राजेंद्र यादव का हांफना और निशंक की रचना छापना

E-mail Print PDF

यशवंत

हिंदी पट्टी के लोगों में उद्यमिता के लक्षण कहीं दूर दूर तक नहीं होते. सिपाही से लेकर कलेक्टर तक बनने की हसरत लिए बच्चे जवान होते हैं और बीच में कहीं घूसघास के जरिए या टैलेंट के बल पर फिटफाट होकर नौकरी व उपरी कमाई का काम शुरू कर देते हैं और इस प्रकार जिंदगी की गाड़ी टाप गीयर में दौड़ाने लगते हैं.

वह आदमी जो किसी के लिए पैसा लेकर काम करता है, नौकर कहलाता है. और इस करने की प्रक्रिया को नौकरी कहते हैं. गुलामी और नौकरी में थोड़ा-सा ही फर्क है. गुलामी में आपकी जिंदगी के लिए कोई विकल्प नहीं होता, सेवा-शर्तें नहीं होती. नौकरी में आप नौकर बनने के अलावा के वक्त में अपनी निजी जिंदगी जी पाते हैं. नौकरी की सेवा-शर्तें होती हैं. आजकल के मार-काट-इंग (मार्केटिंग) माहौल में कई जगहों पर नौकरी व गुलामी के बीच का फासला खत्म हो जाता है. कई मीडिया कंपनियों में भी कई पत्रकार अपने बारे में तय नहीं कर पाते कि वे यहां के नौकर हैं या गुलाम. इसी कारण कई बार गुलामों को लगता है कि वे नौकर हैं और नौकरों को लगता है कि वे गुलाम है. फासला जो बड़ा महीन सा है.

चंद रुपये के लिए करेजा काट कर रख देने वाली धुंधली दृष्टि युक्त हिंदी पट्टी के अपने रणबांकुरें भला सोच भी कैसे सकते हैं कि वे खुद उद्यमी बनें, वे खुद मालिक बनें, वे खुद कंपनी चलाएं. क्योंकि यह सोचने और करने का अधिकार तो सिर्फ गुप्ताज, अग्रवाल्स, माहेश्वरीज, जैन्स, मारवाड़ीज, लालाज आदि को होता है. हम आप तो पैदा ही हुए हैं इनकी गुलामी करने के लिए, महीने में मिलने वाले चंद सैकड़ा नोटों की खातिर मरने-खपने के लिए. तो, इस बंधी-बंधाई नौकरी-गुलामी वाली परंपरा से अलग कोई कुछ कर पाए, खासकर हिंदी पट्टी वाला तो उसे साहसी आदमी मानना चाहिए और अगर वह यह काम न्यूनतम बेइमामी के साथ अधिकतम ईमानदारी के उद्देश्य के लिए करे तो साहसी के साथ उसे महान आदमी भी मानना चाहिए.

और, अगर बिना किसी आर्थिक बैकग्राउंड वाला कोई व्यक्ति साहित्यिक मैग्जीन अपने दम पर निकालने की ठाने तो उसे कुछ कुछ पागल और उसके काम को दुनिया का सबसे रिस्की काम माना जाना चाहिए. पर राजेंद्र यादव ने साबित किया कि दुनिया पागल है, वह नहीं. असंभव ही संभव हो जाता है, गर ठान लो. और महान रिस्की काम को करते हुए उन्होंने 25 बरस गुजार दिए. कह सकते हैं कि दुनिया के लिए जो काम पहाड़ था, उनके सामने आकर वह धूल-धूसरित-सा है. समाज में अधिकतम ईमानदारी हो, न्यूनतम लूटपाट हो, ज्यादातर लोग प्रसन्न व खुशहाल रहें, कोई जात-पात-धर्म-भाषा का भेदभाव न हो... ऐसे मकसद के लिए साहित्यकार, कलाकार जीता है, करता है. इस महान मकसद के लिए जीना और करना आजकल के मार-काट-इंग माहौल में बेहद रिस्की काम है. पर यह सब कुछ राजेंद्र यादव ने किया.

एक बड़ा साहित्यकार लगातार 25 बरस तक हिंदी साहित्य को दिशा देने वाली मैग्जीन को चलाता रहता है और यह सब करते हुए वह खुद 85 बरस का हो जाता है और जब वह अपनी मैग्जीन के 25 बरस होने पर आयोजित समारोह में बोलता है तो उसकी आवाज से जो हांफने का कंपन निकलता है उससे कइयों को लगा कि राजेंद्र यादव बुढ़ा गये हैं क्योंकि हंस का भी बुढ़ापा आ चुका है. नामवर सिंह ने अपने संबोधन में लोगों (अखिलेश) के कहने का जिक्र करते हुए इशारा किया कि, हंस का अब बुढ़ापा है. नामवर या अखिलेश, जिसे मानना हो माने, पर हम लोग नहीं मानते कि राजेंद्र यादव का बुढ़ापा है. खुद राजेंद्र यादव नहीं मानते होंगे कि उनका बुढ़ापा है. वह आज भी एक नौजवान की तरह चौकस, चैतन्य और चंगे हैं. वैसे भी, अपन के यहां कहा जाता है, अपन के यहां की परंपरा है, शरीर बूढ़ा हो सकता है. आत्मा और विचार को कैसा बुढ़ापा.

नामवर सिंह को माइक से आवाज देते राजेंद्र यादव और मंच की ओर बढ़ते नामवर सिंह. सबसे दाहिने तरफ अजय नावरिया.

नामवर को सम्मान से मंच पर बिठाते अजय नावरिया. नामवर के विराजने को दूर से देखते राजेंद्र यादव और पूरे दृश्य को कैमरे में कब्जातीं एक मोहतरमा.

अर्चना वर्मा को हंस से उनके जुड़ाव के लिए सम्मानित किया गया. सबसे दाएं मंच पर बैठे हैं गौतम नवलखा. अर्चना वर्मा ने कहा कि उनका नाम इसलिए लोगों को याद रहा कि उन्होंने हंस के स्त्री विशेषांक के संपादन के दौरान राजेंद्र यादव की रचना को लौटा दिया था. अर्चना के मुताबिक, इसमें उनका साहस कम, राजेंद्र यादव की लोकतांत्रिकता ज्यादा सराहनीय है. गौतम नवलखा ने कहा कि उन्हें अंग्रेजी से हिंदी लिखने को प्रेरित राजेंद्र यादव ने किया और उन्हीं के चलते वे हिंदी में लिख पाने का साहस जुटा पाए, जिसके लिए वे आभारी हैं.

नामवर सिंह ने भले कहा कि राजेंद्र यादव ऐसे भीष्म पितामह हैं, जो शरशैय्या पर सोए हैं, उनसे सीखना हो तो सीख लो. लेकिन यह एकांगी सच है. राजेंद्र यादव से करीब तीन पीढ़ियों के लाखों-करोड़ों लोगों सीखा है. उनके हंस से गांव-कस्बे तक में एक चेतना, एक जागरूकता पहुंची-पैली है. आरक्षण आंदोलन रहा हो चाहे नक्सली या वामपंथी आंदोलन. दलितों-पिछड़ों का मुद्दा रहा हो या मुस्लिमों-स्त्रियों का. धर्म का मुद्दा रहा हो या सवर्ण का, जातपात का मु्ददा रहा हो या भेदभाव का, दुनिया के साहित्य का मसला हो या भारत के लोगों की जीवन शैली व सोच-समझ का, इतना बेबाक, इतना लाजिकल, इतना तेवरदार लेखन अपने जीवन में मैंने किसी और का नहीं देखा.

कुछ एक लोगों का कुछ एक लिखा स्पार्क देता है, प्रेरित करता है लेकिन कोई बंदा पच्चीस साल तक अलख जगाए रखे, अपने दम पर, अकेले दम पर ताल ठोंककर अपनी बात, अपनी प्रगतिशील सोच, अपनी सामूहिक चेतना के विस्तार को समझाता-बताता-पहुंचाता रहे, यह अदभुत है, यह जीवट है, यह असंभव के संभव होने जैसा है. मेरे जैसे कइयों को रोलमाडल हैं राजेंद्र यादव. मेरे जैसे कइयों की दिमागी बुनावट पर असर डाला है राजेंद्र यादव ने. उनको दिल से सलाम. उनकी लंबी उम्र के लिए दुआ. हंस यूं ही निकले, इसके लिए ढेरों शुभकामनाएं. हंस के निर्बाध निकलते पच्चीस बरस हो गए, इसके लिए बधाई.

राजेंद्र यादव ने हंस की यात्रा से जुड़े कुछ ऐसे लोगों को सम्मानित किया जिन्होंने दिन को दिन नहीं माना और रात को रात नहीं. ऐसे लोगों ने अपने खून पसीने के बल पर हंस का निकलना सुनिश्चित किया. दुर्गा प्रसायद जासवाल, वीना उनियाल, संजीव, गौतम नवलखा, अर्चना वर्मा... ढेरों नाम हैं. राजेंद्र यादव ने यह करके एक नई समझ दी. एक नया ज्ञान दिया. कि, हे कंपनी के मालिकों, हे उद्यमियों, हे अन्टरप्रिन्योरों... सफल हो जाओ, स्थापित हो जाओ... तो उन्हें न भुलाओ, जिनके एक एक कतरे से तुम्हारी सफलता लिखी गई है, जिनकी एक-एक सांस इकट्ठी होकर तुम्हारे लिए नींव के पत्थर बन गए. राजेंद्र यादव ने हंस के पच्चीस बरस होने पर हंस की याद में और हंस के साथियों को सम्मानित करने के लिए कार्यक्रम रखकर अपनी महानता का ही विस्तार किया है.

छोटी सोच वाले लोग अपने फायदे के इतर सोच ही नहीं पाते, इसी कारण उन्हें छोटा आदमी कहा जाता है. आदमी अपनी लंबाई से छोटा या बड़ा नहीं होता. अपने दिल और दिमाग से छोटा-बड़ा होता है. जिसमें दूसरों का भला करने, दूसरों के योगदान के प्रति कृतज्ञ होने, दूसरों के काम को बड़ा मानने का भाव नहीं, वह आदमी बड़ा नहीं हो सकता. राजेंद्र यादव ने हंस के 25 बरस पूरे होने पर आयोजित जलसे में हंस से जुड़े नामधारी-एनानिमस लोगों को सम्मानित कर, उन्हें सामने लाकर बड़ा काम किया है. सच में यह एक बड़ी सीख है. कोई चीज बनाने के दौर में हम मनुष्यों का इस्तेमाल टूल की तरह करते हैं, इस्तेमाल करो और फेंक दो वाले सिद्धांत से अनुप्रेरित होकर करते हैं, यहीं से कंपनियों, संस्थाओं का अमानवीयकरण शुरू होता है. जो कंपनी, संस्था, चीज अपने एप्रोज में अमानवीय हो तो उसका लार्जर मकसद चाहे जो हो, अंततः वह एक दिन आम आदमी के खिलाफ दैत्याकार रूप में खड़ी मिलेगी.

आजकल के मीडिया हाउसों को ही देख लीजिए. इन मालिकों के बाप-दादाओं ने पत्रकारों के खून से अपने अखबारों को सींचा. बाद में उन पत्रकारों को उनकी दुर्दशा में याद तक नहीं किया, मदद देने की बात दूर. और यही अखबार अब पेड न्यूज करते हैं, मीडिया के मौलिक सिद्धांतों को बेवकूफी की बात कहते हैं, बिजनेस को सबसे बड़ा लक्ष्य मानते हैं, जन सरोकार को किताबी बात बताते हैं... तो हालत क्या हो गई है. अखबार आज करप्ट लोगों के करप्शन को ढंकने का सबसे बड़ा माध्यम बन गया है. भ्रष्ट नेताओं, भ्रष्ट नौकरशाहों, भ्रष्ट संस्थाओं के कारनामों को न प्रकाशित किया जाए, इसका खेल चलता रहता है और इसके बदले दाम मिलता रहता है. यानि मीडिया अब सच दिखाने के लिए नहीं बल्कि सच छुपाने का माध्यम बन गया है.

तो ये चौथा खंभा भी विकलांग हो चुका है. आम जन के खिलाफ हो चुका है. इसलिए क्योंकि इसके मालिक का जो दिमाग है, वह मानवीय नहीं है. वह कारपोरेट है. वह ज्यादा से ज्यादा मुनाफा अपने निजी नाम से करने को इच्छुक रहता है. वह लाभ में अपने कर्मियों को हिस्सेदारी देने के नाम से ही भड़कता है. ऐसे दौर में अगर राजेंद्र यादव हंस मैग्जीन से जुड़े रहे लोगों को याद करते हैं, सम्मानित करते हैं, उनकी भूमिका को रेखांकित करते हैं और हंस के लगातार निकलते रहने को एक टीम वर्क बताते हैं तो यह उनका बड़प्पन है, यह हमारे समय के बनियों के लिए सीख है.

हंस चलाते रहने के लिए राजेंद्र यादव ने न्यूनतम बेइमानी का सहारा लिया होगा, इससे इनकार नहीं किया जा सकता क्योंकि जब आपको कोई चीज चलानी होती है तो थोड़ा बहुत दाएं बाएं करना पड़ता है, आंख बचाके या सबके सामने रखके. इसे मैं निजी तौर पर दस फीसदी तक मानता हूं. क्योंकि समय और सिस्टम ऐसा है कि अगर आप अच्छा काम कर रहे हैं तो कोई आपको पैसा नहीं देने वाला. जब तक आप किसी ओबलाइज या उपकृत नहीं करते, तब तक वह आपको कोई मदद देने के बारे में सोच ही नहीं सकता. कई मैग्जीनों में अफसरों की बीवियों की कहानी-कविताएं इसलिए छपती हैं क्योंकि उनके साजन सरकारी या प्राइवेट विज्ञापन दिलाने की भूमिका में होते हैं.

...मैं और मेरा मेरा तेरा सबका प्यार-दुलारा ''हंस'' : यूं गुजर गए पच्चीस साल जैसे कल की बात हो... मंच पर अकेले विराजे राजेंद्र यादव चिंतन में लीन... जब पूरा हाल श्रोताओं-दर्शकों से भर गया तो एक कोने से चुपचाप राजेंद्र यादव मंच की तरफ पहुंचे. उन्हें उनका एक साथी किशन सहारा दिए हुए था. उस साथी को इस जलसे में सम्मानित किया गया. किशन साये की तरह राजेंद्र यादव के साथ रहते हैं. उनकी सेहत की पूरी देखभाल करते हैं. क्या खाना है, कितना खाना है, इसका मुकम्मल हिसाब किशन के पास होता है.

इतनी बड़ी संख्या में लोग राजेंद्र यादव और हंस के प्रोग्राम में पहुंचे कि बड़ा सा हाल छोटा पड़ गया. ऐसे में बहुत सारे लोगों को पीछे जमीन पर बैठना पड़ा. कई लोग खड़े होकर सुनते रहे.

ग़ालिब सभागार के दाएं और बाएं, दोनों ओर सभी सीटें फुल थीं. बाद में पीछे इंग्री गेट के आसपास लोग बैठकर, खड़े होकर कार्यक्रम में देर तक शरीक रहे.

हंस और कथादेश ने भी ये काम किए हैं. घटिया रचनाओं को इसलिए प्रकाशित किया क्योंकि उसके बदले उन्हें विज्ञापन मिलते या इसी पीआर के जरिए उन्हें कुछ लाभ मिल जाता. और, यह क्रम राजेंद्र यादव जारी रखे हुए हैं. अगले वाले अंक में उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक की कोई रचना छप रही है हंस में. उस हंस मैग्जीन में जिसे प्रेमचंद ने शुरू किया और राजेंद्र यादव ने अपनी पूरी जवानी, अपनी पूरी मेधा, अपनी पूरी प्लानिंग के जरिए पिछले पच्चीस साल से जिंदा रखा हुआ है. तो क्या, छब्बीसवें साल से हंस का स्तर निशंक की रचनाओं को प्रकाशन करने वाला रहेगा?

ऐसा ही एक सवाल किसी युवा ने हंस के पच्चीस बरस पूरे होने के जलसे में मंच से राजेंद्र यादव से पूछा. जाहिर है, राजेंद्र यादव को यही कहना था कि रचना मुख्य होती है, लेखक कौन है यह नहीं. और, कई बार बुरे लोग अच्छी रचनाएं कर जाते हैं. और, यह कि वे रचना के स्तर से तय करते हैं कि छपनी है या नहीं. राजेंद्र यादव की बातों से बहुतेरे लोग कनवींस हो गए होंगे. मैं भी थोड़ा थोड़ा हूं. पर मुझे लगता है कि राजेंद्र यादव और हंस अब बड़े ब्रांड हैं. उन्हें हंस चलाने के लिए अब वो मगजमारी करने की जरूरत नहीं जो पहले रही होगी. ऐसे में उन्हें निशंक जैसे रचनाकारों से बचना चाहिए था. मुझे नहीं पता निशंक की जो रचना छपने जा रही है, उसका स्तर क्या है, कंटेंट क्या है. पर भ्रष्टाचार के आधा दर्जन से ज्यादा आरोपों में घिरे भाजपा के इस मुख्यमंत्री के खिलाफ जगह-जगह विरोध के स्वर उठते रहे हैं और कई बार तो अच्छे लोग इस सीएम के साथ बैठने से परहेज करते हैं. ऐसे में राजेंद्र यादव का निशंक की कथित रचना छापने के पक्ष में दलील देना थोड़ा चौंकाता भी है, और उनके बुढ़ापे की मजबूरी को समझने का मौका भी देता है.

मुझे लगता है कि कोई संस्था या मैग्जीन चलाते वक्त उसके मालिक को न्यूनतम बेइमानी का सहारा लेना पड़ता है, खासकर आजकल वाले मार-काट-इंग दौर में, तो उसी अघोषित अनकहे अधिकार का इस्तेमाल किया होगा राजेंद्र यादव ने. क्योंकि ज्योंही आप नौकर की अवस्था से हटकर किसी संस्था, कंपनी, मैग्जीन, धंधा को शुरू करके एक उद्यमी या संचालक या मालिक या प्रधान या मुखिया की भूमिका में आते हैं तब आपको अपनी सारी इंद्रियों को सक्रिय करके संबंधित चीज को जिंदा रखना पड़ता है और इसके लिए कुछ बार ऐसे समझौते भी करने पड़ते हैं जिन्हें लोग पचा नहीं पाते, ऐसा काम भी करना पड़ता है जो आपके काम के स्तर को घटिया बना देता है. पर यह सब तो शुरुआती अवस्था में होता है, प्रारंभ की अवस्था में होता है. किसी चीज के पच्चीस साल हो जाने पर भी अगर यही सब करना पड़े तो मेरे खयाल से यह ठीक नहीं. और अगर ऐसा कोई संकट है तो जनता के बीच जाने में कौन सी हिचक. जिस जनता के दुलार प्यार से हंस ने पच्चीस साल का सफर तय किया, वही जनता छोटे छोटे सहयोग से हंस की क्वालिटी को जिंदा रखने में मददगार साबित हो सकती है.

इतना तो तय है कि जब इस परम भ्रष्टाचार वाले देश में ट्रांसपैरेंसी एक बड़ा मुद्दा है, भ्रष्टाचार को रोकना बड़ा मुद्दा है, वहां निशंक जैसे घपलेबाज-घोटालेबाज सीएम की रचना को छापना दरअसल सारे आंदोलन की हवा निकालने का प्रयास करना है. और, मेरे खयाल से निशंक इसीलिए आजकल अपनी रचनाओं को यहां वहां छपवा रहा है, कवियों-लेखकों के साथ बैठ रहा है, ब्लागर सम्मेलनों में जा रहा है, नेक-पुनीत काम करते-कराते दिख रहा है, अपने नाम से किताबें छपवा रहा है ताकि वह अपने चरित्र के धवल होने का सर्टिफिकेट ले सके, दिखा सके.

याद रखें राजेंद्र यादव जी, अभी कर्नाटक का येदुरप्पा भ्रष्टाचार के आरोपों के कारण भाजपा नेतृत्व के द्वारा पदमुक्त किया गया है, बेहद दबाव में. उस भाजपा नेतृत्व के द्वारा जिस पर आरोप है कि वह पैसे लेकर, अटैची लेकर अपने भ्रष्टाचारी मुख्यमंत्रियों को बचाने का काम करता है. उस तक को मजबूर होकर अपने एक दागदार सीएम से कुर्सी छीननी पड़ी है. निशंक की कुर्सी भले ही ओबलाइज्ड भाजपा नेतृत्व न छीने लेकिन बहुत जल्द होने जा रहे चुनाव में निशंक की लाइजनिंग और रचनाधर्मिता का उत्तराखंड की जनता ही बैंड बजाने वाली है.

याद रखिए यादव जी, देश-समाज के बड़े मुद्दों से कटकर रचनाधर्मिता का ककहरा सुनाना आपको ही हास्यास्पद बना देगा. मैं उस युवा के तेवर को सलाम करता हूं जिसने हंस के मंच पर चढ़कर निशंक और हंस के नापाक रिश्ते के बारे में खुलासा किया, वहां मौजूद सभी लोगों को जानकारी दी.

उस जलसे से लौटकर, दो दिन बाद जब मैं उस आयोजन के बारे में सोचता हूं तो खुद को राजेंद्र यादव के जीवन, दृढ़ता, उद्यमिता से बहुत कुछ सबक लेता हुआ पाता हूं. साथ ही यह निराशा भी कि यादव जी ने हंस जैसी मैग्जीन में निशंक को छापने का एक घटिया फैसला लिया, और, यह फैसला कंस सरीखा है, जैसाकि यादवजी ने मंच से कहा था कि उनकी इच्छा कंस निकालने की थी, पर निकाल दिया हंस, लेकिन आज भी इच्छुक हूं कंस निकालने के लिए. हंस-कंस के बीच हम सब जीवन जीते हैं. कभी किसी का पलड़ा भारी होता है कभी किसी का. लेकिन पब्लिक लाइफ में जिन मूल्यों को लेकर हम प्रतिबद्ध होते हैं, उससे समझौते करते वक्त यह जरूर देख लेना चाहिए कि इसका वृहत्तर समय, समाज, जनता, आंदोलन पर क्या असर पड़ेगा.

यशवंत

एडिटर

भड़ास4मीडिया

This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it


AddThis