प्रो. सरोज और शरद को पंडित रामानंद तिवारी सम्‍मान

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रामानंद "कविता नहीं है मेरी विवशता... पानी और हवा की तरह... कविता नहीं है मेरा धर्म... बाह्य और इस्लाम की तरह... कविता नहीं है मेरी दोस्ती... बाली और बनवारी की तरह... कविता है मेरी रचना... बया के घोंसले की तरह... कविता है मेरी दुश्मन... कमरे के दर्पण की तरह... परिवार से ही मिलता आदर्श... जिंदगी भर मेरे प्यार के साये में रहना... मैं सूरज से लडूंगा तुम साये में रहना।".... पिता की ऐसी भावनों को अपनी श्रद्धा सुमन समर्पित करते हुए तिवारी परिवार और प्रेस क्लब के संयुक्त तत्वाधान में पं. रामानंद तिवारी स्मृति सम्मान समारोह का आयोजन किया गया।

समारोह में प्रो. सरोज कुमार (2007) और लेखिका शरद सिंह ( 2008) को पं. रामानंद तिवारी सम्मान से नवाजा गया। उन्हें श्रीफल, शॉल और11-11 हजार रुपए की नकदी दी गई। मुख्य अतिथि राकेश श्रीवास्तव, जनसंपर्क आयुक्त ने कहा कि परम्पराओं और आदर्श की शिक्षा परिवार से ही मिलती है। आज परिवार में ऐसी शिक्षा नहीं दी जा रही है, यह चिंता का विषय है। उन्होंने कहा कि यह सभी का कर्तव्य है कि हमारी सभ्यता नई पीढ़ी तक पहुंचे। इसके लिए मीडिया को सकारात्मक भूमिका निभानी चाहिए।

इस मौके पर प्रेस क्लब अध्यक्ष प्रवीण खारीवाल और बीएल तिवारी ने भी संबोधित किया। कार्यक्रम में लघु कथा संग्रह हथेली पर उकेरी कहानियां और पं. रामानंद तिवारी की स्मृतियों पर आधारित स्मारिका का विमोचन भी हुआ। कार्यक्रम का संचालन संजय लाहोटी ने किया। आभार महासचिव अन्ना दुरई ने किया।

एक सिक्के के दो पहलू

इस मौके पर शरद सिंह ने कहा कि पत्रकारिता और साहित्य एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। कई बार साहित्यकार भी पत्रकार की तरह ही वे पक्ष पाठकों के सामने लेकर आते हैं जिससे पाठक अछूते हैं।

हाशिये पर साहित्यकार

कार्यक्रम में प्रो. सरोज कुमार ने कहा कि साहित्य गुलाब के फूल के समान है, जिसकी खुशबू से हर कोना महकता रहता है। उन्होंने कहा कि साहित्य में आत्मा की आवाज होती है। साहित्य किसी को रोटी नहीं देता, लेकिन उसमें रोटी पाने की सीख जरूर देता है। समाज में साहित्यकारों की स्थिति पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि समाज द्वारा साहित्यकारों को हमेशा हाशिये पर छोड़ दिया जाता है, लेकिन वहां से भी वे समाज पर अपनी पैनी नजर रखते हैं। इस दौरान उन्होंने अपनी कविताओं और व्यंग्य का पाठ भी किया।


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