मीडिया 2009 : रीयल हीरो हैं जरनैल

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जरनैल सिंह

आज साल का आखिरी दिन है। आज भड़ास4मीडिया घोषित कर रहा है वर्ष 2009 का 'मीडिया हीरो'। यह न कोई पुरस्कार है और न कोई सरकारी सम्मान। यह एक प्रयास है ऐसे शख्स को सामूहिक तौर पर बधाई देने का जिन्होंने बनी बनाई लीक तोड़कर मीडिया के जरिए कुछ नया किया हो और उनके किए का समाज, राजनीति और मीडिया पर गहरा असर पड़ा हो। तो इस कैटगरी में मैं 2009 में सिर्फ और सिर्फ जरनैल सिंह को पाता हूं। उनके जूते ने बड़ा काम किया। जरनैल ने निजी तौर पर कभी नहीं कहा कि उनका जूता फेंकना उचित था। पर उनके भावावेश में आकर चलाए गए जूते ने हत्यारों को टिकट दिए जाने से, निर्वाचित होकर संसद में पहुंचने से रोक लिया। इससे भी बड़ी बात की करोड़ों लोगों के जख्म और भावनाओं के और जख्मी होने से इस जूते ने बचा लिया, करोड़ों लोगों की न्याय से हो रहे मोहभंग को रोका। जूते के बाद जरनैल के पास कई तरह के प्रस्ताव आए। कई तरह के संगठन और लोग आए।

लेकिन उनके आचरण और उनकी बातों से कहीं से भी किसी लालच, बड़बोलेपन, अगंभीरता, उन्माद, धार्मिक नेतागिरी का भाव नहीं दिखा। उन्होंने हमेशा लाजिकल बातें कीं। वे संयत रहे, चुपचाप अपने घर में पड़े रहे, अपने मन की बात को कलम के जरिए कागज पर उतारा और किताब की शक्ल में दुनिया के सामने ले आए। वाकई, भारत में इस साल मीडिया के असली हीरो जरनैल सिंह ही हैं। उन्होंने वह काम कर दिखाया जो बड़े से बड़ा संपादक और पत्रकार भी नहीं कर सकता। उन्होंने अपने करियर और अपने परिवार की परवाह नहीं की। उन्होंने वही किया, जिया, लिखा जो उन्हें देश और लोकतंत्र के हित में समझ में आया। उन्होंने जूते फेकने की घटना, उसके बाद हुए एक-एक घटनाक्रम, अपनी सोच को विस्तार से अपनी किताब 'कब कटेगी चौरासी' में लिखा है। इस किताब के उसी अंश को साभार हम यहां इस उम्मीद से प्रकाशित कर रहे हैं कि जो लोग उन्हें अब भी गलत मानते हैं, वे अपनी धारणा बदलेंगे। इस देश में अगर भगत सिंह को संसद में सिर्फ इसलिए बम फोड़ने को मजबूर होना पड़ा था क्योंकि संसद के बहरे कानों को सुनाई पड़े तो जरनैल सिंह को भी इसलिए जूता फेकना पड़ा था ताकि बेशर्म राजनेताओं और नाकारा हो रहे सिस्टम को रास्ते पर लाया जा सके। लीजिए, जरनैल की अपनी कहानी, उन्हीं की जुबानी पढ़िए और उन्हें नए साल की शुभकामनाएं उनकी मेल आईडी पर भेजिए, जो नीचे दिया गया है।

-यशवंत सिंह, भड़ास4मीडिया


विरोध की वह तारीख

यह 12 अगस्त, 2005 का दिन था और राज्यसभा की प्रेस गैलरी में आज काफी गहमागहमी थी। मैं भी समय से पहले ही वहां पहुंच चुका था ताकि आगे वाली पंक्ति में बैठ जाऊं और कहीं कुछ मिस न हो जाए। आमतौर पर रिपोर्टर हमेशा इस आशंका से घिरा ही रहता है। लेकिन जब मामला ज्यादा बड़ा हो तो फिर चूक की कोई गुंजाइश नहीं होती। मानो तलवार सिर पर लटकी रहती है। 1984 के सिख कत्लेआम को लेकर नानावटी रिपोर्ट सदन में पेश हो चुकी थी। अब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को यह बताना था कि वे रिपोर्ट की सिफारिशों के आधार पर क्या कदम उठाने जा रहे हैं। तत्कालीन गृहमंत्री शिवराज पाटिल ने कार्रवाई रिपोर्ट का एक पुलिंदा सामने रखा था लेकिन खानापूर्ति के सिवा और कुछ नहीं था। प्रधानमंत्री सदन में आए तो कुछ भावुक मगर सहज नजर आ रहे थे। दरअसल पिछली रात ही प्रवासी मामलों के राज्यमंत्री जगदीश टाइटलर को मंत्रीमंडल से हटने के लिए राजी कर लिया गया था। नानावटी रिपोर्ट ने सज्जन कुमार और टाइटलटर के खिलाफ पुख्ता सुबूतों की बात करते हुए इनकी भूमिका पर उंगली उठाई थी। यही नहीं, आयोग ने इनके खिलाफ आपराधिक मामले फिर से शुरू करने की जोरदार सिफारिश की थी। ऐसे में अगर टाइटलर मंत्रीमंडल में बने रहते तो सरकार के लिए बेहद शर्मनाक स्थिति होती। इससे पहले कि विपक्ष इस्तीफे की मांग करता, सरकार ने खुद ही उनसे दूरी बनाने का फैसला कर लिया।

प्रधानमंत्री ने जब अपनी बात कहनी शुरू की तो पूरा सदन और प्रेस गैलरी में बैठे पत्रकार एक-एक लफ्ज ध्यान से सुन रहे थे। उन्होंने गुरुवाणी की कुछ पंक्तियों का सहारा लिया और सिख कौम की जीवटता, संघर्ष और देश के लिए की गई उसकी सेवाओं की तारीफ का पुलिंदा बांधना शुरू कर दिया। उन्होंने बताया कि सिख किस तरह से जुल्म के खिलाफ लड़ते हुए, आगे बढ़े हैं। आजादी में किस तरह अग्रणी भूमिका निभाई और विभाजन के दंश को सहने के बाद भी आगे बढ़ते रहे। देश के लिए सिखों की भूमिका को सही परिप्रेक्ष्य में रख रहे प्रधानमंत्री के ये लफ्ज सुकून दे रहे थे। इसके बाद वे नानावटी आयोग की रिपोर्ट पर आए और कहा कि इसमें जो भी सिफारिशें की गई हैं उनके आधार पर पूरी कार्रवाई की जाएगी। सी.बी.आई. इन मामलों की जांच करेगी और दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा। दंगापीडितों के लिए मुआवजे की रकम बढ़ा दी गई है और तय समय में इसका भुगतान कर दिया जाएगा।

उन्होंने नानावटी आयोग द्वारा तत्कालीन शीर्ष नेतृत्व को क्लीन चिट देने की बात कही जो कि हजम नहीं हुई। लेकिन इसके बाद उन्होंने जो कहा वह इतिहास बन गया। प्रधानमंत्री कह रहे थे, "1984 में जो सिखों के साथ हुआ, वह देश के माथे पर कलंक है और मेरा सिर उसके लिए शर्म से झुकता है।" उन्होंने सरकार वह देश की तरफ से सिखों से माफी मांगी। कभी देश के ही पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने कत्लेआम को जायज ठहराते हुए कहा था, "जब बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती हिलती ही है।" लेकिन आज देश का ही एक अन्य प्रधानमंत्री उसे कलंक बताकर शर्म से सिर झुका रहा था। प्रधानमंत्री ने कहा, "हम इतिहास तो दोबारा नहीं लिख सकते लेकिन भविष्य को अच्छा बना सकते हैं।" इस बयान के बाद विपक्ष कुछ बोलने की स्थिति में नहीं था। सभी प्रेस रिपोर्टर यही कह रहे थे कि आज मनमोहन सिंह ने जिस तरह का भाषण दिया, वह अद्वितीय था। भाषण तो अद्वितीय था ही, 21 साल से तड़पते सिख दिलों पर कुछ मरहम भी लग गया था। सिर्फ लफ्ज ही तो थे। संसद में बोले गए इन लफ्जों ने कुछ राहत पहुंचाई थी। देश की संसद में प्रधानमंत्री ने दुख जताया था। वे अब इस काले अध्याय को पीछे छोड़ सिखों को आगे बढ़ने के लिए कह रहे थे। साथ ही यह भरोसा दिला रहे थे कि सी.बी.आई. दंगों के दोषियों के खिलाफ पूरी ईमानदारी से काम करेगी।

यह खबर मुझे बनानी थी और उस दिन की लीड थी। खबर लिखने साथ ही मुझे लगा कि मेरे सिर से भी बहुत बड़ा भार उतर गया है। दिल के किसी कोने में सुखद अहसास हो रहा था। भले ही प्रधानमंत्री सिख थे पर संसद में एक प्रधानमंत्री ने सिख दंगों पर कम से कम अफसोस तो जताया। कहां वह स्थिति थी कि जब पूर्व सुनियोजित सिख कत्लेआम के पश्चात संसद बैठी तो पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की मृत्यु पर शोक प्रस्ताव तो आया, पर देश में मारे गए 5000 निर्दोष सिखों के बारे में एक लफ्ज तक नहीं बोला गया था। सत्ता पक्ष तो मौन रहा ही, उस वक्त विपक्ष ने भी अपनी जुबान सिल ली थी।

सन 1984 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को 545 में से 404 सीटें मिल गई थीं। भाजपा को दो ही सीटें मिली थीं। विपक्षी दल का नेता माकपा से चुना गया, क्योंकि उसे 22 सीटें ही मिली थीं। धर्मनिरपेक्षता का चैंपियन होने का दम भरने वाली माकपा को शायद मारे गए सिखों की चीखों से कोई मतलब नहीं था। वैसे भी वामपंथियों का 'मुस्लिम प्रेम' तो जगजाहिर है, पर जब सिखों के साथ अन्याय की बात आती है, इनके मुंह सिल जाते हैं। वामपंथियों के मजदूरों, पिछड़ों और गरीबों को लेकर संवेदनात्मक रवैये के प्रति मेरे मन में सम्मान है, लेकिन सिखों के प्रति उनका रवैया मुझे आज तक समझ में नहीं आया। अगर धर्म से उन्हें एलर्जी है तो फिर सभी धर्मों के प्रति समान रुख क्यों नहीं रखते? जो भी हो, देश की इस सबसे बड़ी पंचायत ने इस मुद्दे को कभी चर्चा के लायक तक नहीं समझा था। प्रधानमंत्री के इस बयान ने इतिहास रच दिया था और सिखों के दुखी दिलों पर कुछ हद तक मरहम लग गया था। सरकार ने मुआवजे के मामले में बेहद तत्परता दिखाई, लेकिन दोषियों को सजा दिलाने के मामले में सी.बी.आई. जांच आगे बढ़ाने को तैयार नजर नहीं आ रही थी। उसने पहले तो इन मामलों को शुरू करने में ही आनाकानी की, फिर बाद में उसमें बेमन से लग गई।

आपरेशन ब्लू स्टार के बाद कांग्रेस छोड़ने वाले कैप्टन अमरिंदर सिंह को मुख्यमंत्री के तौर पर पेश करने का दांव खेलने के बाद कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने चंडीगढ़ में कहा कि पिछले दौर में जो कुछ हुआ उसका उन्हें अफसोस है। सोनिया गांधी लंबे समय बाद दिसंबर 1999 में अमृतसर दरबार साहिब में माथा टेकने गईं तो उससे पहले उन्होंने एक बयान जारी कर कहा कि "इवेंट्स लाइक द 1984 हेपनिंग शुड नेवर हेपन अगेन, वी आर एंटरिंग ए न्यू मिलेनियम। लेट अस डू सो इन ए स्प्रिट आफ फॉरगिवनेस।" संकेत साफ था कि वे सिखों और पंजाब के साथ अपने रिश्तों को सुधारना चाहती हैं। वैसे इस बयान के पीछे पंजाब में 1999 लोकसभा चुनाव में कांग्रेस का 13 में से 8 सीटें जीत जाना भी था। कांग्रेस को लग रहा था कि अगर वह अफसोस जताए तो पंजाब विधानसभा चुनावों में जीत हासिल हो सकती है। सोनिया गांधी की बेदाग छवि और ईमानदारी का प्रभाव सिखों पर पड़ने लगा था। इसके अलावा प्रधानमंत्री के तौर पर डॉ. मनमोहन सिंह में विश्वास जताना एक अहम कदम था। कांग्रेस और सोनिया गांधी के इन कदमों का सिखों पर सकारात्मक असर पड़ रहा था। अब सितंबर, 2008 में राहुल गांधी ने पंजाब का दौरा किया। राहुल गांधी का यह दौरा पंजाब के युवाओं के साथ खुद को जोड़ने के लिए था, लेकिन इस दौरान उन्होंने कुछ ज्यादा स्पष्ट ढंग से अतीत की कड़वाहटों को दूर करने की कोशिश की। उन्होंने अमृतसर में प्रेस कॉन्फ्रेंस में एक सवाल के जवाब में कहा, "द 1984 रायट्स वर रॉन्ग एंड आई स्ट्रॉन्गली कंडेम द करनेज।" इससे लगा कि वे गंभीर हैं। हालांकि पंजाब से लौटते ही अगले दिन दिल्ली के चुनावों के संबंध में कत्लेआम के दोषी सज्जन कुमार व टाइटलर के साथ उनकी तस्वीर जब प्रमुखता से सभी अखबारों में छपी तो यह सिखों को बेहद नागवार गुजरा। एक दिन पहले राहुल गांधी के बयान का स्वागत करने वाली सिख फोरम ने अगले ही दिन इस पर बेहद निराशा जताई। पोल खुल गई कि यह बयानबाजी केवल वोटों को लेकर हो रही थी। असल में दोषियों को सजा देने की कोई मंशा ही नही है। बयानों से सिखों का दर्द दूर करने की कोशिश तो हो रही थी, लेकिन 1984 के सिख कत्लेआम के दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी साफ तौर पर नजर आई। ज्यादा जोर मुआवजा देकर सिखों को इस कत्लेआम को भूल जाने के लिए कहने पर ही था। सरकार सिखों के दिलों में लगे 1984 के गहरे घाव को हल्का करके ले रही थी।

जगदीश टाइटलर के मामले में भी जब कोर्ट ने फटकार लगाई, तब कहीं सी.बी.आई. ने अमेरिका जाकर गवाह जसबीर सिंह का बयान लिया। जबकि पहले वह यही बताती रही कि गवाह को ढूंढ ही नहीं पाई है। सी.बी.आई. का यह रवैया बेहद दुखदायी था। जिस मामले में सज्जन कुमार को अदालत ने बरी किया उसे चुनौती देने में ही पांच साल लगा दिए। नानावटी आयोग की सिफारिश के बावजूद सरकार ने कत्लेआम के गुनाहगार पुलिस अफसरों के खिलाफ कार्रवाई करने से इसलिए इंकार कर दिया, क्योंकि वे या तो रिटायर हो चुके थे या फिर इतने समय बाद उनके खिलाफ कार्रवाई करना संभव नहीं रहा। असल में यहां भी राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी थी। अगर सरकार चाहती तो रास्ता निकाल सकती थी। या फिर कम से कम उन पुलिस अफसरों के खिलाफ ऐसी शब्दावली का तो इस्तेमाल करती ही, जिससे कि मौजूदा पुलिस तंत्र कोई सबक लेता। ऐसा कुछ नहीं हुआ। इसी बीच जनवरी 2009 में हाईकोर्ट ने हरचरण सिंह जोश से संबंधित 1984 के संबंध में एक मामले में कहा कि 1984 के घाव अब भर चुके हैं, इसलिए मामले को घसीटते रहने का कोई मतलब नहीं है। यह टिप्पणी दिल को भेद गई। यह जाहिर कर रही थी कि सिस्टम मान चुका है कि 1984 के घाव भर गए हैं। न्याय हुआ नहीं, दोषियों को सजा मिली नहीं और मारे गए निर्दोष सिखों की विधवाएं और बच्चे पल-पल उस अन्याय को लेकर आंसू बहा रहे हैं और यहां कहा जा रहा है कि घाव भर गए। दोषियों के खिलाफ 11 साल बाद पहली एफ.आई.आर. दर्ज हुई। गवाहों को डरा-धमकाकर या लालच देकर बयान बदलने पर मजबूर कर न्याय का मजाक बना दिया गया और कहा जा रहा है कि घाव भर गए। कत्लेआम के पीड़ित कोई भीख तो नहीं मांग रहे? न्याय की मांग करना या आशा करना गुनाह हो गया है क्या?

ये सब बातें मेरे मानसिक द्वंद का कारण बन चुकी थीं। इसी बीच 18 फरवरी को एक और खबर आई, जिसने बुरी तरह विचलित कर दिया। पंजाब के मोहाली में एक और गवाह गुरचरण सिंह ने दम तोड़ दिया था। वह 1984 के कत्लेआम में घायल होने के बाद से बिस्तर पर था और सज्जन कुमार के खिलाफ मुख्य गवाह था। कत्लेआम में लगे घावों से उसका शरीर पैरालाइज्ड हो गया था और वह तबसे बिस्तर पर ही था। सज्जन कुमार के खिलाफ गवाही देने वाली अनेक कौर पहले ही दुनिया से जा चुकी थीं। अब गवाह भी दुनिया से कूच करने लगे थे, पर न्याय का पहिया घूमने को राजी नहीं था। संसद में दोषियों को सजा देने के जो वादे किए गए थे, वे हवा हो रहे थे । यह बात दिल को चोट पहुंचा रही थी। सिखों की भावनाओं और अन्याय को हल्के ढंग से लिया जा रहा था।

कड़वे अतीत को दफन कर नए संबंधों का आगाज करने का आह्रान करने वाली कांग्रेस पार्टी ने अब सिख कत्लेआम का चेहरा बन चुके सज्जन कुमार और जगदीश टाइटलर को लोकसभा चुनाव के लिए पार्टी टिकट थमा दिए। इन दोषियों को टिकट मिलना सिखों को हमेशा 'बेइज्जत' करने जैसा महसूस होता रहा है। शायद राजनीति में जब जीत-हार के समीकरण समझाए जाते हैं तो बड़ों-बड़ों के बड़े-बड़े आदर्श घुटने टेक देते हैं। दिल को यह बात फिर नागवार गुजरी। मन सोचने लगा कि जब सोनिया गांधी गुजरात दंगों के लिए नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार को 'मौत के सौदागर' बताने से गुरेज नहीं करती हैं तो फिर 1984 के सिख कत्लेआम के लिए जो चेहरे सिख भूल नहीं सकते उन्हें टिकट कैसे दे दिया? लेकिन यहां तो सज्जन कुमार और टाइटलर को हर उस आयोग और समिति ने आरोपी बताया जिसका गठन कांग्रेस सरकारों के वक्त हुआ। लेकिन हद तब हो गई, जब चुनाव से ऐन पहले सी.बी.आई. ने टाइटलर के खिलाफ मामले को ही बंद करने की सिफारिश करनी शुरू कर दी।

मुझे याद है कि जब सी.बी.आई. के सूत्रों के हवाले से यह खबर हमारे ब्यूरो रिपोर्टर ने की तो ब्यूरो में ही मेरे कई संगी साथियों ने इसकी जमकर भर्त्सना की। वे इसे सरकार की बेशर्मी की हद करार दे रहे थे। कहा जा रहा था कि इतना 'हाई प्रोफाइल' मामला सी.बी.आई. कभी इस तरह से बंद नहीं करती है। चुनाव के ऐन पहले अगर यह किया जा रहा है तो मतलब साफ है कि निर्देश उपर से आ रहे हैं। सी.बी.आई. यह कहते हुए मामले को बंद करना चाह रही थी कि उसे गवाहों पर भरोसा नहीं है। मेरा दिमाग भी यह बात समझ नहीं पा रहा था कि आखिर सी.बी.आई. अदालत कब से हो गई? उसका काम जांच करना है न कि यह बताना कि गवाह भरोसे योग्य है या नहीं? अगर यह गवाह भरोसे योग्य नहीं हैं तो और गवाह ढूंढ़े?

क्या उसे नहीं मालूम कि ताकतवर राजनीतिक लोगों के खिलाफ गवाही देना ही एक बड़ा जोखिम है। सैकड़ों लोग इन्हें देखने के बावजूद गवाही देने की हिम्मत नहीं जुटा सके। जिसने हिम्मत की भी, उसे ऐसे ही खारिज किया जा रहा है। चुनावों से ऐन पहले यह क्लीन चिट कैसे दी जा रही है? खासकर तब, जब चुनाव आयोग चुनावों की घोषणा कर चुका है। सी.बी.आई. को लंबे समय तक कवर करने वाले किसी भी पत्रकार को यह बात हजम नहीं हो रही थी कि सी.बी.आई. खुद ऐसा कर सकती है। सी.बी.आई. राजनीतिक मामलों को किस तरह से इस्तेमाल करती है। इसके तमाम आरोप तमाम दल अब तक लगा चुके हैं। मन को चोट लग रही थी। सी.बी.आई. के मामला बंद कर देने के बाद न्याय की आखरी किरण भी बुझ रही थी।

ऐसे में 2 अप्रैल, 2009 को किसी रिपोर्टर ने गृहमंत्री पी. चिदंबरम से इस क्लीन चिट के बारे में पूछ लिया। हालांकि अभी यह क्लीन चिट अदालत को बंद लिफाफे मे सौंपी गई थी, सार्वजनिक नहीं हुई थी, लेकिन पी. चिदंबरम ने कहा "मुझे खुशी है कि मेरे साथी को सी.बी.आई. ने मुक्त कर दिया है।" यह बात देश का गृहमंत्री बोल रहा था। इतना बड़ा कत्लेआम और इस मामले में आरोपियों के छूटने पर गृहमंत्री खुशी जता रहा था। वह भी एक ऐसा गृहमंत्री, जिसने मुंबई में वीभत्स आतंकी हमले के बाद गृह मंत्रालय संभालकर देश को कुछ हद तक विश्वास का एक माहौल दिया था।

मेरा स्पष्ट मानना है कि कांग्रेस 2009 में लोकसभा चुनावों की जीत के पीछे मुंबई आतंकी हमले के बाद देश में कोई बड़ा आतंकी हमला न हो पाना भी रहा। इसने भाजपा के आतंकवाद के मुद्दे की धार कम कर दी थी। पत्रकार के तौर पर हम अक्सर यह बात करते थे कि चिदंबरम उन कुछेक नेताओं में से हैं, जिनमें काफी काबिलियत है। लंबे समय तक संसद कवर करते हुए मैं उनकी समझदारी का कायल था। उन्हें शब्दों को विदुर की तरह तौल कर ही मुंह से निकालने की आदत थी। फिर ऐसे व्यक्ति ने आहत लोगों की हसीं क्यों उड़ाई? यह क्यों नहीं सोचा कि 25 साल से न्याय की आस में बैठे पीड़ितों के दिल सी.बी.आई. के इस कदम से बेहद आहत हैं।

मन आहत हो रहा था। मेरी प्रमुख बीट डिफेंस थी, पर फरवरी 2009 से पूरे ब्यूरो को सिर्फ राजनीति और लोकसभा चुनावों पर ध्यान केंद्रित करने के लिए कह दिया गया था। लोकसभा चुनावों के वक्त ऐसा होना स्वाभाविक भी था। मैंने फरवरी से सिर्फ राजनीतिक समीकरण और लोकसभा चुनावों से संबंधित खबरें लिखनी शुरू कर दी थी। विशेष चुनाव पेज के लिए हर हफ्ते कम से कम तीन विशेष चुनावी खबरें देना जरूरी हो चुका था। पंजाब, हिमाचल और जम्मू कश्मीर भी मेरे पास थे, इसलिए वहां के लिए कांग्रेस में टिकट-वितरण और चुनावी रणनीति को लेकर खबरें करना भी मेरी जिम्मेदारी थी। इसके अलावा चुनाव आयोग लंबे समय से मेरी बीट थी और अब चुनावों की घोषणा के बाद यह बीट बेहद महत्वपूर्ण हो चुकी थी। आदर्श चुनाव आचार संहिता उल्लंघन के मामले प्रमुखता से छप रहे थे। इसी बीच गृहमंत्री के खिलाफ भी राजस्थान भाजपा ने सरकारी दौरे का चुनावी दौरे के तौर पर इस्तेमाल करने की शिकायत कर दी। चुनाव आयोग ने चिदंबरम के कृत्य को प्रथमदृष्टया आदर्श चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन बताते हुए नोटिस भेज दिया। चिदंबरम को 6 अप्रैल तक जवाब देने को कहा गया था। लेकिन तभी पता लगा कि चिदंबरम 6 अप्रैल को नहीं पहुंच पा रहे हैं और चुनाव आयोग से भी जवाब देने के लिए एक दिन की मोहलत मांगी है। अब 7 अप्रैल को ही प्रेस कॉन्फ्रेंस भी होगी। इस दिन मेरी कोई और एसाइनमेंट नहीं थी। इससे चार दिन पहले कपिल सिब्बल ने भी प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी जिसमें भाजपा के चुनावी घोषणापत्र की धज्जियां उड़ाई गई थीं। मैं तब भी वहां मौजूद था। असल में प्रमुख राजनीतिक दलों के मुख्यालयों में घूमने से ही चुनावों और राजनीति के समीकरणों के लिए नई खबरों के एंगल निकल सकते थे। मुझे लगा कि अगर चिदंबरम की प्रेस कॉन्फ्रेंस में जाया जाए तो संभव है कि चुनाव आयोग को भेजे गए जवाब के बारे में खबर बन जाए।

दूसरे, 1984 के मामले में मैं चिदंबरम से तीखे सवाल पूछना चाहता था। अगले दिन अदालत में इस मामले में सुनवाई थी। इसलिए चिदंबरम कुछ भी बोलते तो अगल खबर बन जाती।

मुझे याद पड़ता है कि मैं सवाल करने को लेकर काफी उत्सुक था और शुरू से ही हाथ खड़ा करना शुरू कर दिया था। मैं 2 अप्रैल की उनकी टिप्पणी से बेहद आहत था और उनसे कुछ तीखे सवाल करने का मन बनाकर आया था। इससे पहले प्रेस फोटोग्राफर लंबे समय तक फोटो खींचते रहे तो चिदंबरम ने उन्हें खुद ही बाहर जाने को कह दिया। वे आतंकवाद के मुद्दे पर आज आडवाणी पर हमला बोलने की नीयत से जो आए थे। प्रेस कॉन्फ्रेंस शुरू हुई तो मैंने भी हाथ उठाना शुरू कर दिया। लेकिन मेरी बारी तकरीबन आठ-दस सवालों के बाद आई। मैं काफी देर से इस घड़ी का इंतजार कर रहा था। सवाल मेरे दिल के बेहद करीब था और देर होते जाने से दिल पर दबाव ज्यादा बढ़ गया था।

खैर, अब चिदंबरम ने मुझे भी सवाल पूछने के लिए कहा। मैंने पहले उनकी इस बात को लेकर तारीफ की कि मुंबई बम धमाकों के बाद एन.आई.ए. के गठन से लेकर तमाम अच्छे कदम उठाकर उन्होंने अच्छा काम किया है। लेकिन सवाल मेरा अलग था और मेरे दिल के इतना करीब था कि भावुकता मुझ पर हावी होने लगी थी। शायद लंबे समय की पीड़ा आज इकट्ठी हो गई। चिदंबरम का जवाब तकनीकी था कि मामला अदालत के समक्ष है और उसी को फैसला करना है। लेकिन संवेदनशील मामलों में कभी-कभी सिर्फ तकनीकी उत्तर से काम नहीं चलता। यही चिदंबरम पहले टाइटलर की क्लीन चिट पर खुशी जता चुके थे। वह मामला अदालत के समक्ष होने की बात कह रहे थे पर मैं इससे कुछ ज्यादा सुनाना चाहता था। शायद मुझे चिदंबरम से कुछ अधिक संवेदनापूर्वक जवाब की अपेक्षा थी। लेकिन उनका ध्यान आज आतंकबाद से निपटने के लिए कांग्रेस के चुनाव घोषणापत्र पर केंद्रित था जिसमें उन्होंने भाजपा और लालकृष्ण आडवाणी को खासतौर पर निशाना बनाया था। मैंने पूछ लिया कि क्या टाइटलर का मामला साजिशन वापस नहीं हो रहा? जब पीडितों के दिल लंबे समय से लहू बहा रहे हैं तो कोई खुश कैसे हो सकता है? क्या सिखों के साथ न्याय नहीं होगा? उन्होंने सीधा जवाब देने के बजाय कहा कि मेरे सवाल प्रेस कॉन्फ्रेंस का विषयांतर कर रहे हैं। उन्होंने कुछ ऐसे लफ्ज कहे मानो मैं इस प्रेस कॉन्फ्रेंस का इस्तेमाल कर रहा हूं। वह इतने संवेदनशील मामलों को तवज्जो देने के मूड में नहीं थे। संवेदना के बजाय मैंने खुद को 'तिरस्कृत' महसूस किया और फिर भावावेश में एक ऐसा कदम उठाया, जिससे सब 'सन्न' रह गए।

मेरे मन में चिदंबरम को चोट पहुंचाने का कोई ख्याल नहीं था। शायद इसलिए बेहद भावुकता के बावजूद जूता उसी तरफ गया जिस तरफ कोई नहीं बैठा था। यह बात अलग है कि एक कैमरे ने उसका एंगल इस तरह से दिखाया कि मानो मुंह पर है, जबकि यह कम से कम डेढ़ मीटर दूर था। इस घटना के बाद मैं फिर अपनी सीट पर बैठ गया। बहरहाल यह कदम सांकेतिक विरोध था पर पत्रकारिता की मर्यादा का उल्लंघन भी था। इस घटना के बावजूद मैं संयमित था। मुझे अपने किए का एक सिख के तौर पर कतई अफसोस नहीं था। बाद में जब यह बात मुझसे पूछी गई तो मैंने घटना पर कहा कि विरोध का तरीका संभव है, ठीक न हो; पर मुद्दा बिल्कुल ठीक है।

मैंने कहा कि 25 साल तक पुलिस ने अपनी मर्यादा का उल्लंघन किया। लोगों को बचाने के बजाय खुद मरवाया और फिर केस दर्ज नहीं किए। सत्ता में बैठे लोगों ने न्याय करने के बजाय आरोपियों को मंत्री बनाकर पारितोषिक दिए। प्रशासन कत्लेआम का यंत्र बन गया और न्यायिक व्यवस्था अपने आपको पंगु होता देखती रही। उसके सामने न्याय के नाम पर फरेब किया जा रहा था, पर वह अपने विवेक का इस्तेमाल न कर सकी; जैसा कि बाद में गुजरात दंगों के मामले में कर रही है। सबने 25 साल तक अपनी मर्यादा का उल्लंघन किया था। इन्हें अपनी 'मर्यादा' याद दिलाने के लिए एक पत्रकार ने अपनी 'मर्यादा' का उल्लंघन किया जो कि पूरे सिस्टम को उसकी संवेदनहीनता और जिम्मेदारी का अहसास कराना चाहता था। सब पत्रकार स्तब्ध थे। आखिर शांत रहने वाले जरनैल सिंह ने यह क्या किया था?

सुरक्षाकर्मी तत्काल मुझे वहां से ले गए। अभी कांग्रेस मुख्यालय के बाहर ले ही जा रहे थे कि टीवी वालों ने घेर लिया। मैंने तुरंत कह दिया कि विरोध का तरीका गलत हो सकता है, पर मुद्दा बिल्कुल ठीक है। आखिर सिखों को न्याय के लिए कब तक इंतजार करना पड़ेगा? मैंने पत्रकार के तौर पर मर्यादा उल्लंघन की बात तुरंत मान ली। पर यह भी सच है कि कुछ लोग 25 साल से अपनी गलती स्वीकार नहीं कर रहे थे। मैंने जो मुद्दा उठाया था, उसे लेकर मेरे मन में कोई खेद नहीं था। 25 साल से न्याय की बाट जोहने के बाद भी सिस्टम न्याय नहीं दे पाया तो उसके विरोध में यह आवाज जायज थी। यह एक 'अभूतपूर्व अन्याय' के खिलाफ 'अभूतपूर्व विरोध' था, न कि चिदंबरम के खिलाफ। मैंने सांप्रदायिक सोच के खिलाफ आवाज बुलंद की थी। जो काम कलम के जरिए होना चाहिए था उसे जुते से करना पड़ा।

मुझे अब तुगलक रोड थाने ले जाया गया। वहां पहुंचते ही पूछताछ शुरू हो गई। आई.बी. से लेकर तमाम एजेंसियों के लोग मुझसे पूछताछ के लिए पहुंच गए और लगभग आधे घंटे तक यह सब चलता रहा। उन्होंने मुझसे मेरे फोन नंबर पूछे और तत्काल उन्हें लॉक करवा दिया। यह बात मुझे घरवालों ने बाद में बताई। शायद अभी भी मेरे फोन टेप किए जाते हों या फिर आई.बी. मेरे पीछे लगी हो। मेरे पूरे परिवार से जुड़ी तमाम बातें पूछी गईं, जिनका मैंने अपनी समझ से सही-सही जवाब दे दिया। इसी दौरान मेरा पत्रकारिता का पी.आई.बी. कार्ड भी ले लिया गया। गृह मंत्रालय और कांग्रेस कवर करने वाले पत्रकार अभी भी कहते है कि आई.बी. मुझ पर नजर रख रही है। मैं इसकी परवाह नहीं करता। पूछताछ चल रही थी, तब तक थाने में यह निर्देश आ गया कि मेरे खिलाफ कोई मामला दर्ज नहीं करना है। हालांकि इस बारे में मुझे कुछ नहीं बताया गया था। तभी मेरा सहयोगी संजय मिश्र अंदर आया और पुलिस ने भी कहा कि अब मुझे यहां से कहीं जाना है। मैं चल पड़ा। बाहर लाया गया तो मीडिया की भीड़ जमा हो चुकी थी। यहां भी मैंने देश के प्रति सिखों की कुर्बानी का जिक्र करने के साथ ही कहा कि मुद्दा सही था, पर शायद विरोध जाताने का तरीका नहीं। मुझे कुछ भी बोलने से मना किया जा रहा था। पुलिस वाले मेरे मुंह पर हाथ रखकर चुप कराना चाहते थे। संजय भी नहीं चाहता था कि मैं कुछ बोलूं। लेकिन कम से कम स्थिति तो साफ होनी चाहिए। इसलिए मैंने एक-दो वाक्य जरूर कहे। कुछ दूर तक पुलिस की गाड़ी में गए ही थे कि मुझे वापस थाने लाया गया और अब संजय की गाड़ी में बिठा दिया गया। हालांकि मुझे पहले लगा कि वे मुझे किसी मजिस्ट्रेट के यहां ले जा रहे हैं या फिर तिहाड़; लेकिन अब मुझे संजय ने बताया कि तुम्हारे खिलाफ कोई मामला दर्ज नहीं हो रहा है और खुद चिदंबरम ने ऐसा कहा है। मेरे अंदर के पत्रकार ने कांग्रेस और सरकार के इस फैसले का विश्लेषण किया तो पाया कि उन्होंने मौके की नजाकत और मुद्दे की भावुकता को देखते हुए सही फैसला किया था। टाइटलर को क्लीन चिट मिलने पर पहले खुशी जताने वाले चिदंबरम ने अगले दिन कहा कि "सिखों की पीड़ा को वे समझते हैं। दंगों में अधिक लोग दंडित नहीं हुए हैं।"

संजय मुझे मीडिया से दूर रखना चाह रहा था। वो मेरे सबसे अच्छे दोस्तों में से था और उसकी बात टाल नहीं सकता था। वैसे संजय को मुझे मीडिया से दूर रखने की सलाह कांग्रेस नेता और अखबार के वरिष्ठ लोगों से भी मिली थी। मैं यह बात जल्द ही समझ गया। कांग्रेस नहीं चाह रही थी कि मैं ज्यादा बोलूं। उन्हें राजनीतिक नुकसान की चिंता सता रही थी। मुझे कार्रवाई की परवाह नहीं थी और 1984 का मुद्दा हाईलाइट करने का मौका नहीं चूक सकता था।

रास्ते में ही ध्यान आया कि मीडिया तो अब तक घर भी पहुंच चुकी होगी। इसलिए वह मुझे अपने घर ले गया। मुझे लग रहा था कि मीडिया के सामने बात स्पष्ट करनी चाहिए। इसीलिए मैंने उसे घर पर टीवी लगाने को कहा। हालांकि मुझे टीवी पर बार-बार जूता फेंकते हुए दिखाया जाना अच्छा नहीं लग रहा था। मुझे लग रहा था कि टीवी वाले 1984 के मुद्दे को उठाने के बजाय जूता फेंकने को इतनी तरहीज क्यों दे रहे हैं? खैर जो भी हो, जूते ने ही सही, 25 साल बाद मीडिया का ध्यान इस अन्याय की तरफ तो खींचा।

तकरीबन दो घंटे तक मैं उसके घर रहा और वहीं खाना खाया। संजय ने मेरा मोबाइल बंद कर दिया था। अब मैंने उससे कहा कि मुझे मेरे बड़े भाई के घर छोड़ दे, जिसके बारे में मीडिया को नहीं पता है। हम वहां पहुंच गए पर मैंने भइया को किसी को भी यह बताने से मना कर दिया कि मैं कहां हूं? इसी बीच पता लगा कि दिल्ली में सिख राजनीति करने वालों समेत तमाम लोगों का मेरे घर पर जमावड़ा हो रहा है। मुझे न पाकर मीडिया वाले मेरे घरवालों से कुछ बात कर रहे हैं। मैं परेशान हो गया। टीवी मीडिया को मैं अच्छी तरह से जानता था। जिन घरवालों ने कभी कैमरे या प्रेस का सामना नहीं किया है, उनके मुंह में कहीं कुछ शब्द खुद ही न डाल दें। फिर मैंने सभी घरवालों को कोई भी बात बाहर कहने से सख्ती से मना कर दिया। घर फोन करने के लिए फोन आन किया तो सैकड़ों मिस कॉल और एस.एम.एस. आए हुए थे। एक एस.एम.एस. एनडीटीवी के राजदीप सरदेसाई का था जिसमें कहा गया था कि एडीटर्स गिल्ड की तरफ से मेरे खिलाफ कोई स्टेटमेंट आने वाला है। इसलिए इससे पहले ही मैं उनसे बात कर स्थिति स्पष्ट कर लूं। मुझे लगा कि बात स्पष्ट करनी चाहिए। मुझे लगा कि यही मौका है, जब 1984 के मुद्दे को पूरी दुनिया के सामने लाया जाए। अगर मैं चुप रहुंगा तो मौका हाथ से निकल जाएगा। आज मीडिया मेरे पीछे है तो अन्याय की बात को दुनिया भर में मुद्दे बनाना ही चाहिए। मैंने फोन मिलाया तो उन्होंने कहा कि वे एक कैमरामैन को भेज रहे हैं और मैं उसे अपनी बात कह दूं। मैं मना नहीं कर पाया। एडिटर्स गिल्ड के नाम पर मुझे अब सीएनएन आईबीएन के लिए बाइट देने पर राजी कर लिया गया था। अब जब ऐसा हो चुका था तो फिर एनडीटीवी 24x7 की बरखा दत्त के एस.एम.एस. का भी जवाब देकर उन्हें अपना एक कैमरामैन चुपके से भेजने के लिए कह दिया।

मैंने अपनी तरफ से ईमानदारी से बता दिया कि जो कुछ भी हुआ एक पत्रकार के तौर पर शायद गलत हो, लेकिन मुद्दा बिल्कुल सही है। मुझसे एक रिपोर्ट में कहा कि कांग्रेस ने आपको माफ कर दिया है, आपको क्या कहना है? इस सवाल ने मुझे बहुत तैश में ला दिया। मैंने कहा कि कांग्रेस से माफी मांगी ही किसने है! मैंने एक पत्रकार के तौर पर विरोध के तरीके पर अफसोस जताया है, न कि किसी से माफी मांगी है। अगर माफी किसी को मांगनी चाहिए तो वह कांग्रेस पार्टी है। मैंने इस मुद्दे पर कभी माफी नहीं मांगी। हां, एक पत्रकार के तौर पर मैंने खेद जताया है। लेकिन यह खेद उस पत्रकारिता जगत से जताया, जिसका मैं एक हिस्सा हूं, न कि किसी सरकार, पार्टी या किसी और से। मैं खेद जता कर उन लोगों को भी कठघरे में खड़ा करना चाहता था जो 25 साल से अपनी मर्यादा का उल्लंघन कर रहे थे। मुझे किसी सजा का कोई डर नहीं था। अगर पत्रकार के तौर पर मर्यादा उल्लंघन पर अफसोस जताया तो वह विशुद्ध नैतिकता थी।

मुझे अब तक यह मालूम नहीं था कि इसी दिन अकाली दल बादल ने भी जंतर-मंतर पर कोई धरना प्रदर्शन रखा हुआ है। ये धरना प्रदर्शन हमेशा से हमारा स्थानीय आफिस ही कवर करता था इसलिए मुझे उधर ध्यान देने की जरूरत भी नहीं थी और न ही मुझे इसकी कोई जानकारी थी। किसी पत्रकार ने जब मेरे प्रोटेस्ट और अकाली दल का प्रदर्शन एक ही दिन होने के बारे में पूछा तो मैंने कहा कि क्या गृहमंत्री पी. चिदंबरम और अकाली दल आपस में मिलकर एक ही दिन तय करेंगे? खैर मामले ने तूल पकड़ लिया और अब कांग्रेस की तरफ से कुछ ऐसे संकेत आने लगे मानो वह टाइटलर और सज्जन कुमार की उम्मीदवारी पर पुनर्विचार कर सकती है। असल में देश-विदेश में मीडिया ने इसे सही तूल दे दिया था। मेरे पत्रकार के तौर पर मर्यादा उल्लंघन के अलावा इस मुद्दे पर शायद कांग्रेस के पास कोई जवाब नहीं था। वह जो भी कदम उठाती या बोलती, उलझती जाती। ऊपर से डॉ. मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री के तौर पर प्रोजेक्ट करना था और लोकसभा का चुनाव सिर पर। मुझे लगता है कि कांग्रेस के एक वर्ग में यह अहसास तो था कि 1984 में जो हुआ, वह सही नहीं था; लेकिन कहीं इसकी आंच तत्कालीन शीर्ष नेतृत्व तक न जा पहुंचे, इसलिए पूरे मुद्दे पर ही पर्दा डालने की कोशिश होती रही।

काग्रेंस इस बारे में बात नहीं करना चाहती थी। हालांकि जब वह संसद में या बाहर गुजरात दंगों पर भाजपा को घेरने की कोशिश करती तो विपक्ष 1984 के दंगों को याद दिला देता था। यह बात मुझे हमेशा अखरती थी कि अगर एक ने गलती की थी तो दूसरे की गलती को याद दिलाकर अपना बचाव करना कहां तक सही है? दोनों देशों के बड़े राजनीतिक दल हैं और दोनों के वक्त में ही अल्पसंख्यकों के साथ अगर कहीं अन्याय हुआ है तो वे एक-दूसरे पर आरोप लगाकर कैसे बच सकते हैं? ये एक-दूसरे पर आरोप मढ़ने के बजाय सांप्रदायिकता को जड़ से मिटाने के लिए इकट्ठे क्यों नहीं?

इसी बीच किसी राजनीतिक दल ने मेरे लिए लोकसभा टिकट की घोषणा कर दी तो कइयों ने मेरे लिए पैसे और सम्मानों की झड़ी लगा दी। कोई मेरे जूते को पांच लाख में खरीदने को तैयार था तो कोई मुझे लाखों रुपए देने की बात कर रहा था। मैंने सिखों के जज्बात का प्रकटीकरण ही तो किया था। ये लोग इन निर्मल जज्बातों की कीमत क्यों लगा रहे हैं? राजनीति की मैल उस पर क्यों फेंक रहे हैं? मैंने ऐसे लोगों के खिलाफ मीडिया में कुछ कड़े शब्दों का भी इस्तेमाल कर उन संशयों को साफ करने की कोशिश की जो मेरे बारे में जानबूझकर उठाए जा रहे थे। मुझे अकाली बताने की भी कोशिश हो रही थी, जो कि सचाई से कोसों दूर था। कुछ टीवी रिपोर्टरों ने मुझसे कहा कि दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के अध्यक्ष ने भी मेरे खिलाफ टिप्पणी की है। वे मेरा बयान चाहते थे, लेकिन मैंने इस बात को ज्यादा अहमियत देना उचित नहीं समझा, क्योंकि वह वक्त 1984 के मुद्दे को आगे रखने का था न कि ऐसे आरोपों में उलझने का। बहरहाल अगले दिन अदालत में टाइटलर के मामले की सुनवाई थी। विरोध-प्रदर्शनों में तेजी आ चुकी थी और कांग्रेस पर दबाव बढ़ रहा था। मीडिया ने जब सिख विरोध प्रदर्शनों, रेलों को रोकने, सड़क जाम इत्यादी किए जाने के बारे में मुझसे पूछा तो मैंने उसी वक्त कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में अन्याय के खिलाफ विरोध करना जायज है, लेकिन यह किसी भी तरह से हिंसक नहीं होना चाहिए और न ही आम लोगों पर इसका कोई दुष्प्रभाव पड़े। कांग्रेस को पंजाब में भी अच्छा करने की उम्मीद थी और मीडिया ऐसे कयास लगा रहा था कि अब राज्य के कांग्रेस नेताओं ने सज्जन कुमार और टाइटलर मामले का वहां के चुनावों पर असर पड़ने की बात कह दी है। कहा गया कि दिल्ली में शीला दीक्षित का खेमा भी इस मुद्दे को पहले हल्के ढंग से उठा चुका है।

हकीकत यह है कि ये सब तथ्य पहले भी थे पर कांग्रेस ने इन सबको अनदेखा कर टिकट दिए थे। यहां  तक कि टाइटलर को क्लीन चिट के मामले में जब पंजाब के कैप्टन अमरिंदर सिंह से पूछा गया तो उन्होंने कहा कि 1984 के दंगे तो अब सिखों के लिए कोई मसला ही नहीं है। लेकिन अब जूता चलने के बाद मीडिया कह रही थी कि पंजाब कांग्रेस भी टिकट काटने का दबाव डाल रही है। कांग्रेस ने अगले दिन अदालत में सुनवाई का इंतजार किया और जब वहां मामला आगे लटक गया तो कांग्रेस को भी लगने लगा कि वक्त आ गया है कि अब इस धब्बे को कुछ हद तक पोंछ दिया जाए। नहीं पोंछते तो पूरे चुनाव में यह मुद्दा बना रहता। खासकर एक सिख को प्रधानमंत्री के तौर पर पेश करने के साथ ही इस मुद्दे को छिपाकर रखना अब मुश्किल हो चुका था। अगर गुजरात दंगों को मसले पर भाजपा को सांप्रदायिक बताते हुए घेनरा था तो फिर 1984 के भूत से पीछा छुड़ाना ही पड़ता। कांग्रसे अध्यक्ष सोनिया गांधी और कांग्रेस नेतृत्व को इस अप्रत्याशित विरोध के बाद ही सही, पर अब शायद यह अहसास हो गया था कि 1984 का दर्द काफी गहरा है और सिख इसे आसानी से नहीं भूल सकते। नतीजा शाम को जगदीश टाइटलर की प्रेस कॉन्फ्रेंस के तौर पर सामने आया, जिसमें उन्होंने उम्मीदवारी से हटने की बात कह दी थी। अब प्रधानमंत्री वीमेन प्रेस क्लब में पत्रकार वार्ता कर रहे थे। उन्होंने टिकट काटे जाने के सवाल पर 'देर आयद, दुरुस्त आयद' कहकर मेरे विरोध के मुद्दे को सही ठहरा दिया था। मैं विजयी तो नहीं पर काफी राहत महसूस कर रहा था। प्रधानमंत्री ने यहां कहा कि उन्हें इस बात की जानकारी नहीं थी कि टाइटलर को क्लीन चिट दी जा रही है। बाद में इंडियन एक्सप्रेस ने इस क्लीन चिट के पीछे के खेल को भी सामने लाने की कोशिश की। बहरहाल वर्ल्ड सिख न्यूज ने इस घटना के बारे में लिखा कि 25 साल से जो न्याय का पहिया नहीं घूम पाया था, वह जूते के डेढ़ मीटर की दूरी तय करने से कुछ आगे घूम गया।

इस घटना के तीन दिन बाद मुझे अमृतसर के मकबूलपुरा में नशे के खिलाफ एक रैली में शामिल होने का न्योता आया। यहां ऐसे तकरीबन 800 बच्चों को पढ़ाया-लिखाया जाता है, जिनके पिता नशे के जाल में फंस इन्हें अनाथ छोड़ गए हैं। उन्होंने कहा कि मीडिया आज मेरे पीछे है और अगर इस रैली में समर्थन करने आऊंगा तो मुद्दा हाईलाइट होगा। मुझे भी लगा कि इससे अच्छा और क्या हो सकता है, साथ ही अमृतसर दरबार साहिब में मत्था टेकने का भी सौभाग्य मिल जाएगा। इस घटना के बाद मेरा दिल भी वहां मत्था टेकने जाने को कर रहा था। मानो मैं परमात्मा का शुक्र अदा करना चाहता था।

वैसे इस दौरान ही मुझे तमाम तरह से न्योते आ रहे थे। चुनाव का वक्त था। इसलिए पत्रकार होने के नाते मैं समझता था कि मेरा कहां पर खड़ा होने क्या अर्थ रखता है। ऐसे में मकबूलपुरा जाना बिल्कुल ठीक था। मैं अपने परिवार को साथ लेकर वहां गया और सराय में कमरे एक दोस्त के नाम से बुक करवा लिए थे। हालांकि शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी को हमारे आने की खबर लग चुकी थी। शायद रास्ते में, लुधियाना में, जब हमें रोक कर एक सिख फैमिली क्लब ने स्वागत किया तो उन्हीं में से किसी ने आगे बता दिया था। जब हम पहुंचे तो कमेटी के प्रधान अवतार सिंह मक्कड़ की तरफ से अगले दिन सुबह सूचना विभाग में सिरोपा व दरबार साहिब की तस्वीर दिए जाने की बात कही गई। मैं असमंजस में पड़ गया था। अमृतसर के ही कुछ दोस्त पत्रकारों से सलाह की तो उन्होंने कहा कि कुछ दिन पहले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह दिल के आपरेशन के बाद आए तो उन्हें भी सिरोपा दिया गया था, अन्य भी किसी धर्म या क्षेत्र से जुड़ी विभूति के आने पर उसे सिरोपा व तस्वीर सूचना विभाग में दी जाती है। इसलिए इसका कोई राजनीतिक संकेत नहीं जाएगा। हां, अगर इंकार किया तो संदेश गलत जाएगा और राजनीतिक मतलब भी निकाले जाएंगे।

आखिर में मैंने सम्मान लेने की सहमति दे दी। लिहाजा अगले दिन सुबह मक्कड़ जी ने मुझे सिरोपा दिया। इसके बाद वे मुझे अपने साथ एक कमरे में ले गए जहां दस मिनट तक बातचीत हुई। यह बातचीत मुझे एस.जी.पी.सी. में मीडिया सहालकार का पद देने के लिए थी। साथ ही गुरुद्वारों के प्रबंधक को लेकर कुछ बातें हुईं। मैंने उन्हें तभी इंकार कर दिया। इसके बाद प्रेस से बातचीत हुई तो मक्कड़ जी ने अपना प्रस्ताव सार्वजनिक तौर पर फिर दोहरा दिया। उनका कहना था कि एस.जी.पी.सी. के दरवाजे जरनैल सिंह के लिए पूरी तरह खुले हैं। उनके बाद जब मीडिया ने मुझसे पूछा तो मैंने इस प्रस्ताव को नम्रता के साथ स्वीकार करने से इंकार कर दिया। मुझे लगा कि ऐसा करने से इसके राजनीतिक निहितार्थ निकाले जाएंगे और फिर वे लोग मेरी आलोचनाओं की बाढ़ ला देंगे, जिन्हें मैंने अब तक कोई मौका नहीं दिया है। इसके बाद मैंने दोपहर को एक बयान जारी कर स्थिति को और ज्यादा स्पष्ट कर दिया था। असल में मैं किसी राजनीतिक अखाड़े का हिस्सा नहीं बनना चाहता था और मेरे लिए जरूरी था कि मैं इन सबसे दूर रहूं।

वैसे दरबार साहिब अमृतसर में जिस तरह से आम सिख संगत ने रोक-रोक कर मेरी पीठ ठोंकी, वह अनुभव अविस्मरणीय है। एक सिख महिला मेरे वहां आने की बात सुन बाबा दीप सिंह के गुरुद्वारे से नंगे पांव ही उस रिक्शे के पीछे एक किलोमीटर भागते हुए आ गई, जिसमें मैं एक दोस्त के साथ बैठा था। यह वाकेया मेरे दिल को छू गया था। खासकर वे नौजवान सिख जो 1984 के वक्त पैदा भी नहीं हुए थे, मेरे साथ खड़े होकर फोटो खिंचवा रहे थे। यहीं जब मैंने हरिमंदिर साहिब परिसर के ऐतिहासिक मंजी साहिब हॉल में ढाढियों को वार गाते हुए मेरे जूता मारने के प्रकरण का जिक्र करते हुए सुना तो असहज महसूस हुआ। क्योंकि मैं खुद को इस सम्मान के योग्य नहीं समझता था। ढाढी सिख इतिहास का एक विशेष शैली में गायन करते हैं।

सबसे ज्यादा खुशी मुझे तब हुई, जब इस कत्लेआम की शिकार विधवाओं ने सज्जन कुमार और टाइटलर के टिकट कटने पर संतोष व्यक्त किया। उन्होंने मेरे लिए कुछ अच्छे शब्दों का इस्तेमाल किया तो दिल को ठंडक महसूस हुई। लग रहा था कि अगर मेरे इस कदम से इन्हें संतोष हुआ है तो फिर इसके आगे सब तर्क बेकार हैं। जब तिलक विहार में इन विधवाओं की कॉलोनी के गुरुद्वारा में मुझे सिरोपा देकर सम्मानित किया गया तो मैं भावुक हो गया था। मैंने कुछ विचार भी रखे, जिस पर सबसे अधिक संतोष देने वाला दिन था।

इस दौरान मेरे अखबार वालों ने मुझे अगले 20 दिनों तक दफ्तर न आने को कहा। साथ ही मीडिया में न जाने की भी हिदायत दी थी। लेकिन अब 20 दिनों बाद जब मैंने फिर दफ्तर आने के लिए पूछा तो कहा गया कि अभी चुनावों तक इंतजार करो। चूंकि मेरे द्वारा किया गया कृत्य चुनावों को प्रभावित करने वाला हो सकता है, इसलिए मैं घर पर ही रहूं तो अच्छा है। इसी बीच विपक्ष के नेता लालकृष्ण आडवाणी, कांग्रेस सांसद नवीन जिंदल और फिर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर भी जूता फेंकने की घटनाएं हुईं। इन तीनों घटनाओं में जूता या चप्पल फेंकने वालों का महज निजी स्वार्थ था।

इसी दौरान दिल्ली में चुनाव का दिन आ गया तो सुबह-सुबह ही हेडलाइंस टुडे न्यूज चैनल से फोन आया कि मैं वोट किसे और कहां डालने जा रहा हूं। मेरे लिए यह यक्ष प्रश्न था। दिल्ली में चुनाव के बाद अन्य जगह भी चुनाव होना था। उसी दिन पंजाब में भी मतदान था। मेरा कुछ भी कहना कुछ हद तक मतदाताओं को प्रभावित कर सकता था। हालांकि मेरा दिल किसी दल को वोट देने का नहीं था। मैंने कहा कि देश में धर्मनिरपेक्षता को सही मायने में मानने वाला कोई भी उम्मीदवार या दल मेरे समक्ष नहीं है। इसलिए मैं वोट नहीं करूंगा। हालांकि मैं लम्बे समय से चुनाव आयोग कवर करता रहा हूं और चुनाव में मतदान बढ़वाने की चुनाव आयोग की तमाम मुहिमों को अखबार में प्रमुखता से लिखता रहा हूं। मुझे लगा कि शायद मैं मतदान न करके ही सही संदेश दे सकता हूं।

चुनाव का नतीजा आते ही मेरे अखबार वालों का रुख बदल गया था। हालांकि यह मेरे लिए बहुत अचंभित करने वाला नहीं था। सिखों को डॉ. मनमोहन सिंह का फिर से प्रधानमंत्री बनना अच्छा लग रहा था। लेकिन मेरे अखबार ने अब मुझे नौकरी से इस्तीफा देने का दबाव डालना शुरू कर दिया। मैंने इस्तीफा देने से इंकार कर दिया। मेरा इस्तीफा देना सैद्धांतिक तौर पर गलती कबूल करने जैसा होता जबकि मैं इसे सैद्धांतिक तौर पर गलती नहीं मान रहा था। यह एक सांकेतिक विरोध था ताकि वे लोग जिन पर न्याय करने की जिम्मेदारी है उन्हें अपनी जिम्मेदारी याद आए। 1 जुलाई को मुझे नौकरी से निकाला गया।

यहां एक बात महत्वपूर्ण है कि मेरी नौकरी भले गई हो पर मेरे दोस्त पत्रकारों ने मेरे सामने कभी मेरी निंदा नहीं की। बल्कि कई पत्रकार दोस्त जिनमें आउटलुक के सैकत दत्ता, द हिंदू के संदीप दीक्षित और द न्यू इंडियन एक्सप्रेस के गौतम दत्त उसी वक्त थाने की तरफ आ गए थे। यह सहयोग बेहद सुखद था। द टेलीग्राफ में सुजॉन दत्ता ने जिस तरह से 'माई फ्रेंड एंड हीरो जरनैल सिंह' पर एक पीस लिखा वह दिल को छूने वाला था। उनका यह पीस कई सिख साइट्स ने उठाया। हरतोष बल ने भी कमाल का लेख लिखा था। तहलका ने भी मुझे समर्थन दिया तो हरिंदर बवेजा, वीर संघवी व कंवर संधू जैसे धुरंधर पत्रकारों ने भी टीवी पर मेरे द्वारा उठाए गए मुद्दे का समर्थन किया। यह बेहद सुखद था। तहलका मैगजीन ने भी मेरा साथ दिया। मुझे दैनिक जागरण में लाने वाले एक बड़े हिंदी अखबार के पूर्व मुख्य संपादक ने जिस तरह से मुझे निजी बातचीत में तसल्ली दी वह मेरे लिए बहुत हिम्मत बढ़ाने वाला था। मेल टुडे के संपादक भारत भूषण ने मुझे मेरी नौकरी जाने के बाद अपने अखबार के जरिए पक्ष साफ करने के लिए मौका दिया वह दिल को छू गया।

(जरनैल सिंह की किताब 'कब कटेगी चौरासी' से साभार)


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