''यही क्रांति है, इसे कभी खत्‍म नहीं होना चाहिए''

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सेलफोन पर बजती मृदंग की धुन इस बार कुछ देर तक बजी,"भाभी प्रणाम मैं आवेश कैसे हैं सर"? भैया... जैसे मैंने उनकी आँखों में रूके आंसुओं के सैलाब के आगे खड़ी दीवार को तोड़ दिया, मैं उन बदकिस्मतों में था जिन्हें आलोक सर के कैंसर होने का सबसे पहले पता चला. वो मेरे लिए मेरे गुरु ही नहीं पिता सरीखे मेरे बड़े भाई थे. वो भाई जो मुझे जितना डांट लगाता था उससे कहीं ज्यादा प्रेम करता था.

सुप्रिया भाभी के लिए ये जानकारी असह्य थी, लेकिन वो आलोक सर के आत्मबल को जानती थीं और उनके मित्रों को भी पहचानती थी, इसलिए उम्मीद को उन्होंने जिन्दा रखा था कि शायद एक बार फिल आलोक अपवाद साबित हों, मगर मौत आ गयी. हिंदी पत्रकारिता का सबसे रंगबाज पत्रकार रंगों के बीच हमें छोड़ कर चला गया. लेकिन आलोक तोमर हिंदी पत्रकारिता के इस घोर कलयुग में वो एक अपवाद के रूप में हमेशा जिन्दा रहेंगे. ये बात दीगर है कि हम जैसों के लिए आसमान अधूरा ही रहेगा. जब तक वो थे हर एक पल एहसास था कि हम जहाँ भी हैं, जैसे भी हैं, जो कुछ लिख-पढ़ रहे हैं आलोक सर देख रहे होंगे. मन में एक भय हमेशा रहता था, जो अक्सर कलम को रास्ता भटकने से रोकता था. कुछ ही दिन तो हुए, विस्फोट में छपी मेरी एक रिपोर्ट के बाद उनका मेल आया. सिर्फ दो शब्द थे- "ये हमें क्यूँ नहीं भेजा गया." मैं निरुत्‍तर था. इन शब्दों में अपनेपन के साथ एक अधिकारबोध था. मैं समझ रहा था कि इस अधिकारबोध को खारिज करने की नाकाम कोशिशें कर रहा हूँ.

आलोक तोमर की सबसे बड़ी खासियत उनका संवेदनशील होना था. मेरे साथ-साथ जो भी लोग उन्हें नक्सलवाद और राज्य विरोधी हिंसा के खिलाफ कड़वाहट भरी भाषा के इस्तेमालको लेकर आलोचना करते थे, वो ये नहीं जानते थे कि उनके दिल में देश के दलितों आदिवासी, गिरिजनों के लिए भरा प्रेम शायद हम सबसे ज्यादा है. सैकड़ों बार ऐसा हुआ जब उन्होंने उत्तर प्रदेश में चल रहे पूंजीवादी शोषण के खिलाफ मुझे लिखने को कहा. देश भर के मजदूर आन्दोलनों को भी उन्होंने बेहद करीब से जाना और समझा, मगर आलोक के शब्दकोष में राज्य विरोधी हिंसा की कोई जगह नहीं थी. वो व्यवस्था विरोधी क्रांति में विश्वास रखते थे. एक बार की बात है, यूपी में एक बदनाम सांसद की पिटाई की खबर जब मैंने उन्हें भेजी, तब उन्होंने पलट कर जवाब दिया "आवेश, यही क्रांति है, जनांदोलनों और जन्क्रान्तियों से ही हमारा कल निर्धारित होगा, इसे कभी ख़त्म नहीं होना चाहिए.

अभी छह महीने पहले की बात है. आलोक सर के बेहद करीबी अम्बरीश कुमार से कुछ एक बातों को लेकर मेरा मन खट्टा रहा. यकीन मानिए मैंने भी अपनी बुद्धि के हिसाब से ये निर्णय ले लिया कि वो अम्बरीश भाई का पक्ष ले रहे हैं, शायद उन्हें जैसे मेरे मन की  बातों का एहसास था. एक रोज जब मैंने उन्हें फोन किया उन्होंने तुरंत कहा, "कभी आलोचनों से घबराते नहीं हैं, आलोचनाएँ आत्म मीमांसा का अवसर देती हैं, लेकिन ये याद रखो कभी किसी की जबरिया आलोचना नहीं करते." उनका कहना था कि अगले ही पल सब कुछ बदल गया. मुझे एहसास था मैं कुछ एक जगहों पर सीमाओं का उल्लंघन कर रहा था. मेरे मन की सारी खटास दूर हो चुकी थी.

आलोक सर के जाने के बाद जो सबसे बड़ा संकट है वो वेब मीडिया के लिए हैं. आज वेब पर जो खबरिया पोर्टलों के एक बड़ी सीरिज नजर आती है, वो आलोक तोमर की वजह से ही परिपक्व हो सकी. डेटलाइन इंडिया अन्य संचार माध्यमों से बिल्‍कुल अलग सूचनाओं को ख़बरों में तब्दील करने की एक बड़ी प्रयोगशाला बन गया. आलोक सर वो थे जिन्हें माध्यमों की जरुरत नहीं थी. माध्यमों को उनकी जरुरत थी. वो उनमें से थे कि उनसे अगर आप सब कुछ छीन लेंगे तो वो दीवारों पर नहीं तो हथेलियों पर ही खबर लिख कर छाप देंगे. हिंदी वेब मीडिया ने उन्हें स्वेच्छिक तौर पर अपना लीडर मान लिया था, अगर वो रहते तो निस्संदेह हम सबके लिए कल आसान होता. स्मृतियाँ अब भी साँसें ले रही है और हमेशा लेती रहेंगी, मगर सच कहूँ तो इंतजार रहेगा कि फिर मेरे फोन की घंटी बजे और मैं सुन सकूँ "कैसे हो आवेश?"

लेखक आवेश पत्रकार हैं.


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