आलोक धन्वा की नई कविताएं

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कृपाशंकर चौबेसमकालीन हिंदी कविता के सुधी पाठकों के लिए यह एक अत्यंत सुखद समाचार है कि बहुपठित और बहुप्रशंसित काव्यकृति ‘दुनिया रोज बनती है’ के रचनाकार आलोक धन्वा लंबे अंतराल के बाद फिर से कविता लेखन में अपनी एक नई शुरुआत कर रहे हैं। वे १९९७ के बाद फिर कविताएं लिख रहे हैं।

चौदह वर्षों के अंतराल के बाद उनकी चार नई कविताएं-‘मुलाकातें’, ‘आम के बाग’, ‘गाय और बछड़ा’ एवं ‘बुलबुल के तराने’ ‘बहुवचन’ के नवीनतम अंक में छपी हैं। ‘मुलाकातें’ में एक स्त्री के प्रति सच्चा प्रेम है, उसका इंतजार है और उसकी वापसी के प्रति गहरी उत्कंठा है। कविता में सुख-दुःख को पार्थिव कहा गया है। दरअसल हिसाब-किताब को पार्थिव कहा गया है। ‘मुलाकातें’ का प्रेम शरीर की सीमाओं में बंधा हुआ नहीं है बल्कि यह शरीर को भी अस्तित्व के अनंत बोध से भरता है क्योंकि शरीर और अस्तित्व दोनों दो चीजें हैं इसलिए मुलाकातें पार्थिव नहीं हैं क्योंकि मुलाकात का अर्थ अस्तित्व से भी जोड़ा गया है। मुलाकातें हमेशा नए जीवन के लिए एक नई जगह बनाती हैं। मुलाकात एक नया विकल्प भी तैयार करती है। ‘मुलाकातें’ गहरे मानवीय संबंधों को निरंतरता के बीच ले जाती हैं। ‘आम के बाग’, ‘गाय और बछड़ा’ और ‘बुलबुल के तराने’- ये कविताएं भी जीवन की मार्मिक पुकारों से भरी हुई हैं। इनमें कलात्मक सौंदर्य भी जीवन की अंतरंगता से जन्म लेता है न कि किसी शिल्प कौशल से।

ये चारों कविताएं इस बात का साक्ष्य हैं कि आलोकधन्वा जीवन के और निकट गए हैं। कविता लेखन में लंबा अंतराल होने के बावजूद जनता के सुख-दुःख से बहुत गहरे जुड़े होने के कारण कविता का कंपन आलोकधन्वा को छोड़कर कभी नहीं गया। आलोकधन्वा कविता की रचना प्रक्रिया को अलौकिक और अबूझ घटना नहीं मानते। उनकी कविता एक खास तरह के सामाजिक और नैसर्गिक निजी संयोजन के बीच ही उनकी खुद की जिंदगी और दूसरी जिंदगियों के जीवन संगीत से पैदा होती है।

निश्चित ही आलोक धन्वा को नए सिरे से शुरू होने का रचनात्मक परिवेश वर्धा के महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय ने मुहैया कराया है, इस परिवेश ने उन्हें जीने का संबल भी दिया है। इन कविताओं के छपने के साथ ही आलोकधन्वा की लंबी चुप्पी भी टूटी है। कहना न होगा कि लंबा मौन धारण करने के मामले में आलोकधन्वा का कोई मुकाबला नहीं। इस मामले में उनकी प्रतिद्वंद्विता स्वयं से है।

आलोक धन्वा ने हमेशा लंबे अंतराल के बाद कविताएं लिखीं। उनकी पहली कविता ‘जनता का आदमी’ १९७२ में ‘वाम’ पत्रिका में प्रकाशित हुई थी। उसी साल ‘फिलहाल’ में ‘गोली दागो पोस्टर’ छपी थी। उसके चार साल बाद १९७६ में ‘पतंग’ और सात साल बाद १९७९ में ‘कपड़े के जूते’ छपी। इसी तरह ‘भागी हुई लड़कियां’ १९८८ में और ‘ब्रूनो की बेटियां’ १९८९ में छपी थीं। ‘कपड़े के जूते’ और ‘ब्रूनो की बेटियां’ के प्रकाशन में दस साल का अंतराल है। आलोकधन्वा का एक मात्र काव्य संकलन ‘दुनिया रोज बनती है’ १९९८ में छपा। और उस संकलन के प्रकाशन की स्वीकृति भी कवि ने बहुत संकोच के साथ दी थी। वैसे उस संकलन के छपने से काफी पहले उनकी ‘जनता का आदमी’,‘गोली दागो पोस्टर’,‘भागी हुई लड़कियां’,‘कपड़े के जूते’ और ‘ब्रूनो की बेटियां’ सरीखी कविताएं क्लासिक की श्रेणी में आ चुकी थीं और आलोकधन्वा चाहते तो बाकी जीवन इन्हीं कालजयी कविताओं पर काट सकते थे। पर यह उन्हें कबूल न हुआ।

‘दुनिया रोज बनती है’ से जो प्रसिद्धि आलोकधन्वा को मिली, वह उनके किसी समकालीन कवि को नसीब नहीं हुई। पिछले चौवालीस वर्षों से देश के विभिन्न हिस्सों में सांस्कृतिक कार्यकर्ता के रूप में सक्रिय रहे आलोकधन्वा की दो कविताएं ‘जनता का आदमी’ और ‘गोली दागो पोस्टर’ प्रायः चार दशकों से देश के प्रगतिशील सांस्कृतिक आंदोलन की प्रमुख कविताएं बनी हुई हैं। आलोकधन्वा उन कवियों में से हैं, जिनकी कविताओं के पोस्टर सर्वाधिक तैयार किए गए और आज भी किए जाते हैं। कहने की जरूरत नहीं कि आलोकधन्वा की ये कविताएं ऐसी हैं जिनकी गूंज एक शताब्दी से दूसरी शताब्दी तक बनी रहती है। अच्छा कवि कभी भूतपूर्व नहीं होता।

आलोकधन्वा की कविताओं को गंभीर पाठकों ने जैसा स्नेह और सम्मान दिया है, वैसा प्रेम साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त मंगलेश डबराल, राजेश जोशी, वीरेन डंगवाल और अरुण कमल को भी नहीं मिला। आलोकधन्वा की कविताएं कितनी बार और कहां-कहां प्रकाशित हुईं, न सिर्फ देश में, बल्कि विदेशों में भी, इसका हिसाब-किताब विस्मयकारी है। अमेरिका की विश्वप्रसिद्ध पत्रिका ‘क्रिटिकल इनक्वायरी’ से लेकर भारत के छोटे-छोटे कस्बों से निकलनेवाली ढेर सारी लघु पत्रिकाओं में बार-बार आलोकधन्वा की कविताएं उद्धृत की जाती हैं, अनूदित की जाती हैं।

आलोक धन्वा उन कवियों में हैं जो अपनी कविताओं पर बात करने या उनका पाठ करने में भी बहुत संकोच करते हैं। आलोकधन्वा वैसे काव्य पाठ नहीं करते, कविता को प्रस्तुत करते हैं। पूरी नाटकीयता के साथ। विरले मौकों पर वर्धा में आलोकधन्वा का काव्य पाठ सुनते हुए बंगाल की समृद्ध काव्य आवृत्ति की परंपरा की याद ताजा हो जाती है। बंगाल में काव्य आवृत्ति को स्वतंत्र कला का दर्जा हासिल है और ब्रबती बंद्योपाध्याय तथा शर्मिष्ठा बाग तो काव्य आवृत्तिकार के बतौर ही जानी जाती हैं।

आलोक धन्वा सालभर से वर्धा के महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय में आवासीय लेखक हैं। वर्धा में आने के पूर्व भी आलोकधन्वा रंगकर्म और साहित्य पर कई राष्ट्रीय संस्थानों और विश्वविद्यालयों में अतिथि व्याख्याता के रूप में भागीदारी कर चुके हैं। वर्धा में उनका कार्यकाल और एक वर्ष के लिए बढ़ा दिया गया है। विलक्षण कविता पाठ के अलावा वर्धा परिसर में विभिन्न अवसरों पर आलोकधन्वा जो सुचिंतित व्याख्यान देते हैं, उनका संकलन छापा जाए तो पता चलेगा कि इस कवि के भीतर कितनी ज्ञान संपदा छिपी है। किसी श्रेष्ठ किताब की तरह।

कविताओं को पढ़ने के लिए इस हेडिंग पर क्लिक करें-- बारह साल बाद आलोक धन्वा ने लिखीं चार कविताएं

लेखक कृपाशंकर चौबे महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के क्षेत्रीय केंद्र, कोलकाता के प्रभारी हैं.


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