नईदुनिया के संपादक डाक्‍टर राकेश को रिपोर्टर ऑफ द ईयर अवार्ड

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ग्वालियर में एक समाजसेवी संस्था है। नाम है ग्वालियर विकास समिति। यह संस्था हर साल पंद्रह अगस्त और 26 जनवरी को उन लोगों को सम्मानित करती है, जो समाजसेवा के क्षेत्र में साल भर में अच्छा योगदान देते हैं। इसी क्रम में यह संस्था 26 जनवरी को रिपोर्टर ऑफ द ईयर का अवार्ड भी देती है। यह अवार्ड ग्वालियर के कलम के धनी रहे पत्रकार स्वर्गीय कैलाश परिहार की याद में दिया जाता है, जिनका 24 जनवरी 2002 को निधन हो गया।

स्वर्गीय परिहार के नाम एक रिकॉर्ड यह भी दर्ज है कि वे लगातार 25 साल तक दैनिक भास्कर के सिटी चीफ रहे। अपराध जगत की रिपोर्टिंग में उन्हें मास्टरी हासिल थी। इसलिए पहले तय किया गया कि क्राइम रिपोर्टर को यह अवार्ड दिया जाएगा। पर जब बाद में दिखा कि इस तरह तो सिर्फ क्राइम रिपोर्टर ही इस अवार्ड के हकदार होंगे तो इसका दायरा बढ़ा दिया गया और हर तरह की रिपोर्टिंग करने वाले को रिपोर्टर में इसमें शामिल किया जाने लगा। अवार्ड में 11 हजार रुपए नकद दिए जाते हैं।

यह तो परिचय था अवार्ड का। लेकिन जरा सोचिए। रिपोर्टर को मिलने वाला अवार्ड का हकदार क्या एडीटर हो सकता है। सभी रिपोर्टर का जवाब होगा, कतई नहीं। वे यह तर्क भी दे सकते हैं कि फील्ड में रिपोर्टर घूमता है। उसकी रिपोर्ट को ही एडिटर ओके करता है और तय करता है कि बाईलाइन रिपोर्ट है या नहीं। एडिटर भी इस बात से सहमत होंगे कि रिपोर्टर के हक पर एडिटर को डाका नहीं डालना चाहिए। पिछले आठ अवार्ड तो रिपोर्टर को मिले पर इस साल का अवार्ड नईदुनिया के संपादक डॉक्टर राकेश पाठक के खाते में चला गया।

रिपोर्टर भी अचंभित हैं कि उनको मिलने वाला अवार्ड एडिटर के खाते में कैसे चला गया। रिपोर्टर कहते हैं कि यह अवार्ड जिन एडिटर को दिया गया है वे रिपोर्टिंग भी नहीं करते हैं। साल भर का लेखा-जोखा देखा जाए तो वे सिर्फ एक डायरी लिखते हैं जो सप्ताह भर में हो चुके घटनाक्रम की खिचड़ी होती है। इसके अलावा रिपोर्टिंग के नाम पर उनके खाते में बीते साल की विदेश यात्रा की डायरी अवश्य है। जिसका ग्वालियर की रिपोर्टिंग से कोई सरोकार नहीं है। यहां बताना मुनासिब है कि यही एडिटर पहले उस चयन समिति के सदस्य हुआ करते थे, जो रिपोर्टर ऑफ द ईयर का चयन करती थी।

ग्‍वालियर से एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.


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