''केदारनाथ से बात करना रोमांचकारी अनुभव था मेरे लिए''

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: जन्‍मशती श्रृंखला समारोह आयोजित : महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय, वर्धा द्वारा 'बीसवीं सदी का अर्थ : जन्‍मशती का सन्‍दर्भ' श्रृंखला के त‍हत 'केदारनाथ अग्रवाल की जन्‍मशती पर आयोजित दो दिवसीय समारोह के उदघाटन सत्र की अध्‍यक्षता करते हुए कुलपति विभूति नारायण राय ने कहा कि बांदा में आकर केदारजी जैसे जनकवि को याद करना एक तरह से अलग व अनूठा प्रयास है। इलाहाबाद व गाजियाबाद में जब भी उनसे मुलाकात होती थी उनसे वार्तालाप करना ही एक रोमांचकारी अनुभव था मेरे लिए। उनकी बातचीत में आमजनों की पीड़ा स्‍पष्‍ट रूप परिलक्षित होती थी।

उन्‍होंने कहा कि हम जन्‍म शताब्‍दी श्रृंखला समारोह के तहत रचनाकारों के कर्मभूमि में वैचारिक विमर्श के लिए कार्यक्रम का आयोजन कर रहे हैं ताकि उनके साहित्‍य की वर्तमान में प्रासंगिकता पर गंभीर विमर्श हो सके। विश्‍वविद्यालय व केदार शोध पीठ, बांदा के संयुक्‍त तत्‍वावधान में 'केदारनाथ अग्रवाल एकाग्र' पर आयोजित समारोह के दौरान देशभर के साहित्यिक चिंतक उनके गृह जनपद में विमर्श के लिए एकत्रित हुए। साहित्‍यकार से.रा.यात्री, प्रह्लाद अग्रवाल, दिनेश कुमार शुक्‍ल, सुनीता अग्रवाल, महेश कटारे, भारत भारद्वाज जैसे क‍ई चिंतक विमर्श के लिए पहुंचे थे बांदा में।

समारोह में युवा कवि पंकज राग को उनके कविता संग्रह 'यह भूमंडल की रात है', के लिए केदार सम्‍मान 2010 से पुरस्‍कृत किया गया। समारोह यादगार और भी बन गया जब विश्‍वविद्यालय द्वारा केदारजी पर प्रकाशित संचयिता : केदारनाथ अग्रवाल तथा अप्रकाशित रचनाएं- केदार : शेष अशेष एवं प्रिये प्रिय मन (पत्‍नी को लिखे पत्र), कविता की बात (कविता पर आलेख), उन्‍मादिनी (कहानी संग्रह), 'वचन' पत्रिका के केदार नाथ अग्रवाल विशेषांक का विमोचन किया गया। शुरुआत में कवि केदार की नातिन सुनीता अग्रवाल व केदार शोध पीठ के सचिव नरेन्‍द्र पुण्‍डरीक ने कुलपति विभूति नारायण राय को केदार जी की हस्‍तलिखित पांडुलि‍पियां सौपीं।

विमर्श को बढ़ाते हुए पंकज राग ने कहा कि मैंने कविता की चली आ रही धारा को मोड़ने की कोशिश की है। ठहरे हुए समसामयिक समय को गति देने के साथ-साथ जो लिखा जा रहा है उसमें वैचारिकता है या नहीं इसको भी टटोलने का प्रयास किया है। उन्‍होंने कहा कि इतिहास के अंत के दौर में विचार का बचा रहना बहुत जरूरी है। केदार की तुलना यदि किसी से की जा स‍कती है तो वह नजीर अकबरावादी हैं, का जिक्र करते हुए साहितयकार प्रह्लाद अग्रवाल ने कहा कि दोनों ने समाज के उस वर्ग पर कलम चलायी जो अपनी पहचान के लिए सदैव संघर्ष करता है और वह जन मारे नहीं मरता है।

साहित्‍य आलोचक और पुस्‍तकवार्ता के संपादक भारत भारद्वाज ने केदार जी के साथ बिताए पलों को याद करते हुए कई अनछुए पहलुओं को उजागर किया तथा भावुक स्‍वरों में कहा कि केदारजी अन्तिम समय में कहते थे कि अब तो बुढ़ा हो गया हूं, अब जाना-आना नहीं होता है, नई पीढ़ी के रचनाकारों को जमीन से जुड़कर समाज सापेक्ष कार्य करने की जरूरत है। केदार शोध पीठ के सचिव नरेन्‍द्र पुण्‍डरीक ने केदारजी को याद करते हुए बाबूजी की सरलता और सहजता और स्‍नेह को हिंदी कविता की थाती बताया। विमर्श का लब्‍बोलुआब यह था कि बाजार की शक्ति के आगे आज हम मानवीय मूल्‍यों से कटते जा रहे हैं, वर्तमान संदर्भों में केदारनाथ के साहित्‍य पर पुनर्विश्‍लेषण किए जाने की जरूरत है।

साहित्‍यकार दिनेश कुमार शुक्‍ल की अध्‍यक्षता में द्वितीय अकादमिक सत्र में 'केदार की कविता : लोक काव्‍य का प्रवाह' विषय पर प्रह्लाद अग्रावल,  डॉ. आनन्‍द शुक्‍ल, शांति नायर, ज्‍योति किरण, कालूलाल कुलमी ने विचार व्‍यक्‍त किए वहीं अजित पुष्‍कल की अध्‍यक्षता में तृतीय अकादमिक सत्र में 'केदार का गद्य : अनुपस्थित का आख्‍यान' विषय पर भारत भारद्वाज, प्रह्लाद अग्रवाल, श्रीप्रकाश मिश्र, जयप्रकाश धूमकेतु, अमरेन्‍द्र कुमार शर्मा ने जीवंत बहस कर समारोह को विचारोत्‍तेजक बनाया। गौरतलब है कि जन्‍म शतवार्षिकी पर यह तीसरा कार्यक्रम केदारनाथ अग्रवाल पर उनकी कर्मभूमि बांदा में किया गया। इसके पूर्व बाबा नागार्जुन की रचनाओं पर विमर्श के लिए पटना में तथा उपेन्‍द्रनाथ अश्‍क के साहित्‍य पर विमर्श के लिए इलाहाबाद में कार्यक्रम आयोजित किया गया था।

कार्यक्रम का संचालन जन्‍मशती कार्यक्रम के संयोजक प्रो. संतोष भदौरिया ने किया। काव्‍य-पाठ से यादगार बनी संध्‍या- वैचारिक कार्यक्रम के उपरांत काव्‍य-पाठ का आयोजन किया गया, कवि अपनी कविताओं के माध्‍यम से शोषण व अन्‍याय के प्रति आवाजें बुलंद करने की संदेश प्रवाहित कर रहे थे। कविता पाठ करने वाले कवियों में पंकज राग, पवन करण, ज्‍योति किरण, मुन्‍नी गंधर्व, अजित पुष्‍कल, श्रीप्रकाश मिश्र, नरेन्‍द्र पुण्‍डरीक, अमरेन्‍द्र शर्मा, नन्‍दल हितैशी शामिल थे।


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