वे चले गए, अधूरी रह गई मेरी ख्‍वाहिश

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आदरणीय आलोक तोमर नहीं रहे. सुनकर भरोसा नहीं होता. सच कहें तो ऐसी जिजीविषा और जीवट वाला व्यक्ति जीवन में कभी देखा ही नहीं था, इसलिए मन यह मानने को कतई तैयार ही नहीं हुआ कि मौत ऐसे शख्स को भी इस तरह हम सब से छीन सकती है. सालों पहले जनसत्ता में उनकी एक झलक देखने के सिवाय आलोक जी से मेरा कभी सीधे साक्षात्कार नहीं हुआ. चौदह जनवरी की रात अचानक आलोक जी फेसबुक पर संपर्क में आ गये. लगा मन की मुराद पूरी हो गयी. पहले ही सन्देश के साथ ऐसा लगा जैसे एक दूसरे को दशकों से जानते हों.

जनसत्ता के ज़माने से उनकी लेखनी का तो मुरीद था ही, उनका भी उस दिन के बाद से मुरीद बन गया. पहली ही मुलाकात में उनका अधिकार पूर्वक आदेश था कि मैं डेटलाइन के लिए कुछ लिखूं. मैं दुविधा में था कि क्या करें क्या नहीं? संस्थान को नोटिस में डाले बिना लिखना चाहिए या नहीं, यही सोचता रहा. आदेश की अवहेलना मुश्किल थी, लिहाजा नींद नहीं आई और उठकर लिखने बैठ गया. रिपोर्ट भेजी तब जाकर सो पाया. सुबह सन्देश मिला-मिल गयी बालक!

वह कैंसर जैसी बीमारी से लड़ रहे थे. फिर भी मौत को हराने का उनका जज्बा ऐसा था कि अनिष्ट के बारे में सोच तक नहीं पाया. सोचता भी कैसे? उन्होंने मय परिवार मेवाड़ की यात्रा का मेरा आमंत्रण स्वीकार जो कर लिया था. उसी रात बातों-बातों में मेवाड़ के इतिहास और हल्दीघाटी की बातें चल पड़ी. लगा चम्बल के इस शेर की रगों में मेवाड़ की आन-बान-शान कूट-कूट कर भरी है, न समझौतावादी और न ही झुकने वाले. इसीलिए सोचा मुलाकात के वक्त हल्दी घाटी की मिट्टी ही गिफ्ट क्यों न की जाये. सो एक रिश्तेदार बीते दिनों उदयपुर से जयपुर के लिए रवाना हुए तो मैंने उन्हें हल्दी घाटी की मिट्टी साथ लाने का आग्रह कर दिया. वो लेकर आये भी लेकिन जल्बाजी में उस मिट्टी को गलती से वापस साथ ले गये. याद आया तब तक वह वापिस राजसमन्द पहुँच गये.

तय हुआ कि कुरियर से मंगवा ली जाये. लेकिन, हर बार किसी न किसी बहाने से दिल्ली जाना टलता चल गया. जयपुर के पत्रकार मित्र अमित शर्मा और चंडीगढ़ के साथी मुकेश राजपूत दोनों से बात हुई, जाना तय हो गया लेकिन उसी दिन राजस्थान के दारा सिंह एनकाऊंटर मामले में चार पुलिस वालों की गिरफ्तारी की बड़ी खबर ने कार्यक्रम को बदलने पर मजबूर कर दिया. फिर प्लान बना और जाने की तैयारी की ही थी कि थोड़ी ही देर में सवाई माधोपुर भागना पड़ा. घटना बड़ी थी. एक थानेदार को जिन्दा जला दिया गया. आलोकजी के बत्रा अस्पताल में भर्ती होने की खबर अमित जी को बार-बार डरा रही थी, लेकिन आलोकजी के जीवट के आगे मुझे कैंसर की ऐसी बिसात नजर ही नहीं आई कि मैं अनहोनी के बारे मैं सोच भी पाता.

तय हुआ कि ऑफिसियल काम से 25 मार्च से 28 मार्च तक नोएडा जाना ही है, तब मुलाकात भी हो जायेगी और लम्बी बातें भी. लेकिन आज जब पता चला तो हल्दीघाटी की उस मिट्टी को अपने साथ लिए घूम रहे वह रिश्तेदार भी दुखी हो गये और मेरी पत्नी सुनीता भी. जो आलोक जी को तो नहीं जानती, लेकिन यह जरूर जानती है कि मैं उनसे मिलने के लिए कितनी बार प्रोग्राम बनाकर भी किसी न किसी कारण नहीं जा सका. और हर बार कार्यक्रम बदला तो चुप्पी साधकर बैठ गया. और आज तो अफ़सोस इतना है कि अपने आप पर कोफ़्त हो रही है. हालाँकि मैं ऐसे जीवट वाले व्यक्ति की मौत की बात अब भी स्वीकार नहीं करना चाहता. क्योंकि जानता हूँ कि वह सशरीर हमारे  बीच भले नहीं रहे हों. उनकी बेबाकी और सच को हर हाल में बयान करने कि जिद, हमेशा उन्हें हमारे बीच बनाये रखेगी. वैसे आलोक तोमर सरीखे शख्‍स के लिए किसी ने लिखा भी है-"मौत उसकी है जमाना जिसका करे अफ़सोस, यूँ तो दुनिया में आये हैं सभी मरने   के लिये."


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