कविता को जनता की भाषा में जनता के बारे में बात करनी होगी-प्रो मैनेजर पांडेय

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सुप्रसिद्ध आलोचक एवं जनसंस्कृति मंच के अध्यक्ष प्रो मैनेजर पांडेय ने कहा है कि कोई भी कविता तब जनतांत्रिक होती है जब वह संवेदना, संरचना व भाषा के स्तर पर जनता के लिए, जनता के बारे में और जनता की भाषा में बात करे। बडी कविता वह है जो संकट के समय लोगांे के काम आए। नागार्जुन के काव्य लोक व्यापक विविधताओं का है तो शमशेर की कविता को जानने के लिए प्रकृति, संस्कृति और जिंदगी को समझना जरूरी है।

प्रो पांडेय रविवार को जन संस्कृति मंच द्वारा हिन्दी के प्रसिद्ध कवियों शमशेर बहादुर सिंह, केदारनाथ अग्रवाल और नागार्जुन के जन्मशती समारोह के मौके पर ‘काल से होड़ लेती कविता’ आयोजन में व्याख्यान दे रहे थे। यह आयोजन जयशंकर प्रसाद सभागार कैसरबाग में किया गया था। प्रो पांडेय ने कहा कि नागार्जुन एक ओर भारत के काश्मीर से मिजोरम के बारे में कविता लिखते हैं तो दूसरी तरफ अपने समय के लगभग सभी राजनैतिक व्यक्तियों पर कविता के जरिए सच कहने का साहस दिखाते हैं। उन्होंने प्रकृति पर जितनी कविताएं लिखी उतनी कविताएं शायद ही किसी कवि ने लिखी है। उनकी काव्य भाषा के विविध रूप और स्तर हमें चकित करते हैं।

प्रो पांडेय ने शमशेर की कविता को समझने के लिए जिंदगी को समझने पर जोर दिया। उन्होंने शमशेर की कविता की कुछ आलोचनाओं को रहस्यवादी आलोचना बताते हुए कहा कि आलोचना में रहस्यवाद बहुत घातक है। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ कवि नरेश सक्सेना ने कहा कि यदि कविता लोगों की स्मृति में नहीं है तो वह किसी काम की नहीं है। जो कविता याद रहेगी वह काम करेगी। उन्होंने शमशेर और नागार्जुन को अपनी कविताओं में सभी कलाओं का इस्तेमाल करने वाला कवि बताया।

इसके पूर्व युवा आलोचक सुधीर सुमन ने केदारनाथ अग्रवाल की कविताओं पर बोलते हुए कहा कि केदारनाथ अग्रवाल देशज आधुनिकता के कवि हैं जिनकी कविताएं अपनी परम्परा, प्रकृति और इतिहास से गहरे तौर पर जुडी हुई है। उनके जीवन और कविता में जनता के स्वाभिमान, संघर्ष चेतना ओर जिंदगी के प्रति एक गहरी आस्था मौजूद है। पूंजीवाद जिन मानवीय मूल्यों और सौन्दर्य को नष्ट कर रहा है और उस पूंजीवादी संस्कृति और राजनीति के प्रतिवाद में केदार ने अपनी कविताएं रचीं। उनकी कविताओं में जो गहरी उम्मीद है किसान, मेहनतकश जनता के जीत के प्रति वह आज भी हमेें उर्जावान बनाने में सक्षम है।

कार्यक्रम का आरम्भ शमशेर की कविता ‘काल तुझसे होड़ है मेरी: अपराजित तू - तुझमें अपराजित मैं वास करूँ‘ के पाठ से हुआ। इस मौके पर भगवान स्वरूप कटियार ने शमशेर की कविता ‘बात बोलेगी’ तथा ‘ निराला के प्रति’ का भी पाठ किया। ‘जो जीवन की धूल चाटकर बड़ा हुआ है/तूफानों से लड़ा और फिर खड़ा हुआ है/जिसने सोने को खोदा लोहा मोड़ा है/जो रवि के रथ का घोड़ा है/वह जन मारे नहीं मरेगा/नहीं मरेगा’ केदार की इस कविता का पाठ किया ब्रहमनारायण गौड़ ने। उन्होंने केदार की कविता ‘मजदूर का जन्म’ व ‘वीरांगना’ भी सुनाईं। सुभाष चन्द्र कुशवाहा ने नागार्जुन की दो कविताओं का पाठ किया।

चन्द्रेश्वर की कविता संग्रह ‘अब भी’’का लोकार्पण हुआ

जन्मशती समारोह में मैनेजर पाण्डेय ने चन्द्रेश्वर के कविता संग्रह ‘अब भी’’ का लोकार्पण किया। चन्द्रेश्वर ने अपने इस संग्रह से ‘यकीन के साथ’, ‘उस औरत की फाइल में’, ‘हाफ स्वेटर’, उनकी कविताएँ’, ‘कितना यकीन’ और ‘यह कैसा समय’ शीर्षक से कई कविताएँ सुनाईं और अपनी कविता के विविध रंग से उपस्थित लोगों का परिचय कराया। उनकी कविता ये पंक्तियाँ बहुत अन्दर तक संवेदित करती रहीं: ‘क्या आप यकीन के साथ कह सकते हैं / कि यह आप की ही कलम है / कि यह आपका चश्मा / आप का ही है / कि आपके ही है। / ये जूते..... कितना अजीब है /  यह समय / कितना घालमेल / चीजों का / आप यह भी नहीं कह सकते / कि यही है... हाँ / यही है मेरा देश’।

‘अब भी’ का लोकार्पण करते हुए मैनेजर पाण्डेय ने कहा कि चन्द्रेश्वर की कविताएं आज के समय की राजनीतिक, सामाजिक व सांस्कृतिक समय की कविताएं हैं। उनकी कविताएं मानवीय गुणों के क्षरण को दर्ज करने वाली कविताएं हैं। आयोजन के अन्तिम सत्र में ‘हमारे सम्मुख शमशेर’ के अन्तर्गत शमशेर के कविता पाठ की वीडियो फिल्म दिखाई गई। इस फिल्म के माध्यम से लोगों ने शमशेर के मुख से उनकी कविताएँ सुनीं। कार्यक्रम के अन्त में मार्क्सवादी आलोचक चन्द्रबली सिंह को दो मिनट का मौन रखकर श्रद्धांजलि दी गई।

कौशल किशोर
संयोजक
जन संस्कृति मंच, लखनऊ


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