'बीमारियों का बादशाह : कैंसर की कहानी' के लिए डा. सिद्धार्थ को पुलित्जर

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ये हैं डाक्टर सिद्धार्थ मुखर्जी. उम्र केवल चालीस वर्ष. इन्हें इस साल का नाम फिक्शन कैटगरी का पुलित्जर मिला है. यह सम्मान उन्हें उनकी किताब के लिए दिया जा रहा है. किताब कैंसर पर है और एक तरह से कैंसर की आत्मकथा है. सिद्धार्थ की यह पहली किताब है और इसे काफी लोकप्रियता मिली है. सिद्धार्थ भारतीय मूल के हैं.

पुस्तक 'बीमारियों का बादशाह : कैंसर की कहानी'  की प्रस्तावना में सिद्धार्थ लिखते हैं... ''कैंसर की कोशिकाएं तेजी से बढ़ती हैं. वे माहौल के मुताबिक अपने आपको बेहतर ढालती हैं. वे हमारी बेहतर संस्करण हैं.'' डा. सिद्धार्थ के मुताबिक अगर हम अमर होना चाहते हैं, तो अपने विकृत तरीके से कैंसर की कोशिकाएं भी यही इच्छा रखती हैं और यही करती हैं. दिल्ली के सफदरजंग एनक्लेव मे पले सिद्धार्थ न्यूयार्क की कोलंबिया यूनिवर्सिटी में असिस्टेंट प्रोफेसर मेडिसीन हैं. वे सेलुलर बायलॉजिस्ट ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के भी छात्र रहे हैं. 'बीमारियों का बादशाह : कैंसर की कहानी' को न्यूयार्क टाइम्स ने पिछले साल की टाप टेन किताबों में से एक कहा था. टाइम्स मैगजीन की टाप टेन बेहतरीन नॉन फिक्शन में भी ये किताब है. किताब में सिद्धार्थ ने कैंसर से जुड़े खोजों-अविष्कारों, कैंसर से लड़ने में विफलताओं, सफलताओं और मौत के डर के बारे में प्रकाश डाला है. सिद्धार्थ मुखर्जी का कहना है कि यह किताब लिखने में उन्हें दस साल लगे.


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