मेरे लिए 09811222998 ही आलोक तोमर थे

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एक लड़ाके की मौत पर आंसू टाइप कुछ शब्द बहाने से कहीं बेहतर उन्हें श्रद्धांजलि इस तरह दी जाए कि उनके व्यक्तित्व के वे कुछ खास बातें सामने लाई जाएं, जो उन्हें आलोक तोमर बनाती थीं। क्या कोई आदमी महज एक नंबर हो सकता है...मेरे लिए आलोक तोमर महज एक नंबर ही थे।उनका मोबाइल नंबर 098112-22998। मगर ये नंबर मेरे लिए किसी लॉटरी के नंबर से कम आकर्षक नहीं था।

दरअसल, उस लड़ाका पत्रकार और मेरे बीच यही एक जरिया था, जिसके जरिये उनसे पांच-छह दफे बात हो पाई। उन्हें भड़ास पर फोटो के सिवा कभी देख भी नहीं पाया। मगर बावजूद इसके मैं उन्हें थोडा-बहुत जानने के तमाम दावे कर सकता हूं। ...और इसकी वजह भी वे ही हैं। पहली बार की बातचीत में ही वे खासा जुड़ाव बना लेते थे। उनका मध्यप्रदेश से होना भी उनके प्रति गहरे जुड़ाव की एक वजह मानी जा सकती है।

ये 2009 के सितंबर को कोई दिन था ...मैं अपने भोपाल स्थित दफ्तर में थोड़ा परेशान था। खुद से तमाम बातें करने के बावजूद जब लगा कि यार संतुष्टि और हल दोनों नहीं मिल रहे, तो ध्यान आया कि आलोक भाई साहब से बात करता हूं। ये सोचकर ऑफिस से उतरा और नीचे लॉन में चला आया। मन में थोड़ी धुकधुकी थी कि ‘पहली बार बात कर रहा हूं, मनमौजी आदमी हैं, उखड़ गये तो और लेने के देने पड़ जाएंगे।’ अपनी परेशानी अपनी जगह है, मगर उन्होंने अगर उठाकर बोल दिया ‘कि तुम्हारी परेशानी तुम निपटो, मैं उसमें क्या करूं तो...?’ फिर भी इस ‘...तो’ के सवाल को दरकिनार कर मैंने उन्हें भड़ास से लिए गए उनके नंबर पर फोन लगा ही दिया। ट्रिन-ट्रिन टाइप की रिंग के साथ मन में धुकधुकी की आवाज भी ‘ट्रिन-ट्रिन’ टाइप की ही थी।

हालांकि फोन लगाने से पहले मैंने ‘कैसे बोलना है, क्या बोलना है, शुरुआत कैसे करना है जैसे बिंदुओं पर लगभग रिहर्सल जैसा कुछ कर डाला था।’ फिर भी उनके सितारा, मनमौजी और अक्खड़ स्वभाव के किस्से सुन-पढ़कर धुकधुकी बरकरार थी। रिंग बज रही थी और मन में दोनों तरह के भाव थे। यदि वे फोन उठाते हैं तो क्या कहना है और नहीं उठाते हैं तो फिर से डायल करना है या नहीं।...और उन्होंने मोबाइल नहीं उठाया। न जाने क्यूं उनके मोबाइन न उठाने से मुझे थोड़ी राहत-सी महसूस हुई, धुकधुकी का मीटर डाउन होने लगा। मैंने मोबाइल जेब में रखा और जानबूझकर यह सोचने लगा कि अभी वो कहीं बिजी होंगे इसलिए फिर से फोन लगाना ठीक नहीं।

वैसे भी बडे़ लोगों के मिजाज के बारे में सुन रखा था कि ‘घड़ी-घड़ी घंटी करो तो बिदक जाते हैं।’ मगर यह क्या, मेरा मोबाइल वाइब्रेट करने लगा। जेब से निकालकर देखा तो स्क्रीन पर ‘आलोकजी, नईदिल्ली’ लिखा हुआ था। दरअसल, उन्होंने कॉलबैक किया था। बडे़ आदमी... फिर भी कॉलबैक। यहीं से उनके प्रति जो सुना था, वो सच होने लगा था। सोचा तपाक से उठा लूं मगर चार-पांच घंटी बजने तक खुद को दो वजहों से रोका। एक तो फिर से फेफड़ों में हवा भर लेना चाहता था, दूसरे अपन भी उनके इत्ते हल्के-पतले नहीं लगना चाहते थे कि ‘लो झट से फोन उठा लिया।’ मैं उनके लिए अनजान था इसलिए फोन उठाते ही पहले पूरा परिचय दिया और फिर अपनी परेशानी, अपना असमंजस...सब कुछ कह डाला।

हल सुझाने की बजाय उन्होंने ऐसा सवाल पूछा कि दुःख, तकलीफ टाइप का जो मूड था वो पलभर में हंसी में बदल गया। बोले ‘शादी हो गई तुम्हारी।’ मैंने कहा ‘नहीं भाई साहब...अब तक तो नहीं हुई। मगर आपकी कृपा से सालभर में हो जाएगी।’ पता नहीं उस दिन वे मस्ती के मूड में थे या फिर हमेशा ही ऐसे रहते थे, मगर मेरी ही बात से सवाल निकालकर हंसते हुए बोले ‘क्यों भई, मेरी कृपा का क्या मतलब, मेरी कृपा से कैसे हो जाएगी और अगर मेरी कृपा हो गई तो उलटे शादी होती होगी तो टूट जाएगी।’

पहले ही फोन में वे ऐसे बात कर रहे थे जैसे वे मुझे अच्छे-से जानते हों। उनके इस पानी जैसे दोस्ताना रवैये ने उनके प्रति ‘बडे़ आदमी’ होने के शीशे को तोड़ दिया था। अब मेरी धुकधुकी राहत में बदल चुकी थी और मैं भी उनसे सहज होकर बात कर पा रहा था। 20 मिनट की हमारी बातचीत में मेरी परेशानी कहीं पीछे छूट गई थी और वो आदमी इन 20 मिनटों में ही मेरी सोच के फलक को और बड़ा कर चुका था। यहां उनके व्यक्तित्व की ये खासियत पता चली कि ‘वे वास्तव में बडे़ आदमी इसलिए हैं क्योंकि औसत से कहीं ज्यादा बड़ा सोचते हैं।’

बहरहाल, उनसे बातचीत के दौरान लगा नहीं कि फोन के दूसरे छोर पर प्रभाष जोशी जैसे बरगद के नीचे भी पनपने की कुव्वत रखने वाले, मुंबई में जनसत्ता की लांचिंग के दौरान सर्कुलेशन की जंग में भाई लोगों के शार्प शूटर का इस्तेमाल करने जैसे मौलिक आइडिया सोचने वाले, महज 18-19 साल की उम्र में अपनी पहली ही खबर से मध्यप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमत्री अर्जुनसिंह को एक पिछडे़ गांव का दौरा करने के लिए मजबूर करने वाले और महानायक अमिताभ बच्चन की पत्नी जया बच्चन से मोहब्बत का इजहार कर सकने की प्लानिंग करने वाले आलोक तोमर ही हैं।

फोन के अंतिम दो-तीन मिनट मेरी परेशानी पर केंद्रित रहे। चूंकि मेरी परेशानी निजी होते हुए भी अखिल भारतीय यानी मीडिया के अंदरूनी दबावों और उठापटक से जुड़ी हुई थी इसलिए उनके पास इस समस्या के दसियों हल थे। मैं नौकरी छोड़ने पर उतारू था और वे मुझे बने रहने की बात कह रहे थे। वे बोले ‘पानी बनो बेटा...पानी। जहां जैसी जगह मिले वैसा आकार ले लो। इस दौर में तभी सर्वाइव कर पाओगे।’ उनकी इस सलाह पर मैं बिदक गया। बोला ये तो आप बिल्कुल उलटा कह रहे हैं, आपने तो कभी ऐसा नहीं किया होगा।

इसका जवाब देते हुए वे बोले ‘तभी तो आज किसी संस्थान की मोटी कुर्सी पर नहीं बैठा हूं’। उनकी बातों में शहादत के भाव में लिपटी हुई निराशा झलकी थी। मगर तभी वे फिर अपने रंग में आते हुए बोले ‘...और यही वजह है कि किसी का पल्लू पकड़कर भी नहीं बैठा हूं। लिख रहे हैं तो अपनी मर्जी का...पेड-वेड के चक्कर में किसी के सामने खोले नहीं बैठे हैं।’

यहां शायद उनका ये जवाब उनकी ढलती अवस्था, जिंदगी के कड़वे-कसैले अनुभवों और मतलबी दुनिया से माथा कूट-कूटकर लहूलुहान होने का परिचायक था। मगर वे समझाते हुए बोले ‘यूं इस्तीफा देकर घर बैठोगे तो होना-जाना क्या है...जिम्मेदार कुर्सी पर बैठे रहोगे तो अपने स्तर पर कुछ अच्छा तो कर सकोगे। संत टाइप मत बनो, दुनिया खा जाएगी। थोड़ा-सा शातिर तो मंदिर में पूजा करते टाइम भी होना चाहिए, वरना कोई जूते ही उठाकर ले जाएगा। याद रखना, व्यवस्था की सड़ांध व्यवस्था में रहकर ही दूर की जा सकती है, वहां से भागकर नहीं।’

हालांकि मैं उनकी बात से संतुष्ट होकर इस्तीफा देने का मन त्याग चुका था फिर भी वे मेरे मध्यप्रदेश का होने के चलते अतिरिक्त स्नेह से बोले ‘अब भी कोई टेंशन हो तो बोलो, हृदयेश (हमारे अखबार के तत्कालीन संपादक) मेरा दोस्त है, तुम्हारे बारे में उससे बात करूं?’ मैंने बड़ी विनम्रता से शुक्रिया कहते हुए उन्हें कहा कि ‘आपकी बातों में ही मुझे हल मिल गया है, अब हृदयेशजी से बात करने की कोई जरूरत नहीं है। वैसे भी वे जो हल देंगे वो संस्थागत होगा जबकि परेशानी मेरे अंर्तद्वंद्व की थी, और अंर्तद्वंद्व कभी संस्थागत नहीं बल्कि बेहद निजी हुआ करता है।’

खैर, अब मेरे पास अपनी परेशानी का ‘आलोक तोमर मार्का’ हल था। यहां उनके व्यक्तिव का यह पहलू सामने आया कि ‘परिस्थितियों से भागो मत, वहीं बने रहो, हल खोजो और साम, दाम, दंड भेद लगाकर वो करो जो वास्तव में सही है। भागोगे तो कहां जाओगे...सब जगह शूर्पणखा के भाई बैठे हैं।’

मेरे सूत्र, मेरे सिद्धांतों की चासनी में तबसे आलोक तोमर का भी थोड़ा टेस्ट मिला हुआ है...और वे अब जबकि इस दुनिया में नहीं हैं, तब भी मेरे लिए एक मोबाइल नंबर या फिर भड़ास पर देखे गए फोटो की शक्ल में जिंदा हैं। मैं आगे भी जब किसी अंर्तद्वंद्व या निजी परेशानी में घिरूंगा तो उस नंबर ‘098112-22998’ नामक आदमी को धुकधुकी और अपनेपन के साथ फोन लगाता रहूंगा। मैं जानता हूं कि पहली बार की तरह अब भी हर बार उस ओर से फोन नहीं उठाया जाएगा। मगर, मेरा विश्वास है कि थोड़ी ही देर बाद मेरा मोबाइल फिर से वाइब्रेट करेगा...मैं अपनी जेब से मोबाइल निकालूंगा और स्क्रीन पर ‘आलोकजी, नईदिल्ली’ ही लिखा मिलेगा।

ईश्वर शर्मा

न्यूज एडिटर

राज एक्सप्रेस, भोपाल


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Comments (3)Add Comment
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written by BIJAY SINGH, March 22, 2011
hamara dost iss duniya se chal gaya,biswas hi nahi hota,kahan khoje ab nay alokkkk?????????????????
Iswar UNKI atma ko shanti de.
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written by पंकज झा., March 22, 2011
काश...........कभी मैं भी उन्हें फोन कर लिया होता.......!
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written by मदन कुमार तिवारी, March 22, 2011
ईश्वर भाई , बहुत हीं अच्छा लगा आपका लेख । पढकर आलोक तोमर जी के और नजदीक आ गया। मेरा दुर्भाग्य उनसे मिल न सका .

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