पत्रकार अनीता वशिष्ठ की कुछ कविताएं

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अनीता वशिष्ठबहुत सारे युवा लोग बहुत सारी कविताएं लिखते हैं, लेकिन कुछ लोगों की ही रचना अपने प्रयोग या नएपन या तेवर के चलते दूसरों का ध्यान खींच पाती है. एक हैं अनीता वशिष्ठ. मीडिया में सक्रिय हैं. पहले दिल्ली प्रेस के साथ जुड़ी थीं. इन दिनों इंडिया टुडे ग्रुप में चीफ सब एडिटर हैं. उनके ब्लाग पर उनकी लिखी कुछ कविताएं हैं. इनमें कुछ ऐसी कविताएं हैं जो झकझोर देती हैं.

ये कविताएं स्त्री को समझने के लिए नई निगाह-नई नजर की जरूरत को महसूस कराती हैं. बहुत साफगोई से अपनी भावनाओं का इजहार किया है अनीता ने. उनके ब्लाग ''रास्ते खत्म नहीं होते'' से कुछ उनकी कविताएं उठाकर यहां प्रकाशित किया जा रहा है. अनीता की अभी इसी महीने शादी हुई है. इनके पति पेशे से होम्यो चिकित्सक हैं. इन दोनों को शादी और बेहतर भविष्य के लिए शुभकामनाएं. -एडिटर

स्तनों का जोड़ा

अकसर देखती हूं,
राहगीर, नातेरिश्तेदार
और यहां तक कि
मेरे अपने दोस्तयार...
उन्हें घूरघूर कर देखते हैं,
उनकी एक झलक को लालायित रहते हैं...

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आज मैं
उन लालायित आत्माओं को
कहना चाहती हूं,
जिनके लिए वे अकसर मर्यादा भूल जाते हैं,
वह मेरे शरीर का हिस्सा भर हैं...
ठीक वैसे ही, जैसे
मेरे होंठ,
मेरी आंख
और मेरी नाक
या फिर मेरे पांव या हाथ...

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इसी के साथ
मैं उनसे अनुरोध करती हूं...
मेरे मन में यह संशय न उठने दें
कि मैं नारी हूं या महज स्तनों का एक जोड़ा...

मेरा अस्तित्व: वीर्य सा

मेरा अस्तित्व
तुम्हारे हस्तमैथुन से
गिर पड़े उस वीर्य सा है,
जिसे फेंकना
तुम्हारे लिए
जरूरी होगा,

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काश कि
मेरा अस्तित्व
किसी के पेट में पलते
तुम्हारे वीर्य के
उस कण सा होता
जिसे देखना
तुम्हारे लिए
सबसे जरूरी होगा।

बेचैन आयु

मुझे माफ करना जीवन
के मैं तुम्हें न जी सकी,
मुझे तोड़ देना संघर्ष
के मैं तुम्हें न सह सकी...
झूठी परंपराओं की वेदी पर...
अपने नेह को घोट पाना
कितना मुश्किल है
मेरे नेही
तुमने भला कब जाना
इससे तो अच्छा है
पिघल कर घुल जाउं,
लिप्त हो जाउं
तुम में
तुम्हारी प्राण वायु में
खो जाउं वाष्प सी कहीं
कि लौट कर
वापस न आ पाऊं
इस बेचैन आयु में...

मेरी एक और मौत

मेरी मौत को
आत्महत्या का नाम न देना
यह तो एक कत्ल है
इसकी शिनाख्त करवाना...
समाज के
हर उस ठेकेदार को
इसकी सजा दिलवाना
जो मेरी आजादी पर
अपने नियमों का
पहरा दिए रहता था...
हर उस शख्स पर
जुर्माना लगाना
जिसने मेरे अरमानों को
सहला सहला जवां किया
और परंपराओं की वेदी पर
नग्न कर शोषित किया
उस खास शख्स को
यातना जरूर देना
जिसने झूठे वादों की सेज पर
बार बार मेरा बलात्कार किया...
और हां
अंत में
यह घोषण करना न भूलना
कि
यह आत्महत्या नहीं थी
यह कत्ल था
वह भी अनजाने में नहीं
बल्कि
एक सोच समझी साजिश के तहत...

काश

काश कि

मैं पत्थर होती

कोई मूर्तिकार आता...

और मुझ पर

गढ़ जाता

तुम्हारे नाम का पहला अक्षर।

बनना और बिखरना

कभी नहीं चाहा था
कि मैं किसी के बिस्तर की,
सिल्वट भर बन रहूं,
कुछ ऐसी
कि उठने पर,
उसे खुद न पता हो
कि किस करवट से,
उभर आई थी मैं.
जरा गौर से देखो,
हमारा रिश्ता,
कुछ ऐसा ही तो है,
हां,
मैं हमेशा चाहते,
न चाहते
तुम्हारे सामने बिछ जाती हूं,
तुम उठते हो
और मुझे झाड़ देते हो
सदा के लिए...
तुम्हारी कसम
सच कहती हूं,
यह सोचकर अजीब लगता है
कि
मेरे अस्तित्व का बनना
और
बन कर बिखर जाना
तुम्हारे ऊपर ही निर्भर करता है.

स्नेहमयी पराजय

छीन लो आज मुझसे
मेरा यह भय,
हो जाओ सदा के लिए
कहीं गहन अंधकारमय,
नित क्षणप्रतिक्षण
तुमसे दूर होने का,
यह निर्बाध भय,
निस्वार्थ सा बढ़ता है,
मुझमें अक्षय
बना लो दूरियां मुझसे,
तुम हो निर्भय
न घबराओ परिणाम से
कदाचित तय है
मेरे अस्तित्व का क्षय
क्योंकि मैं स्वयं ही
स्वीकार चुकी हूं,
तुमसे,

अपनी स्नेहमयी पराजय...

मैं और मेरा कमरा...

मैं जमीन पर पडे एक गूदड पर रजाई लिए बैठी हूं

ठीक सामने एक संदूक पर,
सिल्वटों भरी मेरी पेंट पडी है
उपर हैंगर पर एक चाइनीज जींच टंगी है,
दो दीवारों पर टिका एक टांड भी है
जिसमें न जाने क्या क्या भरा है
टांड पर पुरानी साडी का परदा
और उसके ठीक नीचे एक डबलडोर फ्रिज रख है
साथ में एक गेंहू की टंकी
तनी खडी है षायद किसी अकड में है
साथ ही सटी है पूजा की अलमारी
जिस पर परदा लगा है
श ssss षायद भगवान सो रहे हैं
इसके नीचे रखी है सिलाई मषीन
और तितर बितर पडे धागे
एक केंडल स्टेंड और
डाइनिंग टेबल सेट की एक कुर्सी
कुल मिलकार पता चलता है
कि मैं

एक मध्यवर्गीय परिवार से हूं

निरक्षर हाथों का जोड़ा

रोज देखती हूं
एक निरक्षर हाथों का जोडा
दिल्‍ली की हर रेड लाइट पर
बेच रहा होता है
साक्षरता का पहला ‘अक्षर’
इस जोडे को शायद
जमा घटा का ज्ञान नहीं
किंतु एक रुपय की कीमत
भली भांती ज्ञात है
मैला सिर, मैले लत्‍ते,
और मैली आंखों में चमकता वो शुद्ध मन...
मुझे रोज याद दिलाता है
कि
वह मेरे साक्षर हाथों का श्रष्‍टा है...
इसलिए ही कहती हूं
जब कभी
अपनी साक्षरता का पर गुरुर हो,
दौड कर उस रेड लाइट पर जाएं
और देखें
आपके हाथों को साक्षर बनाने वाले
वो नन्‍हें हाथों का जोडा
आज भी उसी चौराहे पर
10 रुपय के जोडे के हिसाब से
पैंसिलें बेच रहा है
वही पैंसिल
जिसे पकड
आपने पहला अक्षर लिखा था...


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