हिंदी के सबसे बड़े प्रकाशक की प्रतिष्ठा पर प्रश्नचिन्ह

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: मेधा पाटकर ने जिस पुस्तक को झूठ का पुलिंदा कहा, उसका लोकार्पण नामवर सिंह ने क्यों किया..? : "विवाद, विरोध और विकास की नर्मदा" भारत की सबसे बड़ी बांध परियोजना सरदार सरोवर को विकास के गौरवशाली प्रतीक के रूप में प्रस्तुत करनेवाली पुस्तक है, जिसके लेखक नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण के जन संपर्क विभाग में संयुक्त सचिव आदिल खान हैं.

इस पुस्तक का लोकार्पण 14 जुलाई को इंदौर के देवी अहिल्या लाईब्रेरी में हिंदी के चर्चित समालोचक डॉ. नामवर सिंह ने की है. इस पुस्तक का प्रकाशन हिंदी के प्रतिष्ठित प्रकाशन समूह राजकमल प्रकाशन ने की है. इस पुस्तक का लोकार्पण करते हुए नामवर सिंह ने कहा -"किताबों के मामले में दिल्ली इंदौर के सामने उसर सी जगह है. नर्मदा एक नदी नहीं संस्कृति का नाम है. इस पुस्तक में नर्मदा के बारे में तथ्यपरक सूचनाएं दी गयी है. मैं खुद अब लेखक की बजाय पाठक हो गया हूँ, इसलिए मेरे लिए नर्मदा पर केन्द्रित पुस्तक का लोकार्पण गौरव की बात है." पुस्तक के लोकार्पण के बाद राजकमल के स्टॉल से तत्काल यह पुस्तक क्यों गायब कर दी गयी...? जाहिर है कि सरदार सरोवर परियोजना से विस्थापित होने वाली सबसे बड़ी आबादी मध्य प्रदेश की है और इन के पुनर्वास और पुनर्वास पैकेज में हुए बड़े घोटाले के विरुद्ध किसानों-आदिवासिओं का संघर्ष भोपाल, इंदौर, बड़वानी से दिल्ली की सड़क पर जारी है. पुस्तक लोकार्पण के तत्काल बाद इसलिए गायब कर दी गयी कि नर्मदा बचाओ आन्दोलन के समर्थक इस पुस्तक पर कोई विवाद-बलवा ना खड़ा कर दें.

इस पुस्तक के लोकार्पण के बाद नामवर सिंह प्रभाष जोशी के निमित्त आयोजित भाषाई पत्रकारिता महोत्सव में शरीक हुए. इस आयोजन में नर्मदा बचाओ आन्दोलन की मुख्य सूत्रधार मेधा पाटकर जनांदोलन की भूमिका पर बोलने के लिए आमंत्रित की गयीं. मेधा पाटकर ने सरदार सरोवर परियोजना को गौरवशाली बतानेवाली इस पुस्तक के लोकार्पण के तत्काल बाद टिप्पणी की -"नामवर जी ने इस पुस्तक का लोकार्पण किया..? नामवर जी हमसे एक बार पूछ तो लेते ...?"  फ़िलहाल नर्मदा बचाओ आन्दोलन के जानकार इस पुस्तक की समीक्षा कर रहे हैं. मेधा पाटकर ने तत्काल राजकमल प्रकाशन और नामवर जी के खिलाफ आन्दोलन समर्थकों से कोई प्रतिक्रिया ना देने का आग्रह किया है. बावजूद मेधा पाटकर को नामवर सिंह से शिकायत है कि आपने बिना पढ़े इस पुस्तक का लोकार्पण क्यों कर दिया ...?

मेधा पाटकर ने आदिल खान लिखित इस पुस्तक को झूठ का पुलिंदा बताते हुए सरदार सरोवर परियोजना के सन्दर्भ में सरकारी विज्ञापन बताया है. मेधा पाटकर और आन्दोलन समर्थकों को इस बात की आपत्ति है कि हिंदी के एक प्रतिष्ठित प्रकाशक ने इस बार उजड़े हुए लाखों लोगों के विरुद्ध सरकारी प्रचार के लिए अपना ब्रांड दे दिया. ज्ञात हो की आदिल खान विस्थापितों के हक़ की आवाज को झुठलाते हुए सरकारी पक्ष को मीडिया से प्रचारित करने में सरकार के  अति भरोसेमंद रहे हैं और सरकार ने इसी सरकारी विश्वसनीयता के एवज में आदिल खान को अवकाश के बाद सेवा विस्तार देते हुए नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण के संयुक्त निदेशक की कुर्सी उन्हें उपहार में दी है. निमाड़ के मशहूर लोक कथा वाचक और आन्दोलन के अगुआ नेता सीताराम काका ने ऐसी पुस्तक को साहित्य मानने से इनकार किया है, जो जन- हिताय की बजाय सरकार -हिताय के सूत्र पर प्रस्तुत की गयी हो.

हिंदी के सचेतन समाज को यह विचार करना है कि क्या ऐसे पुस्तकों के प्रकाशन से साहित्य का स्तर ऊँचा उठेगा ...? क्या नामवर जी ने सच में पुस्तक के भीतर का यथार्थ जाने बिना पुस्तक का लोकार्पण कर दिया ....? क्या देश के नामचीन लेखक भारत के सबसे बड़े निःशस्त्र -अहिंसात्मक जनांदोलन के विरुद्ध प्रकाशित इस पुस्तक के विरुद्ध इसलिए अपना मुख नहीं खोलेंगे कि राजकमल प्रकाशन के स्वामी बुरा मान जायेंगे...? अगर जन और जनांदोलन के प्रति आपकी राजनितिक -लेखकीय प्रतिबद्धता है तो एक बड़े अमीर प्रकाशक के साथ होने की बजाय सत्य कहने का सहस जुटाइए.

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.


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