डा. नामवर सिंह : विवादास्‍पद एवं बौद्धिक उपस्थिति

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वरिष्ठ समालोचक डॉ. नामवर सिंह का हिन्दी आलोचना के विकास-विस्तार में महत्वपूर्ण योगदान है। वे हमारे समय की बौद्धिक उपस्थिति हैं। उन्हीं के शब्दों में 'जिसमें सारा हिन्दी समाज शामिल हैं।'  मार्क्सवाद से शुरू करके अब तक की जीवन यात्रा में वे कई उपलब्धियों से लैस आलोचक हैं।

वाराणसी से तीस मील दूर चंदौली जिले के छोटे-से गांव जीअनपुर में २८ जुलाई,  १९२७ को उनका जन्म हुआ। हालांकि नामवर सिंह की पुस्तकों में इनकी जन्‍म तिथा १ मई (श्रम दिवस), १९२७ दर्ज है। हिंदी क्षेत्र में पुनर्जागरण के नायक के रूप में उन पर आयेजित 'नामवर के निमित'  (अमृतवर्ष-२००२) में असली जन्म दिन का लोगों को पता चला। पिता सागर सिंह किसान और शिक्षक थे। मां बागेशवरी देवी थीं। उनकी शिक्षा-दीक्षा वाराणसी में सम्पन्न हुई। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से हिंदी में एम. ए. (१९५१) और पी-एच.डी. की उपाधि (१९५६ में) प्राप्त की। पृथ्वीराज रासो : भाषा और साहित्य पर उनका शोध ग्रंथ काफी चर्चित रहा। आज भी इस पुस्तक की मौलिक दृष्टि की विशिष्ट पहचान है। 'हिन्दी के विकास में अपभ्रंश का योग'  की भूमिका प्रो. पी.एल.वैद्य जैसे विद्वान ने लिखी थी।  इसी दौरान १९५३ से १९५९ तक उन्होंने विश्वविद्यालय में अध्यापन किया। वे आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जी के प्रिय शिष्य रहे। द्विवेदी हिन्दी साहित्य के उस समय के सर्वाधिक यशस्वी प्रोफेसर थे।

जोधपुर विश्वविद्यालय, सागर, कन्हैयालाल माणिक मुंशी हिंदी विद्यापीठ (आगरा), जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय तक के अकादमिक सफर में अनेक पड़ावों से गुजरते हुए उन्होंने कई जीवन उपलब्धियां अर्जित की। वे बेहद लोकप्रिय अध्यापक रहे। 'अध्यापक हो तो नामवर जैसा'  उनके शिष्य आज भी कहते हैं। मध्यकालीन और आधुनिक साहित्य के बहुपठित विद्वान हैं। उनकी वक्तता उन्हें कक्षाओं, सभागारों में हिट करती है। उनके शिष्यगण बताते हैं कि काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से जे.एन. यू. तक जहां भी रहे उनकी  कक्षाएं खचाखच भरी रहती थीं। दूसरे विषयों के छात्र भी उनकी कक्षाओं के गेट-खिड़कियों पर खड़े होकर उन्हें सुनते थे। हिन्दी के विकास में अपभ्रंश का योग, पृथ्वीराज रासो की भाषा, इतिहास और आलोचना, छायावाद, आधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियां, बकलम खुद, कविता के नये प्रतिमान, दूसरी परम्परा की खोज, वाद-विवाद संवाद आदि उनकी प्रमुख पुस्तकें हैं।

'दूसरी परंपरा की खोज'  उनकी अपनी लिखी प्रिय आलोचना पुस्तक है। उनका कहना है कि 'दूसरी परंपरा का मतलब द्वितीय परंपरा नहीं बल्कि एक और परंपरा है। वह गणना के क्रम में दूसरी नहीं थी।'  इसके अलावा उन्होंने 'जनयुग'  साप्ताहिक (१९६५-६७), 'आलोचना'  १९६७- ९१ का संपादन किया। पुनर्प्रकाशित 'आलोचना' (२००० से) के भी वे प्रधान संपादक हैं। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल संचयन चिंतामणि : भाग-३,  आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के निबन्ध संकलन, आधुनिक रूसी कविताएं, आज की हिन्दी कहानी, नवजागरण के अग्रदूत बालकृष्ण भट्ट आदि का भी उन्होंने संपादन किया है। समकालीन साहित्य की प्रवृत्तियों को लेकर उन्होनें अनेक 'विमर्श' खड़े किये हैं।

उनकी स्थापनाएं जितनी जीवंत और मौलिक होती हैं, उतनी ही विवादास्पद! वे चौंकाऊ स्थापनाओं ने लिए विख्यात रहे हैं। विचारों में वे अत्यंत प्रगतिशील रहे हैं। इसीलिए वे अपने साहित्य-चिंतन के प्रतिमानों को बार-बार रचते रहते हैं। अब यदि उनके 'भक्तगण'  उन्हें विचार और इतिहास के अंत की तरह आखिरी आलोचक साबित कर चुके हों या कर रहे हों तो इसमें नामवरजी क्या कर सकते हैं? लेकिन नामवरजी भी अपनी एक चौकाउं स्थापना में 'आचार्य शुक्ल को ही एकमात्र आचार्य घोषित कर चुके हैं, अपने गुरु द्विवेदी जी को भी नहीं'  तो इसमें नामवरजी न आचार्य शुक्ल की प्रतिष्ठा बढ़ा रहे हैं और न ही उनको आखिरी आलोचक बताने वाले उनकी प्रतिष्ठा। 'हंस'  संपादक राजेंद्र यादव के शब्दों में कहूं तो 'वचिक ही मौलिक है'  का धर्म निवाह रहे नामवर जी 'दूसरी परंपरा की खोज'  करके भी यदि सिर्फ आचार्य रामचन्द्र शुक्ल को ही आचार्य मानते हों, अपने गुरु को भी नहीं तो यह विड़म्बना ही है।

ठीक वैसे ही जैसे कुछ उत्तर आधुनिक विमर्शियों ने उन्हें अतिंम आलोचक घोषित कर दिया था। अगर ऐसा है तो इसमे शुक्ल जी और नामवर जी ही कटघरे में खड़े होते हैं कि उनके बाद उनकी परंपरा ही टूट गई। तो यह हुई दूसरी खोज जहाँ एक बार आचार्य और आलोचक पैदा होने के बाद साहित्य की धरती ही बंजर हो गयी! आचार्य केशवप्रसाद मिश्र, आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी, आचार्य विश्वनाथ प्रसाद मिश्र जैसे अनेक मनीषियों से प्राप्त वैदुष्य-संस्कार तथा आधुनिक भाषाओं के साहित्य का गंभीर अध्ययन उनकी आस्वाद-क्षमता को विशिष्ट बनाता है। उनकी पारंपरिक और आधुनिक दृष्टि उन्हें दूसरों से अलग करती हैं। पंडित रामअवतार शर्मा और आचार्य चंद्रधर शर्मा गुलेरी जैसे आधुनिक बोध वाले आचार्यों से भी वे खासा प्रभावित हैं। संस्कृत के इन परंपरावादी विद्वानों के आधुनिकता बोध, आचार्यत्व को नामवर सिंह सेमीनारों और लिखंत में उल्लेखित करते रहे हैं।

नामवर जी ने अपनी क्षमता, मेधा की तुलना में कम लिखा है। वे 'वाचिक ही मौलिक है'  में अपार विश्वास करते हैं, यहां तक कि वह कहते हैं 'वे धन्य हैं जो अमर होने के लिए बोलते हैं पर मैं तो मर-मर के बोलना चाहता हूं। मेरे शुभचिंतक शिकायत करते हैं कि मैं आजकल लिखता नहीं, बोलता हूँ। उन्हें शायद यह मालूम नहीं कि मैं बोलता ही नहीं, लोकार्पण भी करता रहता हूँ - (स्वयं को ग्रंथमोचक बताते हुए). काशी (बनारस) उनको कचोटती रही है। वे अक्सर कहते हैं -(बाबा नागार्जुन के) उस बैल की तरह जो बेच दिया गया, अपने बथान तक बार-बार दौड़ता है। इसीलिए वे यहां आने का बहाना तलाशते रहते हैं। 'तुम्हारी याद के जख्म भरने लगते हैं तो किसी बहाने तुम्हें याद करने लगते हैं।'

बनारस छूटने के बाद वे दिल्ली में स्टार-सुपर स्टार आलोचक बनकर साहित्य संसार में छा गए। बनारस छूटने का कारण वह 'भैरवजी का सोटा'  (मान्यता है कि काशी के कोतवाल भगवान काल भैरव के आदेश के बिना काशी में वास संभव नहीं है।) मानते हैं। वह कहते हैं 'काशी बार-बार मुझे दुत्कारती है फिर भी मैं काशी का हूं।'  काशी को वे ब्राह्मण और श्रमण संस्कृति और बहुलतावादी परम्परा का केन्द्र मानते हैं। इस्लाम, बौद्घ, जैन तथा सिख परंपरा को इस विरासत से काटना संभव नहीं है। नामवर की दुत्कार वाली शिकायत की उनकी वजहें रही है। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से उनकी निकासी और आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जैसे समर्थ गुरु के स्नेह-आशीर्वाद के बावजूद हिन्दी विभाग में चयन न होना उनके दु:ख का कारण रहा है।

१९५९ में वे चकिया चंदौली लोकसभा चुनाव में भारतीय कम्युनिष्ट पार्टी के उम्मीदवार भी रहे जिसमें उन्हें असफलता मिली। बीएचयू से निकासी के कारणों में यह चुनाव माना जाता है। अभाव और बेकारी में शुरुआत का जीवन -( गर्वीली गरीबी वह) बिता चुके नामवर अब साहित्यिक जीवन उपलब्धियों की आलोचकीय समृद्घि से सम्पन्न हैं। 'हक अदा न हुआ'  नामवर जी की षष्टिपूर्ति पर लिखे भावनात्मक और महत्पूर्ण लेख में विश्वनाथ त्रिपाठी जी ने लिखा है - मुझे याद है एक बार तो नामवर जी आदरणीय विजय शंकर मल्ल जी जैसा लम्बा कोट पहनकर इंटरव्यू देने गये। हम लोग आश्वस्त थे।

केदारनाथ सिंह का विचार था कि जब ऐसा लम्बा कोट पहन कर गये हैं तब चयन होना निश्चित है। पर चयन श्री भोलाशंकर व्यास का हुआ। वहां तो द्विवेदी जी कुछ कर-धर नहीं पाये। मिलने पर नामवर जी को काफी डाटा- अपनी किताबें क्यों नहीं ले गये। वहां पूछा गया, कौनसी किताबें लिखी हैं तो दिखाने को एक भी नहीं। ऐसे इंटरव्यू दिया जाता है?  क्या इससे यह ध्वनि नहीं निकलती है कि कम योग्य अभ्यर्थी का जुगाड़ या अन्य कारणों से चयन हो गया? आप ही बताइए विश्वनाथ जी, व्यासजी भी प्रतिभा, उपलब्धि -स्तर, शिक्षा के स्तर पर कहां कम थे? हालांकि व्यासजी हमेशा कहा करते थे कि काश, एक और सीट होती और नामवर भी यहां होते। नामवर जी की मेधा, साफगोई और दृष्टि के व्यास जी कायल थे। लेकिन यह कहा जाना कि नामवर जी से कमतर का चयन हुआ सही नहीं है,  विश्वनाथ जी ने लिखा हैं वे दिन बहुत खराब थे। लगभग सात वर्षों तक एम.ए., पी-एच.डी. छायावाद, हिन्दी के विकास में अपभ्रंश का योग, इतिहास और आलोचना, आधुनिक साहित्य की प्रवृतियां के लेखक डा. नामवर सिंह बेकार रहे।

साहित्य अकादमी (१९७१ में कविता के नए प्रतिमान), श्‍लाका सम्मान (हिंदी अकादमी दिल्ली) सहित उन्हें अनेक पुरस्कार-सम्मान मिल चुके हैं। राजेन्द्र यादव के शब्दों में-''सत्ता उनकी कमजोरी है। ... अनेक ऐसे उदाहरण हैं जब उन्होंने सत्ता में बैठे लोगों की आरतियां उतारी हैं।'' नामवरजी ने जितना कुछ लिखा-पढ़ा है; आलोचना को समृद्धि दी है- वह हमारे लिए गौरवपूर्ण है। यह अलग बात है कि उनकी हर आलोचना को समालोचना की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। कहीं-कहीं ज्यादा आशीर्वादी और पीठ ठोंकी भूमिका में रहे हैं तो कहीं काफी आक्रामक और पूर्वाग्रही। यह हम नहीं कह रहे हैं बल्कि नामवर का आलोचना के कुशल पारखियों का कहना रहा है। बनारस में कई-कई बार उन्हें सुनने का मौका मिला। खचाखच भीड़-भाड़ में खड़े होकर, जमीन पर बैठकर भी या जगह के अभाव में खिड़कियों -दरवाजे पर खड़े होकर भी उन्हें सुनते हुए लोगों को देखा है। उनमें साहित्य-फाहित्य से दूर-दूर तक नाता न रखने वाले भी होते हैं। बस एक बार प्रेमचंद की १२५ वीं जयंती पर वाराणसी में आयोजित संगोष्ठी में लंका से यूपी कालेज तक सरकारी लक्जरी बस के इंतजाम यानी यातायात की बेहतरीन सुविधा के और नामवर, राजेंद्र यादव जैसे स्टार वक्ताओं को पता नहीं लोग उम्मीद के मुताबिक सुनने क्यों नहीं गए जितना अकेले नामवर जी को ही सुनने जाते थे। 'वाद-विवाद-संवाद'  में रमने वाले नामवर सिंह शतायु हों।

लेखक प्रमोद कुमार पांडेय पत्रकारिता विषय के शिक्षक हैं.


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