क्‍या बिक जाएगा निराला निकेतन!

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उत्तर बिहार की सांस्कृतिक राजधानी के साथ मुजफ्फरपुर की पहचान रस भरी लीचियों के लिए भी है। इसके साथ ही यहां से उठती थी उत्तर छायावाद की वो लहर जिसे निराला निकेतन को जानने वाले जरूर सुनते और गाते थे। हम बात कर रहे हैं। स्व. आचार्य जानकी बल्लभ शास्त्री की। जिनकी कविताओं ने उन्हें पद्मश्री के साथ उत्तर प्रदेश का सर्वोच्च साहित्यिक सम्मान भारत भारती दिलवा दिया। आचार्य महीनों से बीमार चल रहे थे। लगभग महीने भर पहले उनका निधन हो गया। आचार्य अपने पीछे दर्जनों कुत्ते और छह गायें छोड़कर गए हैं।

उनके निधन के बाद देश भर से शोक संदेश आये। बड़े-बड़े वादे हुए। मुंबई से शशि कपूर। भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी, सुषमा स्वराज के साथ कई नेताओं ने शोक संवेदना व्यक्त की। इतना ही नहीं निधन से चार दिन पूर्व बिहार सरकार में कला संस्कृति मंत्री सुखदा पांडेय उनसे मिलने आई, आचार्य की आर्थिक तंगी को देखते हुए उन्होंने एक लाख रुपए भिजवाने का वादा किया। आचार्य के निधन को महीना बीतने चला है... न चेक आया न पैसा। अब सुखदा पांडेय कह रही हैं कि मैंने आचार्य को देने की बात की थी.. उनकी पत्नी को नहीं।

अब कोढ़ में खाज की तरह अखबार वालों को तो खबर मिलती नहीं। कोई कुछ छाप देता है... और कोई कुछ। 25 अप्रैल को हिंदुस्तान ने एक खबर छापी। कोई खरीदेगा....., निराला निकेतन बिकने वाला है। ठीक 26 अप्रैल को प्रभात खबर में एक खबर छपती है। यादों का धरोहर है निराला निकेतन। निराला निकेतन बेचने की बात गलत है। दोनों खबरें आचार्य की पत्नी छाया देवी के स्टेटमेंट से निकाली जाती हैं।

अब आप बताइए की हिंदी साहित्य के समृद्ध होने में निराला निकेतन का योगदान अद्धितीय माना जाता है। आर्थिक तंगी ने छाया देवी को मजबूर कर दिया है कि निराला निकेतन को वह बेचने को मजबूर हैं। जब हमने निराला निकेतन का दौरा किया तो आचार्य की मुंहबोली बेटी और उनके घर की देखभाल करने वाली प्रियंका दबी जबान कहती हैं कि बहुत कर्ज हो गया है निराला निकेतन पर क्या करें। बिकने वाली बात में कितनी सच्चाई है मैं नहीं जानती।

अब सवाल  उठता है कि आचार्य के निधन पर जुलूस में स्थानीय सैकड़ों साहित्यकार और प्रशासनिक पदाधिकारी शामिल हुए। लेकिन सिर्फ फोटो खिंचाने के लिए। आज जब निराला निकेतन और उत्तर छायावाद के अंतिम पुरोधा की अंतिम निशानी पर संकट गहरा रहा है। सभी साहित्यकारों के साथ प्रशासनिक पदाधिकारी भी चुप्पी साधे हुए हैं। क्या जमाना आ गया है।

आचार्य श्री के साथ बैठकर सैकड़ों फोटो खिंचवाने और उनकी पैरवी पर अपनी रचनाएं छपवाने वाले लोग अब गायब हैं। निकेतन में बस बच गया है वीरानापन और कुत्तों का बिस्तर पर लेटना और उन छह गायों का आचार्य श्री के बिस्तर को निहारना। आचार्य के पशु प्रेम का अंदाजा इसी बात से लगा सकते हैं कि गायों और कुत्तों के मरने के बाद आचार्य उनका स्मारक बनवाते थे। अब बस जरूरत है सरकार के साथ प्रशासनिक पदाधिकारियों को आगे आकर निराला निकेतन बचाने का।

लेखक आशुतोष टीवी पत्रकारिता से जुड़े हैं.


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