हिन्दी को विश्व में फैलाना है तो उसे मसखरों के हाथों सौंप देना चाहिए

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: दरबारियों की जय हो! : हिन्दी किस तरह लूट-खसोट का माध्यम हो गई है। इसका ताजा उदाहरण 11 से 13 मार्च के दौरान अशोक चक्रधर के नेतृत्व में इग्लैंड की यात्रा पर गया हिन्दी कवियों और सेवियों का आठ सदस्यीय शिष्ट मंडल है। यह वहाँ चतुर्थ अंतरराष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन यूके में भाग लेने गया जो कहने मात्र को अंतरराष्ट्रीय था क्योंकि इसमें भारत के अलावा रूस से तीन हिन्दी विद्वानों ने भाग लिया था।

अन्य सभी लोग ब्रिटेनवासी भारतीय थे। इसमें जाने का बहाना गजब का था। वह था विदेशों में हिन्दी शिक्षण की समस्या और होली मिलन व हास्य कवि सम्मेलन। संवाद तो सिर्फ एक दिन भी पूरा नहीं हुआ बाकी दिन अंतरराष्ट्रीय हास्य कवि अशोक चक्रधर छाये रहे। इससे एक बात तो सिद्ध होती ही है कि आज हिन्दी को अगर विश्व में फैलाना है तो उसे मसखरों के हाथों में सौंप दिया जाना चाहिए और भारत सरकार ने लगभग यही कर दिया है। यही कारण है कि हास्य कवि अशोक चक्रधर पिछले तीन साल में हिन्दी के नाम पर चलने वाली चार-चार संस्थाओं का नेतृत्व कर रहे हैं। केंद्रीय हिन्दी संस्थान आगरा के अलावा वह दिल्ली की हिन्दी अकादमी के भी उपाध्यक्ष हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय के इंस्टीट्यूट फार लाइफ लांग लर्निंग में हिन्दी के प्रोफेसर हैं और विदेश विभाग के इंडियन काउंसलि आफ कल्चरल रिलेशंस में भी हिन्दी के नाम पर पहुंच बनाए हुए हैं। साफ है कि शासकों को सिर्फ चाटुकारों की जरूरत है। इसके अलावा पिछले कुछ दशकों में हमारे नेताओं के बौद्धिक व नैतिक स्तर में जो गिरावट आई है यह उसका भी प्रतीक है।

महात्मा गांधी, जवाहर लाल नेहरू और इंदिरा गांधी प्रेमचंद, निराला और महादेवी जैसे लेखकों को व्यक्तिगत स्तर पर जानते थे। आज के नेता न तो हिन्दी की रचनात्मकता से परिचित हैं, न ही उसके लेखकों के बारे में जानते हैं। वे हिन्दी के महत्व को लेकर किसी तरह से चिंतित नहीं हैं। हिन्दी एक ऐसा खटारा है जिसमें ऐसे किसी भी व्यक्ति को कभी भी बैठाया जा सकता है जिसके लिए और कहीं जगह नहीं निकल रही हो। यह काम एनडीए के दौरान भी उसी गति से हो रहा है। पर मजे की बात यह है कि वृहत्तर हिन्दी समाज को इससे कोई लेना-देना नहीं है। वैसे भी हिन्दी को अपढ़ों और कुसंस्कृत लोगों की भाषा माना जाता है। जो आज की दुनिया में आगे बढ़ने में सहायक नहीं है।

इसका फायदा किस तरह से लोग उठा रहे हैं इसका उदाहरण अशोक चक्रधर से बेहतर कौन हो सकता है जो इस बीच कांग्रेसियों के प्रिय कवि बने हुए हैं। होली की ठिठोली के साथ हिन्दी की चोली में हाथ डालने जो लोग ब्रिटेन की यात्रा पर गये थे उनमें चक्रधर के अलावा सुधीश पचैरी, प्रेम जनमेजय, दिविक रमेश, बालेन्दु शर्मा दधीच, रामचंद्र राय, बागेश्रवरी चक्रधर और अजय गुप्ता थे।
प्रेम जनमेजय और दिविक रमेश की प्रतिष्ठा से हिन्दी जगत परिचित हैं ही। बालेन्दु शर्मा ने चक्रधर के साथ मिलकर कंप्यूटर को हिन्दी में बदलने का बीड़ा उठाया हुआ है। रामचंद्र राय चूंकि शांति निकेतन में हैं इसलिए अगर उन्हें रवीन्द्रनाथ ठाकुर की परंपरा में न मानें तो भी वह हजारी प्रसाद द्विवेदी की गद्दी के वारिस तो कहे ही जा सकते हैं। अशोक चक्रधर की प्रतिभा स्वयं सिद्ध ही नहीं वैश्विक है, यह बतलाने की जरूरत नहीं है। केंद्रीय हिन्दी संस्थान के उपाध्यक्ष होने के नाते इस प्रतिनिधि मंडल में होने के उनके अधिकार को कैसे चुनौती दी जा सकती है। इस पर भी कहा नहीं जा सकता कि हिन्दी समाज बागेश्वरी चक्रधर की प्रतिभा से कितना परिचित है। चूंकि हिन्दी का हर मुद्दरिस जन्मजात कवि या लेखक होता है और बागेश्वरी जी भी दिल्ली के एक कालेज में हिन्दी पढ़ाती हैं इसलिए उनकी रचनात्मकता पर शंका की गुंजाइश नहीं बचती।

बड़ी बात यह है कि वह अशोक चक्रधर की पत्नी हैं इसलिए प्रतिनिधि मंडल में कवि के रूप में उनके शामिल होना लगभग स्वाभाविक ही लगने लगता है। आखिर अर्धांगिनी हैं। अशोक जी के संपर्क से किसी का भी कवि बन जान सहज संभाव्य है, फिर यह तो घरेलू मामला है। अगर पति का खर्च केंद्रीय हिन्दी संस्थान के खाते से आया तो पत्नी के व्यय की व्यवस्था आईसीसीआर ने की। पारिवारिक संबंधों को दृढ़ करने और विदेश में जा कर पतियों को अकेलेपन का लाभ उठाकर भटकने से रोकने में आईसीसीआर की इस भूमिका की जितनी सराहना की जाए, थोड़ी है। लगता है वे हिन्दी वालों के रोमांटिक मिजाज से खासे वाकिफ हैं, विशेष कर जब वे भारत भूमि से बहार होते हैं। आखिर इस संस्था का काम भारतीय संस्कृति का प्रचार-प्रसार जो है।

पर आश्चर्य यह है कि होली मिलन और हिन्दी प्रचार के इस अनूठे कार्यक्रम में आचार्य प्रवर और आलोचक श्री सुधीश पचौरी की क्या भूमिका रही हो। फिलहाल इस पाठकों की कल्पना पर छोड़ने में ही भलाई है। वैसे सुना जाता है हाथरस और आसपास के लोगों में मसखरेपन की प्रतिभा जन्मजात होती है। फिर मित्र चक्रधर ने भी बाकी जुगाड़ के अलावा पचौरी को कुछ टिप्स तो दिए ही होगें। दोस्त हो तो ऐसा या दोस्ती हो तो ऐसी।

पर केंद्रीय हिन्दी संस्थान के मोर्चे से खबर है कि फिलहाल निदेशक की नियुक्ति को मामला अटक गया है। एक सांसद को भेजे पत्र में मानव संसाधन विकास मंत्री ने यह जानकारी दी है। लगता नहीं कि उपाध्यक्ष के मनचाहे मोहन जी की वंशी बज पायेगी। अब उपाध्यक्ष की कोशिश यह रहेगी कि इस पर पर फिलहाल कोई नियुक्ति न हो, कम से कम उनमें से तो कोई न आये जो पैनल मैं हैं और सेवा निवृत के. विजय कुमार को एक्सटेंशन पर रख लिया जाए। अगर ऐसा है तो इससे ज्यादा शर्मनाक कुछ नहीं होगा। पिछले दो वर्षों से संस्थान में कोई निदेशक नहीं है इसलिए जरूरी है कि पूरी सर्च कमेटी नये सिरे से अपनी राय दे या फिर चुनिंदा उम्मीदवारों के जिस पैनल की संस्तुति की गई है उसी में से अगले निदेशक की नियुक्ति हो।

समयांतर मई २०११ अंक से साभार


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