जमीनी हकीकत से दूर है राहुल पंडिता की 'हलो बस्‍तर'

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इन दिनों 'बस्तर' शब्द का अपना बाजार है संभवत: इसी लिये ट्रांक्वीबार प्रेस से अंगरेजी में प्रकाशित राहुल पंडिता की पुस्तक का शीर्षक 'हलो बस्तर'  रखा गया है। यह पुस्तक भारत में माओवादी गतिविधियों उनके इतिहास, वर्तमान और भविष्य पर केन्द्रित है जिसमें कुछ गिने चुने पृष्ठ ही बस्तर पर हैं।

'हलो बस्तर' में कितना बस्तर? : पृष्ठ -8 में माओवादियों के बस्तर में सक्रिय माड़ डिविजन का जिक्र किया हैं तथा तीन पंक्तियों में अबूझमाड़ की परिभाषा भी हैं। दूसरा अध्याय नक्सली/माओवादी आन्दोलन के इतिहास कर केन्द्रित है, बस्तर इस इतिहास का हिस्सा नही है। चौथे अध्याय का शीर्षक है 'हलो बस्तर'  जो एकल दृष्टिकोण से बस्तर अंचल की संक्षिप्त प्रस्तुति करता है। जो यह मानते हैं कि दण्डकारण्य में माओवाद एक स्वत: स्फूर्त आन्दोलन हैं उन्हें पृष्ठ 53-54 को गंभारता पूर्वक पढना चाहिये। आन्ध्र में सक्रिय नक्सली नेता कोंडापल्ली सीतारमैय्या अपने अनेकानेक प्रयासों के बाद भी मुलुगु के जंगलों में पैर जमाने में सफल नहीं हो पा रहे थे।

लेखक बताते हैं कि अपनी एम्स में डॉक्टर बेटी और दामाद के सुझाव पर सीतारमैय्या को आन्ध-महाराष्ट्र से सीमा लगे होने के कारण बस्तर के जंगलों के भीतर अपने गुरिल्लाओं के लिये सुरक्षित क्षेत्र बनाने का ख्याल कौंधा। जून 1980 में दो दल बस्तर की ओर भेजे गये थे। जो तथ्य नदारद हैं वे हैं - माओवादी किस रास्ते से बस्तर में प्रविष्ठ हुए? कहाँ-कहाँ गये?? पृष्ठ-63 में वे लिखते हैं कि 'अपना कार्य/लड़ाई आरंभ करने के लिये पहले वन अधिकारी तथा ठेकेदारों पर ध्यान केन्द्रित किया गया। पेपर मिल के प्रबंधन, ठेकेदारों तथा उन के खिलाफ संघर्ष किया गया जो वनोपज लूट रहे थे। तेन्दू-पत्ता संग्रहण तथा बांस संग्रहण की दरें बढाने के लिये संघर्ष किया गया।'  पृष्ठ -66 पर उद्धरण है कि 'माओवादी जब बस्तर में प्रविष्ठ हुए तो उन्होंने पाया कि यहाँ लोग केवल गोंडी ही बोलते है जिसकी अपनी कोई लिपि नहीं है। आज सभी माओवादी गुरिल्ला न केवल गोंडी बोल और समझ लेते हैं बल्कि इस बोली के लिये लिपि बनाने का कार्य कर रहे हैं। जिन इलाकों में माओवादी स्कूल चला रहे हैं वहाँ गोंडी में पाठयपुस्तक जारी करने का प्रयास किया है।'

छठे अध्याय के पृष्ठ-100 में जानकारी दी गयी है कि 'दक्षिण बस्तर में पार्टी नें लोगों को जल संग्रहण के लिये हौज (टैंक) बनाने के लिये प्रोत्साहित किया। माओवादियों नें मत्स्यपालन को बढ़ावा दिया है तथा आदिवासियों द्वारा पाली गयी मछलियों को दिल्ली और कलकत्ता में बाजार उपलब्ध कराया है। आदिवासियों को तरह तरह की सब्जियाँ लगाने के लिये प्रेरित किया गया है। माओवादियों नें वर्ष 1996-97 में 20000 फलों के पौधे वितरित किये तथा 1996-98 के बीच दक्षिण बस्तर के 100 आदिवासी परिवारों को बैल बाँटे।'  लेखक पृष्ठ संख्या 103 में लिखते हैं कि अबूझमाड़ माओवादियों का 'सेंट्रल गुरिल्ला बेस'  हैं।

...ऐसा भी है बस्तर!!! : प्रश्न है कि क्या 'अबूझमाड़'  ही बस्तर है? प्राकृतिक दृष्टि से बस्तर के छह भाग हैं- उत्तर का मैदान, केशकाल घाटी, अबूझमाड, उत्तरपूर्वी पठार, दक्षिण का पहाड़ी क्षेत्र तथा दक्षिणी निम्न भूमि। 'अबूझमाड'  वृहत बस्तर का मात्र एक हिस्सा है। कम ही लोग जानते हैं कि अबूझमाड़ ही न तो आजादी से पहले अबूझ था न ही महाराजा प्रवीरचंद्र भंजदेव की नृशंस हत्या तक रहा है। तुगलकी नीति निर्माताओं ने अबूझमाड़ को प्रतिबंधित क्षेत्र बना कर जो एतिहासिक गलती की थी माओवादियों नें अपने पैर जामाने में इसका ही लाभ उठाया है। 'अबूझमाड'  शब्द का सतही प्रयोग प्राय: दिल्ली से बस्तर देखने वाले लेखकों ने किया है। माडियाओं के दो प्रमुख प्रकार है अर्थात वे जो 'माड़'  या पर्वत पर हैं - अबूझ माडिये और जो पर्वतों से उतर कर मैदानों में आ गये - दण्डामि माडिये। पुस्तक 'बस्तर-इतिहास एवं संस्कृति'  में लाला जगदलपुरी लिखते हैं - ''मडिया लोग स्वयं को 'कोयतूर' कहते हैं। माडिया 'गोंड' कहलाना पसंद नहीं करते।''

माओवादिओं को अपने चालीस साला इतिहास पर जितना गर्व है उससे गौरवशाली और प्राचीन बस्तर के महान भूमकालियों का अतीत है। राजा, मराठाओं, अंगरेज तथा भारत सरकार के विरुद्ध जो भूमकाल हुए वे हैं -  हलबा विद्रोह (1774-1779),भोपालपट्टनम संघर्ष (1795), परलकोट विद्रोह (1825), तारापुर विद्रोह (1842-1854), मेरिया विद्रोह (1842-1863), महान मुक्ति संग्राम (1856-57), कोई विद्रोह (1859), मुरिया विद्रोह (1876), रानी-चो-रिस (1878-1882), महान भूमकाल (1910), महाराजा प्रबीर चंद्र का विद्रोह (1964-66)। दुर्भाग्य! बस्तर की वास्तविक पहचान माओवाद के प्रचारतंत्र के कारण खोती जा रही है। 'हलो बस्तर'  में दावा तो वनांचल के गुंडाधुरों से परिचित कराने का है लेकिन जो बाहर आता है वह 'किशन जी'  और'गणपति'  जैसा कुछ है। बस्तर में किसी मजदूर आन्दोलन का नेतृत्व माओवादियों नें नहीं किया है। बस्तर में कोई पेपर मिल नहीं है। तेन्दुपत्ता नीति का आंशिक श्रेय माओवादियो को अवश्य दिया जा सकता है।

इस झूठ का खंडन होना चाहिये कि बस्तर की संपर्क बोली 'गोंडी'  है। डॉ. हीरा लाल शुक्ल की पुस्तक 'बस्तर का मुक्तिसंग्राम'  के पृष्ठ -6 में उल्लेख है- 'वर्तमान में निम्नांकित मुख्य जातियाँ बस्तर के भूभागों में रहती हैं -  1.सुआर ब्रामन, 2.धाकड, 3.हलबा, 4.पनारा, 5.कलार, 6.राउत, 7.केवँटा, 8.ढींवर, 9.कुड़्क, 10.कुंभार, 11.धोबी,12.मुण्डा, 13.जोगी, 14.सौंरा, 15.खाती, 16.लोहोरा, 17.मुरिया, 18.पाड़, 19.गदबा, 20.घसेया, 21.माहरा, 22.मिरगान, 23.परजा, 24.धुरवा, 25.भतरा, 26.सुण्डी, 27.माडिया, 28.झेडिया, 29.दोरला तथा 30.गोंड। उपर्युक्त मुख्य जातियों में 1 से 22 तक की जातियों की 'हलबी'  मातृबोली है और शेष जातियों की हलबी मध्यवर्ती बोली है। कुछ जातियों की अपनी निजी बोलियाँ भी हैं जैसे क्रम 23 और 24 में दी गयी जातियों की बोली है 'परजी'  जबकि 25 और 26 की बोली है 'भतरी'। क्रम 27 से 30 तक की बोलियाँ हैं 'माडी' तथा 'गोंडी'।

लाला जगदलपुरी ने अपनी पुस्तक 'बस्तर- लोक कला, संस्कृति प्रसंग'  के पृष्ठ-17 मे जानकारी दी है -  'गोंडी बोलियों में परस्पर भाषिक विभिन्नतायें विद्यमान हैं। इसी लिये गोंड जनजाति के लोग अपनी गोंडी बोली के माध्यम से परस्पर संपर्क साध नहीं पाते यदि उनके बीच हलबी बोली न होती।....। हलबी, रियासत काल में बस्तर राज्य की राजभाषा के रूप में प्रतिष्ठित रही थी।....और आज भी बस्तर संभाग में हल्बी एक संपर्क बोली के रूप में लोकप्रिय है।'  लाला जगदलपुरी ने 'बस्तर-इतिहास एवं संस्कृति'  के पृष्ठ-283-284 में प्रचलित गोंडी बोलियों का वर्गीकरण दिया है -  'अबूझमाडिया, दण्डामिमाडिया, घोटुल मुरिया, झोरिया, दोरला और परजा धुरवा लोगों की बोलियों का सामूहिक नाम गोंडी है। अबूझमाडी, दण्डामिमाडी, मुरिया, दोरली और परजी-धुरवी बोलियाँ गोंडी की शाखाएं हैं। गोंडी की ये सभी बोलियाँ एक दूसरे से भिन्नता लिये हुए प्रचलित हैं।'

कथनाशय है कि अपनी अबूझ कोशिशों से माओवादी बस्तर अंचल की बोलियों का जो क्रांतिकारी सत्यानाश कर सकते हैं उसकी कल्पना नहीं की जा सकती। बस्तर अंचल में गोंडी बोली पर कार्य हुआ है तथा देवनागरी में ही इसका अपना साहित्य तथा अनूदित साहित्य, यहाँ तक कि 'गोंडी-हिन्दी' शब्दकोष भी उपलब्ध है। माओवादियों की किताबों में क्या होगा इससे पहले यह जवाब जरूरी है कि 'किस गोंडी बोली'  का जिक्र राहुल की किताब में है - अबूझमाडी, दण्डामिमाडी, मुरिया, दोरली या कि परजी-धुरवी?...? वह 'इजाद'  गोंडी लिपि क्यों सार्वजनिक नहीं की जाती कि पता तो चले फारसी जैसी दिखती है या चाईनीज की तरह? बोली ही क्यों - लेखक प्रत्यक्षदर्शी हैं किसी कैम्प के पास माओवादी गुरिल्लों ने एक जहरीले साँप को देखा जिसके मुँह में दूसरा साँप दबा हुआ था। इसे तुरंत मार ही दिया गया। इस वनांचल को आधार इलाका मानने वालों को उनके जीव जंतुओं के साथ जीना भी आना चाहिये और उनके जीवन की रक्षा का दायित्व भी जबरन काबिजों और स्वयं घोषित समानांतर सरकार का ही है। माओवादी बस्तर की जैवविविधता को अपना कवच बना कर घुसे हैं और अब उसे भी नष्ट करने में गुरेज नहीं करते।

1996 से 2011 तक के बीज वितरण, पौध वितरण या मवेशी वितरण के आंकडे लेखक क्या इस लिये प्रस्तुत नहीं किये हैं कि अब बंदूक की खेती पर ही माओवादियों का अधिकतम ध्यान केन्द्रित है? सब्जियाँ गुरिल्लाओं की आवश्यकता पूर्ति के लिये ही लगवायी जा रही है जो माडियों की स्वाभाविक खेती प्रक्रिया का हिस्सा नहीं है? पुस्तक में स्पष्ट नहीं है किस किस गाँव में मछलियाँ पाली गयीं और कब कैसे लद कर दिल्ली और कलकत्ता पहुँच गयी? इतना 'विराट'  मत्स्य उत्पादन कि आसपास का बाजार छोडिये सीधे दिल्ली-कलकत्ता सप्लाई?? सारा माल बाहर चला जाता होगा, जैसे कश्मीर के सेब चले जाते हैं?...। जो नास्तिकता की शराब माओवादियों के प्यालों ने छलकानी आरंभ कर दी है,  क्या वह आदिम सभ्यता उनकी मान्यताओं और पहचान पर हमला नहीं है? इस पुस्तक के अंतिम अध्याय के लेखक कोबाद गाँधी ने भारत भर के आँकडे समेट दिये किंतु उस बस्तर को हलो कहने के लिये उन्हें चार वाक्य भी नहीं मिले। मैं तो इतना ही जानता हूँ कि दिल्ली में चम चम करती लेखन की दुनिया है। वह वही परोसती है जो बिकता है। जमीन और जमीनी हकीकत से किसे वास्ता?

लेखक राजीव रंजन प्रसाद दंतेवाड़ा के निवासी हैं तथा पत्रकारिता से जुड़े हैं.


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