसएमएस आया- ''यशवंत जी, आज से ठीक 20 दिन पहले आलोक जी के पास गया था, मुरैना जिले की गजक लेकर. उनकी एक शिकायत थी आपको लेकर. कल मिलूंगा तो बताऊंगा.''

जाने क्या क्या उनको कहना था, जाने क्या क्या उनकी योजनाएं थीं, जाने क्या क्या किससे कराना था, किसी को बताया, किसी को कहने के लिए सोचा था, पर अब क्या. आखिरी दम तक उनके पास सपने, योजनाएं, शिकायतें, प्यार, फटकार... सब था. मैं तो ऐसी अवस्था में वीतरागी बन जाता. न किसी से शिकायत न किसी से उम्मीद. कोई भी हो जाता. जिसे एहसास होता कि उसके दिन गिने चुने रह गए हैं. पर वे अदभुत आलोक थे. ऐसी जिजीविषा की मिसाल सुनता था. देखा और महसूस किया सिर्फ आलोक भइया से.

मयंक रो रहा था, लखनऊ से. बता रहा था आलोक सर की डांट फटकार के बारे में. लड़ाई झगड़े के बारे में. जो उन्होंने मयंक से की थी. इसलिए कि वे मयंक से बहुत उम्मीदें रखते थे और उससे बहुत कुछ कराना चाहते थे. मयंक कहता- कैसी बात कर रहे हैं, आप कहां जाने वाले हैं कि मैं आपके न रहने पर ये करूंगा, वो करूंगा. आलोक जी ने गुस्से में फोन काट दिया. वो गुस्सा नहीं, वो बेहद अपनों से जताया जाने वाला उनका प्यार था. ऐसे ही करते थे वो. मां और भाभी थीं घर में. वो भी थे. बोले- यशवंत, मां के साथ मेरी फोटो खीचो. मेरे साथ बरेली से आए कुशल भी थे. मैंने अपने मोबाइल से कई तस्वीरें लीं. कुशल ने अपने कैमर से तस्वीरें लीं. अब मुझे लगता है कि आलोक जी को सब पता था.

उन्हें अपनी भावी यात्रा के बारे में खबर थी. वे बेखबर नहीं, बाखबर थे. पर जमाने से जताते थे कि वे नहीं जाने वाले, वे तो यहीं रहेंगे और कैंसर को पीटते रहेंगे. भाभी पर कभी गरम होते. चुप रहो, मां को बोलने दो. भाभी कप में मिक्सचर बनाकर खाना ले आईं तो कप की शिकायत की थी कि इस कप ने जीना हराम कर दिया है, दवा और खाना, दोनों इसी में. खाना भी दवा लगता है. अगले कुछ घंटे में भाभी नए बड़े कप में खाना लेकर आईं. आलोक सर मुस्कराए. बोले- बदल गया कप. थोड़ा खाए और थोड़ा बहा दिया.

मां अपने लाडले, अपने शेर का बखान करतीं. आलोक सर मंद मंद मुस्कराते. बोलीं- आखिर किसका प्रोडक्ट है ये आलोक. ये तो मेरा ही बेटा है ना, तभी तो ये आलोक आज आलोक तोमर है, इतिहास पुरुष है. आलोक सर के चेहरे पर संतोष का भाव दिखता. इशार करके कुछ और तकिये सिर के नीचे लगवाये. तेज-तेज सांस चलने लगी तो बगल में रखी कृत्रिम सांस वाली मशीन को आन करने को कहा. खुद उसका प्लास्टिक अपने नाक और मुंह पर ढाप लिया. कुछ देर की इस क्रिया के बाद वे फिर बैठे. ठीक हो जाएंगे तो भिक्षाटन वाली योजना पर काम करना है, मैंने कहा. आलोक जी चहंके. बस, तीन महीने बेटा. साथ-साथ भिक्षाटन किया जाएगा- भिक्षाम देहि माते को गाते-गाते.

कीमियो और रेडियो थिरेपी के ही दौर में एक दिन वो भड़ास के आफिस आए. बोल-बोल कर लिखवाया, आभार लिखवाया, उन सभी के लिए जिन जिन ने उनके खराब स्वास्थ्य को लेकर चिंता और संवेदना जताई थी. अपने प्रशंसकों और पाठकों की अपार पूंजी के प्रति बेहद कृतज्ञता का भाव. भड़ास के कंटेंट एडिटर अनिल ने लिखना शुरू किया. मैंने अपने मोबाइल से फिल्म बनाने और फोटो खींचने का काम शुरू किया. आलोक जी ने चेताया- बेटा, अभी न छाप देना, मोटा हो गया हूं, और काला हो गया हूं, बाल झड़ गये हैं, लोगों को अच्छा नहीं लगेगा मुझे इस हाल में देखकर. उफ्फ.... आलोक जी को चिंता थी अपने पाठकों-प्रशंसकों की, कि उनका मन न छोटा हो जाए, यह सब देख जान कर. पर उन्होंने मुझे फिल्म बनाने दिया, फोटो खींचने दिया.... इस अघोषित शर्त के साथ कि हम न रहें तो जो चाहे करना इसका.

पड़ी हुई है वो वीडियो और तस्वीरें मेरे पास. दिल्ली लौटूंगा तो निकालूंगा और लोड करूंगा. पर मैं नहीं चाहता कि आलोक सर जाएं. वो यहीं कहीं हैं, प्रकट हो जाएंगे, मेरे सिर पर चपत लगाते हुए कि तून डाल ही दिया फोटो व वीडियो न, मना किया था, कि मेरे रहने तक ये सब न डालना.... और, मैं चमत्कृत-सा कहूंगा कि भइया गलती हो गई, अभी हटा लेता हूं. तब वो कहते कि चल, डाल ही दिया है तो रहने दे, देख जरा कमेंट में किसने क्या लिख मारा है....

ये भड़ास. आलोक भइया की जिंदगी का अनिवार्य हिस्सा बन गया था. अस्पताल में रहें या घर में या चैनल में. भड़ास आन रहेगा. रिफ्रेश करते रहेंगे. किसी लेख-खबर में कुछ गड़बड़ दिखा, गलत दिखा, अधूरापन दिखा तो फोन कर बताएंगे, यशवंत इसे ठीक कर, इसमें ये ये नहीं, बल्कि ये है. कई बार मैं उनका कहा मानता और कुछ बार नहीं मानता... कहता कि ये दुकान मेरी है, मैं जैसे चाहूं वैसे चलाऊं. तब वो कहते- अब तेरे को फोन न करूंगा. अगले रोज मैं फोन कर उन्हें गाना सुनाता और मनुहार करता. वो हंस पड़ते.

ओह.... किसके बल पर लड़ूंगा अब. किसके दिलासे से बेढंगी यात्राएं करूंगा. किसके होने और सिर पर हाथ होने की उम्मीद में उन जैसा दुस्साहस कर गुजरने की ठान पाऊंगा. मैं सच में बहुत कमजोर हो गया हूं. भाषण देने वालों की भारी भीड़ में आलोक एक उम्दा ग़ज़ल की तरह थे, जो कहते- ठीक किया, बहुत अच्छा, कोई बात नहीं, देख लेंगे यार, टेंशन मत लेना, लगे रहो, शाबास.....

भइया, प्लीज, फोन करो, कुछ कहो, कुछ लिखो, कुछ बताओ, कुछ सुनाओ..... कैसे कटेंगे ये दिन-रात.

आपको प्रणाम आलोक भइया. प्रणाम, प्रणाम, प्रणाम....

यशवंत

गाजीपुर जिले के अलीपुर बनगांवा गांव से


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Comments (4)Add Comment
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written by ish madhu talwar, March 21, 2011
yashwant ji, hamein bhi bahut vedna ho rahi hai...kis se kahein ? ek achchha dost aur kamaal ki kalam rangon mein aise kho kar kitne hi logon ko mahroom kar jaayegi, socha nahin tha..aapne hi ek raat bataaya tha ki cancer nahin hai...man ko kuchh tasalli hui thi, lekin kambakht maut aakhir doosre raaste se aa kar dhokha de gayi...!
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written by rtnaker singh, March 21, 2011
Alok Tomer ak aisa naam, jo har hal me patrakaron ko shakti deta tha. hamse Alok ji ki mahaj ak mulakat thi, jb hamne Aj hindi dainik ke Gorakhpur Edition ke R.E. ki post se malikon ki punjivadi neeti ke khilaph isteefa diya tha, tb Alok ji ne kaha tha,patrakarita ab samjhuta adhik ho gai hai.unhone sujhav diya ki agli baar Delhi aayen, to milen, kuch behter kiya jayega.Durbhagya raha ki hm unse dubara nhi mil sake. achanak unki maut ki khabar se aisa lagajevan me koi kami ho gai, jo ab puri nhi ho sakegi. ab to uke Alok se hi Alokit hona hoga.Ishwer unki atma ko shanti den, aur unke pariwar aur mitron ko dukh ki is darun bela me Shakti pradan kare.
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written by Neeraj Bhushan, March 21, 2011
हमसब का कर्तव्य बनता है 'आलोक' को जिन्दा रखना, हर 'आलोक' को जिन्दा रखना.
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written by अरविन्द त्रिपाठी , March 21, 2011
प्रिय यशवंत,
आज प्रभास जी के जाने के बाद दूसरी बार जी खोलकर रोया हूँ. यद्यपि ये दोनों मेरे सगे-संबंधी न थे , पर अपने थे.शब्द इनकी कमी को पूरा नहीं कर सकता. कल पूरा दिन्दीन मन बहुत विछिप्त था. कारण जान नहीं पड़ता था , पर कोई पूर्वाभास सा था. रंग और गुलाल में मन नहीं लग रहा था. घर पे आने-जाने वालों की संख्या बहुत थी.पर भीड़ में अकेलापन था. कारण आलोक भैया की बिमारी का और गंभीर होते जाना था.शायद बिलकुल अंतिम अवस्था, जहां सब कुछ पीछे छूट सा जाता है.
उनकी कमी कौन पूरी करेगा ?

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