प्रभाषजी पर किताब लिखने के लिए स्वाति तिवारी ही मिलीं?

E-mail Print PDF

: अगर स्वाति तिवारी जनसम्पर्क विभाग के जुगाड़ु अपर संचालक सुरेश तिवारी की पत्नी नहीं होतीं तो क्या इस किताब का विमोचन इस गरिमापूर्ण और भव्य कार्यक्रम में हो सकता था? :  स्वाति तिवारी सरकारी कर्मचारी हैं जिन्हें लेखिका के रूप में महान बनाने के लिए सुरेश तिवारी ने अपनी पूरी जिन्दगी दॉव पर लगा रखी है : जोड़तोड़ और सरकारी विज्ञापनों के दम पर लेखक-लेखिकाएं बनाने की साजिश का भंडाफोड़ किया जाना चाहिए :

बात सोचने वाली है, इसलिए सोचने में और लिखने में कोई बुराई नहीं है। सवाल इस बात का है कि आदरणीय प्रभाषजी पर किताब लिखने के लिए स्वाति तिवारी नामक सरकारी कर्मचारी कम महिला लेखिका ही मिलीं? क्या देश के सारे बड़े पत्रकार और जोशी जी के समकालीन इतने गए गुजरे हैं कि उनमें से किसी ने भी अपने श्रद्धासुमन जोशी को लेखन के माध्यम से अर्पित करना उचित नहीं समझा? बात तो यह भी सोचने में कोई बुराई नहीं है कि जोशीजी के जाते ही पामनों के भले हो गए। पामनों से आप समझ ही गए होंगे कि जोशीजी की आड़ में स्वाति तिवारी महान हो गईं?

तथाकथित महान हिन्दी लेखिका स्वाति तिवारी से प्रेरणा लेकर अब मैं भी आदरणीय अब्दुल कलाम आजाद जी के वैज्ञानिक अवदान पर एक किताब लिखने की तैयारी कर रहा हूं, भले ही मैंने एम.ए. हिन्दी साहित्य में किया हो और विज्ञान से मेरा कोई दूर-दूर तक रिश्ता नहीं रहा हो लेकिन यदि दुकान जमाने का मौका और माहौल मिले तो इसमें बुराई क्या है? ज्यादा से ज्यादा लोग तो यही कहेंगे कि अजु‍र्न राठौर का वैज्ञानिक सोच से क्या लेना देना? अब लोग कहें तो कहें, जब देश के तमाम वैज्ञानिक लेखक चुप हैं तो मौके का फायदा अजु‍र्न राठौर क्यों नहीं उठाए। ऐसी ही सोच स्वाति तिवारी और उनके पति सुरेश तिवारी की रही होगी, जो हिन्दी साहित्य की प्रसिद्ध पत्रिकाओं में कहानियां जनसम्पर्क विभाग के विज्ञापन के साथ छपवाते हैं।

यदि सुरेश तिवारी चाहें तो सबूत भी दिए जा सकते हैं। बहरहाल बात जोशी जी की चल रही है। सवाल यह है कि स्वाति तिवारी का हिन्दी पत्रकारिता से क्या लेना देना? क्या उन्होंने जोशी जी के साथ पत्रकारिता की है? देखा जाए तो वे एक सरकारी कर्मचारी हैं जिन्हें लेखिका के रूप में महान बनाने के लिए सुरेश तिवारी ने अपनी पूरी जिन्दगी दॉव पर लगा रखी है। चलिए मान लेते हैं स्वाति तिवारी महान महिला लेखिका हैं और तसलीमा नसरीन से लेकर अमृता प्रीतम तक उनके आगे पानी भरती है फिर भी इस बात को कैान जस्टिफाई करेगा कि स्वाति तिवारी का पत्रकारिता से कोई लेना देना रहा है। जोड़तोड़ और सरकार के विज्ञापनों के दम पर लेखक और लेखिकाएं बनाने की जो साजिश चल रही है उसे इस देश के और मध्यप्रदेश के और जोशी जी के साथ दिल से जुड़े लोगों को समझना चाहिए और उसका भंडाफोड़ भी करना चाहिए।

सरकार को भी यह देखना चाहिए कि उसके विज्ञापनों के दम पर कहीं नकली लेखक फायदा तो नहीं उठा रहे हैं। सरकार का पैसा जनता का पैसा है जो टैक्स के रूप में दिया जाता है और टैक्स देने वाले हर नागरिक को यह अधिकार है कि वह जनधन के दुरूपयोग के खिलाफ आवाज उठाए। अपने इसी अधिकार का उपयोग करते हुए मैं यह रिपोर्ट लिख रहा हूं, इस खतरे के साथ कि सुरेश तिवारी जब तक जनसम्पर्क विभाग में हैं इस नाचीज के साथ लगातार अन्याय ही होता रहेगा, जो वे इन्दौर में कर भी चुके हैं। इसके बावजूद विचारों की अभिव्यक्ति हर नागरिक प्रथम दायित्व है। शर्मनाक बात तो यह भी है कि बेचारे आलोक तोमर जल्दी चले गए वर्ना क्या वे जोशी जी पर किताब लिखने के प्रथम अधिकारी नहीं थे।

क्या जोशी जी तमाम समकालीन और उनके साथ काम कर चुके लोग यह किताब नहीं लिख सकते थे? सवाल इस बात का भी नहीं है कि स्वाति तिवारी ने यह किताब क्यों लिखी? वे चाहें तो ओबामा पर भी किताब लिख सकती हैं? शायद लिख भी रही हों, लेकिन सरकारी कर्मचारी स्वाति तिवारी की किताब को जिस तरीके से इंदौर में इतने बड़े गरिमापूर्ण कार्यक्रम में महिमामंडित किया गया क्या वह उचित था? अगर स्वाति तिवारी जनसम्पर्क विभाग के जुगाड़ु अपर संचालक सुरेश तिवारी की पत्नी नहीं होती तो क्या इस किताब का विमोचन इस गरिमापूर्ण और भव्य कार्यक्रम में हो सकता था? ये सवाल मैं प्रभाष परंपरा न्यास के रामबहादुर राय और इंदौर प्रेस क्लब के प्रवीण खारीवाल के सामने छोड़ रहा हूं। इन लोगों को सोचना चाहिए कि वे अपने कार्यक्रम के जरिए प्रभाष जोशी का सम्मान कर रहे हैं या उन्हें बौना बनाकर अपमानित कर रहे हैं।

इंदौर से अर्जुन राठौर की रिपोर्ट


AddThis