पत्रकारिता के एक शोधार्थी का 'पीपली लाइव में मीडिया' पर रिसर्च पेपर

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'हम किसानों पर फिल्म बनाने चले थे लेकिन बन गयी मीडिया पर!'  - (महमूद फारूकी, सह-निर्देशक, 'पीपली लाइव')।  पीपली लाइव में मीडिया का चित्रण विषय पर शोध करने का मुख्य कारण फिल्म में प्रस्तुत किये गये मीडिया के चरित्र का अध्ययन करना था। इसके साथ ही फिल्म में दिखाऐ गये मीडिया के विषय-वस्तु की समीक्षा करना था। आमतौर पर फिल्म में मीडिया के चरित्र को जिस तरह से पेश किया गया है उसको लेकर व्यावहारिक जीवन में विरोधाभाष देखने को मिलता है।

फिल्‍म इस देश की उलझी हुई बुनावट के भीतर छिपी ढेर सारी विडंबनाओं पर एक फीकी हंसी हंसने की कोशिश है। शुरू से अंत तक ये एक इंटरटेनमेंट फिल्‍म है। किसान की समस्‍या, लोन और खुदकुशी तो एक प्रतीक है -  उसके बहाने मीडिया और राजनीति के खेल पर मजेदार अंदाज में गम्भीर सवाल उठाती है। साथ ही देश में किसानों की क्या समस्या है, क्यों ये आत्महत्या कर रहे है इनकी चर्चा मीडिया में क्यों सुनाई नहीं देती जैसी बातों पर जोर देना था। क्यों कोई दूसरा साईनाथ पैदा नहीं होता, जो देश भर में घूम-घूम कर बताये की किसानों की स्थिति क्या है और वे क्यों आत्महत्या कर रहे हैं।

भारतीय मीडिया में कुछ एक को छोड़ कर सभी पूरी तरह बेखबर है और उसे इस तरफ देखने की फुर्सत नहीं। जैसे बातों पर जोड़ दिया गया हैं। किस प्रकार  मीडिया शहर और गाँव को लेकर अपने असंतुलित नजरीए को अपनाती है चूँकि गांव टीआरपी नहीं देता इस कारणों से गांव की खबरें कही छूट जाती है जैसी बातों को प्रमुखता से लिया गया है। साथ ही विभिन्न परिणामों को भी प्रस्तुत किया गया है, कि लोगों की मीडिया पर आधारित सबसे पसंदीदा फिल्म कौन सी है, फिल्म में मीडिया को जिस तरह से दिखाया गया है उसमें कितनी सच्चाई है। आखिर गांव की खबरों का प्रतिशत इतना कम क्यों है? क्यों कि अक्सर यह कहा जाता है कि भारत गांवों में बसता है और जनसंख्या के नये आंकड़े भी इस बात के गवाह है। इस सिलसिले में कुछ टेलीविजन पत्रकारों से बात की गयी तो मुख्य रूप से चार कारण उभर कर आए।

विज्ञापनों का दबाव :  महंगा जनसंचार माध्यम होने के कारण टेलीविजन को निरंतर आय को निरंतर आय के लिए विज्ञापनों पर निर्भर रहना पड़ता है और अधिक विज्ञापन बटोरने के लिए केवल अधिक दर्शक होना जरूरी नहीं है बल्कि ऐसे दर्शक चाहिए जिनकी बाजार में हैसियत हो यानि जो सामाजिक-आर्थिक वर्ग में भी ए और बी हों। यही कारण है कि अंग्रेजी के अखबारों को हिन्दी के मुकाबले कम पाठक होने के बावजूद अधिक विज्ञापन मिलते हैं। चैनल अगर गांव के समाचार अधिक दिखाएंगे तो उनकी ब्रांड छवि को नुकसान हो सकता है। विज्ञापनदाता उसे संपन्न शहरी तबके के स्थान पर गांव वालों का चैनल समझने लगेंगे।

टीआरपी की होड़ :  दूसरा बड़ा कारण दर्शक संख्या है। माना जाता है कि अभी देश में सैटेलाइट टेलीविजन का विस्तार शहरों तक ही हो पाया है। भारत के लगभग साढ़े आठ करोड़ टीवी सेटों में से 4.5 करोड़ में केबल कनेक्शन है। इनमें से अधिकांश शहरी घरों में है। स्वाभाविक है कि टीआरपी बढ़ाने के लिए अपने दर्शकों से जुड़ी या उनकी रूची की ख़बरे अधिक दिखानी होंगी। टीआरपी मापने का सारा शोध भी शहर केंद्रित है इसलिए टीआरपी जोन की रिपोर्टिंग पर विशेष ध्यान दिया जाता है।

चैनलों के समीति संसाधन :  एक गांव में घटित खबर को कवर करने के लिए राजधानी से रिपोर्टर कैमरा टीम लेकर जाता है। यह एक महंगा मामला है जिस पर अधिक समय खर्च होता है। एक चैनल के लिए सभी जिला मुख्यालयों पर कैमरा टीम तैनात करना आर्थिक तौर पर अभी संभव नहीं लगता। हालांकि सभी चैनल तेजी से स्ट्रिंगरों की पूरी फौज जिला मुख्यालयों में तैनात कर रहे है। सीमित संसाधनों के चलते भी गांव की खबरें या तो रिपोर्टिंग के बिना ही छूट जाती है या फिर देर से रिपोर्ट हो पाती है।

शहरी समाचार :  गांव की खबरों को टेलीविजन बुलेटिन में स्थान न मिलने के कारण सामाचार चयनकर्ताओं का शहरी पूर्वाग्रह भी है। अधिकांश टेलीविजन पत्रकारों की समाजिक-सांस्कृतिक पृष्ठभूमि शहरी है इसलिए यह पूर्वाग्रह अनेक महत्वपूर्ण ग्रामीण खबरों को या तो सही संदर्भों में समझने ही नहीं देता या फिर उसे दरकिनार कर देता है। पत्रकार खबरों की यह गेटकीपिंग कई स्तरों पर करते हैं और एसाइनमेंट डेस्क इस दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण है। चैनलों का कवरेज मैट्रों केंद्रित होने के मसले पर टेलीविजन पत्रकारो की राय मिली-जुली है। एक बात साफ तौर पर उभर कर सामने आई कि पत्रकार इस बात को महसूस करते है कि गांव को अपेक्षित कवरेज नहीं मिल पाता है। लेकिन उनके महसूस करने का पूरे टेलीविजन ढाचे की कार्यप्रणाली पर कोई खास असर नहीं पड़ता। क्योंकि चैनल एक खास बाजार दबाव में अपने ढर्रे पर काम करते हैं। और एक पत्रकार इस मशीन का छोटा हिस्सा भर है। चैनल प्रबंधक की बात करे तो उन्हें अपनी आर्थिक सीमाओं का ध्यान रखना पड़ता है। गांवों की रिपोर्टिग एक खर्चीला और समय लेने वाला मामला है। इसलिए किसी रिपोर्टर को दूरदराज के एक गांव में रिपोर्टिग के लिए भेजने से पहले कई बार सोचा जाता है। विभिन्न लोगों से बातचीत से यह भी पता चला कि चैनल विशेष की समाचार नीति भी इस मामले में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। प्रत्येक चैनल की अपनी एक ब्रांड छवि होती है और उसी के हिसाब से चैनल अपनी प्राथमिकता तय करता है।

दूरदर्शन के कार्यक्रम कृषि दर्शन की तरह किसानों और ग्रामीण जनता को केंद्रित कर इनाडू टेलिविजन 'अन्नदाता' नामक कार्यक्रम दिखाता है। इसी प्रकार गांव की खबरों पर केंद्रित सहारा 'हमारा गांव' दिखाता है। लेकिन इस प्रकार के कार्यक्रम गिनती के हैं। टीवी चैनल गांवों मे केवल दुर्घटना, आपदा, सनसनीखेज अपराध या किसी राष्ट्रीय हस्ती के दौरे को कवर करने के लिए ही जाते है या नत्था जैसे किसान की आत्महत्या को कवर करने। फिल्म पीपली लाइव की बात करे तो पीपली लाइव की नंदीता नत्था के अलावा बाकी लोगों को जिस तरह से फ्रेम से बाहर करने की बात राकेश से करती है, बकरियों को चारा खिलाते हुए फुटेज लेने की कृत्रिम कोशिश करती है, वह सब कुछ बेशर्मी और चैनल की सरोकारी पत्रकारिता का एक पैश्टिच रूप है, जो कि दीपक नाम के किरदार में और मजबूती से स्थापित होता है, पीपली लाइव में उसके चैनल का रंग ब्लू है और नाम भी उस ब्लू रंग के चैनल से मेल खाते हैं, इसलिए बहुत अधिक कल्पना करने की जरूरत नहीं रह जाती।

वही न्यूज चैनलों के मुकाबले प्रिंट मीडिया को अधिक विश्वसनीय और विकल्प के तौर पर देखने के पीछे कहीं न कहीं हिन्दी सिनेमा के भीतर अखबारों की आदिम सकारात्मक छवि भी काम कर रही होती है, जो कि नया संसार (1941) से शुरू होकर मशाल (1984) से लेकर नो वन किल्ड जेसिका (2011) तक विस्तार पाती है। इस विषय को लेने का मुख्य कारण था कि क्या मीडिया सिर्फ गोबर से गू तक के सफर तक को ही बताती है, क्या सब कुछ टीआरपी को लेकर ही किया जाता है। क्या पत्रकार मुंबई का 26/11  को कवर नहीं करता, क्या वह बिहार बाढ़ में फँसे लोगों की मदद नहीं करता। कैसे एक महिला एंकर /पत्रकार  अपने तीन माह के बच्ची को घर पर छोड़ कर अपने काम को दिन-रात अंजाम दिया करती है, कैसे एक प्रेगनेंट महिला अपने संपादक के कहने पर अपने पति को बिना बताये चुनाव कवरेज के लिए घर से निकल जाती है। ये ऐसी तमाम बाते हैं जिसे नज़र अंदाज नहीं किया जा सकता। किसी भी सिक्के के दो पहलू होते है शायद पहले हिस्से को पीपली लाइव में दिखाया गया है।

अंतत: कहा जा सकता है कि फिल्म 'पीपली लाइव'  में मीडिया का जो चित्रण है वह उसके एक पहलू को दिखाता है। उसके परे भी एक मीडिया है। मीडिया के इतिहास में कोई घटना तब तक खबर नहीं बनती जब तक वो घट नहीं जाती, ख़ासकर इलक्ट्रोनिक मीडिया के लिए। सवाल यह कि हिन्दुस्तान में रोज़ हज़ारों ऐसी घटनाएं मीडिया रिपोर्टिंग से महरूम रह जाती हैं। हमारे मुल्क़ की मीडिया महानगर और शहर केन्द्रित है, गाँव और क़स्बे से उसका सरोकार नहीं के बराबर है। पीपली लाइव में मीडिया के इस बुनियादी सच को उलट दिखाया गया है। हिन्दुस्तान के 62 साल के इतिहास में कोई भी कस्बाई स्तर पर बिना घटे कोई घटना तो दूर घटने के बाद भी चुनाव में राष्ट्रीय मुद्दा नहीं बना, पीपली लाइव फिल्म को छोड़ कर।

मीडिया के इतिहास में कई बार ऐसी खबरें बनी हैं। आपको उस एक चरित्र को याद करना चाहिए -  जिसने कहा था कि फलां तारीख को मेरे जीवन का अंत है और सारे टीवी चैनल का कैमरा उसको कैद करने उसके गांव पहुंच गया। बाद में वो नहीं मरा और फिर टीवी वाले नैतिकता का पाठ पढ़ाने लगे थे। फिल्म में जिस मीडिया को दिखाया गया है, वर्तमान में कुछ पत्रकारों को छोड़कर बाकी इस तरह की खबरों के अहमियत नहीं दिया करते है। फिल्म में दिखाये गये पत्रकारों की ही बात करें तो उनमें चेतना और ग्रामीण परिवेश की समक्ष नहीं होने के कारण भी ग्रामीण पत्रकारिता कुंठित हुई है। यह चौंकाने वाला सत्य है कि ग्रामीण समाचार में सर्वाधिक समाचार आपसी विवाद से संबंधित होते हैं,  जिनके गर्भ में या तो भूमि विवाद होता है या बिल्कुल महत्वहीन घटनाएं। कई महत्वहीन घटनाएं ऐसी होती हैं जिनका समापन आत्महत्या के प्रयास या आत्महत्या से होता है। साधारण समझ वाला पत्रकार विकास या बुनियादी समस्याओं को भूल कर उपरोक्त घटनाओं को ही मूल समस्या समझ बैठता है। इसी बीच प्रेम या बलात्कार संबंधी घटना मिल जाए तो पत्रकार इसे ही बड़ा समाचार मानकर खुश हो जाता है।

पीपली लाइव में नत्था की आत्महत्या के घोषणा के बाद पूरे मामले ने राजनीतीक रंग लेने के कारण तूल पकड़ा। लगभग पूरे राज्य के लोगों ने इस गांव का नाम अखबारों और टीवी के जरिये जान लिया। पत्रकार भी स्थापित हो गये। पर गांव में सड़क, बिजली, पानी, शिक्षा आदि की क्या स्थिति है, इसे जानने की जरूरत किसी ने नहीं समझी। यह फिल्म समसामयिक इलेक्ट्रोनिक मीडिया पर तीखा प्रहार करती है। कुल मिलाकर यह फिल्म देश में हो रही किसानों की आत्महत्या और उसपर होने वाली मीडियाबाजी व राजनीति पर तीखा व्यंग्य है।

पवन जायसवाल

शोधार्थी, इलेक्ट्रानिक मीडिया प्रोडक्शन एंण्ड मैनेजमेंट

पत्रकारिता एंव नवीन मीडिया अध्ययन विधापीठ

इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविधालय

मैदान गढ़ी, नई दिल्ली-110068


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