विमल कुमार की कुछ कविताएं

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पिछले 25 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय विमल कुमार के चार कविता संग्रह आ चुके हैं. उन्हें कई पुरस्कार और सम्मान मिल चुके हैं. विमल फिलहाल यूएनआई, दिल्ली की हिंदी सेवा में विशेष संवाददाता हैं. पेश है उनकी कुछ कविताएं...

राहत

विमल कुमार

 

एक सवाल मैं

आज खुद से पूछता हूं

बचता रहा हूं अब तक

क्या पाना चाहता था

मैं तुम्हारे प्रेम में

तुम्हारा मन?

तुम्हारी देह?

नहीं पाया इनमें से कुछ भी

तो क्या नहीं किया प्रेम

कुछ तो जीया

साथ तुम्हारे दो कदम चला

दो प्याली चाय पी

सच है कि

हुआ कई बार अपमानित

कई बार आहत

पर कुछ तो मिली

कई बार तसल्ली

कई बार राहत

xxx

प्रेम केवल आलिंगन नहीं है

विमल कुमार

 

प्रेम केवल आलिंगन नहीं है

चुंबन नहीं है केवल

यह कहना भी प्रेम नहीं है

कि मैं तुमसे प्रेम करती हूं/करता हूं

प्रेम तो सिर्फ एक स्मृति है

जो उस बेंच के यप में दर्ज है तुम्हारे भीतर हमारे भीतर

जहां कहीं बैठे थे हम

उन सीढ़ियों की स्मृति

जहां बैठकर कभी चाय पी थी

अपने दुख के बारे में बातें की थीं

वे प्रेम, वो कुर्सी की स्मृति

अगर तुम्हें उस प्रेम को फिर से पाना है

तो उस बेंच के पास जाओ

जाओ, उस घास के पास

सीढ़ियों और मेज तथा कुर्सी के पास

और उस फूल के पास जाओ

कहो मैं फिर आया हूं

भले ही हूं इस बार अकेला

अगर वहां जाने पर

तुम्हारे अंदर कुछ टीसता है

तो समझो अभी भी है

तुम्हारा प्रेम जीवित है

तमाम नश्वर चीजों के बीच

समझ जाएं। स्मृतियां कभी मरती नहीं

प्रेम अमरता में है

किसी तरह की क्षणभंगुरता में नहीं

xxxx

आईने में मन

विमल कुमार

 

कल तक यह ठीक-ठाक था आईना

अब टूट गया है

टूटे हुए आईने में

देख रहा हूं तुम्हारा चेहरा

तुम्हारे बाल, तुम्हारे होंठ

टूटे हुए आईने में अब भी

दिख सकता है तुम्हारा सौंदर्य

बशर्ते न टूट गया हो

मेरे मन का आईना

क्या कोई ऐसा आईना

मिल सकता है

जिसमें तुम्हारे ख्वाह दिखें

नजर आए तुम्हारी कल्पनाएं

तुम्हारी इच्छाएं, कामनाएं

एक दिन आईने मंे

देख सकूं तुम्हारा मन

इस जीवन में बहुत बार देख लिया

तुम्हारा तन!

xxxx

राख से जन्म-1

विमल कुमार

 

मैं अपनी राख में से

फिर से जन्म ले रहा हूं

एक सपना लिए

एक उम्मीद लिए

शायद इस बार मैं

कुछ ऐसी रेखाएं खींच सकूं

नदी की सतह पर

तुम जिन्दगी भर याद करोगी

कि कितनी चमक है इन रेखाओं मंे

मैं जन्म ले रहा हूं

अपनी आंखें खोल रहा हूं

पंख फड़फड़ा रहा हूं

खोल रहा हूं मुंह

फैला रहा हूं अपनी भुजाएं

आसमान में चारों तरफ

डगमग कर रहे हैं मेरे पांव

मैं आ रहा हूं फिर से तुम्हारे पास

पर घबराओ नहीं

अब मैं काफी बदल गया हूं

राखपुत्र जो हूं

तुम मिलोगी तो

नहीं पहचान पाओगी

यह वही शख्स है

जो कुछ दिन पहले ही

एक मुट्ठी राख में तब्दील हो गया है

 

2

मैं अपनी राख में से

फिर जन्म ले रहा हूं

तुम्हारा प्रेम नहीं मिला

तो इसका अर्थ यह नहीं

कि मैं मिट जाऊंगा

हो जाऊंगा नेस्तानाबूद

मुझे सिर्फ तुमसे ही नहीं प्रेम करना है

करोड़ों लोग हैं

करना है जिनसे

मैं उन्हें बेहद चाहता हूं

जी जान से

उनके पसीने से

उनकी ईमानदारी से

मुझे बहुत प्यार है अब भी

अंधेरे से

क्योंकि जब हम उसे चीरते हैं तो इसी में छिपी होती है

एक रोशनी भी...

’’’’

बीमारी में किसी ने किया है

मुझे फोन

उसकी आवाज से लगता है फोन करनेवाला भी

बुखार में है

यह एक औपचारिकता है या

क्या वह मेरे प्यार में है

मैं जानता हूं कुछ के लिए प्रेम

छिपाने में है

तो कुछ के लिए इज़हार में है

’’’

मर जाने के बाद

क्या कोई भीख मांगता है

किसी से

पर मेरे शहर में

एक आदमी

मांगता है भीख अब भी

पर जाने के बाद

पेड़ के नीचे

उसे नहीं चाहिए

पैसे

रोटी का कोई टुकड़ा

वह कहता है

मेरे भिक्षापात्र में

तुम डाल दो

थोड़ा-सा प्रेम

थोड़ा विश्वास

देखना,

मैं किस तरह फिर

जिन्दा हो जाऊंगा

इस दुनिया में

और नहीं मांगूगा

कभी कोई भीख

’’’’

वसंत सेना!

मैंने तुम्हे चाह कर

किया बहुत बड़ा अपराध

नहीं जानता था

चाहने की भी होती है सज़ा

इतनी बड़ी सजा

कि मृत्युदंड!

अगर मैंने तुमको चाहा है

तो तैयार हूं

यह सज़ा भुगतने को भी

वसंत सेना!

एक अनुरोध है

कि फांसी की रस्सी

तुम्हीं खींचना

अपने हाथों से

जब तुम सामने रहोगी

तो शायद मुझे

इस मजा में भी

थोड़ी देर के लिए

मिल जाएगी

कोई खुशी

’’’’

अब पत्थर बनकर

बैठा हूं तुम्हारे सामने

नहीं करूंगा कोई शिकायत

लिख रहा हूं

तुम्हे खत जिस कलम से

वह एक जीवाश्म बन गया है

आंसू जो निकलने थे

आंखें से

वे लककड़ी के बुरादे

बन गए हैं

अब तुम चाहो

तो मुझे दर्द दे सकती हो

बेहिचक

मुझ पर नहीं होगा

इसका असर

नहीं होगी कोई तकलीफ

पहले की तरह

आंधी में

उखड़ा हुआ पेड़

तुम्हें याद करेगा

जीवन भर बिना किसी शिकायत के

xxxx

बिस्तर पर

विमल कुमार

 

जब तुम रात में

बिस्तर पर नहीं होती हो

चादर और तकिए

काटने दौड़ते हैं मुझे को

वे अपने नुकीले दांतों से

बना देते हैं मेरे शरीर पर

कई जगह घाव

और जब बिस्तर पर रहकर

तुम बातें नहीं करती हो

मेरी बेचैनी और बढ़ जाती है

मैं तो यही चाहता हूं

तुम बिस्तर पर रहो

हंसते हुए

हमबिसतर भले ही न हो

जिन्दगी में कभी

2

बिस्तर पर भी एक गवाह है

चश्मदीद गवाह

लेकिन नहीं बुलाया जाता

वह अदालत में

कौन सुनता है उसकी गवाही

इस अनबन में

3

जब तुम मेरे साथ हो

बाहों में

तो मुझे लगता है

बिस्तर पर है एक चांद

मेरे पास लेटा हुआ

4

आधी रात को

यह बिस्तर पुकारता है

कोई उत्तेजना जगाता है, कोई राज बताता है

5

बिस्तर पर

गुस्सा

क्रोध

झगड़ा, फसाद

लो! अब चांद सो गया

मुंह फेरकर

अपनी ओर

6

बहुत दिनों के बाद

आज तुम हमबिस्तर हुई हो

किसी खुशी से तर हुई हो

उड़ती हुई एक परी हुई हो

बरसात में एक पेड़-सी हरी हुई हो

7

बिस्तर पर मैंने चांद को

नाराज पाया

तो उससे माफी मांग ली

चांद खुश हुआ

तो बिस्तर भी मुसकराने लगा

तकिया भी गाने लगा

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बिस्तर जानता है

एक ऐसा सच

जो कोई नहीं जानता

बिस्तर ने देखा है

एक ऐसा दृश्य

जो कोई कभी नहीं देख सकता

यह गोपनीयता ही

है उसका सौंदर्य

उसके बगैर नहीं की जा सकती

कल्पना जीवन की

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बिस्तर ने देखे हैं

आंसू

सुनी है सिसकियां

उमड़ती लहरें भी

देखी है उसने

देखा है

एक जहाज को डूबते हुए

फिर एक दीये को बुझते हुए

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यह बिस्तर भी

एक कांटा बन गया है

सोता हूं मैं

कांटों की बिस्तर पर

याद करते हुए

तुम्हें फूलों की तरह

11

बिस्तर पर एक संग्राम

कोई खुशी पाने के लिए

आज मैं फिर हांफने लगा हूं

12

बिस्तर पर भी

दूरियां होती हैं

साथ सोने की

मजबूरियां होती हैं

13

मैं तुम्हारे साथ बहुत दूर चला गया

पर नहीं जा सका

बिस्तर पर

बहुत विश्वास हो या

फिर प्रलोभन

तो जाती है एक स्त्री पुरुष के साथ बिस्तर पर

प्रलोभन मैं दे नहीं सकता था

और नहीं पा सका तुम्हारा विश्वास

xxxx

बेचैनी का सबब

विमल कुमार

 

मेरे लिए तुम्हारा प्रेम कोई सौदा नहीं था

नहीं था कोई अनुबंध, करार, घोषणापत्र

जरूरत पड़ने पर सिर्फ काम से काम भी नहीं था

नहीं थी कोई वासना, लिप्सा

था तो सिर्फ इतना

तुम थोड़ी देर के लिए यहां सीढ़ियों पर बैठ जाती

मैं तुम्हारी छाया के साथ थोड़ी देर

सुस्ता लेना चाहता था

अपना सुख और दुख बताना ही

मेरे लिए प्रेम था

इसलिए मैं कहता हूं

तुम जरा अपनी मां और पिता और भाई के बारे में बताती

बताती अपने बच्चों के बारे में

कितनी जकड़न है उसके सीने में

कितना कफ जमा है

इसलिए मैं यह भी बार-बार तुमसे कहता हूं

मैं तुम्हें प्यार नहीं कर रहा था

मैं तो इस दुनिया को जानने का

जीवन को पहचानने का उपक्रम कर रहा था

मैं तो अपनी जिन्दगी जी रहा था

जो मुझे छोड़कर चली गई थीं कहीं

इस शहर में

मेरे पंख नोच लिए गए थे

मेरी इच्छाएं कुतर दी गई थीं

छीन ली गई थी सांसे मुझसे

नथुनों में आक्सीजन नहीं

ढेर सारा कार्बनडायक्साइड भर गया था

सब्जी खरीदने निकला था

निकला था दूध लाने

तो रास्ते में ही बेहोश हो चुका था

गिरा पड़ा था सड़क के किनारे

मेरा चेहरा भी मेरी पत्नी नहीं पहचान पा रही थी

मेरी लिखावट भी मेरी बेटी पहचान नहीं पा रही थी

उसे अंधेरे में

ऐसे में मैं और कर क्या करता

इस बुढ़ापे में

एक पुलिया पर बैठा

तेज अंधड़ को आते-जाते देखकर

चांद को ढलने देखकर

सूरज को रोज पसीने से तर-बतर निकलते देखकर

किस तरह चीजें खरीदी जा रही हैं

किस तरह बेची जा रही हैं

इसलिए मैं कहता हूं

मेरे लिए प्रेम कोई सौदा नहीं था

वह दिल को बहलाने का

गालिब ख्याल भी नहीं था

वह एक ऐसी पुकार थी

जो किसी पुराने कुएं के भीतर से

या किसी ढह गए किले के अंदर से

आती थी और मुझे बेचैन कर जाती थी

मैं तो केवल इस बेचैनी का सबब ढूंढ रहा हूं

xxxx

गवाही

विमल कुमार

 

तुम बोलोगी नहीं

सुनोगी नहीं

जो कुछ मुझे कहना था गवाही में

मैंने इस दर्पण को कह दिया है

यही है एकमात्र गवाह

मेरे अपराधों का

पापों का

झूठ का

छल का

इससे बचकर मैं कहां जाता

इसलिए मुझे जो कुछ कहना था

मैंने उससे कह दिया है

मैंने अब तक तुमसे

अपने जीवन में कुछ भी नहीं लिया है

तुम्हें मैंने

बिना मांगे अपना प्यार दिया है

झूठ नहीं था उसमें रत्ती भर मिला

सच था, जितना वक्त मैंने तुम्हारे साथ जीया है

बता दो, मेरा अपराध

फिर देना सजा

आखिर मैंने क्या किया है

’’’’

रक्षा में हत्या

विमल कुमार

 

मैं तो तुम्हें

लहरों से बचाने आया था

तुम्हारे दुख को

अपने भीतर छिपाने आया था

तूफान अब आने ही वाला है

यह तुम्हें बताने आया था

पर तुम्हें अच्छा नहीं लगा

मेरा इस तरह आना

तुम्हारी प्रार्थना में

कोई गीत गाना

फिर तुमने जीवन भर

मुलाकात नहीं हो सकी

खत्म हो गया

अब मिलने का

हर इक बहाना

कर बैठा जो मैं

रक्षा में हत्या

’’’’

दर्द में खून में मिल गया है, सांस में भी

विमल कुमार

 

तुम अपने दर्द से कह दो

वह मुझे इस तरह न पुकारे

रात के अंधेरे में

जैसे कोई चीखता है

न पुकारे वह मेरे घर में आकर

सीढ़ियों पर से

छत पर से

जब मैं सोने जाऊं

तो मेरी चादरों और उसकी सलवटों में छिपकर न पुकारे

तकिए के भीतर तो हरगिज नहीं

मेरे सपने और मेरी नींद में

न आए उसकी कोई आवाज

तुम अपने दर्द से कह दो

मेरे भीतर खाली कुएं में न झांके

न झांके किताबों के पन्नों के भीतर

जिसे मैं ट्रेन मंे पढ़ रहा हूं

न झांके वह पत्तों और फूलों के भीतर

जिसे मैं तोड़कर लाया हूं

पूजा-अर्चना के लिए

कह दो तुम अपने दर्द से

वह मेरा दरवाजा न खटखटाए

सुबह-सुबह

जिससे बढ़ जाती है मेरी बेचैनी

और टूट जाती है नींद

अगर तुम्हारा कोई दर्द

पुकारता है मुझे

तो मैं

तुमसे मिलने चला आता हूं

फिर न कहना कि क्यों आते हो

तुम्हारे दर्द मं

जमाने का भी दर्द है मिला हुआ

मिला है तुम्हारे टूटे सपनों का दर्द भी

मैं जानता हूं

तुम कहोगी

आखिर तुम सुनते ही क्यों हो इसकी पुकार

अनसूना कर दो

पर मैं कैसे कर सकता हूं

अनसुना

जब मेरे कान के पर्दे के भीतर

सुनाई पड़ती है तुम्हारी दर्द भरी आवाज

मैं एक मनुष्य हूं

अपनी मां के दर्द से ही

मैं पैदा हुआ था

किसी के दर्द को अपने जीवन में

कैसे कर सकता हूं अनसुना

जब वह मेरे खून में मिल गया हो और सांस में भी

यह मेरी भूल थी कि मैंने चांद को

चांद समझ रखा था

मुझे लगता है

कि मैं चांद के करीब

बहुत करीब पहुंच गया हूं

अब उसे छू लूंगा

पकड़ लूंगा

अपनी मुट्ठी में

लेकिन नहीं

मैं तो दूर था

बहुत दूर

लेकिन जब मुझे लगा

कि मैं करीब हं उसके बहुत करीब

तो उसकी धड़कन की आवाज भी सुनाई पड़ने लगी मुझे

उसके छिपे हुए ख्वाब भी नजर आने लगे थे

तब मुझे यह लगा

कि चांद अब मुझसे हाथ मिलाएगा

उतनी ही गर्मजोशी से

जितनी वह हाथ मिलाता रहा दूसरों से

मेरा हाल चाल पूछेगा

पूछेगा-तुम्हारी तबीयत अब कैसी है?

और नौकरी तो सुरक्षित है न?

लेकिन यह क्या

चांद ने मुझसे कुछ भी नहीं पूछा

वह औरों से तपाक से हाथ मिलाता रहा

मेरे सामने उनके साथ गप्प-शप्प की

चाय-कॉफी पीता रहा

मुझसे तो उसने एक ग्लास पानी तक नहीं पूछज्ञ

जबकि वह घंटों मुझसे टेलीफोन पर बतियाता रहा

कई ई-मेल भी किए उसने मुझे जरूरत पड़ने पर

उसने मुझसे पूछा!

अंग्रेजी के फलां शब्दों का

हिन्दी में मानी

मैं उसकी बीमारी में धरती पर से

दवाइयां लेकर देता रहा

डाक्टरों से उसके लिए समय भी लिया

लेकिन इससे ज्यादा तकलीफदेह बात

और क्या होगी

कि वह धरती पर आया

तो मेरे मुहल्ले में

यहां तक कि मेरे पड़ोस में आकर भी

वह मेरे घर नहीं आया

उसने इतिल्ला भी नहीं की

वह मेरे पड़ोस में आ रहा है

मैं उसका कम से कम

अगवानी तो करता

अपने चांद को देखता

वह किस तरह मुस्कराता हुआ आ रहा है

मेरे घर के सामने पार्क का उद्घाटन करने

जिसकी बेंच पर बैठा

मैंने उसे कितनी बार याद किया है

आंखों में आंसू लिए

वह दरअसल पत्थर का एक टुकड़ा ही था

यह मेरी भूल थी कि मैंने चांद को चांद समझ रखा था

’’’’

भूलों का नाम

विमल कुमार


यह जीवन भी

कई भूलों का नाम है

एक भूल यह भी थी

कि मैं पता नहीं

किन-किन को प्यार करता रहा

जबकि वे मुझसे मित्रता भी नहीं करना चाहते थे

एक भूल यह भी थी

कि मैंने परोपकार किए

आंसू पोछे किसी के

किसी के दुःख को

अपना समझा

किसी के बच्चे को

प्यार किया

जबकि लोगों ने कहा

तुम्हें यह सब करने की क्या जरूरत पड़ी थी

जानता था

कि यह भूल थी

पर उस भूल में

कोई सुख मिलता था

कोई तसल्ली

रूह को थोड़ा आराम मिलता था

आंखों को मिलते थे कोई सपने, कोई नींद

इन्हीं भूलों की वजह से

यह सजा पा रहा हूं

मैं तुमसे दूर बहुत दूर जा रहा हूं

किसी से प्यार करके अपना ही घर ढा रहा हूं

’’’’

एक लहर

विमल कुमार

 

समुद्र ने क्या कभी चाहा होगा

इतना लहरों को

नदी ने तट को

पक्षी ने आसमान को

चांद ने धरती को

क्या चाहा होगा

इतना ही पेड़ ने कभी फूल को

चाहा होगा जरूर

तभी तो लौट जाती हैं लहरें

समा जाती हैं, उसके गर्भ में

चाहकर भी

तट से अलग नहीं होती नदी

पक्षी कहीं उड़ नहीं पाते

आसमान के बगैर

यही हाल चांद और धरती का

पेड़ और फूल का

मैं भी चाहता हूं

तुम्हें इसी तरह

और सोचता हूं

काश! तुम भी

एक लहर बन जाती

बन जाती कोई तट

कोई आसमान

कोई चांद

कोई फूल

मैं तो कब का समुद्र बना हूं

बना हूं नदी

कोई पक्षी

कोई पेड़

तुम्हारे प्रेम में

प्रतीक्षा में हूं

तुम भी कुछ बन जाओ

मेरी तरह

चाहते हुए

मुझे एक लहर...

’’’’

प्रकृति के नियम के विरुद्ध

विमल कुमार

देवी!

तुम अपने भक्तों के घर नहीं जाती हो

चाहे वे कितने बीमार क्यों न हो

दर्द से छटपटा रहे हों

बिस्तर पर

देवी!

तुम उन्हें अपने आप फोन भी नहीं करती हो

पूछती नहीं हो

उनका हाल-चाल

यह कैसी जिद है देवी!

क्या तुम उनका इस्तेमाल करती हो

बाजार के जमाने में

केवल काम से काम

तुम पर वे फूल चढ़ाते हैं

तुम्हारे द्वार पर वे शीश नवाते हैं

और तुम हो

कहती हो

मनुष्यों और देवता के बीच

रहनी चाहिए एक दूरी

नहीं तो मनुष्य देवता बन जाएगा

और देवता

बन जाएंगे

एक दिन मनुष्य

प्रकृति के नियम के विरुद्ध!

’’’’

गुनाह

विमल कुमार

 

देवी!

तुम्हारे मंदिर के गहने

चोरी हो गए

तो तुमने मुझे ही

चोर समझ लिया

मैं तो इस पंक्ति में

इसलिए खड़ा हूं

दो फूल मैं भी चढ़ा सकूं

तुम्हारा आशीर्वाद मिले या न मिले

कम से कम

मुझे तो मिल जाएगी तसल्ली

कि मैं भी खड़ा हूं

किसी पंक्ति में किसी के लिए

देवी!

मैं कोई सेंध लगाने नहीं आया हूं

तुम्हारे मंदिर में

देखो!

नहीं है मेरे हाथ में

कोई फावड़ा

कोई रस्सी, कोई नक्शा

मैं एक गरीब दुखियारा हूं

इतने जगमगाते हीरे-जवाहरात

नहीं देखे हैं मैंने

पर लालची नहीं हूं देवी!

इस मंदिर के पिछवाड़े में रहूंगा

बिन्ना अनन जल ग्रहण किए

जब तक तुम मुझपर

विश्वास नहीं कर लो

सुना है, तुम जब प्रसन्नचित हो जाती हो

तो अपने भक्तों से

करती हो प्रेम

सच कहूं, देवी!

मैं तुम्हारा प्रेम चुराने ही

यहां आया था

मुझे सपनों मंे भी नहीं थी उम्मीद

तुम करोगी

इस भक्ति से कभी

सहानुभूति की तरह प्यार

अगर प्रेम चुराना

गुनाह है

तो मंदिर के गर्भगृह में ही

दे दो मुझे सजा

उन चोरों के साथ

जिन्होंने तुम्हारे

गहने चुराए हैं

’’’

अपरिवर्तित प्रेम

विमल कुमार

तुमने भी मुझसे कहा था

एक दिन

मुझे प्यार करो

तो उसी रूप में

जिस रूप में

मैं हूं

अपरिवर्तित

मुझे प्यार करो

लहरों में फंसी मेरी नाव को भी प्यार करो

उस तूफान से भी

जिसमें घिरी हूं मैं

प्यार में यह न कहो

कि मैं अपना रंग

और गंध और अपनी भाषा बदल लूं

तुम्हारे लिए

बदल दूं

अपना नजरिया

अपनी दृष्टि

तुम प्यार करो

मेरी सीमाओं से

प्यार करो

मेरी कमजोरियों से

न कहो

कि मैं अपनी रेखाओं को मिटा दूं

मिटा दूं

अपने पांचों के निशान

प्यार करो

तो मेरे दुख से भी

प्यार करो

केवल सपनों और

उम्मीदों से न करो

करो मुझसे प्यार

संपूर्णता में करो

मुझे मेरे वक्त से

काटकर

काटकर मेरे अतीत से

भविष्य से

प्यार नहीं करो

करो,

तो जरा सोच समझकर

करो,

इतनी जल्दबाजी

हड़बड़ी

और भावुकता में

प्यार नहीं करो

’’’’

संवाद

विमल कुमार

 

मेरे घर की दीवारें ढह गई हैं

पलस्तर झर गया है

दरवाजे उखड़ गए हैं

खिड़कियां भी निकल गई हैं

लगता है

तुमसे मेरा कहीं

कोई संवाद

टूट गया है

अपना चेहरा

जैसे रास्ते में

छूट गया है

’’’’

कविता केवल शब्दों में नहीं लिखी जाती

लिखी जाती है वह

कभी किसी के जख्म की रोशनाई से

कभी किसी के

दर्द की परछाई से

’’’’

खत्म कहानी

विमल कुमार

 

नहीं पता था मुझे

लिखते-लिखते

कहानी बीच में ही

खत्म हो जाएगी

वह औरत जो सुना रही थी मुझे

अपना दुख

कहानी के शीर्षक में ही अचानक

सो जाएगी

मैं उसे ढूंढूं कहां ढूंढूं

जब वह

मेरी नजरों के सामने

खड़ी-खड़ी

खो जाएगी

’’’’

वक्त के तूफान पर

विमल कुमार

 

नहीं खरीदे जा सकते

किसी के आंसू

नहीं बेचे जा सकते

किसी के सपने

किसी की दुकान पर

हाथ रखना

जरा प्रेम के निशान पर

लिख रहा हूं मैं एक गीत

वक्त के तूफान पर

’’’’

असंवाद

विमल कुमार

 

कोई पत्ता

टूट गया है डाली से

तो फिर उसे जोड़ा हनीं जा सकता

कोई लहर लौट गई हो

तो उसे वापस नहीं

खींचा जा सकता तट पर

कोई शाम ढल गई हो

तो फिर उसे नहीं बुलाया जा सकता

आसमान पर

उसी तरह

नहीं प्राप्त किया जा सकता

किसी का विश्वास

दोबारा

अगर वह टूट गया हो

किसी तरह

अगर नहीं चाहता है

कोई आपसे करना बात

तो नहीं किया जा सकता

कायम फिर से

संवाद

’’’’

तुम मेार किताब हो

विमल कुमार

 

मैं जानता हूं

अन्ततः साथ रहेगी

मेरी कविताएं मेरे साथ

संभव है,

तन्हाई भी मेरा साथ छोड़ दे

छोड़ तो तुम भी सकती हो

एक दिन मुझे

इसलिए मैं प्रेम करता हूं

अपनी कविताओं से

जैसी भी हों

कच्ची, पक्की, अनगढ़, कमजोर

वह तो नहीं जाएंगी मेरी डायरी से निकलकर बाहर कहीं

धोखा तो नहीं देंगी वह मनुष्यों की तरह

उपेक्षा और बेरूखी भी नहीं दिखाएंगी

उनके साथ वर्षों  का एक भरोसा तो है

मेरे लहू से बनी हैं, बनी हैं मेरी चीत्कारों से

आत्मा की पुकारों से

इसलिए मैं चाहता हूं

तुम्हें बनाना मैं अपनी एक खूबसूरत कविता

कविता बनकर

तुम रहे सकोगी मेरे पास हर वक्त

और एक दिन उनके छपने पर

तुम्हें भी मैं देख सकूंगा

एक किताब की शक्ल में

और किताबें तो डलिया को बदल देती हैं एक दिन

’’’’

नहीं बना सका तुम्हें

विमल कुमार

 

चाहकर भी मैं

तुम्हें अपनी पतंग नहीं बना सका

नहीं उड़ा सका

उसे अपनी छत पर

आसमान में 

मैं तुम्हें अपनी नाव भी

नहीं बना सका

पार कर लेता

मैं जिससे यह भंवर

मैं तुम्हें इस बरसात में

एक छाता भी नहीं बना सका

बच जाता मैं

भीगने से इस बारिश में

मैं तुम्हंे अपनी कलम भी

नहीं बना सका

नहीं बना सका स्याही

और न ही कागज

कुछ उकेर लेता अपना दर्द

लिख लेता कुछ ऐसा

जो होता जीवन में कुछ सार्थक

छत, घर, सीढ़ियां

दरवाजे और खिड़कियां बनाने की तो बात बहुत दूर।

मैं तुम्हें अपनी केाई चीज नहीं बना सका

मूर्त या अमूर्त

नहीं था वह हुनर मुझसे

किसी को अपना बनाने का

चाहता तो मैं था

तुम्हारी सांस बन जाना

चाहता था तो मैं

तुम बन जाती मेरे लिए हवा

तुम नहीं बनी कुछ तो

उतना दुख नहीं था

पर दुख इस बात का ज्यादा है

तुमने मुझे कुछ भी नहीं बनाया अपना

जबकि मैं तैयार था

तुम्हारा बहुत कुछ बनने को

पतंग से लेकर

आईने तक

और फिर सांस तक

खड़ा हूं मैं वर्षों से

रास्ते मंे तुम्हारे

फूल बनने को

आज तक

पर तुमने तो मुझे कांटा भी बनने नहीं दिया

जो उलझ कर थाम लेता तुम्हें तुम्हारे दुपट्टे सहित

’’’’

अगर मैं थोड़ा मर लेता

विमल कुमार

 

तुम्हें अगर मैं

अपनी बांहों में भर लेता

तो सुबह की हवा को

सीने में कर लेता

अगर मैं तुम्हें चूम लेता

तो फूलों की खुश्बू को

अपने भीतर कैद कर लेता

तुम्हारा हाथ पकड़ता

तो मानों तारों को यहीं से

छू लेता

पर तुम रही हमेशा से दूर

दूर रही मुझसे हवा

फूल, तारे, सब

मुझे नहीं होती कोई तकलीफ

तुमसे मिलकर

जीने के लिए

अगर मैं थोड़ा

मर लेता

तकलीफ है

कि तुम्हारी तसवीर को भी

सीने से नहीं लगा सका मैं

’’’’

प्रेम का निमित्त

विमल कुमार

 

देवी!

वह जो व्याकुलता थी

तुम्हारे दर्शन की

वह पुराने अर्थों  मंे

प्रेम नहीं था

अभिव्यक्ति का संकट था

युग प्रश्न भी

अनुतरित था

वह दरअसल एक पुकार थी

बेचैनी सी सीने मंे जो

जमाने की लहरें थीं

तट पर आने के लिए

उद्विग्न!

दुख को हलका करने का

एक उपक्रम था

उपक्रम था

तुम्हें जानने का

एक निमित्त था

बस!

मैं तो जानता था

प्रेम की गली

अति संकरी थी!

’’’’

नए आदमी से मुलाकात

विमल कुमार

 

तुम क्या इस नए आदमी से मिलोगी

जो अब नहीं रहा एक पत्थर

न रेत, न धुआं, न अंधेरा

न कोई चीख, न कोई पुकार

न कोई अर्न्तनाद,

न कोई विषाद

न कोई बात-बात पर विवाद

वह काफी बदल चुका है

जब बदल गई है हवाएं अपनी दिशाएं

पक्षियों ने बदल लिए जब अपने घोंसले

यात्रियों ने अपने रास्ते

किराएदारों ने अपने मकान

क्या तुम इस नए आदमी से मिलोगी

जो अब पुराने विमल कुमार की तरह नहीं है

उसने बदल दी है अपने चेहरे की रंगत

अपनी आवाज, अपनी आबोहवा

अपनी भाषा, अपना व्याकरण

अपनी जुल्फें, अपनी पतलून

जूते, जुराब, मफलर, कलम इत्यादि

वह अब चलता नहीं लंगड़ाता हुआ

नहीं बोलता कुछ हकलाता हुआ

नहीं हिलाता हाथ किसी को बिना समझाता हुआ

नहीं दिखता तुमसे मिलकर अब घबराता हुआ

इसलिए कहता हूं

एक बार तुम फिर मुझसे मिल लो

जितनी शिकायतें हैं उसे दूर कर

फूल की तरह जीवन में बगीचे में खिल लो!

’’’’

तुमसे मुलाकात

विमल कुमार

 

मिलकर तुमसे

अब मैं क्या करूंगा?

क्या कहूंगा?

चुभती रहेगी चुप्पी

पास जितने साल तुम्हारे रहूंगा

चाहता था बहना

लहरों की तरह

पर अब नहीं बहूंगा

दुख अपने भीतर

समुद्र का सहूंगा

जब भी मरूंगा

मरने से पहले

एक बार तुम्हें

याद जरूर करूंगा

’’’’

खाली हाथ

विमल कुमार

 

नहीं करूंगा

अब याचना

किसी चीज की

प्रेम की?

मित्रता की?

जीवन की खुशी की?

बिना मांगे

जितना मिल जाए

उससे ही रहूंगा संतुष्ट

अगर नहीं मिला

कुछ भी तो

कोई बात नहीं

खाली हाथ ही

चला जाऊंगा दुनिया से

तब कोई जख्म तो नहीं होगा

याचना के बाद

नहीं मिलने पर

जो होता है दर्द

कम से कम

वह दर्द तो नहीं होगा

पर प्रश्न यह भी है

आखिर कितनों ने मनमाफिक

इस जीवन को भोगा?

’’’’

चांद के बारे में कुछ कविताएं

विमल कुमार

1

मेरा चांद

मुझसे बोलता नहीं

न लिखता है खज

न देता है जवाब

न भेजता है कोई एसएमएस

न करता कोई ई-मेल

है इतना वह नाराज मुझसे

न मिलता कहीं भूल से

मेरे लिए पत्थर का एक टुकड़ा है

मेरा चांद

(यह मेरी खुशफहमी सही)

आखिर क्या बात है

लगता है, वह मुझसे अभी जुड़ा है

कितना भी बदल जाए

पर मेरे लिए वह

अब भी नहीं बुरा है?

2

चांद!

अपने दुख के बारे में

अब और न बताओ!

और वह गीत

तो हरगिज न सुनाओ

गाओ!

अलबत्ता,

जीवन का कोई नया राग सुनाओ!

3

मैंने पढ़ी एक दिन

चांद की आत्मकथा

बहुत दुख था उसमें

जमाने का भी दर्द था

फिर अखबार मंे पढ़ा

लगाया किसी ने उस पर आरोप

झूठी है यह आत्मकथा

नकली है उसकी व्यथा

समझ नहीं पाया

क्यों मिल रही है

चांद को यह सज़ा?

4

चांद की डायरी भी मैंने पढ़ी है

लगा, अपनी ही डायरी पढ़ रहा हूं

तारीखें...साल...

घटनाएं... सब कुछ नहीं

यहां तक कि लिखावट भी मेरी जैसी

डायरी भी वही

निहार डायरी

जिस पर बनी होती है

एक तसवीर

जो लगती है रात में

मुझे अक्सर डरावनी

5

चांद की कविताएं पढ़ीं

जो की थी उसने अनुदित

एक दिन उसकी कजरी सुनी

एक दिन दादरा

एक दिन टधा...

एक दिन चांद का एक लेख भी पढ़ा

किसी अखबार में

निजीकरण के सवाल पर

अच्छा नहीं लगा

मुझे चांद का

वह स्टैंड!

लेकिन उसके गाने

थे वाकई

बहुत मार्मिक

दर्द भरे!

में उस चांद का

क्या करूं

कई बार कुछ समझ में नहीं आता

चांद भी अपनी बात

कहां खुलकर

मुझे बताता!

6

एक दिन देखा

चांद का विज्ञापन!

विज्ञापन में वह शरमा रहा था

बाजार से क्या वह घबरा रहा था?

7

क्या चांद भी

वक्त के साथ बदल जाएगा?

रात ढल जाएगी

तो क्या वह भी ढल जाएगा?

कागज की नाव की तरह

गल जाएगा!

8

मैं इन दिनों लिख रहा हूं

चांद की जीवनी

उसमंे जाना जाएगा

मेरा भी इतिहास!

9

मनुष्य को चांद चाहिए

चांद को आखिर

क्या चाहिए?

क्या नहीं बताया उसने

आज तक

जितना था मन मंे उसके

उतना छिपाया

चांद पर पड़ा है

आखिर किस का साया?

10

ओह! चांद ने भी कर ली

मनुष्य की तरह

एक दिन आत्महत्या

क्या रहा होगा उसका दुख

मैं तबसे यही सोच रहा हूं

क्या वह भी असफल था

अपने जीवन में

धोखा दिया था उसे

किसी ने प्रेम में?

कौन था वह?

कोई तारा

कोई ग्रह

या पृथ्वी

या कोई मनुष्य?

जिसे वह करने लगा था

मन ही मन प्रेम

क्या नाम था

उसका?

अखबार मंे छपा था

बाद में उसने भी

कर ली थी

खुदकुशी

प्रेम की है

यह कैसी दुखद कथा?

’’’’

जैसे केाई जाल था

विमल कुमार

 

क्या कहीं नहीं था

वह प्रेम

सिर्फ एक

खयाल था?

पता नहीं कैसा था

उसका रंग

हरा था

नीला था

लाल था?

भाव था वह केवल

या उसका भी

दिक्-काल था

मछुआरों ने फेंका

जीवन की नदी में

जैसे एक जाल था!

’’’’

नहीं मांगूंगा प्रेम की कोई भीख

विमल कुमार

 

रही होगी कमी मुझमें ही, देवी!

नहीं किया इसलिए तुमने मुझसे प्यार

झांक रहा हूं

अपने कुएं में गहरे

कहीं गंदला तो नहीं है पानी

देख रहा हूं

अपने आईने में

कोई अंधरो तो नहीं बैठा है

पलथी मारे मेरे ाीतर

नहीं मांगूंगा

मैं तुमसे प्रेम की कोई भीख

देवी!

नहीं करूंगा, तुम्हें लज्जित

नहीं आऊंगा लेकर कोई कटोरा

पहले खुद को करूंगा परिमार्जित

झाड़ूंगा अपना शीशा

पोछूंगा अपनी खिड़कियां

बुहारूंगा धूल

फिर आऊंगा

तुम्हारे द्वार पर देवी!

पर तब भी नहीं करूंगा कोई उम्मीद

प्रेम तुम मुझसे करो ही

रंग मेरी खाली तस्वीर में भरो ही।

’’’’

प्रेम में कर्जदार

विमल कुमार

 

कर्जदार हूं देवी!

तुम्हारा बहुत बड़ा कर्जदार

तुम्हारे जख्मों का

जो आंसू दिए तुमने उनका

इसी कर्ज से

अब तक लिखता आया हूं

जीवन भर टीसता आया हूं

बहुत कर्ज है देवी!

तुम्हारा मुझे पर

झिड़का तुमने कई बार

फिर भी तुमने मुझे दिया बहुत कुछ उधार

फिर कैसे मैं कह सकता हूं

खाली हाथ लौट आया

मैं तुम्हारे द्वार

मेरी ओर से जुड़े रहेंगे

हमेशा कुछ अदृश्य तार

तुम कर दो भले ही अस्वीकार

चुकता करता हूंगा

तुम्हारा मैं हरदम ब्याज

टूट गया हो भले ही

भीतर कोई साज

’’’’

मत भेजो अर्जी

विमल कुमार

 

लौट जाओ मेरे द्वार से

भूल जाओ

ओ! बहुरुपिए

ले जाओ अपना भिक्षापात्र

मैं जानती हूं

बहेलिए इसी तरह आते हैं

कहते हैं वे आंखों मंे आंसू लेकर

प्रेम करता हूं तुमसे

हे देवी!

वे इस देह को पाना चाहते हैं

इसलिए करते हैं हर बार

नए तरीके से आखेट

उन्हें मैंने गिड़गिड़ाते देखा है

बहुरुपिए!

तुम्हें गर्म सलाखें चाहिए

गर्म पकौड़ियां....

इसलिए जब ठंडी हो जाती है

एक औरत

तो तुम खोज में निकल पड़ते हो

कई बार तो तुम

रचना के आवरयें करते हों छल

लौट जाओ मेरे द्वार से

भूल जाओ

बहुत विनम्र स्वरों में

कह रही हूं मैं

अकेली और प्यासी रहने दो मुझे

मत भेजो

तुम मुझे अपनी कोई अर्जी!

’’’’

अत्याचार

विमल कुमार

 

हे देवी!

तुम मुझसे प्यार न करो

पर न लगाओ

इतना बड़ा इल्जाम

कम से कम

बहेलिया

या बहुरुपिया न कहो

नहीं पहन रखा है

मैंने कोई मुखौटा

ले सकती हो

तुम मेरी अग्नि-परीक्षा

पारदर्शी है सब कुछ यहां

देख सकती हो

तुम मेरी आत्मा की तलहट

अत्याचार है

देवी!

कहना किसी को बहुरुपिया

या बहेलिया

जो तुमसे करता है

इतना गहरा प्रेम!

’’’’

पटाक्षेप

विमल कुमार

 

पटाक्षेप हो गया देवी!

देखते-देखते गिर गया पर्दा

गिरना ही था उसे

एक अंतराल के बाद

घंटी भी बज गई

उठने लगे सारे दर्शक

अपनी सीटों से

खाली हो गया सभागार कुछ ही देर में

क्या हासिल हुआ

क्या मिला

क्या जो देखा

वह बचा रह पाएगा सुरक्षित

जब तक खुला था पर्दा

जीवन था चारों तरफ धड़कता

जैसा भी हो

पर्दा गिर जाने के बाद

सभागार में

छा गई है

एक अजीब-सी वीरानी

पटाक्षेप के बाद

प्रेम?

नहीं, कभी नहीं

लिखना कोई अपनी कहानी...

’’’’

अभियुक्त का बयान

विमल कुमार

 

एक अभियुक्त

बार-बार कह रहा है

उससे गलती हो गई है

उसने सरेआम माफी भी मांग ली है

तो क्यों तुम उसे

फांसी देने पर तुले हो

क्यों लेना चाहते हो जान उसकी

क्यों घृणा करने लगे हो उससे

घृणा करो अपराध से

अपराधी से नहीं

वह भी मनुष्य है

हमारी तरह

हमारे भीतर भी छिपा है

कोई न कोई राक्षस

कोई इस राक्षस से डर जाता है

लेकिन आज कोई आदमी

अपने भीतर के राक्षस से लड़ रहा है

तो तुम भी उसे माफ कर दो

तुम्हारा बड़प्पन

इसी में छिपी है तुम्हारी मनुष्यता

फिर क्या फर्क रह जाएगा

बचा इस समाज में

’’’’

बिना तकिया के प्यार

विमल कुमार

 

मेरी पत्नी ने कहा

मैं कोई तकिया लगाकर नहीं सोती

मेरे तकिए में नींद मर गई है, नींद मर गई है तो ख्वाब सारे मर गए हैं

नहीं है उसमें मेरे आंसू

वे सूख गए हैं,

चांद तारों की बात तो बहुत दूर है, बादलों की तो मैं नहीं कर सकती कल्पना

अपने बच्चों के लिए

और तुम्हारे अच्छे स्वास्थ्य की कामना लिए

घसीट रही हूं यह जिंदगी

तकिया तो मैं देना चाहता था एक

एक अपनी पत्नी को

पर मेरे तकिए में न हवा है

न रूई है, सिलाई भी उघड़ी हुई

कांटे हैं उसमें छिपे अपने वक्त के

कांटों से ही मैं उलझता रहा हूं

अपनी पत्नी से वर्षों  से

बगैर तकिए के प्यार करता रहा हूं

’’’’

दिल की बुरी नहीं है वह औरत

विमल कुमार

 

लगता है, दिल की बुरी नहीं है

वह अकेली औरत

सुना है, सोती है वह

लगाकर चार तकिए

अपने सीने से

चार बच्चो की तरह

चिपकाकर

ख्वाब ही ख्वाब है

एक तकिए में उसके

पर ज्यादातर गए हैं

अब वे टूट

एक तकिए में जख्म है उसके

जो दिए हैं, जमाने ने उसे

एक तकिए में छिपे हैं

चांद-तारे

एक तकिए में समुद्र

जो आंसुओं से बना है उसके

गुस्से में जब वह आ जाती है

कहती है बार-बार

नहीं बनाऊंगी तुमसे कोई रिश्ता

नहीं करूंगी किस से कोई प्यार

बहुत दुख देता है जीवन मंे प्रेम

पहले से अब वह ज्यादा हो गया है

जटिल

करना यकीन किसी का

हो गया है अब मुश्किल

बहुत कर देखें हैं मैंने

भेड़ियों के चेहरे जहीन

कहता हूं मैं उससे

है पास मेरे

विश्वास का तकिया एक

लगाकर तो देखो तुम सर के नीचे

आ जाएगी तुम्हें बहुत सुंदर नींद उसमें

पर कहती है वह बार-बार

नहीं लूंगी तुमसे वह कोई तकिया

बहुत सारे लेकर तकिए

देख लिए हैं मैंने

हर तकिए में छिपा

रूई की जगह धोखा

दिल की बुरी नहीं है

वह औरत

लेकिन आ गया है ऐसा वक्त

कुछ मछलियों ने कर दिया है

सारे तालाब को गंदा

मैं हूं कि नहीं जीत पा रहा हूं

एक औरत का विश्वास इस शहर में

इससे बड़ी तकलीफ

मेरे जीवन में

और क्या हो सकती है

जब आदमी का

उठ जाए किसी पर से विश्वास ही

पर कोई आपसे हर बार मिलें

आप पर अविश्वास करता हुआ

और मैं मिलूं उससे हरदम डरता हुआ

’’’’

भेड़ियों से गुत्थगुत्थ

विमल कुमार

 

मैं रोज लड़ता हूं

अपने भीतर छिपे भेड़िये से

जो दिन प्रति दिन होते जा रहे हैं

खूंखार

लड़ता था रात में

अपने बिस्तर पर

नींद टूटने पर सुबह-सुबह

नहाते वक्त

गुसलखाने में भी

रास्ते में, बाजार में भी

ये भेड़िये हैं

इन्हें मांस चाहिए

ये किसी गुफा में

सोना चाहते हैं थोड़ी देर के लिए निश्चिंत

वक्त से ये भी परेशान हैं

कुछ सुख पाना चाहते हैं

पर मैं नहीं चाहता

इन भेड़ियों के लिए झूठ बोलूं

कोई जाल रचूं किसी के इर्द-गिर्द

अपनी आत्मा को बेचूं

धोखा दूं किसी को

दाना डालूं किसी चिड़िया के आगे

सुख किसे नहीं चाहिए!

मुझे भी

पर इस सुख के लिए

मैं गिरवी नहीं रख सकता

अपनी आत्मा को

गहरा अंतद्वर्द्व है मेरे मन में अभी भी

मुझे डर है

मैं कहीं अपनी लड़ाई न हार जाऊं

आखिर मैं भी किसी से

प्यार करता हूं

लेकिन भेड़िये भी ऐसे हैं

जो बीच-बीच मंे गुर्राते हैं

अपने दांत पैने करते हैं

अपने पंजे दिखाते हैं

मांस के लोथड़े

और गुफा के लिए

रक्त पिपासू और

हिंस्र होना ठीक नहीं है

क्या ये भेड़िये

प्रेम के भूखे हैं

मैं उनसे हर रोज लड़ते हुए

यही एक सवाल करता हूं

छोड़ दो मांसाहार

शाकाहरी हो जाओ

पर एक जवाब उठता है मेरे भीतर

और भेड़िये फिर नजर आते हैं

लाल आंख किए अपनी

मैं दौड़ रहा हूं अभी-अभी उन भेड़ियों के पीछे जंगल में

और सपने में गुत्थगुत्थ हो गया हूं

’’’’

शब्दों का ताजमहल

विमल कुमार

 

मैं शाहजहां नहीं हूं

नहीं है मेरे पास

इतनी धन-दौलत

हूं एक क्लर्क मामूली-सा

सौभाग्य से है मेरे पास

कुछ शब्द

और मैं करता हूं

कुछ कागज भी काला

मैं शब्दों का एक ताजमहल

बनाना चाहता हूं

तुम्हारे लिए

मुझे डर है और इसलिए माफ करना मुझे

कहीं मैं अपनी जिंदगी में अगर

तुम्हारे लिए

शब्दो की एक टूटी हुई

मस्जिद भी नहीं बना पाया तो तुम कितना हंसोगी

क्या तुम घर के ड्राइंगरूम में

शब्दों के रूप मंे

रखोगी मेरे इस ताजमहल को

या

टूटी हुई मस्जिद को

जिसको लेकर काफी मुकदमा भी चला

मुल्क़ में

और ख़ून-खराबे भी हुए

’’’’

अधूरा प्यार

विमल कुमार

 

कर रहा हूं

तुमसे अब तक मैं

अधूरा प्यार

नहीं जान पाया हूं

तुम्हें पूरा

अभी तो मैं

नहीं जान पाया हूं

खुद को

मरने के ठीक पहले

शायद मैं कह पाऊंगा

तुम्हें कितना जान पाया

कितना तुम्हें कर पाया

प्यार

पर चाहता तो मैं हमेश था

करना पूरा प्यार

जानना तुम्हें पूरा का पूरा

लेकिन कभी भी किसी को

पूरी तरह नहीं जान सकता

कोई चीज़ नहीं होती पूरी

इसलिए मैं करता रहूंगा

तुमसे मैं हमेशा अधूरा प्यार

’’’’

प्रेम करने से पहले

विमल कुमार

 

प्रेम करने से पहले

हमें देख लेना चाहिए

एक-दूसरे के घर का नक्शा

देख लेनी चाहिए

एक-दूसरे की चौहद्दी

कौन किस दिशा में खड़ा है

किसके पास किस तरह के सपने हैं

देख लेना चाहिए

एक-दूसरे का आंगन

एक दूसरे की छत

एक दूसरे की सीढ़ियां

और खिड़कियां भी

अगर नहीं है कोई घर

तो यह देख लेना चाहिए

कितना आसमान है सर के ऊपर

कितनी है पेड़ की छांट

प्रेम करने से पहले

जान लेना चाहिए

जीवन की परिभाषाएं

मृत्यु का सच

क्या है एक दूसरे की

घबराहटें, साहस एक-दूसरे का

कौन कितना समझता है

दुख

कौन देता है महत्व

कितना संघर्ष को

है कितना धैर्य

यह पता लगा लेना

तो और भी चाहिए

किसके भीतर छिपा है

कितना लालच

कितना घृणा

कौन कितना है क्रूर

और हिंस्र

अगर प्रेम करने से पहले

एक-दूसरे की डायरी

पढ़ लें हम सब

तो बहुत कुछ अंदाजा लगाया जा सकता है

प्रेम करने से पहले

हमें एक-दूसरे के भीतर

झांककर देख लेना चाहिए

जैसे हम देखते हैं

झांककर कोई कुआं

कितना पानी है उसके अंदर

एक-दूसरे के कंधे पर जमी

धूल भी झाड़ लेनी चाहिए

ताकि पता चले

कितना मजबूत है यह कंधा

प्रेम करने से पहले

इतना सोच

जरूर लेना चाहिए

कि बाद में पछताना न पड़े

और कोई न लगाए

एक-दूसरे पर तोहमत

ज्वार की तरह

जो आता है प्रेम

वह छिन्न-भिन्न कर देता है

चीजों को

प्रेम सृजन का नाम है

ध्वंस का नहीं

यह बात दोनों को

याद रखनी चाहिए अच्छी तरह

और इसलिए नहीं करना चाहिए क्रोध

अगर क्रोध आ ही गया

तो माफी मांग लेनी चाहिए

ईमानदारी से

बिना कुछ सोचे समझे

किसी के प्रेम मंे पड़ जाना

बहुत दुखदायी है

आत्म संहारक भी

लेकिन जब किसी का किसी पर

उमड़ता है प्रेम

तो बुद्धि काम नहीं आती

हार जाता है

मस्तिष्क

धरी की धरी रह जाती है

हर सोची समझी चीज

पर एक जद्दोजहद भी

चलती रहती है

मनुष्य के भीतर

तर्क और भावना के बीच

किसी की भावना जीत जाती है

तो किसी का तर्क जीत जाता है

और इस तरह हार जाता है मनुष्य

पड़ जाता है किसी के प्रेम में फिर बुरी तरह

’’’’

अलबम के आंसू

विमल कुमार

 

मैंने तुम्हें एक दिन

लाने को कहा था

अपना अलबम

चाहता था मैं देखना

उसमें बचपन की तुम्हारी तस्वीरें

कैसी थीं तुम स्कूल में

फ्राक कर रंग कैसा था तुम्हारा

और कॉलेज के दिनों में तुम कैसी दिखती थी

चाहता था मैं यह भी देखना

तुम्हारी मां कैसी है

क्या मेरी मां की तरह

पीठ पर है उसके भी जख्म

क्या सपने उनके भी हैं टूटे हुए कटी हुई पतंगों की तरह

और तुम्हारे पिता की मूंछें

क्या मेरे पिता से भी मिलती है

चाहता था मैं यह जानना

तुम्हारा घर कैसा है

क्या मेरे घर की तरह चूता है

कांपती हैं उसकी भी दवारें

और किवाड़ में बोलते रहते हैं झिंगुर रात में

खिड़कियां रहती हैं गुमसुम

उदास परियों की तरह

आंगन में नीम के तले

खुशी का कोई टुकड़ा है

तुम्हारे यहां भी फैला धूल में

पर तुम नहीं लाई

लाख कहने पर भी

अपना अलबम

क्या चाहती थी तुम

मुझसे छिपाना

उन तस्वीरों के दर्द?

उनके पते?

तुमने भी कभी नहीं मांगा

मुझसे मेरे घर का कोई अलबम

तुम क्यों नहीं चाहती थी जानना

उन ब्लैक एंड व्हाईट

जमाने की तस्वीरों की कहानियां

क्या तस्वीरें अपने वक्त का

इतिहास बताते हुए

रोने लगती हैं नई नवेली दुल्हनों की तरह

और उसकी आंखों से

बहते हैं आंसू

अलबम से अगर केाई

आंसू गिरे

तो मैं भी उन तस्वीरों को नहीं चाहूंगा देखना

तस्वीरों के जख्म

आदमी के जख्म से

ज्यादा गहरे होते हैं


शायद यही कारण है

कि तुम आज तक नहीं

लाई मेरे पास अपना अलबम

मैं तो अपनी यादों का

कोई अलबम भी नहीं

चाहता बनाना

और इसलिए

अपनी कोई तस्वीर नहीं

खींचना चाहता हूं

तुम्हारे साथ मेरी

एक भी तस्वीर नहीं है

जो बीते हुए वक्त की

याद दिला सके मुझे

जो बहुत कड़वी हो चली है

इस शाम के धुंधलके में

जब बारिश बहुत तेज हो गई है

अचानक

’’’’

प्रेम क्या है?

विमल कुमार

 

प्रेम

दूसरे को जानना भी है

खुद को पहचानना भी है

गलत को गलत

सही को सही

मानना भी है

प्रेम गुसलखाने में

गाना भी है

नहाना भी है

किसी को अपने घर

खाने पर बुलाना भी है

किसी का दुःख-दर्द सुनना

और अपना बताना भी है

प्रेम

अपना हाथ देकर

किसी को उठाना भी है

कांटे हमें कहीं

तो उसे निकालना भी है

पत्थर है कोई रास्ते में

तो उसे हटाना भी है

प्रेम

अगर मान-मनौव्वल है

तो कुछ

उलाहना भी है

प्रेम

जिंदगी भर का हिसाब है

जोड़कर

उसमें कुछ घटाना भी है

प्रेम जितना जताना भी है

उतना छिपाना भी है

प्रेम में आंसू बहाना भी है

मुस्कराना भी है।

’’’’

सुख-दुःख

विमल कुमार

 

वह सुख लेकर मैं

क्या करूंगा

जिससे किसी को दुःख होता हो

मैं तो किसी के दुख में दुखी होकर ही

सुख की तलाश में

निकला था

यह कैसा सुख मिला मुझे

जिसमें दुख भी

छिपा हुआ है

क्या दुख के भीतर ही

सुख मिला हुआ है!

’’’’

अदृश्य जख्में

विमल कुमार

 

पूरी दुनिया देखती है

जब एक पूल टूटता है

फोटोग्राफर खींचते हैं

उसकी तस्वीरें

अखबारों में वह

छपता भी है

एक मकान भी ढहता है

तो पूरा मुहल्ला देखता है

एक फूल भी टूटता है, एक पता भी

तो वह दिखाई देता है गिनता है

पार्क में सबको

छिप नहीं सकतीं

ये घटनाएं छिपाने पर भी

जब टूटते हैं रिश्ते

तो दिखाई भी नहीं देता

पूरी दुनिया को

आवाज भी नहीं होती

और घर में भी पता नहीं चलता

मालूम होता है केवल उन्हें

जिनके बीच में ये रिश्ते

कई लोग तो

छिपा लेते हैं

अपने भीतर

जख्मों की तरह

अपने सीने में

उसे

पर टूटे हुए पूल को नहीं

छिपाया जा सकता

नहीं छिपाया जा सकता

ढह गए मकान को

कई बार साथ-साथ

बैठे रहते हैं दो जन

और किसी तीसरे को

पता भी नहीं चलता

दरक गए हैं कितने

दोनों के बीच

खूबसूरत रिश्ते

सच तो यह है

कि दरक गए रिश्तों की

कोई तसवीर नहीं

खींची जा सकती

कभी किसी कैमरे से

जो भीतर ही भीतर

टीस रहे हैं जख्म की तरह

टूटै हुए रिश्तों के पीछे

छिपा था कितना प्रेम

इसका तो कभी

पता ही नहीं चलता

’’’’

प्रेम संवाद

विमल कुमार

 

बिना मिले भी

क्या नहीं किया जा सकता

किसी से प्रेम

क्यों जरूरी है मिलना

सोचता हूं

क्या बिना लिखे खत भी

नहीं किया जा सकता प्रेम

बिना बोले

बिना किए बातचीत

बिना घुमाए टेलीफोन

बिना पूछे हालचाल

मौन में भी रहता है

प्रेम

और मौन से परे भी

होता है प्रेम

प्रेम दरअसल

एक संवाद है

इसलिए चाहता है आदमी

जिससे करता है वह प्रेम

उससे वह मिले, कुछ कहे

और हल्का हो जाए उसका मन

जो भरा हुआ है जामाने की गर्द से

या लिखे खत

या बात करे

या नहीं तो चुप ही रहे

कई बार तो उसकी तस्वीर

देखता भी है

संवाद कायम करता है उससे

किसी को याद करके भी

आदमी

कोशिश करता है

संवाद कायम करने की

यह अलग बात है

कि कई बार वह टूट जाता है

बीच-बीच में वह

संवाद

जैसे टूट जाते हैं

बीच-बीच में किसी

पुरानी फिल्मों की रीले

नहीं मिल पाती हैं तरंगे

आपस में चाहने पर भी

लेकिन याद रहता है हर किसी को

अपनी स्मृति के कोने में

किसी ने उसके साथ

जिंदगी के किसी मोड़ पर

संवाद बनाने की

की थी कभी कोशिश

भले ही हो गई हो वह आज नाकाम

अगर प्रेम हो मन में कहीं तो

मरने के बाद भी

कायम रहता है यह इकतरफा संवाद

’’’’

सभ्य भेड़िये

विमल कुमार

 

जिन लोगों ने मुझे कहा-‘छिनाल’

उनमंे से कइयों को मैं जानती हूं

जानती हूं

वे रात के अंधेरे में चाहते हैं

मुझसे मिलना

बताए बगैर अपनी बीवियों को

कई तो थे कल तक उनमें

मेरे भी दोस्त

कहते थे दोनों जगह

हो गया हूं-अंधा तुम्हारे प्रेम में

दरअसल उन्हें नहीं चाहिए था प्रेम

हैं वे भीतर से भेड़िये

आखेट करने निकले हैं

इस शहर में

जिन लोगों ने मुझे बचाया था

इन भेड़ियों से

उनमें से भी कईयों को

जानती हूं मैं

हैं ये भी भेड़िये

सभ्य और शालीन

रहते हैं लगाए मुखौटे

अपने चेहरे पर हरदम

चाहते हैं इन्हें भी मिल जाए

कोई हड्डी

गुपचुप तरीके से

नहीं हो खबर किसी को कानो-कान भी

जानती हूं उन्हें भी,

जां नहीं जाती बिस्तरों पर किसी के

पर जाने का एक स्वांग

रचती हैं

भ्रम में फंसाए रखती हैं भेडिऋयों को

अपने रंगीन जादू से

जो चली जाती हैं बिस्तर पर

भोली और निर्दोष हैं

पर जो नहीं जाती

वे अपना काम निकाल लेती हैं

बड़ी चालाकी और बारीकी से

---करती हैं

अपने स्त्रीत्व को बचाए

रखने के लिए

पर्दे के पीछे

दरअसल ---कुछ लोग होते हैं ऐसे

जो सभ्य कहे जाते हैं

पर सारा खेल वही खेलते हैं

मैं छिनाल जरूर कही जाती हूं

पर इस तरह का कोई खेल नहीं खेलती

जो लोग खेल खेलते हैं

वे कभी पकड़े नहीं जाते

सपने भी नहीं आते

किसी विवाद में

चुपचाप रहते हैं

मैं सबकुछ जानती हूं

पक्ष और विपक्ष भी

इसलिए लड़नी पड़ती है

मुझे अपनी लड़ाई

दोनों मोर्चों पर

हर बार इतिहास में

’’’’

अवांछित प्यार

विमल कुमार

 

तुम मत करना प्यार

पर मैं तुम्हें प्यार करके ही जाऊंगा

इस दुनिया से

इस अधेड़ उम्र में

एक पेड़ बनूंगा

और तुम्हें रास्ते में छांह देकर जाऊंगा

जहां-जहां से तुम गुजरोगी

प्यार करूंगा

बादल बनकर

तुम्हारे आंगन में खूब बरसते हुए

फूल बनकर

करूंगा प्यार

और खुश्बू दे जाऊंगा तरह-तरह की

तुम्हारे बदन में

चंद्रमा बनकर

शीतलता देकर जाऊंगा

मत करना प्यार

पर तुम्हारे सुख-दुख में

रहूंगा साथ

तुम्हारी अवांछित छाया की तरह

तुम्हें हो सकता है

यह सब नागवार भी गुजरे

यह शख्स अनोखा

क्यों चाहता है मुझे करना इस तरह बेइंतहा प्यार

जबकि मैं नहीं चाहती

पर तुम्हें मैं अपने साथ

बांधने के लिए नहीं करूंगा प्यार

नहीं करूंगा कुछ पाने के लिए जो भौतिक हो

लहरों की तरह करूंगा प्यार

दौड़ते हुए तुम्हारी तरफ आऊंगा

तुम मत समझना

कि आज स्वाभिमान नहीं है मेरे पास

और खुद को समर्पित किए जा रहा हूं

बिना तुमसे पूछे दुत्कारे

तुम्हारे चरणों पर

भिगोते हुए तुम्हें अपने पानी से

कर रहा हूं प्यार

करूंगा तुम्हें प्यार

बिना तुम्हें बताए

बिना लिखे कोई चिट्ठी

बिना किए कोई टेलीफोन

और बिना मिले भी

अगर तुमने मिलने से भी मना कर दिया तो

तुम्हें देखा है

किस तरह आकाश में सुदूर

एक तारा टिमटिमाता है

और वह छाती को करता है कितना प्यार

तुम मेरे प्यार को भले ही न समझ पाओ

पर मैं तुम्हें

मरने के बाद

राख बनकर भी करूंगा प्यार

जिसमें रसोई घर में

तुम मांज सको

अपने जूठे बर्तन

कम से कम

इसी बहाने

तुम समझोगी

राख का भी है कितना

महत्व हमारे जीवन में

अपने से तो प्यार हर कोई करता है

करता है अपने बाल-बच्चों

और पति तथा पत्नी से

मैं तो दूसरों से भी

प्यार करके जाऊंगा

एक दिन इस दुनिया से

तुम कहोगी खीझकर मेरी मृत्यु के बाद

कितना अवांछित है इस तरह का प्यार

’’’’

सौ खून माफ है आक्सीजन के

विमल कुमार

 

धीरे-धीरे तुम मेरे लिए

आक्सीजन में तब्दील हो गई

जैसे कोई बीज बदल जाता है

एक दिन फूल की शक्ल में

और बीज को भी नहीं मालूम होता है

वह फूल में बदल गया

फूल को भी नहीं मालूम हेाता है

वह कभी बीज था

कोई कैसे करेगा यकीन

हाड़-मांस का पुतला कैसे बदल सकता है

आक्सीजन में

पर तुम हवा बनकर आई थी मेरे लिए

तुम्हें मालूम नहीं था

कि तुम किसी के लिए आक्सीजन बन गई हो इन दिनों

बेखबर थी तुम

अपने इस परिवर्तन से

जैसे बेखबर हैं बीज

क्या पता वह भी किसी के लिए

फूल में तब्दील हुआ हो

जब बाहर की हवा से

सांस नहीं ले पा रहा था मैं

गर्मी और उमस इतनी थी

मेरे सीने में

भर गए थे कीटाणु

भर गया था धुआं इतना

जख्म हो गए थे गहरे

तुम्हें ही मैं मानने लगा था आक्सीजन

मुझे लगा था

अब मेरे सांस चलने लगेगी

मैं थोड़ी देर और जी माऊंगा

अस्पताल में

मैं अपनी सांस से

मिलने के लिए ही

तुमसे समय मांगता था

तुम तो मेरे लिए अदृश्य थी

हवा जो ठहरी

बैठी रहती थी पास मेरे

मैं तुमसे गुफ्तगू थोड़े ही करता था

मैं तो सांस ले रहा था

बातचीत में भी

देखो, कितनी तेज चलने लगती थी धौंकनी मेरी

सीने मंे जल रहा था

आक्सीजन धीरे-धीरे

जैसे मरीज के शरीर में खून जाता है

बूंद-बूंद करके

जब यह आक्सीजन

खत्म होने लगता है

छटपटाने लगता हूं मैं

वक्त मेरा गला दबाने लगता है

भोंकने लगता है

पेट मंे मेरे केाई छूरा

मैं तुमसे अनुरोध करता हूं

क्या आज तुम फिर

चंद मिनटों के लिए मिल पाओगी

सांस लेने में हो रही है

तकलीफ मुझे

कोई कैसे कर सकता है

कभी नाराज किसी आक्सीजन को

कोई कैसे पहुंचा सकता है दुख उसे

लाख वह कर ले गलतियां

जो आदमी

किसी के लिए

आक्सीजन बनकर आए

थोड़ी देर के लिए ही सही

उसका उपकार कैसे

भूला जा सकता है

जीवन में कभी भी

सौ खून माफ हैं इस आक्सीजन के!

भले ही वह बन जाए मेरे जीवन में

एक दिन कार्बनडायक्साइड

’’’’

प्यासा कुआं

विमल कुमार

 

हर बार

जाता है प्यासा

कुएं के पास

अपना लोटा और डोरी लिए

वह डालता है उसे

कुएं मंे बहुत उम्मीद के साथ

कई बार नहीं निकलता है पानी

फिर भी वह जारी रखता है कोशिश अपनी मरने तक

देखता है कुआं

उस प्यासे को दम तोड़ते हुए कई बार

क्या कुएं को मिलता है सुख इससे

कुआं भी कहता है

नहीं मिटा सकता

मैं सबकी प्यास

यह पानी बचा कर रखा है मैंने

किसी के लिए

पर कुआं

कभी नहीं जाता

किसी के पास

उसके निकट भी नहीं

जिसके लिए उसने पानी बचा रखा है

आखिर मैंने कुआं हो गया

इतना निर्दयी

क्या वह भी कभी था प्यासा

पिछले जन्म में

और किसी कुएं ने नहीं बुझाई थी

उसकी प्यास, उसके घर जाके

’’’’

प्यार में कुछ भी नहीं छिपाना चाहिए

विमल कुमार

 

जब कोई आदमी

करता है किसी से

सच्चा प्यार

तो सबकुछ बताना चाहता है

आसमान का रंग

इस समय कैसा है

कैसी हो रही है बारिश

अचानक उसके शहर में

कितनी उल्लास है तरंगें

समुद्र में

कितना --,कितना गर्जन

कितनी गहरी है रात

कितनी उदासी

वह अपनी हर खुशी

बताना चाहता है

जब उड़ी आसमान पर पतंगें उसकी

तो वह इस खुशी को फौरन

एक संदेश की तरह चाहता है भेजना

यहां तक कि उसके घर के सामने

तार पर बैठी हो कोई चिड़िया

तो वह भी बताना चाहता है

चाहता है यह भी बताना

आज उसके आंगन में एक फूल खिला है

धूप निकली है बहुत दिनों के बाद

पार्क में

हालांकि कुछ लोग यह भी

कहते हैं इसमें बताना क्या है

क्या नहीं है उसे मालूम

पर जब आदमी करता है

किसी से सच्चा प्यार

तो आटे दाल और

सब्जियों के दाम भी

चाहता है बताना

किस तरह बढ़ गई है महंगाई

और प्याज के भाव

चढ़ गए आसमान पर

उफ! यह ट्रैफिक जाम

किस तरह झर रहा है पलस्तर

दीवार पर चल रहे हैं

एक छिपकली

किस तरह जर्जर हो गया है

यह मकान

बढ़ गया है कितना

किराया

और स्कूल की फीस

वह खाने के स्वाद

पानी का रंग

मिट्टी की सोंधी सोंधी खुश्बू

भी बताना चाहता है

अपने समय की राजनीति

और दुष्चक्र तो जरूर ही

झूठ और सच के भेद को भी

फरेब को भी

बताना चाहता है

बताना चाहता है

कोई गाना

किस तरह उसके दिल को छू गया एक दिन

पर यह भी बताना चाहता है

नौकरी करवाता किस तरह---रहा

इन दिनों

और नहीं मिल पा रही

समय पर

तनख्वाह....

वह यह भी बताना चाहता है

उसके मन में है

किस तरह की है गुत्थियों

किस तरह की उलझनें

किस तरह से विचलन-आकर्षण

वह अपनी कमजोरी या कमी को बताए

बताए अपने लालच

यह घृणा को

तो समझिए

वाकई वह प्यार करता है

आपसे सच्चा

अगर वह आदमी

नहीं बताना चाहता है

तो समझो वह कुछ

छिपा रहा है

सच्चा प्यार

करना है

तो किसी को

अपने पुण्य और पाप भी बताने चाहिए

प्यार में कुछ भी नहीं छिपाना चाहिए

अगर वह किसी और से प्यार करने लगा है

तो यह बात उसे सबसे पहले बतानी चाहिए

जितना पारदर्शी होगा प्यार

उतना ही होगा वह

मजबूत

और तूफान में भी वह टिकेगा

हरदम

कोई ताकत

नहीं हिला सकती उसे

’’’’

शव से प्रेम

विमल कुमार

 

मैं जानता हूं

एक ऐसी औरत को

जो करती है शव से ही प्यार

चूमती है उसके होठों को

बालों को सहलाती है

भरती है उसे अपनी बांहों में

लिखती है उसे खत भी

भेजती है आसमान के पते पर

मैंने उससे कहा

अब तुम क्यों करती हो

उस शव से प्यार

जीते जी तुमने नहीं किया

जबकि वह मर गया

तुमसे प्यार की भीख मांगता हुआ

घुट-घुट कर

उसने सिसकते हुए कहा

मैं केवल शव से

करती हूं इसलिए प्यार

मुर्दे मर्द की तरह कभी धोखा नहीं देते।

’’’’

प्रेम की परिभाषा

विमल कुमार

 

क्या है

आखिर प्रेम की परिभाषा?

परिभाषा मित्रता की?

सारा झगड़ा-फसाद

परिभाषाओं को लेकर ही है

इस दुनिया में

सबके लिए अलग अलग है

परिभाषा लोकतंत्र की

राष्ट्र की परिभाषा

यहां तक की भूख की भी

कितने खून-खराबे हुए हैं

धर्म की परिभाषा को लेकर

अब तक इतिहास में

आप जानते ही हैं

धर्म निरपेक्षता भी

इसी पचड़े में पड़ी हुई है अपने मुल्को में

लोग अपने-अपने हिसाब से

बदल देते हैं

जीवन कोई विज्ञान नहीं है

कि उसकी एक परिभाषा तय हो

जैसे कि गुरूत्वाकर्षण की परिभाषा

क्या परिभाषाओं का संबंध स्वार्थ से भी है

क्या --छिपा है कोई स्वार्थ

जब मैं कहता हूं

अमुक परिभाषा है मेरे लिए प्रेम की

मित्रता की

क्या यह सच है

प्रेम आदमी जिंदगी भर

अपने आप से ही करता है

अपनी परिभाषा से करता है

और कहता है

कि वह दूसरों से कर रहा है प्यार

तो फिर आदमी क्यों नहीं बदलता

अपनी परिभाषा

क्या प्रेम में

व्यक्ति को नहीं बदलना चाहिए

प्रेम की अपनी परिभाषा

मित्रता की परिभाषा

अगर नहीं चाहता है कोई बदलना

तो फिर वह कैसे कहता है

वह जिंदगी भर

किसी का

मित्र बना रहा सकता है

थोड़ी असहमति की गुंजाइश भी

हमें रखनी चाहिए

आपस में

या फिर एक-दूसरे के लिए

परिभाषा ही बदल लेनी चाहिए

चीजों की

यह जानते हुए

कि मृत्यु ही अटल है

कितना कोई भी बताए

उसकी अपनी परिभाषा

पर सत्य यह है

कि मरना सबको है

एक दिन

तो फिर क्यों झगड़े हो जीवन में

इतने परिभाषाओं को लेकर

’’’’

जो धधकता रहता है

विमल कुमार

 

तुम्हारे भीतर की चिड़िया कैसी है
क्या अभी भी वो आसमान में उड़ती रहती है


क्या अभी भी वो उसी तरह गाती रहती है

क्या उसका घोंसला सुरक्षित है
क्या उसे समय के बहेलिए ने
अपने जाल में फंसा नहीं रखा है


तुम्हारे भीतर की नदी अब कैसी है
क्या अब भी उसी तरह वो बह रही है

या सूख गयी है
अभी भी उसकी लहरें तट को छूती हैं
अभी भी लोग खड़े हैं वहां अपनी प्यास बुझाने को
अभी भी नावें चल रही हैं या उलट गयी हैं

तुम्हारे भीतर का आसमान कैसा है
उसी तरह फैला नीला दूर दूर तक
चांद अभी भी है चमकता
तारे अभी छिटके
या वे मर गये हैं
और चांद भी बुझ गया है

तुम्हारे भीतर
अभी भी एक फूल खिला है
या मुर्झा गया है गर्मी में
खुशबू अभी भी है बची या उड़ गयी है

बरसों बाद मिली हो तुम
पहचान में नहीं आती
दांत मेरे भी सारे टूट गये हैं
बाल तुम्हारे भी पक गये हैं
चांदी के तार की तरह

मैं तो दादा बन गया हूं
तुम क्या नानी नहीं बनी हो अब तक

ये बताओ
तुम्हारी आग अभी भी वैसी ही जल रही है
या चिराग सब बुझ गये हैं

मेरे सीने में
तुम्हें देखकर अब भी कुछ धधकता है

मुझे अब मरने दो
पर मेरी इस
आग को बचालो
इसी के सहारे
मैं अब तक
तुम्हारे बगैर भी जी पाया हूं
इस नामुराद दुनिया में

xxxxx

मुंबई मेरी जान

विमल कुमार

 

ओह, फिर तुम घायल हो गयी हो
मुंबई मेरी जान
फिर तड़पने लगी हो
फिर छटपटाने लगी हो
मछली की तरह
रेत पर दर्द भरे गीत गाने लगी हो।

फिर तुम्हारे सीने से रिसने लगा है खून
दूध की जगह
फिर तुम्हारी मैं सुन रहा चीख पुकार
फिर लाशों की दुर्गंध
फिर लगा उनका अंबार
फिर वही बदहवासी
फिर वही घबराहट
फिर वही बेचैनी
फिर वही जहालत।

ओह, फिर तुम घायल हो गयी
मुंबई मेरी जान
मेरी बांहों में आकर
दे रही हो अपनी जान
कभी रात की बांहों में तुम्हें देखा था
कभी फुटपाथ पर लोगों की आहों में तुम्हें देखा था
तुम्हें कभी प्यार और जिस्म की चाहों में देखा था
तुम्हें कभी रंगीन रोशनी और एश्वर्य की नावों में देखा था
तुम्हें नशे में भी डूबते हुए भी देखा था
तुम्हारे भीतर कुछ खंजर की तरह चुभता हुआ भी देखा था।

तुम फिर घायल हो गई हो
मुंबई मेरी जान
तुम अब सुबह सुबह सुबकने लगी हो
रात में तारों के साथ दम तोड़ने लगी हो
तुम अब मेरा साथ भी छोड़ने लगी हो
ओह, फिर तुम घायल हो गई हो मेरी जान।

बार बार उघड़ जाते हैं तुम्हारे जख्म
बार बार सुनाई देता है
तुम्हारा दुःख भी नहीं है किसी से कम
तुम्हारे दुःख से पूरा मुल्क है परेशान
कहां से आ गया शहर में हैवान
मैंने जब से तुम्हें टीवी पर देखा है
झवेरी बाजार में उठता शोर देखा है
खूनी पंजों को अपने चारों ओर देखा है।

मैं रात में खाना नहीं खा पाया हूं अब तक
तुम्हारे लिए कोई गाना नहीं गा पाया हूं अब तक
एक गिलास पानी भी ठीक से नहीें पी पाया हूं अब तक
एक कौर रोटी का भी नहीं मेरे हाथ में है
जानता हूं आखिर सच किस बात में है
धोखा वही देता है जो अब तक तुम्हारे पास में है
फिर लगता है क्या बीज कोई मुल्क के इतिहास में है

ओह, फिर तुम घायल हो गई
मुंबई मेरी जान
धू धू कर जलने लगे होटल और मकान
घिर गई लपटों से अब दुकान

कौन है असली खूनी कौन जिम्मेदार
हर बार रह जाता है यह अनुत्तरित सवाल
पूछती हैं बस्तियां पूछती है चाल
कौन है पर्दे के बाहर कौन छिपा पर्दे के पार
जीवन तो चलता ही रहता है फिर भी
ठीक नहीं इस तरह मौत से हार
xxxx

Wounded again, Mumbai meri jaan!

Vimal Kumar

 

Ah! You are wounded once again

Munbai meri jaan!

Your song becomes the anguished cry

Of a fish out of water

Writhing in pains

On dry sands. 

Once more blood, not milk

Oozes from the mother’s breast,

As I hear you wailing over again.

Yet again,

The stench of corpses piled up,

The same perplexity

Bewilderment

Agitation

The same brutality once again.

Ah! You are wounded once again

Mumbai meri jaan!

You breathe your last in my arms.

I have seen you Mumbai

In night’s ardent embrace,

On the footpaths in the sighs of homeless,

In love, romance, passion, floating through

The magical glow on yachts of opulence.

I have seen you drunk with 

A dagger in your heart stuck.

You are wounded again

Mumbai meri jaan!

You begin to sob now at dawn,

Melt away with the stars.

You are abandoning me too now

Ah! My love! You lie wounded again! 

Your sores break open once more,

And yet again the nation with you

Agonizes in your pain, wondering

From which crevice did the fiend

His entry made? You reached me

Through the T.V. screen, with the din

Of Zaveri Bazar pounding my ears.

I bleed with you, like you

With gory claws pinning me down.



Hungry, dumb, and song-less,

I can no morsel of food eat or pick,

My throat dry holds no song for you,

Yet, deep inside me is a buried the truth

Of you being stabbed by the hand

You continue to kiss; of being strangled

By vines of trees sown in history.

Ah! You are wounded again

Mumbai meri jaan!

Homes, hotels, shops, all bursting

In flames, have been to ashes reduced.

Who is at fault? Who accountable?

The question mark seems eternal.

The shanties and slums all around wonder

If there stands someone behind a veil

Or are all out there to be seen? ‘Live on we will,’

They say, ‘But hard is such defeat, such death.’


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