राख में बदल गया बारूद

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लोधी रोड के शमशान घाट में आलोक तोमर को अंतिम विदाई के लिए पहुंचा तो जाम के चलते कुछ देर हो गई थी. उनकी चिता से लपटे निकल रही थी. वहीं खड़ा रह गया. करीब बीस साल का गुजरा वक्त याद आ गया. जनसत्ता में प्रभाष जोशी के बाद अगर कोई दूसरा नाम सबसे ज्यादा चर्चित रहा तो वह आलोक तोमर का था. जनसत्ता ने उन्हें बनाया तो जनसत्ता को भी आलोक तोमर ने शीर्ष पर पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.

वे जनसत्ता रूपी तोप के बारूद थे. वह भी आज वाला जनसत्ता नहीं दो दशक पहले का, जिसकी धमक और चमक के आगे अंग्रेजी मीडिया बौना पड़ गया था. शाम को देव श्रीमाली बोले- अब न तो वैसी हेडिंग आती है न भाषा में आक्रामकता है कुछ अपवाद छोड़कर. लगता है. मेरा जवाब था -यह समय का फेर है, प्रभाष जोशी के समय की तुलना नहीं की जा सकती है. उन्होंने आलोक तोमर को तलाशा और तराशा भी. प्रभाष जोशी के बाद अब आलोक तोमर भी चले गए. बीस दिन पहले ही बात हुई तो उनकी तकलीफ को देखते हुए आगे बात करने से मना किया और कहा, सुप्रिया जी को सब बता दूंगा जो आपको समझा देंगी, आपको बात करने के लिए काफी जोर डालना पड़ रहा है. वे कालाहांडी की मौजूदा हालत के बारे में मेरी जानकारी पर सवाल खड़ा कर बहस कर रहे थे. अंतत मैंने हथियार डाल दिए और उन्होंने चार-पांच दिन में लिखने का वादा किया. फिर आलोक से बात नहीं हो पाई जो कहना होता था सुप्रिया से कहा जाता और उन्हीं के जरिए जवाब मिल जाता.

राख में बदलते आलोक तोमर को हाथ जोड़ पीछे लौटा तो सुप्रिया देखते ही फफक कर बोली- अब हम कभी रामगढ़ नहीं जा पाएंगे. हमारा घर नहीं बन पाएगा. देखिए आलोक चले गए. सुनता रहा बोलने को कुछ था ही नहीं. श्‍मशान घाट से घर पहुंचे तो सुप्रिया का हाल और बुरा था. आलोक की फोटो को देख बार-बार उन्हें आवाज दे रही थीं. कुछ देर बैठा फिर बाहर निकल आया. छतीसगढ़ के वरिष्ठ अफसर आलोक अवस्थी, हरीश पाठक, देव श्रीमाली, आलोक कुमार, मयंक सक्सेना और राहुल देव आदि थे. करीब दो घंटे बाद कृष्ण मोहन सिंह के साथ दोबारा पहुंचा तो पद्मा सचदेव, प्रणव मुखर्जी की पुत्री शर्मिष्ठा और टीवी के कुछ पत्रकार मौजूद थे. दो अप्रैल के कार्यक्रम पर बात हो रही थी. आलोक तोमर के वेबसाइट डेटलाइन इंडिया को जल्द अपडेट करने पर पर भी चर्चा हुई.

आलोक तोमर का मोबाइल फोन पहले से ही बंद कर दिया गया है और सुप्रिया का फोन फिलहाल अनिल गुप्ता के पास है और वही बात भी करेंगे, क्योंकि सुप्रिया सभी से बात कर सकें यह संभव भी नहीं है. कुछ कानूनी और तकनीकी पहलुओं पर बात होते-होते अचानक सुप्रिया का ध्यान आलोक तोमर की फोटो पर जाता और वे फिर उन्हें पुकारने लगतीं. पद्मा सचदेव ने सुप्रिया को गले से लगाकर कहा -आलोक कही नहीं गया है वह हम सबके साथ है. फिर उन्होंने आलोक तोमर के कई संस्मरण सुनाए और कहा -शादी के दौरान मैंने मजाक में कहा था मुझे बंगाली बहू नहीं चाहिए तो आलोक का जवाब था अब आपकी बहू तो यही बनेगी.

सुप्रिया बोली- ज्योतिष के जानकारों को आलोक झूठा साबित कर चले गए. आखिरी तक उनकी कलम चलती रही. 17 मार्च को उन्होंने जो लेख लिखा उसी के बाद बत्रा गए और फिर हमेशा के लिए चले गए. चितरंजन खेतान पिछले महीने जब विदेश जाने से पहले मिलने आए तो एक कविता लिखी, जो अंतिम कविता बन गई. इस कविता की फोटो कापी अनिल गुप्ता ने कराकर सभी को दी. रात आठ बजे जब चलने को उठा तो सुप्रिया की आँखें फिर भर आई और बोली- दो अप्रैल को आ रहे हैं ना, मैंने इशारे से कहा हाँ. कुछ बोला नहीं गया. सामने बैठे आलोक तोमर के पिताजी को नमस्कार किया और फिर कमरे से बाहर आ गया. कृष्ण मोहन सिंह और विजय शुक्ल साथ थे. कुछ समझ में नही आ रहा था. समय ही हर घाव को भरता है और यहाँ भी यही होगा यह सोचकर दिलासा दे रहा हूँ.

लेखक अंबरीश कुमार जनसत्‍ता के वरिष्‍ठ पत्रकार हैं. इन्‍होंने काफी समय आलोक तोमर के साथ जनसत्‍ता में बिताए हैं. उनका यह लेख जनादेश से साभार लिया गया है.


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