दा.दा. चतुर्वेदीजी, जिन्होंने कविता को जिया और फिर अनंत की कविता हो गए

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दा. दा. उर्फ दामोदर दास चतुर्वेदी: जयंती पर स्मरण : मां भारती के अनन्य सेवक, मूक साहित्यानुरागी, बहुमुखी प्रतिभा के धनी, स्वतंत्रता सेनानी, मनीषी दा. दा. चतुर्वेदी (दामोदर दास चतुर्वेदी) के व्यक्तित्व एवं कृतित्व के इतने आयाम हैं कि उन पर कुछ लिखना या कहने में बड़ी दुविधा होती है। सबसे बड़ी दुविधा तो इस बात से होती है कि उनके जीवन के किस आयाम से बात शुरू की जाए।

उनके देशभक्त स्वतंत्रता सेनानीवाले पक्ष को लेकर, प्रखर साहित्यसेवीवाले पक्ष को लेकर बांग्ला के सफल अनुवादकवाले पक्ष को लेकर, बाल साहित्यकारवाले पक्ष को लेकर या फिर एक सहृदयी, जिंदादिल, हरफनमौला अंदाज़ में सूफियाना जिंदगी जीनेवाले एक बिंदास शख्सियत को लेकर। दा. दा. चतुर्वेदीजी के बारे में लिखना सूरज को मुठ्ठी में कैद करने-जैसा है। महाकाव्य के कथानक को क्षणिका में समाहित भी कैसे किया जा सकता है। फिर भी इस कठिन कार्य को करने की कोशिश जरूर करूंगा ताकि नई पीढ़ी को इस बात का यकीन हो जाए कि आदर्श और उसूलों की जिंदगी जीते हुए, कुछ भी न पाने की अपेक्षा रखनेवाले इनसान सिर्फ महाकाव्यों और किंवदतिंयों में ही नहीं होते हैं बल्कि वे हमारे आसपास भी होते हैं।

बुद्ध, महावीर और चाणक्य के गृह प्रदेश बिहार के मुंगेर में जन्मे बालक दामोदर की जिंदगी की एक अजीब कहानी है। पितामह के पितामह से लेकर पिता तक उत्तरप्रदेश के मैनपुरी के चौथियाने मुहल्ले के निवासी रहे। पिताजी को मैनपुरी के राजा ने बिहार के गिदावर राजा के राजपुरोहित के रूप में मुंगेर-मलयपुर भेज दिया। आज भी कुलदेवी का वास मैनपुरी में है। 12, अगस्त, 1910 को मलयपुर में जन्मे बालक दामोदर असाधारण प्रतिभा के होनहार बिरवान थे। बाल्यावस्था से ही देश के लिए कुछ करने का जज्बा दिल में हिलोरें मारता था। पिता शिव प्रसाद और चाचा प्रखर साहित्यकार हास्यरसावतार जगन्नाथ प्रसाद चतुर्वेदी (सरस्वती के संस्थापक संपादक) ने दा.दा. चतुर्वेदीजी  को साहित्य के बहुमूल्य ससंस्कार दिए।

चतुर्वेदी होने के कारण ब्रज भाषा से प्रेम भी विरासत में मिला। पिता के सान्निध्य में हरीतिमा और प्रकृति के अप्रतिम सौंदर्य ने सहज ही बाल मन पर हस्ताक्षर कर दिए। बाल कवि दामोदर ने प्रकृति की उन्मुक्त सौंदर्य राशि को देखकर मनुष्य की स्वतंत्रता का अर्थ भी जाना। अपने भाई और बहनों को लेकर किशोर सेना का गठन किया। डा. राजेन्द्र प्रसादजी को किशोर सेना में बुलवाया। किशोर साथियों को जयप्रकाश बाबू से मिलवाया। बहन शारदा तिरंगा लेकर महिलाओं को संगठित करने लगीं और प्रभातफेरियां निकालने लगीं। पिताजी किसानों को संगठित करने लगे। और युवक दामोदर छात्रों को संगठित कर ब्रिटिश सरकार के खिलाफ बगावत के लिए बारूद तैयार करने लगे। आखिर तानाशाह सरकार की नजरों से कब तक बच पाते।  इनकी गिरफ्तारी के जाल बिठाए जाने लगे।

आनेवाले खतरे को भांपकर युवक दामोदर ने कलकत्ते की राह पकड़ी और यहां आकर हिंदी के ऐतिहासिक पत्र विशाल भारत के संपादक मंडल से संबद्ध हो गए। युवक दामोदर ने यहां आकर सीएफ. एंड्रयूज, बनारसीदास चतुर्वेदी और चिंतामणिराय का सानिध्य प्राप्त किया। बांग्ला भाषा सीखी और बांग्ला साहित्य से मानसिक रिश्तेदारी शुरू हो गई। ताराशंकर वंदोपाद्याय, विभूति बाबू और बंकिम चंद के साहित्य का हिंदी में अनुवाद और देशभक्ति के गीत लिखकर युवक कवि दामोदर ने देश की आजादी में अपना रचनात्मक योगदान शुरू कर दिया। बाद में यह कविताएं कौमी तराना के नाम से पुस्तकरूप में सामने आईं। कलकत्ता प्रवास में ही आप नेताजी सुभाष चंद्र बोस के संपर्क में आए और पत्रकारिता करते-करते आजाद हिंद फौज के सेनानी बन गए।

कालचक्र ने पलटा खाया। नेतीजी की आकस्मिक मृत्यु ने सारा परिदृष्य ही बदल दिया। दा.दा. शाति की खोज में शांति निकेतन पहुंच गए और फिर पालीवालजी के अखबार सैनिक से आगरा आकर जुड़ गए। सैनिक उन दिनों राष्ट्रप्रेमी साहित्यकारों का एक प्रमुख केन्द्र बना हुआ था। कुछ दिन यहां रहने के बाद ग्वालियर के महाराजा जीवाजीराव सिंधिया द्वारा स्थापित जयाजी प्रताप के संपादक मंडल से संबद्ध हो गए।  और फिर कहा जा सकता है कि दा.दा. इसके बाद ग्वालियर के ही हो गए। अपने जीवन का एक लंबा कालखंड दादाजी ने ग्वालियर में ही व्यतीत किया और यहां की साहित्यिक गतिविधियों के केन्द्रदिंदु बवे रहे। साहित्यिक गोष्ठियों के जनक,प्रेरक स्तंभ और पोषक होने के साथ-साथ नए कवियों को संवारने, निखारने के एक जीवंत संस्थान के रूप में दा.दा. जी ग्वालियर में जाने गए।

वीरेन्द्र निश्र, आनंद मिश्र, कोमल सिंह सोलंकी, रामकुमार भ्रमर, भीष्मसिंह चौहान, राजाबल अष्ठाना जीवन, जगदीश परमार, सेमचंद्र चक्रम, प्रकाश मिश्र और डा. भगवानस्वरूप चैतन्य-जैसे रचनाकारों की एक पूरी पीढ़ी है जिसे दा.दाजी का स्नेहिल संरक्षण आजन्म मिलता रहा। गोष्ठियों और साहित्यिक आयोजनों के साथ ही दादाजी ने ग्वालियर की तत्कालीन पत्रकारिता को समुचित मार्गदर्शन एवं सक्रिय सहयोग प्रदान किया और स्वयं मध्यप्रदेश संदेश,प्रगति और ग्रामसुधार से जुड़े रहे। दादाजी की लोकप्रियता एवं साहित्य सेवियों से अंतरंगता का आलम यह था कि उनकी वर्षगांठ साहित्यवृत्त में बड़ी धूमधाम से मनाई जाती थी। साहित्यकार जुड़ते और भोर की प्रशम किरण तक कविताओं की चांदनी बिखरती। गोष्ठी में नवोदित और सिद्ध-प्रसिद्ध सभी कवि होते थे। चाय और कविताओं के दौर-पर-दौर चलते। सुबह जब आंख मलता हुआ शहर जागता तभी कविगण अपने-अपने घरों को विदा होते।

ग्वालियर की आजाद साहित्य मित्र मंडल (शिंदे की छावनी), आलोकन (दानाओली), साहित्य मंदिर (किलागेट,ग्वालियर), गीतायम (कैथवाली गली) और मध्यप्रदेश कलावंग्मय (तंबाकूवाली गली माधौगंज), और मध्य भारतीय हिंदी साहित्य सभा (दौलतगंज) न जाने कितनी साहित्यिक संस्थाएं बिना किसी पूर्वग्रह के दादाजी की स्नेहभाजन रहीं। उनके लिए साहित्यकार होना सिर्फ मां भारती का उपासक होना होता था। दक्षिण और वाम पंथ के विभाजन दादाजी के लिए अर्थहीन और बेमानी थे। इसलिए अटलबिहारी बाजपेयी और नागार्जुन दोनों ही दादाजी से एक निश्छल जुड़ाव महसूस करते थे।

जहां कौमी तराना, चंदा मामा, बाल वाटिका, कल्लोलिनी, लक्ष्मी स्तवन और गांधी गीता दादाजी की प्रमुख काव्यकृतियां थीं वहीं मेघ मल्हार और बंगुला कहानियां उनके चर्चित अनुवाद कृतियां थीं। सन 1956 तक के दैनिक लवप्रभात में प्रकाशित दादाजी के प्रमुख लेखों की कतरनें आज भी डां भगवान स्वरूप चैतन्य (ग्वालियर) के संग्रह में उपलब्ध हैं। उनके लेख, कहानी और कविताएं बांग्ला की प्रतिष्ठित पत्रिका देश में भी प्रकाशित होती रहती थीं। हैदराबाद से प्रकाशित होनेवाली कल्पना में दादाजी की कहानियां की वर्षोंतर नियमित प्रकाशित होती रहीं। खड़ी बोली, उर्दू और बंग्ला भाषा के बीच बल खाती उनकी सृजन धारा ने ब्रजभाषा के किनारों को कभी नहीं छोड़ा। और जिस प्रकार पावस के मेघों को देखकर मयूर नृत्य करता है वैसे ही दादाजी जब मस्ती में होते थे तो उनका मन मयूर ब्रजभाषा के काव्य-मन में नाच उठता था।

हां, एक बात और.... पंडित बनारसी दास चतुर्वेदी की वर्षगांठ किसी रामनवमी या जन्माष्टमी से कम नहीं होती थी। सारे स्थानीय अखबारों में पत्रकार प्रवर पर दादाजी के लिखे लेख छपते थे। बनारसीदासजी के दा.दा.जी के नाम लिखे पत्र भी खूब छपते। जोर-शोर से नगर में साहित्यिक गोष्ठियों का आयोजन किये जाते। क्रांतिकारी साहित्य एवं पत्र साहित्य का बनारसीदास चतुर्वेदी को दादाजी जनक पुरुष मानते थे। जितने भी दिन दादाजी ग्वालियर में रहे नई प्रतिभाओं को दादाजी का सान्निध्य कल्पवृक्ष की तरह नई प्रतिभाओं को अपने स्नेह की स्निग्ध शीतल छाया में पल्वित-पुष्पित होने का अनुकूल अवसर प्रदान करता रहा। जीवन-चर्या में शुद्ध सनातनी ब्राहम्मणी-चेतना के आदमकद प्रतीक थे-दादाजी।

त्रिकाल संध्या, शुद्ध शाकाहार और जीवन में मूल्य और शुचिता के अप्रतिम उदाहरण दादाजी सादित्य में बगीची संस्कृति को ताउम्र जीते रहे। जो उनके पास आ गया उसे उन्होंने जीवन-प्रदायनी संजीवनी शक्ति से निष्काम भाव से संरक्षित और संवर्धित किया। कुछ लोगों मे यदि चर्चित और प्रतिष्ठित हो जाने के बाद अगर दादाजी की साहित्यिक प्रयोगशाला में पलट कर नहीं देखा तो दादाजी ने इस से तनिक भी संताप नहीं किया। बल्कि मुस्कराकर यही कहा कि जो देने की भावना रखते हैं उन्हें लेने की अपेक्षा करनी ही नहीं चाहिए। जिन्होंने इस देश के लिए अपने प्राणों का बलिदान किया,उन्हें किस प्रकार की अपेक्षा थी। हमने अपने मिशन के लिए समर्पित रहना चाहिए। यही भावना थी दादाजी की।

ग्वालियर ने भी उन्हें भरपूर प्यार और सम्मान दिया। शायद उनकी इसी भावना के कारण उनकी षष्ठिपूर्ति पर सनातन धर्म मंदिर के विशाल प्रांगण में इस साहित्य मनीषी का नागरिक अभिनंदन किया जिसमें डा. बरसानेलाल चतुर्वेदी, स्नेहलता स्नेह, प्रोफेसर उदय प्रताप सिंह, आनंद मिश्र, मुकुटबिहारी सरोज, पं. सुरेश नीरव, प्रकाश मिश्र तथा डाक्टर भगवानस्वरूप चैतन्य के अलावा तत्कालीन मुख्यमंत्री श्यामा चरण शुक्ल उपस्थित हुए।

मुख्यमंत्री श्यामा चरण शुक्ल ने दादाजी को शाल पहनाकर और प्रशस्तिपत्र देकर न केवल दादाजी को सम्मानित किया बल्कि नगर के साहित्यानुरागियों की भावना का भी सम्मान किया। अपने जीवन के उत्तरार्ध में राजस्थान चले गए अपने कनिष्ठ पुत्र के पास जो कि राजस्थान पत्रिका और नव भास्कर से संबद्ध थे। यहां आकर दादाजी सीतायन महाकाव्य लिखने में व्यस्त हो गए। महाकाव्य की पंक्तियां लिखते-लिखते ही मां भारती के इस विनम्र सेवक ने स्वर्गारोहण किया। सच है दादाजी ने जीवनभर कविता को जिया और फिर स्वयं अनंत की कविता हो गए।

आज जब देश बाजारवाद की उपभोक्ता संस्कृति की आक्टोपसी जकड़न फंसा छटपटा रहा है, तब ऐसे निस्पृह और निष्काम व्यकित को याद रखना और याद करना अपनी ऋषि परंपरा को रेखांकित करना है ताकि नई पीढ़ी को इस बात की प्रेरणा मिल सके कि नैतिक मूल्यों के सहारे भी, स्वाभिमानपूर्वक जीवन जिया जा सकता है। उनके द्वारा किए गए अनुवाद क्लासिक्स में शुमार किये जाने की क्षमता रखते हैं। उनका मौलिक सृजन हिंदी काव्य वांग्मय की कीमती धरोहर है। आज (16 अगस्त को) उनकी 94वीं वर्षगांठ पर एक यायावरी और सूफियाना काव्य जिजीविषा को मैं अपनी लेखनी और चेतना के आत्मीय प्रणाम निवेदित करते हुए स्वयं को गौरवान्वित अनुभव कर रहा हूं।

पंडित सुरेश नीरवलेखक पंडित सुरेश नीरव लोकप्रिय व्यंग्यकार और कवि हैं. 16 पुस्तकें प्रकाशित. 7 धारावाहिकों का पटकथा लेखन. अंग्रेजी, उर्दू, फ्रेंच में अनुवाद. 30 वर्ष तक कादम्बिनी के संपादन मंडल से संबद्ध. छब्बीस देशों की विदेश यात्राएं. भारत के राष्ट्रपति से सम्मानित. आजकल स्वतंत्र लेखन और यायावरी. उनसे संपर्क ''सुरेश नीरव, आई-204, गोविंद पुरम, गाजियाबाद'' या मोबाइल नंबर 09810243966 या मेल आईडी This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it के जरिए किया जा सकता है.


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