रंग बिरंगे सांप हमारी दिल्‍ली में, क्‍या कर लेंगे आप हमारी दिल्‍ली में!

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: दयानंद पांडेय के उपन्‍यास 'वे जो हारे हुए' की समीक्षा : कहानी शुरू होती है अस्पताल से. अस्पताल पहुँची है साल डेढ़ साल की ठुमक ठुमक चलने वाली बच्ची जिस ने अभी अभी चलना सीखा था और पड़ोसी के घर के बाहर कपड़े धोने के लिए रखे खौलते पानी के टब में बैठ कर जल गई थी. छोटे शहर के प्राइवेट क्लीनिक में जले का इलाज करने की कोई सुविधा नहीं थी.

फिर भी मुनाफ़े के लालची क्लीनिक ने बुरी तरह जली बच्ची को पूरे दस दिन अपने यहाँ रखा और हज़ारों रुपए ऐंठे.जब सुनिश्चित मौत सामने खड़ी नज़र आई, तो प्लेटलेट कम होने का बहाना बना कर उसे लखनऊ सरकारी अस्पताल रैफ़र कर दिया. यहाँ हालत सुधर नहीं रही थी. पूरा कुनबा (पिता मुनव्वर भाई, माँ सादिया, नानी, मामा, गोदी का छोटा बच्चा सब) अस्पताल में टक्करें खा रहे हैं और परेशान भटक रहे हैं. आख़िरकार तीसरी रात फ़ोन करते हैं अपने मित्र आनंद को. बड़े रसूख़ वाला आनंद लखनऊ में एक प्राइवेट कंपनी में किसी ऊँचे ओहदे पर है. उस की पहुँच ऊपर तक है. आनंद और मुनव्वर भाई कभी नौजवानी में राजनीति में साथ-साथ थे. घर छोड़ आए नौजवान सक्रिय छात्र नेता आनंद को सहारा देने के लिए मुनव्वर भाई ने ही ट्यूशनें दिलाई थीं और हिम्मत बँधाई थी.

आनंद की ऊपर तक पहुँच का ही परिणाम था कि जब वह सुबह अस्पताल पहुँचा तो डाक्टर लोग बच्ची की देखभाल में तत्पर हो चुके थे, और अब तक ट्रामा सेंटर ले गए थे. बच्ची के बचने का कोई चांस नहीं है. दुर्घटना वाले दिन ही उसे इस बड़े अस्पताल में आ जाना चाहिए था या दिल्ली के सफ़दरजंग अस्पताल भेजा जाना चाहिए था जहाँ जले का इलाज होता है. पर वहाँ भेजी नहीं गई थी. ट्रामा सेंटर में वैंटिलेटर लाने की भागदौड़ मचती है. जैसे तैसे आ भी जाता है. पर लाभ नहीं हो सकता था. हुआ भी नहीं,  बच्ची नहीं रही - तो कभी वार्ड से काग़ज़ लाना है, कभी शव को पोस्टमार्टम होने से रोकना है, पर समय रहते किसी के हाथ गरम न करने के कारण चीरफाड़ के लिए भेज ही दिया जाता है-  शव कभी मुर्दाघर से छुड़ाना है, कभी इस के लिए पंचनामा बनवाना है, पंचनामे के लिए पाँच आदमी जुटाने हैं. कभी थाने, अस्पताल और मुर्दाघर के चक्कर पर चक्कर लगाने हैं. हर जगह काग़ज़ी कार्रवाई होनी है, हर जगह दस्तख़त होने हैं, हर जगह टालमटोल है, जेब गरम होने की तवक़्क़ो है.

क़दम क़दम की इस परेशानी और मज़बूरी का जो सजीव कँपकँपाऊ ब्योरेवार वर्णन दयानंद पांडेय ने उपन्यास के पहले 60-62 पेजों में चलचित्र की तरह दिखाया है - वह एक तरह से पूरे देश की हालत का प्रतीक है. भ्रष्टाचार से पीड़ित देश अस्पताल में है. शायद बहुत पहले ही उसे ट्रामा सेंटर में होना चाहिए था. शायद किसी भी पल चीरफाड़ की नौबत आ सकती है. चीरफाड़ के बाद शीघ्र ही शायद वह मुर्दाघर मेँ पहुँच जाएगा-  आधी रात देश की लाश को वहाँ से छुड़ाने के पंचनामे के लिए कौन कहाँ से किन पाँच जनों को लाएगा, ला भी पाएगा?

क्योंकि मुनव्वर भाई और आनंद दोनों ही राजनीति से संबंधित रहे हैं, अतः इन परेशानी के क्षणों में भी कभी उन्हें पुरानी बातें और बहसें याद आती हैं. कभी वे हालात के गिले शिकवे करते रहते हैं. आनंद को याद आता है छात्र राजनीति के एक पुराने खिलाड़ी का उपदेश - 'सिद्धांत की राजनीति कुछ और है और व्यवहार की कुछ और.' एक जगह मुनव्वर भाई पूछते हैं, 'कहीं हम लोग भी तो इस राजनीति में, इस समाज में चलने की सज़ा तो नहीँ भुगत रहे हैं?' बच्ची को देखने ट्रामा सेंटर पहुँचते पहुँचते आनंद उन्हें सलाह देता है, 'अपने इंटैलैक्चुअल घावों का इलाज भी यहीं करवा लीजिए.'

इसी प्रकरण से एक दृश्य -

आनंद डाक्टरोंके कमरे से निकल कर बाहर आ कर बरामदे एक बार फिर खड़ा हो गया कि तभी पुलिस चौकी का दीवान दिख गया. बाक़ी ग़ुस्सा उस ने दीवान पर उतारा. 'तुम लोग बिना पैसा लिए लाश भी नहीं छोड़ते.'

'क्या करें, साहब, नीचे से ऊपर तक सब का बँधा है.'  वह पूरी ढिठाई और बेशर्मी से बोला, 'आप लोग बड़े आदमी हैं, इतना भी नहीं समझते. जहाँ पैसे के बिना एक क़दम भी नहीं उठता वहाँ आप लोग दबाव और सिफ़ारिश से काम करवाने में लगे हैं.'

सशक्त उपन्यासकार दयानंद पांडेय वे जो हारे हुए में एक एक कर के सामाजिक जीवन के हर पहलू को टटोलते हैं, हर कोण से कुरेदते हैं. जो हालात अस्पताल में थे, मुर्दाघर में थे, वैसे ही हर तरफ़ हैं. बाज़ार की माँगों को पूरा करने और मुनाफ़े, सिर्फ़ मुनाफ़े, के लिए चलाई जाने वाली बड़ी प्राइवेट कंपनियों में तो हैं ही, जो राजनीतिक स्तर पर निकट की जानपहचान वाले आनंद जैसे लोगों को लायज़न के लिए रखती हैं, राजनीतिक पार्टियों के भीतर भी, नेताओं की आपसी उठापटक में भी, सरकारी इमदाद से चलने वाली तथाकथित समाजसेवी एन.जी.ओ. संस्थाओं में होने वाली हेराफेरी लूटमार दलाली स्वार्थ साधन में भी, सामाजिक रिश्तेदारियों में भी, शादी ब्याह में भी, दान दहेज में भी, बहुओं को जलाने में भी, न्यायालयों में भी, न्यायाधीशों की ज़िंदगी में भी-  ईश्वर या कहें तो शैतान की तरह यही हालात हर जगह मिलते हैं.

सांप्रदायिकता का विष गाँव-गाँव तरह तरह के नाम वाली हिंदू और मुस्लिम सेनाएं बन कर न सिर्फ़ फैला है, बल्कि लामबंद हो गया है. नारे लगाए जा रहे हैं कि तथाकथित 'सूडो' धर्मनिरपेक्ष लोग गाँव-गाँव में पाकिस्तान बनाने में लगे हैं. दूसरी तरफ़ से माँग उठती है 'राजधानी दी थी, राजधानी लेंगे.'

आतंकवाद पर एक सैमिनार में नायक की मुलाक़ात होती है फ़िल्म लेखक और गीतकार जावेद अख़्तर से. कैफ़ी आज़मी के जन्म नगर आज़मगढ़ में पनप रहे आतंकियों की बाढ़ के लिए कैफ़ी के दामाद जावेद अख़्तर ने बाबरी मस्जिद के गिराए जाने का वास्ता दे डाला. जावेद का तर्क आनंद को नहीं पचता. इस वस्तुस्थिति को न समझ पाना लेखक की अक्षमता ही कहा जाएगा. भारतीय संदर्भ में बाबरी मस्जिद का ध्वंस मुसलमानों को उग्र बनाने का एक शक्तिशाली कारण बना -  इस तथ्य को नकारा नहीं जा सकता. हाँ, इस संदर्भ में यह बात भी कही जा सकती है कि जिस तरह एक मस्जिद के टूटने से मुस्लिम भावनाओँ को और उन के अहम को ठेस पहुँची है, वैसी ही ठेस अभी तक समृत इतिहास में हिंदुओं को सैकड़ों मंदिरों को मिस्मार किए जाने से पहुँची थी और ऐतिहासिक अवशेष देख कर अब भी पहुंचती है-  बाबरी मस्जिद का ध्वंस हिंदुओं की इन्हीं भावनाओं को उकसाए जाने का परिणाम था. अतः जावेद आदि द्वारा ऐसे आधारों पर आतंकवाद पर लीपापोती करना उचित नहीं ही ठहराया जा सकता.

दयानंद पांडेय यह दिखाना नहीं भूलते कि राजनीति में आए कई हिंदू नेता और मठों के ऐश्वर्यभोगी महंत इन्हीं पुराने ज़ख्मों के हवाले दे दे कर माफ़िया संगठनों से साँठगाँठ कर के हिंदू और मुस्लिम सेनाओं की मदद से, अपनी रोटी सेंकने के लिए दोनों संप्रदायों को भड़कवा कर दंगे करवाने, पूरे समाज को अस्पतालों के ट्रामा सैंटरों तक पहुँचाने में, वोट कमाने के साथ साथ समाज को तोड़ने, देश को हाँकने और लगे हैं.  इन सेनाओं का नेतृत्व जिस तरह के नौजवानों के हाथ में  है, उन की मानसिकता में जाने के लिए लेखक जावेद पर यह आरोप लगाना नहीं भूलता कि स्वयं जावेद की ज़ंजीर, दीवार, शोले जैसी फ़िल्मों ने नायक और खलनायक का अंतर मिटा दिया. देश का नौजवान माफ़िया बनना शान की बात समझने लगा. नौजवानों की खलनायक बन कर अपने को महिमामंडित करने की यह भावना आज की ग्रामीण राजनीति में प्रमुख भूमिका निभा रही है. यही 'दबंग' गुंडे बाद में नेता और विधायक-सांसद बन जाते हैं.

मीडिया जो कभी फ़ोर्थ एस्टेट कहा जाता था, वह भी अछूता नहीँ है-  पेड न्यूज़ का ज़माना आ चुका है. पता नहीं चलता कि हम अख़बारों में जो पढ़ रहे हैं, टीवी पर जो देख रहे हैं वह कितना असली है, कितना बिका हुआ? दुखी आनंद को लगता है-- क्या समाज शास्त्री, क्या इतिहासकार, क्या लेखक, क्या कवि... बाज़ार की प्रशस्तिगाथा का शिलालेख तैयार करने में युद्धरत हैं. युद्धरत हैं सभी स्वामी रामदेवों की योगपताका का मीनू रचने, पढ़ने, बेचने और छलने की प्रवीणता हासिल करने में. आसाराम बापू जा रहे हैं, स्वामी रामदेव आ रहे हैं. एक बाज़ार जा रहा है, एक आ रहा है. यह क्या है कि योग, अध्यात्म, गांधी-  सभी बिकाऊ हो गए हैं?
कुछ अन्य मार्मिक उद्धरण और प्रकरण -

-    क्या कीजिएगा, सिस्टम ही चौपट हो गया है. और सिस्टम के तराज़ू में मानवीयता नहीं अमानवीयता का ही बोलबाला रहता है.

-    क्या अब तक सब की देह से ग़ुस्सा ग़ायब हो गया था और सब को सिस्टम की नपुंसकता ने घेर लिया था?

-    'आजकल तुम कितने एन.जी.ओ चलाते हो?' -  'यही कोई सात-आठ.'

-    रिश्वतख़ोरी को पहले लोग नफ़रत की नज़र से देखते थे, पर अब वही रिश्वतख़ोरी उन की योग्यता बन चली थी.

इस अंतिम वक्तव्य से सहमत होना मुझ जैसों के लिए संभव नहीं है. जब से यानी 1945 से जब से मैं ने होश सँभाला है 'ऊपर की आमदनी'  को समाज में आदर का स्थान पाते देखा है. शादी ब्याह के मामले में लड़की वालों का यह प्रश्न आम हुआ करता था कि लड़के को 'ऊपर की आमदनी'  होती है या नहीँ? वेतन कम होना कोई अवगुण नहीं होता था, असली अवगुण होता था 'ऊपर की आमदनी'  न होना. समाज में तथाकथित भ्रष्टाचार यानी रिश्वतख़ोरी का चलन कोई आज की बात नहीं है. आनंद स्वयं भ्रष्टाचार के विरुद्ध जे.पी. के आंदोलन का सक्रिय सदस्य रहा है. पर क्या हुआ, क्या हो पाया?

नायक आनंद का एक मित्र भ्रष्ट नेता उस से पूछता है--

वी.पी. सिंह जो बोफ़ोर्स के घोड़े पर सवार हो कर बड़ी तेज़ी से धराशायी हो गए, जानते हो कैसे? और स्वयं जवाब भी देता है- यह कारपोरेट लौबी के लोग-  अरुण नेहरू जैसे लोग उन्हें धूल में मिला दिए, पहले राजीव को खाया, फिर वी.पी. को.

आख़िर तक आते आते आनंद अपने दोहरे जीवन से आजिज़ हो उठता है. वह समाज में आदर्शवादिता की तलाश में है. समाज को महापतन की ओर बढ़ते देखते रहना उस के लिए गहन पीड़ा बन जाता है. वह स्वयं किसी बड़ी निजी कंपनी में दिनरात अपने से समझौते करने में लगा रहता है. यहाँ तक कि कंपनी के हित में किसी एक उत्पाद की लांचिंग पर महंत के साथ एक ही मंच पर उत्पाद के गुणगान को विवश है, और इस घटना के बाद वह पूरी तरह टूट सा जाता है. भाग कर गाँव का रुख़ करता है. अब वहाँ उस के लिए कोई जगह नहीँ है.

वह धोबी के कुत्ते की तरह न घर का रह गया है, न घाट का. मित्र और हितैषी समझते हैं कि वह मानसिक संतुलन खोता जा रहा है. शायद उसे भी अपने इंटैलैक्चुअल घावों का इलाज करवा लेना चाहिए. सच तो यह है कि मिडिल क्लास के तथाकथित बुद्धिजीवी जो हाशिए पर बैठे तूफ़ानों का नज़ारा कर रहे हैं, कुछ ऐसी ही हालत में वे ही हैं जो हारे हुए हैं.

उपन्यास जगह-जगह व्यवस्था पर गहरी चोटें करता है, समाज में कुचालों, संप्रदायवाद, दलित उद्धार के नाम पर होने वाले कांडों का सटीक वर्णन करता है, गाँव-गाँव समाज के विघटन पर प्रकाश डालता है, मुझ जैसों के अंतर्तम अंतर्मन को गहराई तक छूता, कचोटता, झिंझोड़ता है. दयानंद पांडेय की हर रचना मुझे उन की आत्मकथा ही लगती रही है. कारण है उन का शिल्प. उन की कहानियों उपन्यासों में जो नाम हैं, उन में से कुछ ही हैं जो बदले हुए हैं, बाक़ी तो असली हैं. कहना कठिन हो जाता है कि ये कहानियाँ हैं या रिपोर्ताज. सब कुछ निर्मम, निष्ठुर, क्रूर-  और सड़ा, बदबूदार. इस के पीछे है लेखक की आँखों देखे सच को जस का तस रख देने की विवशता. उस का कहना है कि वह कुछ और कर ही नहीं सकता.

उपन्यास को पढ़ कर सवाल उठता है - क्या करें? यह सवाल मुनव्वर भाई और आनंद के मन से भी फूटा था. उपन्यास के घटना काल में भी. अब जन लोकपाल क़ानून के समर्थन में अन्ना हज़ारे के अनशन के बाद हमारे सामने भी कुछ ऐसे ही सवाल हैं: क्या करें? क्या होगा?क्या हो सकता है?आंदोलनों से, लोकपालों से क्या भ्रष्टाचार ख़त्म किया जा सकता है? अन्ना हज़ारे की ही तरह नायक आनंद ने भी छात्र आंदोलन के शुरुआती दिनों में अनशन किया था. उस अनशन का उद्देश्य भी था अपनी माँगों के लिए समाज को आकर्षित करना. आनंद भी जे.पी. के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलनोँ का सहभागी रहा है. हुआ क्या-क्या भ्रष्टाचार और नहीं बढ़ गया,  और जे.पी. के आंदोलन से जुड़े कई बड़े लोग क्या स्वयं भ्रष्टाचारी नहीं थे.

दयानंद पांडेय अपनी रचनाओं में जगह जगह बड़े मौजूं और मारक शेर या कविता अंश उद्धृत करते रहते हैं. वे जो हारे हुए में कई बार उद्धृत की गई एक कविता पंक्ति हैं -  रंगबिरंगे साँप हमारी दिल्ली में,  क्या कर लेंगे आप हमारी दिल्ली में? जो बड़े बड़े घाघ हैं, मगरमच्छ हैं, या जो छोटे मोटे पैसे ले कर ऊपर की कमाई करने वाले कर्मचारी हैं, चाहे अस्पताल में हैं, चाहे पुलिस में, बिजली के दफ़्तर में, चुंगी में, नगरपालिका में, प्रदेश या देश की सरकार में-  वे बड़े आराम से, पूरी ढिठाई और बेशर्मी से, कहते नज़र आते हैं -  रंगबिरंगे साँप हमारी दिल्ली में - क्या कर लेंगे आप हमारा दिल्ली में?

क़ानून और व्यवस्था कभी किसी का कुछ बिगाड़ते नज़र तो नहीं आते. शायद नए आंदोलन कुछ सुपरिणाम दे पाएँ. लेकिन उन की माँग बस लोकपाल तक है. सिस्टम बदले बग़ैर लोकपाल ही किसी का क्या कर लेगा? सिस्टम की मूलभूत कमज़ोरी को रेखांकित करने के लिए वे जो हारे हुए में एक जगह कहा गया है-  'किसी की जवाबदेही नहीं है.'

जब तक जवाबदेही नहीँ होती, तब तक किसी भी पार्टी की सरकार आ जाए, कितने ही आंदोलन खड़े कर लिए जाएँ, कितनी ही दूसरी आज़ादियाँ मिल जाएँ, यहाँ तक कि चाहे किसी जादू से रातोंरात अन्ना हज़ारे राष्ट्रपति, अरविंद केजरीवाल प्रधान मंत्री और किरण बेदी लोकपाल बन जाएँ, वे माफ़िया का कुछ नहीं बिगाड़ पाएँगे. हाँ, यह हो सकता है कि सिस्टम में फँस कर वे भी दिल्ली के नए रंगबिरंगे साँप बन जाएँ, फन उठा कर फुँकारने और जिस तिस को डँसने लगें.

पुस्‍तक का नाम : वे जो हारे हुए

लेखक : दयानंद पांडेय

पृष्ठ संख्या  :  264

मूल्य - रु. 400.00

प्रकाशक -  जनवाणी प्रकाशन प्रा लि, 30/35-36 गली नंबर 9, विश्वास नगर, दिल्ली 100 032

समीक्षक अरविंद कुमार बालश्रमिक, प्रूफ़रीडर, उपसंपादक,  प्रधान सहसंपादक से लेकर संपादक तक का दायित्‍व निभा चुके हैं. इनकी गिनती देश के वरिष्‍ठ पत्रकारों तथा समीक्षकों में होती  है.  भोजपुरी-हिंदी-अंग्रेजी कोश के संपादन के साथ इंटरनेट पर अरविंद लैक्सिकन पेशकर इन्‍होंने हिंदी को पूरे विश्‍व से जोड़ दिया है. हिंदी पत्रिका सरिता, मुक्‍ता एवं फिल्‍मी पत्रिका माधुरी के साथ वरिष्‍ठ पदों पर जुड़े रहे हैं. कई पुरस्‍कारों से सम्‍मानित किए जा चुके हैं. कई देशों की यात्रा भी की है.


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