पहचाना, ये आलोक तोमर जी हैं

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आलोक सर कितने निर्भिक और हिम्‍मती इंसान थे इसका अंदाजा उनकी लेखनी से ही लग जाता था, पर वे कितने सरल, सहज और जीवट थे यह उनसे मिलकर ही जाना जा सकता था. मैं शायद उन खुशनसीब लोगों में से हूं, जिनको आलोक सर के दर्शन करने तथा बात करने का सौभाग्‍य प्राप्‍त हुआ. पहली मुलाकात में ही उनका आत्‍मबल देखकर मेरे भीतर भी ऊर्जा का संचार हो गया था.

खबरों को लेकर आलोक सर से मोबाइल से बातें तो अपनी कई बार हुई थी. उनके कुछ आदेश होते थे, कुछ निर्देश होते थे. मैं भी उनके जैसे बेबाक पत्रकार के बारे में सुनते-जानते ही बड़ा हुआ हूं. तो उनसे बात करके अपने को गौरवान्वित महसूस करता था. हालांकि कभी सोचा नहीं था कि उनके जैसे बड़े और नामचीन पत्रकार से कभी अपनी बात हो पाएगी. मैं उनके दर्शन भी करना चाहता था पर फोन पर बात होने के बावजूद मैं उनसे यह निवेदन नहीं कर पाता था. यह शायद मेरे संकोची स्‍वभाव के चलते था.

एक बार मुझे उनसे मिलने का मौका हाथ लगा. कुछ कागजात उनके पास पहुंचाने थे. मैंने उन्‍हें फोन किया तो भाभी जी ने फोन उठाया, उनसे कागजात के बारे में बात किया तो उन्‍होंने कहा कि अभी तो हम दवा के लिए बाहर निकले हुए हैं. कल सुबह आ जाना. घर पर ही मिल जाएंगे. कहां परेशान होओगे अभी. पर यह मौका मेरे हाथ से निकल गया. यशवंत भइया ने कहा कि तुम जाने दो कल मैं इसे भिजवा दूंगा. मेरी उनसे मिलने की इच्‍छा फिर अधूरी रह गई.

पर शायद मेरी किस्‍मत में उनसे मिलना और उनका दर्शन करना लिखा था. इस घटना के तीसरे या चौथे दिन 24 दिसम्‍बर को वो यशवंत भइया के साथ चलकर खुद ऑफिस आ गए. उन्‍होंने ही ऑफिस का दरवाजा खटखटाया. मैंने जब दरवाजा खोला तो सहसा उन्‍हें पहचान ही नहीं पाया. क्‍योंकि भड़ास पर पड़े फोटो और उनके वर्तमान शारीरिक ढांचा में परिवर्तन आ गया था. रेडियाथेरेपी और कीमियोथेरेपी की वजह से उनके शरीर में सूजन आ गई थी. चेहरा भी सूजा हुआ था.

मैं उन्‍हें पहचानने की कोशिश कर ही रहा था कि यशवंत भइया ने कहा कि आलोक तोमर जी हैं. मैं तुरंत झुककर उनका चरण स्‍पर्श किया. उन्‍होंने मुझे पहचानते हुए कहा अनिल. मैंने कहा, 'जी हां.' इसके बाद उन्‍होंने कहा कुमार संजॉय सिंह तुम्‍हारी बहुत तारीफ कर रहे थे. मैं भीतर से खुश तो हुआ पर इसे प्रदर्शित नहीं कर पाया कि आलोक सर जैसा बड़ा व्‍यक्तित्‍व इतनी छोटी बात भी याद रखता है. जबकि फोन पर बातों के अलावा मेरी इससे पहले कभी मुलाकात भी नहीं हुई थी.

हालांकि कैंसर और इलाज के चलते वे अत्‍यंत कमजोर हो गए थे. ऑफिस की सीढि़यों पर चढ़ने के चलते उनकी सांसें भी फूल रही थीं, लिहाजा वो कुर्सी पर बैठ गए. जब वे कुछ बोलने लगे तो यशवंत भइया ने कहा कि थोड़ी देर रेस्‍ट कर लीजिए. इसपर उन्‍होंने कहा कि यशवंत अभी इतना कमजोर नहीं हुआ हूं. मेरा नहीं कैंसर का इलाज हो रहा है कि वो मेरी काया से बचे. देखता हूं कब तक यह अपने आपको मुझसे बचाता है. इलाज के चलते उनकी आवाज भारी लग रही थी.

उन्‍होंने भड़ास के कार्यालय आने के बाद अपने शुभचिंतकों और दोस्‍तों को धन्‍यवाद देने के लिए कुछ लिखने का मन बनाया. कहा कि घर जाकर जरूर लिखूंगा, फिर अचानक कहा कि बोल देता हूं अनिल कंपोज कर देगा. इसके बाद उन्‍होंने एक लेख लिखवाया- दोस्‍ती के असली मतलब. बिना रुके, बिना अटके एक सुर में सब बोलते चले गए. अपने सभी चाहने वालों का आभार जताना नहीं भूले. सभी को धन्‍यवाद दिया.

इस जानलेवा महंगी बीमारी में खुद परेशान होने के बावजूद उन्‍होंने लिखा,''कैंसर के इलाज में मुनाफाखोरी का जो नीच तत्‍व हैं वह असहनीय है और अविश्‍वसनीय है. हमारे और आपके जैसे लोग ढाई लाख रुपये का एक इंजेक्शन कहां से लगवाएंगे और उसके बाद घर जाकर चूल्‍हा कैसे जलाएंगे.'' खुद बीमार होने के बावजूद वे उन आमलोगों के लिए परेशान दिखे, कैंसर जैसी असाध्‍य बीमारी से जूझते हुए अपना सब कुछ बेच देते हैं. उनकी इस बात में अपने से ज्‍यादा आम लोगों के लिए दर्द छिपा हुआ था.

मेरे लिए यह उनकी पहली और आखिरी और आखिरी मुलाकात ही साबित हुई, पर जितना सहज रूप इतने बड़े पत्रकार का दिखा वो दिल की गहराई तक उतर गया. मन में श्रद्धा अपने आप आ गई. मैं तो और ज्‍यादा समय उनके साथ बिताने की कोशिश करता पर उन्‍हें जाना था, वो चले गए. मुझे उनकी कार तक छोड़ने का मौका मिला, पर ये मौका पहला और आखिरी सा‍बित हुआ. क्‍योंकि दूसरा मौका तो उनके चिरनिद्रा में लीन होने के बाद ही मिला. हालांकि ऐसी दूसरी मुलाकात शायद मैं ही नहीं उनके कलम के लाखों कद्रदान भी नहीं चाहते होंगे.

आज जब एक छोटा सा पद मिलने पर तमाम बड़े पत्रकार बौने हो जाते हैं, ऐसे बौने पत्रकारों के दौर में आलोक सर हमेशा याद आएंगे. एक दबंग पत्रकार, एक निर्भिक पत्रकार, एक लड़ाकू पत्रकार, एक अनोखा पत्रकार, एक अदभुत पत्रकार, सहज पत्रकार, एक सरल पत्रकार के रूप में वे हम जैसे लोगों के दिलों में हमेशा बसे रहेंगे. हमारी तरफ से आलोक सर को अश्रुपूरित श्रद्धांजलि.

अनिल सिंह

कंटेंट एडिटर

भड़ास4मीडिया


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